CO2 चूसने वाली टेक्नोलोजी से उम्मीद बंधी, ग्लोबल वॉर्मिंग को पीछे धकेला जा सकता है!

चंद्रभूषण-

पर्यावरण दिवस आकर गुजर गया और अपने पीछे यह तकलीफदेह खबर छोड़ गया कि कोरोना के प्रकोप से पृथ्वी के पर्यावरण ने पिछले साल जो चैन की सांस ली थी, वह इस साल नदारद है। हवाई में स्थित मौना-की ऑब्जर्वेट्री यूं तो ब्रह्मांड के ब्यौरे जुटाती रहती है लेकिन उसका एक काम हमारे वायुमंडल में हो रहे बदलावों का जायजा लेने का भी है। उसी ने जून के पहले हफ्ते में अपना यह प्रेक्षण जारी किया कि मई 2021 में जितनी कार्बन डायॉक्साइड हमारी हवा में मौजूद थी, उतनी बीते 41 लाख वर्षों में कभी नहीं रही। इस गैस का जितना बैर हमारे फेफड़ों से है, उससे कहीं ज्यादा धरती के भविष्य से है। एक ग्रीनहाउस गैस के रूप में ग्लोबल वॉर्मिंग के लिए सबसे बड़ी जिम्मेदारी इसी की है।

इस सिलसिले में अकेली अच्छी बात यही है कि इस सदी के दो शुरुआती दशकों में ऐसी कई तकनीकें उभरी हैं, और दिनोंदिन सस्ती भी होती गई हैं, जिनके बल पर ग्लोबल वॉर्मिंग को पीछे धकेला जा सकता है। खासकर अमेरिका में जोसफ बाइडन की सरकार आने के बाद से इन तकनीकों को आर्थिक बल मिला है और पर्यावरण के मामले में दुनिया का नजरिया आशावादी हुआ है। ऐसी सबसे बड़ी सहायता हवा से सीधे कार्बन डायॉक्साइड सोख लेने वाली टेक्नॉलजी को मिली है। इसमें काम कर रही कंपनियों को एक टन कार्बन डायॉक्साइड के अवशोषण पर टैक्स क्रेडिट के रूप में 50 डॉलर और इस अवशोषित गैस का कोई सकारात्मक उपयोग करने पर 35 डॉलर, यानी प्रति टन कुल 85 डॉलर मिल रहे हैं।

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार इस काम में 135 से 345 डॉलर तक का प्रति टन खर्चा आता है। कंपनियों की कोशिश इसे घटाकर 100 डॉलर से नीचे लाने की है, हालांकि काम वे अभी सरकारों के बुलावे पर ही कर रही हैं। एक अध्ययन के मुताबिक पूरी दुनिया में कार्बन चूसने वाले ऐसे 17 कारखाने चल रहे हैं और कुछ शुरू होने की प्रक्रिया में हैं।

हवा से खींची गई कार्बन डायॉक्साइड का सकारात्मक उपयोग कुछ कंपनियां कच्चा तेल तो कुछ कंक्रीट बनाने में कर रही हैं, हालांकि ज्यादातर इसे खड़िया में बदलकर पुरानी खदानों में भर देती हैं। अनुमान है कि इस टेक्नॉलजी पर भरपूर अमल की स्थिति में 4 करोड़ टन कार्बन हर साल वायुमंडल से बाहर किया जा सकेगा। लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग को काबू में रखने के लिए सन 2050 तक 600 करोड़ टन कार्बन को बाहर का रास्ता दिखाना जरूरी है, जो इसकी क्षमता तो क्या कल्पना के लिए भी दूर की कौड़ी है।

बड़े बदलाव का अकेला रास्ता रीन्यूएबल एनर्जी या अक्षय ऊर्जा का ही है, जिसमें पिछले पांच-सात वर्षों में तकनीक के स्तर पर क्रांतिकारी प्रगति देखने को मिली है। जल विद्युत को अक्षय ऊर्जा माना जाए या नहीं, इसे लेकर दुनिया में दुविधा है क्योंकि बड़े बांधों को पर्यावरण के लिए हानिकर माना जाता है। इसे एक तरफ रख दें तो सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और ज्वार ऊर्जा, तीनों में लगभग हर रोज कोई न कोई नई उद्यमी प्रगति पढ़ने को मिलती है। खासकर चीनियों के इस क्षेत्र में कूद पड़ने से खोजों की रफ्तार बहुत बढ़ गई है। इसके अलावा ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जर्मनी और इंग्लैंड में भी महत्वपूर्ण काम हो रहा है। इन स्रोतों से बनने वाली बिजली अब थर्मल और हाइडेल पावर से भी सस्ती पड़ने लगी है, हालांकि इसमें कुछ योगदान सरकारी सहायता का भी है।

