फिल्म ‘संजू’ : मीडिया इस दौर का सबसे बड़ा, सबसे संगठित और सबसे खतरनाक माफिया है!

Yashwant Singh

मीडिया में एक से बढ़ कर एक नमूने हैं. अभी संजू फिल्म आई है जिसमें मीडिया भी एक मुद्दा है. एक बालक ने मुझे इस फिल्म को इंटरनेट से डाउनलोड करके दे दिया तो मुफ्त में ही पूरा देखने का मौका मिल गया. आखिरी सीन पर आइए. जेल से निकल रहे हैं संजय दत्त. मीडिया वाले चिल्ला रहे हैं- बाबा, बाबा, एक बार इधर देख लो…

ये चिल्लाहट इसलिए ताकि संजय दत्त की एक ठीकठाक फोटो क्लिक हो जाए, फुटेज बन जाए… लेकिन संजय मीडिया को इग्नोर कर बाकी फार्मिल्टी पूरी करने के बाद अपनी कार में जा बैठते हैं. तभी मीडिया वालों के बीच से एक बंदा चिल्लाता है- ”अबे ओ टेररिस्ट… दम है तो सामने आ…”

जाहिर है, यह संजय दत्त को उकसाने के लिए था…पर संजय ने जिंदगी के ठोकर पत्थर अनुभवों शिक्षाओं से जान लिया है कि ”कुछ तो लोग कहेंगे…लोगों का काम है कहना….”

संजय दत्त इग्नोर करते हैं मीडिया वालों को… चाहते तो वह कार से निकल कर कान पर कंटाप मार कर मीडिया वाले की वॉट लगा सकते थे… बिना मारपीट किए, सिर्फ जवाबी गालियां देकर भड़ास निकाल सकते थे… लेकिन इससे तो काम बन जाता मीडिया वालों का ही… जोरदार फुटेज / खबर / फोटो / वीडियो बन जाती, जिसका इंतजार मीडिया वाले कर रहे थे… ऐसे में अखबार वालों को प्रसार और टीवी वालों को टीआरपी मिल जाती..

पर फिर फंसता संजय दत्त ही… उसके खिलाफ एफआईआर मीडिया वाले कराते… देश भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर आंदोलन होता.. संजय दत्त के पुतले फूंके जाते….

लेकिन संजय ने धैर्य बरत कर, इग्नोर करके ऐसी नौबत न आने दी…

पर सवाल तो बना रहेगा कि आखिर जिस मीडिया वाले ने संजय दत्त को टेररिस्ट कहा, उकसाने के लिए, उसके खिलाफ कौन एक्शन लेगा…

मीडिया एक ऐसा भूखा भेड़िया है जिसे शांत रखने के लिए उसे हर वक्त शिकार मुहैया कराना पड़ेगा… शिकार न मिलेगा तो वह किसी को भी काटने दौड़ेगा ताकि उसका शिकार कर सके… मीडिया फिलवक्त नैतिकता, कानून, संविधान, आचार संहिताओं से परे है…

मीडिया इस दौर का सबसे बड़ा, सबसे संगठित और सबसे खतरनाक माफिया है जिसमें लोकतंत्र के सारे स्तंभ एक साथ निहित हैं, इसलिए वह तानाशाह वाला ताकत धारण कर चुका है… मीडिया सुपारीबाज है… उसे सत्ताधारी सुपारी देते हैं और वह विपक्ष को शूट करने निकल पड़ता है… उसे बढ़े रेट पर कोई भी सुपारी देकर कुछ भी करा सकता है…

फिलहाल एक वीडियो देखें… ये नमूना भी मीडिया का ही है, लेकिन फिल्मी नहीं, बिलकुल ओरीजनल है… नेता को तेल लगाने के वास्ते तत्पर है… कुछ सौ रुपये इसे मिल जाएंगे… पर सवाल वही है कि इन महोदय को नियुक्त करने के पहले इनका क्वालिटी चेक किया गया या बीस हजार रुपये सिक्योरिटी मनी लेकर माईक आईडी देकर आंय बांय सांय बकने के लिए छोड़ दिया गया….

वीडियो ये रहा…

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की एफबी वॉल से.

संजू फिल्म पर लखनऊ में पीटीआई के पत्रकार जफर इरशाद की एफबी वॉल पर प्रतिक्रिया यूं है…

Zafar Irshad : फ़िल्म ‘संजू’ में विलेन के रोल में ‘मीडिया’ को दिखाया गया है… ऐसा लगता है फ़िल्म में कि संजय दत्त ने कुछ नहीं किया था, मीडिया ने बिना सर पैर के फरज़ी खबरें बनायी और मीडिया ट्रायल की वजह से संजय गलत फंस गए… इस तरह की मीडिया की ऐसी की तैसी आज तक किसी फिल्म में नहीं दिखाई गयी.. और तो और, अखिर में मीडिया की खबरों में नमक मिर्च लगाने पर 10 मिनट का एक गाना भी है, जिसमें जी भर कर मीडिया के ‘सूत्रों ने बताया’ मुद्दे पर ज़लील किया गया है.. 1993-1994 में पत्रकारिता करने वाले वरिष्ठ पत्रकार लोग बताए कि क्या संजय वाकई मीडिया ट्रायल का शिकार हुए थे? मुझे तो लगता है कि मीडिया को पहली बार इतना बेइज़्ज़त किया गया है किसी फिल्म में…

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