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रोजगार ना मिलने तक बेरोजगारी भत्ता पाना युवाओं का अधिकार है…

रोजगार या बेरोजगारी भत्ता की मांग कितनी गंभीर : देश में यदि कोई रोजगार या बेरोजगारी भत्ते की मांग करें तो उसे भिखारी से भी गिरी नजरों से देखा जाता है। खैर अब लोग थोड़े जागरूक हुए हैं और इसे सरकार की ही जिम्मेदारी मानते हैं लेकिन सरकार एक नया बहाना ढूढ़ रही है। संसद में कहती है कि हम बेरोजगारी भत्ता नहीं रोजगार देंगे। और सड़क पर कहती है कि हर व्यक्ति को रोजगार देना संभव नहीं। वे स्वरोजगार स्थापित करें बैंक लोन देगी। जब सत्ताधारी दल ये मान रहा है कि सबको रोजगार देना संभव नहीं तो सभी स्वरोजगार स्थापित कर लेंगे क्या ये संभव है? लेकिन जनता को 60 सालों से टोपी पहना रहे हैं तो आज भी सही।

रोजगार या बेरोजगारी भत्ता की मांग कितनी गंभीर : देश में यदि कोई रोजगार या बेरोजगारी भत्ते की मांग करें तो उसे भिखारी से भी गिरी नजरों से देखा जाता है। खैर अब लोग थोड़े जागरूक हुए हैं और इसे सरकार की ही जिम्मेदारी मानते हैं लेकिन सरकार एक नया बहाना ढूढ़ रही है। संसद में कहती है कि हम बेरोजगारी भत्ता नहीं रोजगार देंगे। और सड़क पर कहती है कि हर व्यक्ति को रोजगार देना संभव नहीं। वे स्वरोजगार स्थापित करें बैंक लोन देगी। जब सत्ताधारी दल ये मान रहा है कि सबको रोजगार देना संभव नहीं तो सभी स्वरोजगार स्थापित कर लेंगे क्या ये संभव है? लेकिन जनता को 60 सालों से टोपी पहना रहे हैं तो आज भी सही।

मुस्लिम देशों में आतंकवाद क्यों? : अपने कभी सोचा है कि आतंकवाद मुस्लिम देशों में क्यों पनपता है। यूरोपीय देशों में क्यों नहीं? कारण है बेरोजगारी भत्ता। जो मुस्लिम देशों में हराम माना जाता है। यूरोप या अमेरिका की सरकार बच्चे के जन्म से लेकर मरण तक का जिम्मा उठती है तो लोगों के अंदर देश प्रेम की भावना है। बच्चे के भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य रोजगार, बेरोजगारी भत्ता, पेंशन सब सरकार उपलब्ध करती है। और जनता से टैक्स भी इन्हीं कामो के लिए लेती है। और यह सिर्फ 10 से 20 प्रतिशत टैक्स में हो जाता है। भारत में 60 से 70 प्रतिशत टैक्स ले लिया जाता है। यदि आप टैक्स नहीं दिए तो ये दंडनीय अपराध है। और सरकार रोजगार ना दे तो उस पर चर्चा ना करें। चाइना की बात करें तो सरकार जितना टैक्स पाती थी उसे अधिकांशतः स्वास्थ्य, बेरोजगारी भत्ता और पेंशन पर खर्च करती थी। जानती थी की पब्लिक के पास जितना पैसा जायेगा वे उतनी खरीदी करेंगे। तो मुद्रा का साख बढ़ेगा। सरकार को कल ज्यादा टैक्स मिलेगा।

भारत में भी वही हालात :  भारत सरकार वर्तमान वित्त वर्ष में आतंरिक सुरक्षा तेज करने के लिए ढाई लाख पुलिसकर्मियों की भर्ती करने का बजट रखा है। अर्थात सरकार को आम नागरिकों से डर लग रहा है। हथियारों के भंडारण की चिंता है। नक्सलियों को सरकार ने छेड़ कर चुप्पी साध ली। लेकिन नक्सली सक्रीय हो गए। वे लोग और हथियार जमा करना तेज कर दिए। यूपी के सहारनपुर की हिस्सा अन्य जिलों में फैलने की आशंका है। शुक्र मने चाइना का जो भारत के हालात का फायदा नहीं उठा रहा है नहीं तो isis को जिस तरह अमेरिका ने हथियार उपलब्ध कराए ऐसे कोई पूर्व के उग्रवादियों और नक्सलियों को हथियार देता तो विकट स्थिति पैदा हो जाती। अब अमेरिका भारत के लिए मुक्त हथियार आयत निर्यात का अनुबंध कर चुका है जिसके तहत भारत और अमेरिका की कंपनी एक दूसरे के देश में बिना रोकटोक हथियार बेच सकेगी। तो अमेरिका पर विश्वास कैसे कर सकते हैं। अमेरिका और बीबीसी हर ख़बर भारत पाक की ऐसे दिखा रहे हैं जिससे युद्ध हो और भारत नए हथियारों का ऑर्डर दे तो अमेरिका की बेरोजगारी दूर हो जाय।

लेकिन इन सबका बेरोजगारी से क्या कनेक्शन है? दरसअल बेरोजगारी के कारण लोग चिढे हैं और वे अपना गुस्सा दूसरे रूप में निकलना चाहते हैं। कश्मीर में पुलिस की भर्ती साढ़े 5 हज़ार निकली थी और 36 हज़ार से अधिक कश्मीरी युवाओं ने आवेदन किया था। एक पोस्ट के पीछे पड़ रहे सैकड़ो फार्म क्या संकेत देते हैं? तो रोजगार ना मिलने तक बेरोजगारी भत्ता देना सरकार का कर्तव्य है। चूँकि लोग रोजगार और रोजगार ना मिलने तक बेरोजगारी भत्ता देने की मांग पर चुप हैं तो सरकार का क्या जाता है। सरकार तो चार चापलूस पाल कर रखी ही है जो जनता का प्रतिनिधित्व कर कहेंगे- नहीं, हम हराम का नहीं खाना चाहते, आप हमें बेरोजगारी भत्ता नहीं, रोजगार दें। और, सरकार कहेगी कि आगामी 5 सालों में कुछ करते हैं। तब तक ना रोजगार मिला ना बेरोजगारी भत्ता। देश में ऐसे होते हैं कुछ चापलूस।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र
पत्रकार

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