दैनिक भास्कर वाले कमबख़्तों की हिंग्लिश भी फ़ज़ीहत!

अजित वडरनेकर-

◆कमबख़्तों की हिंग्लिश भी फ़ज़ीहत
◆हिन्दी ने तो कब का साथ छोड़ा

∆हिंग्लिश लिखवाने का दबाव इतना है कि गलत-सलत कुछ भी लिख दो, सम्पादक जी ख़ुश। क्योंकि हिन्दी कौन पढ़ता है। हिंग्लिश चलाओ। चाहे पेडेस्ट्रिअन (पैदल चलने वाले) की पीठ पर सिंधिया की प्रतिमा जड़ दी जाए।

∆मज़े की बात यह कि आज के अखबारवाले निडर भी हो चुके हैं। चूक करने से डरते भी नहीं और खेद जताने की चूक भी नहीं करते। उतनी जगह में हवाबाण हरडे का विज्ञापन लग जाता है।

∆अब नगर निगम वालों ने आपके अखबार को पढ़ कर यही इंग्लिश सीखी होगी। या अफसर ने पेडस्टल या पॉडियम कहा होगा, रिपोर्टर बाबू ने पेडेस्ट्रिअन लिख मारा।

∆हिन्दी में चौकी, मंच, कुर्सी, आधार, चबूतरा, थान, पीठिका जैसे न जाने कितने आसान विकल्प हो सकते थे।

हालाते जिस्म सूरते जाँ और भी ख़राब
सब तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब



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