डॉक्टर साहब का क्लीनिक : संस्कृति के चार उपचार

MAYANK SAKSENA

(पहला मरीज़ कमर पर हाथ रखे अंदर आता है…स्टूल पर बैठता है)

मरीज़ 1 – डॉक्टर साहेब, कमर और बाकी जोड़ों में ऐसा दर्द है कि चला नहीं जाता है…उठना बैठना भी मुश्किल है…

डॉक्टर साहेब – आप ऐसा कीजिए पड़ोस वाले मेडिकल स्टोर से 11 हज़ार रुपए दे कर, अपनी बद्रीनाथ-केदारनाथ धाम की बुकिंग करवा लीजिए…

मरीज़ 1 (अचकचाते हुए) – हैं डॉक्टर साहेब…मुझे कमर और जोड़ों का दर्द है…

डॉक्टर साहेब – हां, उसी का इलाज कर रहा हूं…वहां जाकर बाबा केदार और बद्री के मंदिर की 11-11 परिक्रमा कीजिएगा…देखिएगा न हमेशा के लिए दर्द गायब हो जाएगा…और लौट कर प्रसाद भिजवाना मत भूलिएगा…

(दूसरा मरीज़ जो कि एक महिला है…अंदर आती है…उसकी आंखें लाल हैं…और खांस रही है)
मरीज़ 2 – डॉक्टर साहिब, वो मेरा आजकल जल्दी-जल्दी दम फूलने लगता है…और वो…

डॉक्टर साहेब – सबसे पहले तो सिर ढंकिए…पल्लू रखिए…अरे आप जींस पहिन कर आई हैं…पल्लू कहां से करेंगी…आजकल की औरतें…चलिए ये मेरा तौलिया सिर पर रखिए…पराए मर्द के सामने कम से कम सिर तो ढंकिए…भारतीय संस्कृति का नाश कर दिया सब…

मरीज़ 2 – वो सर, खांसी, दम फूलना…

डॉक्टर साहेब – हां-हां…आप ऐसा कीजिए, 100 ग्राम साबुत लाल मिर्च बगल के मेडिकल स्टोर से खरीद लीजिए…उसे एक फूल या पीतल के कटोरे में डाल कर उसमें एक डली कपूर की डाल कर जलाइए…और अपने चारों और घुमा कर उसे सूंघिए…ऐसा 101 बार कीजिए…कटोरा भी मेडिकल स्टोर से डिस्काउंट पर मिल जाएगा…

मरीज़ 2 – जी…मिर्च का धुआं…

डॉक्टर साहेब – जी…आपको दरअसल नज़र लगी है…अब बिना पर्दा-घूंघट घूमेंगी तो नज़र तो लगेगी ही…सिर ढंकिए और ग़ैर मर्दों की नज़र का परहेज कीजिए…बाकी दिन में दो बार नज़र उतारती रहिए मिर्च जला कर…और हां, तौलिया दे कर जाइएगा…बगल के मेडिकल स्टोर पर माता की चुनरी मिलती है…खरीद कर सिर ढंक लीजिएगा…

(औरत चेहरे पर श्रद्धा भाव लिए जाती है और एक मोटा सा सेठ टाइप आदमी अंदर घुसता है…)

मरीज़ 3 – डॉक्टर जी परनाम…और क्या हाल है…

डॉक्टर साहेब – सब बढ़िया है…आप कहें…

मरीज़ 3 – बस डॉक्टर जी…सब साईं कृपा है…

(डॉक्टर साहेब पर्चा लिखते रुक कर उसे तिरछी निगाह से घूरते हैं…और फिर लिखने लगते हैं)

मरीज़ 3 – बस वो दिक्कत ये है कि तीसरी शादी के बाद से कुछ दिक्कत है…वो समझ तो रहे हैं न आप…मतलब उमर तो ज़्यादा है नहीं अपनी…52 ही है लेकिन पत्नी खुश नहीं…दरअसल…

डॉक्टर साहेब – (व्यंग्य से मुस्कुराते हुए) इसमें कोई दिक्कत नहीं है…बस ऐसा कीजिए कि  एक तो साई वगैरह के चक्कर में मत पड़िए…ये सब हिंदू संस्कृति के खिलाफ है…तो कमरे में जितनी साईं की फोटो वगैरह हैं हटा दीजिए…उन तस्वीरों से संस्कृति का नाश हो रहा है…और यौवन शक्ति कम हो गई है…बाकी मैं लिख दे रहा हूं…बगल के मेडिकल स्टोर से लाल धागा लीजिएगा, अभिमंत्रित है…पवित्र जल में भिगोया हुआ है और जड़ी बूटियों का लेप है…चमत्कारी है…
मरीज़ 3 – तो उसे बांधना है…मतलब

