मजीठिया पर परिचर्चा प्रसारित करने पर डीएनए अखबार ने राज्यसभा टीवी से लिया प्रतिशोध

यह बहुत ही दुर्भाग्‍यपूर्ण लगता है कि डीएनए जैसा अखबार राज्‍यसभा टीवी जैसे संस्‍थान पर बिना जांचे- परखे इस तरह का आरोप लगा रहा है। हमें समझ में आ रहा है कि डीएनए क्‍यों राज्‍यसभा टीवी से उखड़ा है। 

दरअसल 15 मार्च को अपने बिग पिक्‍च्‍र में राज्‍यसभा टीवी ने एक सारगर्भित और आज तक कहीं न प्रकाशित और प्रसारित मजीठिया वेज बोर्ड को न लागू करने पर परिचर्चा आयोजित की थी। डीएनए में मजीठिया वेज बोर्ड की रिपोर्ट लागू नहीं की गई है। इतना ही नहीं यहां मजीठिया वेज बोर्ड के नाम पर कर्मचारियों के साथ कई तरह का छलावा किया जा रहा है।

उस परिचर्चा के बाद प्रिंट मीडिया की कलई पब्लिक के सामने आ गई। यही कारण है कि प्रिंट मीडिया राज्‍यसभा टीवी से इस तरह बदला ले रहा है। हो सकता है राज्‍यसभा टीवी के खिलाफ अन्‍य अखबारों में भी इस तरह की रिपोर्टें प्‍लांट की जाएं। ऐसे हालात में एसे भ्रामक खबरें प्रकाशित करने वाले संस्थानों के खिलाफ सख्‍त कानूनी कार्रवाई की जानी चाहिए।

मजीठिया मंच एफबी वॉल से

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Comments on “मजीठिया पर परिचर्चा प्रसारित करने पर डीएनए अखबार ने राज्यसभा टीवी से लिया प्रतिशोध

  • पत्रकार संगठनों में अखबार मालिकों की घुसपैठ हो चुकी है। नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (एनयूजे) जिसे हम श्रमजीवी पत्रकारों का संगठन मानते थे। उसमें भी अखबार मालिक पदाधिकारी बन बैठे हैं। ऐसे में लगता नहीं की पत्रकारों के हितों के लिए कोई संघर्ष करेगा। बल्कि मैंने तो यहाँ तक देखा है। पदाधिकारी मालिकों की चापलूसी कर हमेशा अपनी नौकरी बचाने और प्रमोशन पाने के हथकंडे अपनाते हैं। राजस्थान में जार के प्रदेश अध्यक्ष खुद तीन अखबार निकालते हैं। रिछपाल पारीक जो आजतक किसी अख़बार के संवाददाता नहीं रहे, उन्हें जार ने अपना संरक्षक बना रखा है। क्योकि वह आत्मदीप के खास हैं। मजीठिया के लिए बेचारे पत्रकार मालिकों की प्रताड़ना सहने के बावजूद सुप्रीम कोर्ट में अपने हक़ के लिए अकेले ही लड़ रहे हैं।
    जबकि होना तो यह चाहिए की सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू कराने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों पर दबाव बनाया जाना चाहिए। हाल ही कोटा में नेशनल यूनियन ऑफ़ जर्नलिस्ट्स (एनयूजे) का अधिवेशन हुआ था। उसमें मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की ओर से पांच लाख रुपये का डोनेशन और एक वक्त का खाना दिया गया। पदाधिकारी सहायता पाकर बहुत खुश हुए। इस मौके पर बजाये सहायता लेने के सरकार मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन लागू करने और नहीं लागू करने वाले अखबारों के विज्ञापन बंद करने के बात करते.

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