धर्म हमेशा से बेहतरीन कारोबार रहा है, ईश्वर के दूत हो जाते हैं मालामाल!

: धर्म के योग से कारोबारी क्रिया : ईश्वर के कुछ ‘दूत’ कैसे कारोबार चलाते हैं और उनके पास कितनी संपत्ति है, इस पर हमेशा ही गोपनीयता का पर्दा पड़ा रहता है :

ऐसी कई चीजें हैं जो योग गुरु रामदेव को सख्त नापसंद हैं। अगर इस फेहरिस्त को देखें तो सबसे ऊपर भ्रष्ट राजनेताओ की बारी आती है, जिन्हें वह सीधे फांसी पर लटकाने की बात कहते हैं। उनके बाद समलैंगिक हैं जिनके बारे में रामदेव की एकदम साफ राय हैं। वह कहते हैं कि ये बीमार लोग हैं और उनका इलाज होना चाहिए। तीसरे पायदान पर बहुराष्ट्रीय कंपनियां हैं, जिन्हें रामदेव इस पवित्र देश से बाहर निकालने की वकालत कहते हैं। इस बारे में उनका तर्क है कि ये कंपनियां देश में जितनी रकम निवेश करती हैं, उसकी कई गुना अधिक रकम बाहर ले जाती हैं। इसके अलावा ये स्थानीय कारीगरों और हस्तशिल्पियों के पेट पर भी लात मार रही हैं।

आदर्श देश की उनकी योजना में बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए कोई जगह ही नहीं है। उनके अनुसार 3,00,000,000 करोड़ रुपये का विदेश में जमा काला धन वापस आने पर उसका इस्तेमाल बिजली संयंत्र लगाने, सड़कें बनवाने और खेतों की सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने में किया जाए। उनके आदर्श देश में लोग सुबह दो घंटे योग करने के बाद दिन भर का काम ईमानदारी से करेंगे और सोने से पहले धार्मिक किताबें पढ़ेंगे। दिलचस्प है कि जब अप्रैल में उनके पतंजलि आयुर्वेद ने पैकेजिंग सॉल्यूशंस मुहैया कराने वाली दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी टेट्रा पैक के साथ करार किया था तब बहुराष्ट्रीय कंपनियों को लेकर उनकी आपत्ति कहीं दूर तक दिखाई नहीं दे रही थी।

पतंजलि ने ट्रेटा के साथ मिलकर जूस और बाकी पेय पदार्थ बेचने के लिए करार किया था। पतंजलि का 65 मिलीलीटर का आंवला अमृत ट्रेटा पैक बाजार में 5 रुपये में उपलब्ध है। आने वाले समय में पतंजलि सेब, अंगूर जैसे फलों के करीब 30 नए पेय पदार्थ ऐसी ही पैकिंग में पेश कर सकता है। हरिद्वार में पतंजलि आयुर्वेद के संयंत्र का उद्घाटन करते समय रामदेव ने गर्व के साथ कहा था, ‘हम देशवासियों को शुद्घ उत्पाद मुहैया कराना चाहते हैं। इसीलिए हम अपने उत्पाद टेट्रा पैकिंग में पेश करेंगे।’ रामदेव के कारोबारी कदम बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विरोध में उनके  बयानों का समर्थन नहीं करते।

रामदेव ने अमेरिका में आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी हर्बाे वेद का अधिग्रहण किया है। हालांकि उन्होंने अधिग्रहण की रकम का खुलासा नहीं किया। उनके उत्पादों की बिक्री अमेरिका से लेकर पश्चिम एशिया तक होती है। उनके अनुयायियों सैम और सुनीता पोद्दार ने स्कॉटलैंड में एक द्वीप दान में दिया है जहां जल्द ही अत्याधुनिक आश्रम खोले जाएंगे और चिकित्सा विद्यालय के साथ हास्य-विनोद की कक्षाएं भी होंगी