नए ऊर्जा स्रोतों में सबसे बड़ा दायरा सोलर एनर्जी का है, जिसकी सबसे अच्छी बात छतों को पावरहाउस बना देने की है। इसकी अकेली बीमारी सोलर मॉड्यूल्स का वजनी होना है, जिसके इलाज की कोशिश जारी है। यहां से दो रास्ते हाइड्रोजन इकॉनमी और बैट्री ट्रैक्शन के भी निकलते हैं। अपने इर्दगिर्द हम दो तरह से ऊर्जा का इस्तेमाल देखते हैं। एक वे सारे काम, जो बिजली से संपन्न हो जाते हैं। दूसरे वे, जिनमें कोई फ्यूल टंकी में भरकर या पाइप से खींचकर जलाना पड़ता है। सोलर, विंड या टाइडल पावर किसी नेशनल पावर ग्रिड से जुड़कर वहां के स्थापित बिजली ढांचे का हिस्सा बन जाती है। इससे कल-कारखाने चलाए जा सकते हैं, बिजली की घरेलू जरूरतें पूरी की जा सकती हैं और ट्रेनें चलाई जा सकती हैं। लेकिन सड़क का धुआं नहीं घटाया जा सकता। हाइड्रोजन इकॉनमी और बैट्री ट्रैक्शन अक्षय ऊर्जा को इसी समस्या से जोड़ने का जरिया हैं।

एलन मस्क की कंपनी टेस्ला ने ऑस्ट्रेलिया में नेशनल पावर ग्रिड से दूर पड़ने वाले कुछ इलाकों में सोलर और विंड एनर्जी से चार्ज होने वाली विशाल बैट्रियां इंस्टाल करके बाकायदा छोटी पैरलल ग्रिड खड़ी कर दी है। हम इस कंपनी की पॉश बैट्री कारों के बारे में जानते हैं लेकिन कोरोना से ठीक पहले अमेरिका में इन कारों से ज्यादा चर्चा बैट्री से चलने वाले हैवी ड्यूटी ट्रकों की थी। इस सिलसिले में अगली लहर प्रदूषण रहित ईंधन के रूप में हाइड्रोजन की चलने वाली है, हालांकि अभी इसे बनाने में बहुत ज्यादा कार्बन डायॉक्साइड निकलती है। दुनिया में सात करोड़ टन हाइड्रोजन का उत्पादन अभी होता है, जिसका ज्यादातर हिस्सा सऊदी अरब और कुछ अन्य तेल उत्पादक देशों में प्राकृतिक गैस और भाप की रासायनिक क्रिया से बनाया जाता है। लेकिन अगले कुछ सालों में हम सौर ऊर्जा के जरिये समुद्री पानी को औद्योगिक पैमाने पर हाइड्रोजन में बदलते देखेंगे। इस ग्रीन हाइड्रोजन को अपना फ्यूल बनाने वाली गाड़ियों के एग्जास्ट से सिर्फ भाप निकलेगी।

एक बात तय है कि दुनिया में कार्बन उत्सर्जन से निपटने वाली टेक्नॉलजी मौजूद है और यह इतनी महंगी भी नहीं है कि रोजी-रोजगार का हवाला देकर इससे नजरें चुराई जा सकें। सरकारों को समझ लेना चाहिए कि ग्लोबल वॉर्मिंग को नियति के रूप में पेश करने के दिन अब लद चुके हैं। अगर वे कम प्रदूषण वाला रास्ता नहीं अपनातीं तो इसे उनका फैसला समझा जाएगा और देर-सबेर इसकी जवाबदेही उनपर आएगी। घरेलू मोर्चे पर लौटें तो जैसे-जैसे दुनिया के बाकी देश अपने लिए कार्बन न्यूट्रलिटी यानी शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित कर रहे हैं, वैसे-वैसे भारत पर भी इसके लिए दबाव बढ़ रहा है। ऐसा कोई लक्ष्य अभी तक भारत सरकार की ओर से घोषित नहीं किया गया है। लेकिन कार्बन उत्सर्जन में कटौती के वादे और सन 2030 तक 450 गीगावाट बिजली अक्षय ऊर्जा स्रोतों से हासिल करने के भारतीय संकल्प की दुनिया में काफी तारीफ हुई है।

ध्यान रहे, अभी भारत की कुल बिजली उत्पादन क्षमता 382 गीगावाट है, जिससे ज्यादा का लक्ष्य इस दशक के अंतिम वर्ष में केवल अक्षय ऊर्जा के लिए रखा गया है। एक गीगावाट यानी 1000 मेगावाट और 1 मेगावाट यानी 1000 किलोवाट। हमारे घरों में आने वाली बिजली की इकाई किलोवाट-घंटा होती है। 1 यूनिट बिजली खर्च करने का अर्थ है 1 किलोवाट बिजली का एक घंटा इस्तेमाल। भारत में अक्षय ऊर्जा की मौजूदा क्षमता पर बात करें तो यह 95 गीगावाट के आसपास है। इसमें सौर ऊर्जा और पवन ऊर्जा की क्षमताएं लगभग बराबर, 40 फीसदी के इधर-उधर हैं जबकि थोड़ी बिजली चीनी मिलों में गन्ने की खोई और अन्य बायोमास से तथा लघु पनबिजली परियोजनाओं से बनाई जाती है।

