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सियासत

पाप से धरती फ़टी, अधर्म से आसमान, गई बहुतों की जान

संजय कुमार सिंह-

क्यों मचती है भगदड़ और क्यों नहीं ली जाती है सीख…

जम्मू में आज हुए हादसे से मुझे 6 दिसंबर 1980 के हादसे की याद आई। कुतुब मीनार पर ऊपर जाने के लिए सीढ़ियां हैं और इस हादसे से पहले लोग ऊपर जाते थे। हादसे के बाद ऊपर जाना बंद कर दिया गया। 40 साल से ज्यादा हो गए ऊपर जाने की सुविधा फिर शुरू नहीं की गई। हजारों लाखों लोगों को उस अनुभव से वंचित रखा गया पर हादसे तो हो ही रहे हैं।

आज के हादसे को आप कुतुब मीनार वाले हादसे से अलग मान सकते हैं पर ऐसे हादसे तो होते रहे हैं। मातारानी अपने दरबार में आने वालों की रक्षा नहीं कर पाईं – तो सरकार और प्रशासन की क्या बात करूं। आस्था वाले तो कह सकते हैं कि वहां मरने वाले पुण्यात्मा होंगे। पर इस लापरवाही के लिए मरने वालों के अलावा किसी को सजा होगी?

क्या कुतुब मीनार में ऊपर जाना चाहने वालों के लिए कोई व्यवस्था नहीं होनी चाहिए। तब कहा गया था बत्ती चली गई थी। अब यूपीएस लग सकता है, कम खर्च में ज्यादा रोशनी हो सकती है। घिसी हुई सीढ़ियों की मरम्मत हो सकती है। पर कौन करेगा और कौन मांग करेगा। खुलते ही भीड़ तो हमीं लगाएंगे और नियंत्रण नहीं रखने की लापरवाही भी हमी से होगी। लेकिन सरकार, व्यवस्था या सिस्टम का भी कुछ काम है।


गिरीश मालवीय-

क्या वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड के अध्यक्ष मनोज सिन्हा की इस हादसे को लेकर कोई जिम्मेदारी नही बनती है?

कहा जाता है कि वैष्णों देवी मंदिर में क्राउड कंट्रोल से लेकर सिक्योरिटी तक की हाई क्लास फेसेलिटी है। मंदिर में दर्शन के लिए एक यात्रा रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था है, जिसकी पर्ची ऑनलाइन या ऑफलाइन मोड से ली जाती है। इस पर्ची की एक सीमित संख्या ही जारी की जाती है, जिससे कि मंदिर पर क्राउड को कंट्रोल किया जा सके, ये कोटा फिलहाल 25 हजार श्रद्धालुओं का है।

तो फिर कैसे 80 हजार से भी अधिक श्रद्धालुओं को ऊपर जाने दिया गया ? त्रिकुटा हिल्स में ज्यादा श्रद्धालु नहीं ठहर सकते हैं। ऐसे में उन्हें कटरा बेस कैंप में ही क्यो नही रोक दिया गया।

आम तौर पर तय कोटे के बाद यात्रियों की संख्या बढ़ने पर बाणगंगा चेकपोस्ट के गेट्स बंद करने की व्यवस्था है, जिससे कि मुख्य भवन पर ज्यादा भीड़ ना हो। लेकिन इस बार इसका ध्यान नहीं रखा गया। इसके अलावा मंदिर के मुख्य भवन पर लाइन लगाने के लिए भी अतिरिक्त सुरक्षा की व्यवस्था नहीं की गई।

इतनी गम्भीर चूक की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए कि नहीं चाहिए!

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