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जॉब सेक्युरिटी के मामले में सबसे खतरनाक मीडिया कंपनी है भास्कर ग्रुप

भूल कर भी न करें दैनिक भास्कर ग्रुप में जॉब… मांगनी पड़ सकती है भीख… अगर कोई पत्रकार, आईटी हेड, एचआर मैनेजमेंट का बन्दा दैनिक भास्कर ग्रुप में अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रवेश करना चाहता है तो भूल कर भी यह गलती न करे क्योंकि ऐसा करने पर उसे आने वाले समय में भीख मांगनी पड़ सकती है। भास्कर ग्रुप को इम्प्लाई के खून पसीने की कोई कीमत नहीं लगती। इसका एक उदाहरण आप यूपी दैनिक भास्कर डिजिटल की टीम के किसी भी इम्प्लाई से ले सकते हैं।

भूल कर भी न करें दैनिक भास्कर ग्रुप में जॉब… मांगनी पड़ सकती है भीख… अगर कोई पत्रकार, आईटी हेड, एचआर मैनेजमेंट का बन्दा दैनिक भास्कर ग्रुप में अपने उज्ज्वल भविष्य के लिए प्रवेश करना चाहता है तो भूल कर भी यह गलती न करे क्योंकि ऐसा करने पर उसे आने वाले समय में भीख मांगनी पड़ सकती है। भास्कर ग्रुप को इम्प्लाई के खून पसीने की कोई कीमत नहीं लगती। इसका एक उदाहरण आप यूपी दैनिक भास्कर डिजिटल की टीम के किसी भी इम्प्लाई से ले सकते हैं।

यहाँ कम्पनी को सालों से फर्श से अर्श पर पहुंचाने वाले इम्प्लाइज को बिना किसी कारण निकाला जा रहा है। इम्प्लाई रोज की तरह अपने काम पर निकलता है कि अचानक उसके पास एच आर का काल आता है और बिना किसी गलती के मेहनतकश इम्प्लाई से इस्तीफा मांग लिया जाता है। इस्तीफा न दे तो उसे नोटिस की एक माह की तनख्वाह देकर टर्मिनेट कर देते हैं। आपको बता दें कि भास्कर डिजिटल की लॉन्चिंग पर आज से चार वर्ष पहले एक लाख हिट भी प्रति सेंटर नहीं थे। अपनी स्ट्रिंगर की नौकरियों  को छोड़ कर भविष्य संवारने को बड़े ग्रुप से जुड़ने आये इम्प्लाइज ने दिन रात एक कर भास्कर को मासिक 4 करोड़ से 5 करोड़ पीवी तक पहुंचाया।

रिपोर्टर्स को फोटो खींचने की जिम्मेदारी दे दी गयी और फोटोग्राफर को खबर लिखने की। यहां भी मन नहीं भरा तो फोटोग्राफर को वीडियो बनाने के काम पर भी लगा दिया। इतनी जिम्मेदारियां बढ़ने और नए काम मिलने के बाद भी छायाकार और रिपोर्टर अपनी परफार्मेंस को शीर्ष पर रखे रहे। एक दिन अचानक कम्पनी के  शीर्ष नेतृत्व को अब कुछ नया दिख गया और पुराने काम में प्राफिट कम दिखा तो नए काम के लिए पुराने मेहनतकश इम्प्लाइज को छांटने का सिलसिला शुरू हो गया। मात्र तीन माह में मैनेजमेंट और एडिटोरियल से मिलाकर 25 से अधिक लोग हटाये जा चुके हैं। शेष जो भी तीन चार लोग बचे हैं उनको यह तक नहीं पता कि वो कितने दिन तक यहाँ रह पायेंगे।

ऐसा माना जा रहा है कि नया बिजनेस सत्र लागू होने से पहले ही सभी की विदाई तय है। सबको अल्टीमेटम दे दिया गया है। कोई नहीं जानता कि उसकी नौकरी कब तक है। इम्प्लाइज किसी नए मोबाइल नम्बर की काल देखते ही डर जाते हैं। वर्तमान में चल रहे दौर में इम्प्लाइज को नयी नौकरी मिलना पारस मणि मिलने जैसा है क्योंकि आज कोई भी मीडिया संस्थान नए इम्प्लाइज की भर्ती नहीं कर रहा है|

ऐसे में जिन इम्प्लाइज ने अपने परिवार को भूलकर अपना सारा समय कम्पनी को यहां तक लाने में लगाया वो इस समय ऐसे कगार पर खड़ा है कि उसे अपना जीवन अन्धकार में लग रहा है। कोई बड़ी बात नहीं है कि समाज के चौथे स्तम्भ में शामिल यह इम्प्लाइज भुखमरी और जीवन से हार के कारण आत्महत्या जैसा कदम उठा लें। यह कम्पनी बिहार दिल्ली हरियाणा आदि जगहों पर लोगों को इसी तरह बर्बाद कर चुकी है। मेरा मात्र इतना कहना है कि कोई भी व्यक्ति अगर यहाँ बेहतर भविष्य देख रहा है तो वर्तमान यूपी की लखनऊ टीम के किसी भी इम्प्लाई से संपर्क कर ले।

एक भास्कर इम्प्लाई की कलम से.

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