इस बार गुड़गांव के कालोनाइजरों ने हुड्डा को जन्मदिन की बधाई नहीं दी

नई दिल्ली। आज हरियाणा के मुख्यमंत्री तथा कालोनाइजरों के खास दोस्त भूपेंद्र सिंह हुड्डा का जन्मदिन है। उन्हें जन्मदिन मुबारक हो। इस बार उन्हें गुड़गांव के कालोनाइजरों ने जन्मदिन की मुबारिक नहीं दी है। मुझे याद है कि उनके पिछले जन्मदिन पर गुड़गांव के कालोनाइजरों ने अंग्रेजी के अखबारों में पूरे-पूरे पेज के विज्ञापन देकर हुड्डा को जन्मदिन की मुबारिक दी थी। शायद उन्होंने दीवार पर लिखा पढ़ लिया है। अब वे चुपचाप रामबिलास शर्मा, सुशमा स्वराज, इंद्रजीत, बीरेंद्र सिंह तथा सीएम पद के दावेदारों को मुबारक दे रहे होंगे।

वैसे हुड्डा साहब को इस बात का बुरा नहीं मानना चाहिए, कालोनाइजर क्या आजकल तो हर कोई चढ़ते सूरज को ही सलाम करता हैं। गुड़गांव के कालोनाइजरों ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा से बहुत फायदा उठाया। उन्होंने हुड्डा साहब की भी काफी सेवा की। अब भई ये कालोनाइजर इस बात का इंतजार करेंगे कि हरियाणा में सरकार किसकी बनती है। यदि उनके दोस्त हुड्डा साहब तीसरी बार फिर मुख्यमंत्री बन जाते हैं तो वे उनका जन्मदिन आज की बजाए अक्तूबर महीने में मना लेंगे। वैसे पता चला है कि कुछ कालोनाइजर चुपचाप गुलदस्ते लेकर हुड्डा साहब की कोठी पर मुबारक देने गए हैं। हरियाणा में एक पुराना किस्सा गांव की चैपाल में बैठा किसान आमतौर पर सुनाता है। एक किसान तहसीलदार को गन्ना छील कर खिला रहा था। इसी बीच पता चला कि तहसीलदार का तबादला हो गया है। किसान ने गन्ना खिलाना बंद कर दिया। पूछने पर बताया कि अब ये बचा हुआ गन्ना आने वाले तहसीलदार को खिलाउंगा।

कालोनाइजर की बात एक तरफ रखें, काफी अफसर जो सुबह-सुबह ही गुलदस्ते लेकर हुड्डा साहब की कोठी पर पहुंच जाते थे उनमें से भी ज्यादातर कन्नी काट गए। वक्त बड़ी चीज होती है। आज हमारे एक पुराने पत्रकार मित्र ने अपना दर्द फेसबुक पर बयान किया। उनका कहना था कि जब कोई वरिश्ठ पत्रकार नौकरी छोड़ देता है तो नेता, अफसर तथा मुख्यमंत्री के सलाहकार जो पहले रात-दिन उसके चक्कर लगाते थे उससे कन्नी काट लेते हैं। भई इसमें भी महसूस करने की कोई बात नहीं। उन्हें पत्रकार से कोई दिली लगाव तो होता नहीं। वो तो उनका इस्तेमाल अपनी राजनीति चमकाने के लिए करते हैं। हां, यदि पत्रकारिता में रहते आप ने कुछ वफादार दोस्त बनाए हैं तो वे आपका बाद में भी ख्याल रखते हैं। मेरे भी निजी अनुभव हैं। मैंने भी नौकरी छोड़ दी थी। वो नेता दिन-रात बंसल साहब कहते नहीं थकते थे। दिन में कई-कई बार फोन करते थे सब कन्नी काट गए लेकिन जितने भी अफसर दोस्त थे वे संकट के समय में साथ खड़े रहे।

पवन कुमार बंसल

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