डॉक्टर साहेब (व्यंग्य से) अब कहां बांधना है ये भी मैं बताऊंगा,..वो समझ रहे हैं न आप…
बाकी सुबह शाम मंदिर जाएं…पत्नी को साथ लेकर और सूर्य नमस्कार करते रहें…देखते हैं इस दवा से लाभ न हो तो फिर अनुष्ठान करवाते हैं अपने पंडित जी से…

(लाला जी तसल्ली और भक्ति भाव से हाथ जोड़े बगल के मेडिकल स्टोर की ओर बढ़ जाते हैं, चौथा मरीज़ अंदर घुसता है, पेट पर हाथ रखे है और सिर के सारे बाल गायब हैं…)

डॉक्टर साहेब – अरे संभल कर…

मरीज़ 4 – जी-जी वो थोड़ा कमज़ोरी है…इसलिए लड़खड़ा गया…

डॉक्टर साहेब – अरे वो बात नहीं है…आप बैलेंस लूज़ कर रहे थे और उधर श्री यंत्र लगा है…वो गिर के टूट जाता तो मैं तो बर्बाद हो जाता…चलिए बैठिए स्टूल पर और पहले गंगाजल से हाथ धो कर 11 बार ये कुश अपने चारों और फिराइए…

मरीज़ 4 – जी…हैं…
डॉक्टर साहेब का कम्पाउंडर – अरे जैसा कह रहे हैं करिए वैसा ही…

मरीज़ 4 – जी…
डॉक्टर साहेब – अब बताइए…क्या दिक्कत है…

मरीज़ 4 – दरअसल डॉक्टर साहेब, वो क्या है कि पिछले 4 महीने से पेट में तेज़ दर्द उठता था…पहले तो लगा कि कोई सामान्य बात है…फिर दवा से ठीक नहीं हुआ तो टेस्ट कराया तो पता चला कि पेट में कैंसर का ट्यूमर है…और दूसरी स्टेज है…ये रिपोर्ट्स…
(डॉक्टर साहेब मरीज़ को गुस्से से घूरते हैं)

कम्पाउंडर – डॉक्टर साहेब रिपोर्ट नहीं देखते हैं…परम्परा देखते हैं…

डॉक्टर साहेब – जाति क्या है आपकी?

मरीज़ 4 – जी…

डॉक्टर साहेब – कुछ नहीं…जाने दीजिए…ऐसा है बगल के मेडिकल स्टोर से उज्जैन के महाकाल का प्रसाद 12 पुड़िया ले लीजिए…3 दिन तक दिन में चार बार गंगाजल के साथ उसे ग्रहण कीजिए…और सुबह शाम महामृत्युंजय का जाप कीजिए…फिर चौथे दिन आइए…देखते हैं…

मरीज़ 4 – लेकिन डॉक्टर साहेब, दवा…

डॉक्टर साहेब – अरे दे तो दी दवा…कितनी दवा खाएंगे…संस्कृति के मुताबिक चलिए…सब ठीक रहेगा…अरे कम्पाउंडर ज़रा मेरी धोती कुर्ता निकालना पूजा का समय हो गया है…
(मरीज़ 4 डॉक्टर साहब की जय का जयकारा लगाते हुए, मंदिर..माफ़ कीजिएगा क्लीनिक से बाहर निकलता है..तब तक एक गरीब आदमी और उसकी बीवी अपनी छाती से एक नन्हे बच्चे को चिपकाए अंदर घुसने लगते हैं…कम्पाउंडर उन्हें रोकता है…)

कम्पाउंडर – कहां जा रहे हो…डॉक्टर साहेब के उठने का समय हो गया है…

औरत – साहेब, बच्चा बहुत बीमार है…इसे देख लीजिए…बचा लीजिए इसे…

डॉक्टर साहेब (धोती गांठते हुए बाहर निकलते हैं..) – कल आओ दोपहर में अभी मंदिर जा रहा हूं…पूजा का वक्त हो गया है…

(डॉक्टर साहेब कह कर निकल जाते हैं…क्लीनिक के बोर्ड पर बल्ब जल रहा है…बोर्ड पर लिखा है…संस्कृति चिकित्सा मंदिर…गरीब दम्पति के रोने की आवाज़ कार के स्टार्ट होने और मंदिर की घंटियों के शोर में दब जाती है…कम्पाउंडर शटर गिरा रहा है…डॉक्टर साहेब कार की पीछे की सीट पर बैठे माला के मनके गिन रहे हैं…कार में भजन बज रहा है…मैली चादर ओढ़ के कैसे….)

(इस चिकित्सा विधि का किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बंध नहीं है, आप जिसके बारे में सोच रहे हैं, उससे भी नहीं)

मयंक सक्सेना
mailmayanksaxena@gmail.com

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