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धर्म हमेशा से ही बेहतरीन कारोबार रहा है। ऐसा लगता है कि धर्म का काम करने वाले ‘खुदा के बंदे’ कारोबारी बन जाते हैं। वे बड़े कारोबारियों की तरह व्यापार चलाते हैं, संपत्ति मालिकों के माफिक बड़ी परिसंपत्तियों का नियंत्रण करते हैं, किसी बड़े सलाहकार की तर्ज पर कारोबारियों को सलाह देते हैं, वकीलों की भांति विवादों को सुलझाते हैं, और कई मौकों पर लॉबिइस्टों की तरह सरकार को ‘समझाने-बुझाने’ का काम करते हैं। भारी तादाद में फैले भक्तों की भारी फौज और ‘जादुई शक्तियों’ के दम पर उनमें से कई सत्ता के गलियारों में भी अपनी दमदार पैठ बना लेते हैं। इससे दान-दक्षिणा मिलने में सहूलियत मिल जाती है जिससे कारोबार, आश्रम और धर्मार्थ कार्यक्रम चलाए जाते हैं। विश्व धर्मायतन संस्था के चंद्रास्वामी के प्रमुख भक्तों में भारत के दो प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्ह राव और चंद्रशेखर के अलावा, बु्रनेई के सुल्तान, हथियार विक्रेता अदनान खगोशी, एलिजाबेथ टेलर और नैन्सी रैगन जैसे प्रमुख नाम थे।

उसके बाद 1996 में चंद्रास्वामी को लंदन के एक कारोबारी लखूभाई पाठक से 1,00,000 डॉलर की ठगी के आरोप में गिराफ्तार किया गया था। उसी साल प्रवर्तन निदेशालय ने भी उन पर विदेशी विनिमय के नियमों के उल्लंघन का मामला दायर किया था। बुधवार को चंद्रास्वामी ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि वह इस विवाद को निपटाने के लिए 9 करोड़ रुपये अदा करने के लिए तैयार थे! ये ईश्वर के दूत कैसे कारोबार चलाते हैं और उनके पास कितनी संपत्ति है, इस पर हमेशा गोपनीयता का पर्दा पड़ा रहता है। रामदेव को भारी दबाव के बाद पिछले हफ्ते अपनी वित्तीय हालत का ब्यौरा देना पड़ा।

उनके मुताबिक दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट, पतंजलि योगपीठ ट्रस्ट, भारत स्वाभिमान ट्रस्ट और आचार्यकुल शिक्षा संस्थान जैसे 4 ट्रस्टों के पास 426.19 करोड़ रुपये की राशि है, जो चंदे में मिली रकम और दवाओं की बिक्री से जुटाई गई है। इस ब्यौरे में अभी तक 785.09 करोड़ रुपये के खर्च का जिक्र भी शामिल है। उनके इस खुलासे में निश्चय ही उनकी किसी कंपनी का कोई उल्लेख नहीं था। रामदेव की मुख्य कंपनियां पतंजलि आयुर्वेद और दिव्य फार्मेसी हैं जिनका सालाना कारोबार क्रमश: 320 करोड़ और 300 करोड़ रुपये का है। और मुनाफा? रामदेव ने पिछले वर्ष बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ बातचीत में स्वीकार किया था कि उनका मुनाफा मार्जिन 16 फीसदी है, जबकि उनके उत्पाद उनकी प्रतिद्वंद्वी कंपनियों के मुकाबले 50 फीसदी सस्ते हैं। पतंजलि आयुर्वेद फैक्टरी एक घंटे में 32,000 पैक तैयार कर सकती है। कंपनी के देश भर में 1,500 से अधिक बिक्री भंडार हैं। रामदेव के उत्पाद डाकघरों के जरिये भी बेचे जा रहे हैं। रामदेव के बेहद निकट सहयोगी आचार्य बालकृष्ण वैदिक ब्रोडकास्टिंग के मालिक हैं जो आस्था नाम का धार्मिक टेलीविजन चैनल चलाती है।