जाहिर है, अक्षय ऊर्जा स्रोतों से इनकी क्षमता के बराबर बिजली नहीं बनती। विंडमिल से यह तभी बनती है जब तेज हवा चल रही हो, जबकि सोलर सेल उजाला रहने तक ही काम करते हैं। वास्तविक बिजली के मामले में अक्षय ऊर्जा स्रोतों की 450 गीगावाट क्षमता खड़ी करने का अर्थ वैसा ही है जैसे चार-चार सौ मेगावाट के 50 यानी कुल 200 गीगावाट के कोयले वाले ताप बिजलीघर खड़े करना। सवाल यह है कि क्या भारत 2030 तक 450 गीगावाट की अक्षय ऊर्जा क्षमता विकसित कर पाएगा? प्रधानमंत्री ने 2015 के विश्व जलवायु सम्मेलन में जब यह घोषणा की थी तब इसके पहले चरण में 2022 तक 175 गीगावाट अक्षय ऊर्जा का लक्ष्य रखा था। आंकड़ों से स्पष्ट है कि अभी, यानी 2021 के ऐन अधबीच में इस लक्ष्य से हम काफी पीछे हैं।

कहा जा रहा है कि सब ठीक-ठाक रहा तो 2022 के अंत तक 110 गीगावाट की अक्षय ऊर्जा क्षमता हमारे पास जरूर होगी। लेकिन सब ठीक-ठाक कहां है? अक्षय ऊर्जा का असली महत्व इस बात में है कि उसका स्वरूप विकेंद्रित हो। जनहित के साथ उसका कोई टकराव न हो और प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव ज्यादा न पड़े। इसको ध्यान में रखते हुए 2022 तक 40 गीगावाट बिजली छतों पर सौर पैनल लगाकर बनाई जानी थी। यह लक्ष्य अबतक एक चौथाई भी हासिल नहीं हो सका है। भारत की कुल अक्षय ऊर्जा क्षमता में 85 फीसदी हिस्सा सोलर और विंड एनर्जी का है। दोनों के उत्पादन पर दो-तीन बड़ी कंपनियों का कब्जा है, जो आत्मनिर्भरता को ताक पर रखकर हैवी इंपोर्ट मॉडल पर काम करती हैं।

भूमध्य रेखा के पास पड़ने के कारण भारत में हवा ज्यादा नहीं चलती। लिहाजा पवन ऊर्जा के लिए यहां गुंजाइश कम है। सौर ऊर्जा के लिए हमारे यहां काफी अच्छी संभावना है लेकिन इसकी 40 मेगावाट क्षमता एक किलोमीटर लंबा और इतना ही चौड़ा जमीन का टुकड़ा मांगती है, जिसमें एक मंझोला गांव अपनी खेती-बाड़ी समेत आराम से बस जाता है। चीनियों ने अपने विशाल रेगिस्तानी इलाकों के इस्तेमाल के लिए अक्षय ऊर्जा का दामन थामा तो अपनी पूरी सप्लाई लाइन डेवलप की। सौर ऊर्जा की जान पॉलीसिलिकॉन वेफर्स हैं, जो रेत को 300 डिग्री गर्म किए गए नमक के तेजाब में धोने के बाद 1800 डिग्री सेल्सियस पर तपाकर बनाए जाते हैं।

इसे बनाने वाली दुनिया की दस शीर्ष कंपनियों में पहले, तीसरे, चौथे, पांचवें, छठें, आठवें और दसवें नंबर पर चीनी कंपनियां ही हैं जबकि दूसरे नंंबर पर जर्मन, सातवें पर कोरियाई और नवें पर एक अमेरिकी कंपनी है। भारत में तो कोई कंपनी सिलिकॉन वेफर्स बनाने का जोखिम ही नहीं उठाती। सभी या तो चीन से सोलर सेल मंगाकर भारत में उनके मॉड्यूल बांधती हैं, या बहुत किया तो उधर से वेफर्स मंगा लिए और उससे सेल और मॉड्यूल बना डाले। अगर हम अक्षय ऊर्जा को भारत के भविष्य की तरह देख रहे हैं तो हमें नीचे से ऊपर तक इसके हर रूप की पूरी सप्लाई लाइन विकसित करनी चाहिए और इनके विकेंद्रित बिजनेस मॉडल को प्रमोट करना चाहिए।

भड़ास की खबरें व्हाट्सअप पर पाएं, क्लिक करें-

https://chat.whatsapp.com/CMIPU0AMloEDMzg3kaUkhs

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *