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सुख-दुख

भारत भ्रमण की कई यात्राओं को मैं उनके रास्तों के लिए भी याद करता हूँ!

रामजी तिवारी-

भारत भ्रमण की कई यात्राओं को मै उनके रास्तों के लिए भी याद करता हूँ। जैसे कि लेह से अलची जाते समय पहाड़ अपने आपको पीछे हटाकर पांच सात किलोमीटर की एक सीध वाली रेंज प्रदान करते हैं, और वही मंजर जैसलमेर में सम गांव से तनौट माता मंदिर और पाकिस्तान बॉर्डर जाते समय भी उपस्थित रहता है, तो वह जेहन में बैठ गया है।

लद्दाख का खारदुंगला और कश्मीर का जोजिला पास, उत्तराखंड में धारचूला से नारायण आश्रम का रास्ता, सोनप्रयाग से त्रिजुगीनारायण मंदिर का रास्ता, या फिर सिक्किम में लाचेन से गुरुडोंगमार झील जाने वाला रास्ता इसलिए याद रहता है, क्योंकि यहाँ पर चलते हुए आप जीवन की मोहमाया से निर्लिप्त हो जाते हैं ।

चेन्नई से पांडिचेरी जाने के लिए मैं हमेशा ईस्ट कोस्ट रोड को ही चुनता हूँ, क्योंकि साथ मे समुद्र भी चलता है । और नागरकोइल से तिरुवनंतपुरम जाने के लिए दिन के समय को, क्योंकि इस रास्ते मे छोटी पहाड़ियां, केले और नारियल के खेत और उनके मध्य धान की हरियाली जादू रचती है ।

अमृतसर से चंडीगढ़ के बीच गेंहू की लहलहाती फसल के समय मे की गयी यात्रा आज भी मेरे जेहन में हैं ।

रास्तों के मामले में सिक्किम और हिमाचल के ऊपरी हिस्से को मै हमेशा याद करता हूँ । और याद करता हूँ झारखंड की यात्राओं को, जिसमें जंगल और छोटी पहाड़ियां स्वप्निल दुनिया रचती है।

दक्षिण के चारों हिल स्टेशनों मुन्नार, कोदईकनाल, कूर्ग और ऊटी की यात्राएं भी रास्ते के कारण ही विशेषतया याद हैं । और अंडमान के पोर्टब्लेयर से डिगलीपुर की यात्रा की खूबसूरती भी रास्ते की ही कहानी है ।

उसी तरह पश्चिमी घाट के रास्ते मुझे बार- बार खींचकर ले आते हैं। कभी मुम्बई से गोआ । तो कभी तिरुवनंतपुरम से गोआ । एक बार मैंने बरसात के दिनों में गोआ से बेलगाम की यात्रा की थी, और वह आज भी जेहन से नही निकलती ।

चेरापूंजी मे डबल डेकर पुल को देखने के लिए जो रास्ता हमे लेकर जाता है, शास्त्रों मे शायद उसी को स्वर्ग का रास्ता कहा गया होगा। वह सचमुच कमाल का रास्ता है।

गत वर्ष की गयी यात्रा में पश्चिमी घाट के रास्ते बार बार याद आ रहे हैं । खासकर कर्नाटक के हिस्से वाले रास्ते । बेलगाम से डांडेली होते हुए सिरसी और वहां से पश्चिमी घाट की पहाड़ियों को पार कर जोग फाल्स होते हुए कोल्लूर की यात्रा । फिर कोल्लूर से इन पहाड़ियों को श्रृंगेरी और धर्मस्थला जाते हुए पार करना । और मंगलौर के किनारे को पकड़ने के लिए एक बार फिर । वाह …. मजा आ गया ।

और गत वर्ष जब हमने स्पीती घाटी की यात्रा मे “की मानेस्ट्री” के रास्ते को देखा तो ऐसा लगा कि इसके बाद यदि कुछ और देखने को नही मिले तो भी जीवन मे बहुत कुछ नसीब हो गया।

तो इस नवरात्र और रमजान में सबको अच्छा रास्ता मिले, यह कामना सबके लिए ।

तस्वीर “की मानेस्ट्री” के रास्ते की है ।

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