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रामदेव की कंपनी से जुड़े एक अधिकारी का कहना है, ‘हमारे गुरू के आशीर्वाद से हमारा कारोबार काफी फल-फूल रहा है और हम जल्द ही वैश्विक बाजार में भी पकड़ बनाएंगे।Ó पिछले साल रामदेव ने 500 करोड़ रुपये के निवेश से हरिद्वार में 125 एकड़ जमीन में पतंजलि फूड एंड हर्बल पार्क की स्थापना की है। रामदेव का कहना है कि इस फूड पार्क में उत्पाद तैयार करने के लिए संयुक्त राज्य खाद्य एवं औषधि प्रशासन (यूएसएफडीए) के मानकों का कड़े तरीके से पालन किया जाएगा। ये उत्पाद किसके लिए तैयार किए जा रहे हैं, यह समझने में किसी को कोई शक शुबहा नहीं होना चाहिए। इसके पहले हफ्ते की शुरुआत में द आर्ट ऑफ लिविंग के श्री श्री रविशंकर के मान मनौवल के बाद रामदेव ने अपना अनशन समाप्त किया। ये दोनों कई अवसरों पर साथ-साथ देखे जाते हैं और निश्चित रूप से कुछ समान धारणाएं भी रखते हैं।

बेंगलुरु के बाहरी इलाके में आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन का आश्रम 70 एकड़ या उससे भी ज्यादा जमीन में फैला हुआ है, जिसमें आश्रम के अलावा एक आयुर्वेद अस्पताल और सुमेरू सॉफ्टवेयर नाम की सॉफ्टवेयर कंपनी भी मौजूद है। आश्रम में करीब 250 लोग काम करते हैं और इसकी शाखाएं अमेरिका और दक्षिण अफ्रीका में भी हैं। कंपनी जो मुनाफा कमाती है, उसका एक तयशुदा हिस्सा धर्मादा कामों के लिए लगाया जाता है। फाउंडेशन का मानना है कि केवल मुनाफा कमाने वाला संगठन ही बेहतर धर्मार्थ कार्य कर सकता है क्योंकि चंदे से बहुत ज्यादा काम नहीं चलता।

आर्ट ऑफ लिविंग की बुनियाद 1981 में रखी गई थी और उसके दुनिया भर में फैले 3,000 केंद्र सुदर्शन क्रिया सिखा रहे हैं- इसमें सबसे ताजा पड़ाव जुड़ा है पेइचिंग जहां 157 एकड़ में इसका परिसर बनाया गया है। फाउंडेशन सभी केंद्र खुद नहीं चलाता बल्कि फ्रैंचाइजी नियुक्त करता है। फ्रैंचाइजी हासिल करने के लिए आश्रम का एक विशेष कोर्स करना पड़ता है। शुरुआती कोर्स का शुल्क 1,200 रुपये है। इसके अतिरिक्त यह अपनी पाठ्य सामग्री और आयुर्वेदिक दवाओं की बिक्री से कमाई करता है। धन को सामाजिक कार्यों पर खर्च किया जाता है। मौजूदा दौर में आर्ट ऑफ लिविंग स्वैच्छिक स्वयंसेवकों वाली मानवीय और शिक्षा के मामले में दुनिया की प्रमुख संस्था है। इसका संदेश 140 से भी अधिक देशों में फैले 30 करोड़ लोगों तक पहुंचता है। दायरा बेहद विशाल है लेकिन ईश्वर के दूतों के लिए यह कोई अनोखी बात नहीं है।

इस साल अप्रैल में श्री सत्य साईं बाबा के अस्पताल में भर्ती किए जाने और उसके बाद उनकी मृत्यु के बाद उनकी परिसंपत्ति के आकलन किए गए। उनकी जीवन पर्यंत जोड़ी गई संपत्ति का आकलन 5,000 से 1,30,000 करोड़ रुपये के बीच लगाया गया। उनकी मृत्यु के पश्चात हुई पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस में श्री सत्य साईं सेंट्रल ट्रस्ट के कर्ताधर्ताओं ने इन आंकड़ों से मुंह फेरने की पूरी कोशिश की और कहा कि सत्य साईं मेडिकल ट्रस्ट सहित उसके जरिये होने वाली आमदनी पिछले 14 वर्ष के दौरान प्रति वर्ष 100 से 130 करोड़ रुपये  के बीच रही है जिसमें 75 से 100 करोड़ रुपये प्रति वर्ष खर्च रहा। इस पर बहस हो सकती है लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि सत्य साईं बाबा विरासत में बहुत बड़ी संपत्ति छोड़ गए हैं-इसमें शामिल है बाबा की कर्मस्थली पुट्टापर्थी में मौजूद 300-बेड वाला मल्टी स्पेशियलिटी अस्पताल जो 105 एकड़ से भी अधिक जमीन में फैला हुआ है। पुट्टापर्थी का यह अस्पताल वर्ष 1991 में 65 करोड़ रुपये की लागत से तैयार हुआ था। एक अन्य अस्पताल बेंगलुरु में है जिसे वर्ष 2001 में 130 करोड़ रुपये खर्च कर बनाया गया था।

पुट्टापर्थी में मुख्य आश्रम प्रशांति निलयम 70 एकड़ भूमि पर बना हुआ है, एक निजी हवाई पट्टी, शैक्षिक संस्थान, एक ताराघर और दुनिया के 167 देशों में फैले विभिन्न केंद्र शामिल हैं। स्वास्थ्य एवं शिक्षा संस्थान गैर-लाभकारी मॉडल के अनुसार काम कर रहे हैं जहां दो आम अस्पतालों और सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में इलाज पूरी तरह मुफ्त है, कुछ ऐसा ही शिक्षा के मामले में भी है जहां इसके स्कूलों और कॉलेजों में निशुल्क शिक्षा मिलती है। पुट्टापर्थी में असल कारोबार वह है जो साईं बाबा की वजह से अप्रत्यक्ष रूप से फैला। साईं बाबा के जिंदा रहते साल भर वहां भक्तों का तांता लगा रहता था जिससे होटलों, टैक्सी परिचालकों और दुकानदारों को लगातार कारोबारी अवसर मिलता रहता और गर्मियों में चरम के दौरान ही यह सिलसिला कुछ मंद पड़ता। देश-विदेश से भारी संख्या में आने वाले भक्त इस छोटे से शहर में महीनों तक डेरा डाले रहते और इसका सबसे बड़ा फायदा रियल एस्टेट क्षेत्र को मिला। शहर से 1 किलोमीटर बाहर जमीन की जो कीमत 20,000 रुपये प्रति सेंट (सेंट एक एकड़ का सौवां हिस्सा होता है) थी वह तीन साल पहले 4 लाख रुपये तक चली गई। 24 अप्रैल को साईं बाबा के देहांत के बाद से जमीन की कीमतों में 60 फीसदी तक की गिरावट आ चुकी है।

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पंजाब के ब्यास में राधास्वामी सत्संग के डेरे के दूर से ही समृद्घि के दर्शन होने लगते हैं। यहां कर्मियों और कार सेवकों का 7,000 का बड़ा जत्था है। सत्संग के गुरू जहां प्रवचन देते हैं, वह करीब 30 एकड़ जमीन पर बना है, जहां 2,50,000 लोग तक समा सकते हैं। एशिया में निर्मित ढांचों में यह सबसे बड़े ढांचों में से एक माना जाता है। डेरे में हरियाली भी खूब है, वहां फल और सब्जियां भी उगाई जाती हैं जिनका इस्तेमाल लंगर में किया जाता है।

अपनी जल आपूर्ति, जल शोधन और कचरा प्रबंधन का बंदोबस्त भी डेरा खुद ही करता है। पूरे समुदाय तक आकस्मिक स्थिति में बिजली पहुंचाने के लिए यहां भीमकाय जेनरेटरों का भी इंतजाम है। डेरे के भीतर किसी सैन्य शिविर सा आभास होता है। गुरु को सुनने के लिए यहां दुनिया के अलग-अलग कोनों से लोगों का जमावड़ा लगता है। कई प्रवासी भारतीय भी यहां हफ्तों तक रह कर जाते हैं। सत्संग में खाने की व्यवस्था देखने वाली प्रबंधक का कहना है कि डेरे पर वार्षिक भंडारे के दौरान वे एक साथ 2,75,000 लोगों को भोजन कराते हैं। डेरे पर हवाई पट्टïी भी है जिसके जरिये समृद्घ भक्त गुरु का जल्दी दर्शन कर पाते हैं। डेरे के नामचीन भक्तों में फोर्टिस और रेलिगेयर के सिंह बंधु शामिल हैं।

बिजनेस स्टैंडर्ड से साभार. इसके लेखक हैं शिशिर प्रशांत, आभाष शर्मा, प्रवीण बोस और इंदुलेखा अरविंद.

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