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सुख-दुख

वरिष्ठ पत्रकार हरीश पाठक का आज 64वां जन्मदिन है!

देव श्रीमाली-

पढ़ी भौतिकी और रचा इतिहास… आज ग्वालियर में जन्मी एक ऐसी शख्सियत का जन्मदिन है जिसने पत्रकारिता हो या साहित्य,हर क्षेत्र में देशभर में झंडे गाड़े । जी हाँ मैं हरीश पाठक की ही बात कर रहा हूँ ।

देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम ग्वालियर में ही परवान चढ़ा था जहां वीरांगना लक्ष्मीबाई ने अपने बलिदान से देश की आज़ादी के सपने की नींव रखी थी । इस काल से ठीक सौ साल बाद इसी वीर भूमि ग्वालियर में श्री पाठक का जन्म हुआ । 20 दिसंबर 1957 को ।

देश में नव सूर्य उदय हो रहा था । इस काल मे हरेक अर्ध सम्पन्न व्यक्ति अपने बेटे को या तो डॉक्टर बनाना चाहता था या फिर इंजीनियर । हरीश जी का परिवार भी इसी राह पर था । लेकिन हरीश इसके ठीक उलट थे । वे जो बनना चाहते थे उसका तो घर मे कोई नाम भी सुनना पसंद नही करता था । घर मे बच्चा पलता रहा । दो सपने भी पल रहे थे। ज्यादातर के सपने में वह इंजीनियर का शैशव था और बच्चे के जेहन में लेखक,साहित्यकार और कहानीकार बनने का सपना पल रहा था । खैर द्वंद और बगावत के बीच जंग चलती रही। बच्चे ने बड़ो का सपना तोड़ दिया । वह बचपन मे ही कहानीकार बन गया । अपने सपने की जीत पर वह तब खुश हुआ जब कमलेश्वर ने उनके पिता से कहा – हरीश हिंदी कहानी का भविष्य है । बस यहीं से भौतिकी पढ़ने वाला यह लड़का साहित्य में इतिहास रचने चल दिया ।

हरीश पाठक ने अपनी ज़िंदगी शुरू की ग्वालियर के दैनिक स्वदेश से । क्यों? इसलिए क्योंकि तब यही अखबार था जहां का माहौल साहित्यिक था । वे यहां से दिल्ली प्रेस दिल्ली गए और फिर राह पकड़ी बम्बई की । हरीश जी उस बालपन में ही कितनी शानदार कहानियां लिखते थे इसका अंदाज़ा इस बात से ही लग सकता है कि जब सारिका पढ़ने के लिए मिलना मुश्किल था तब उनकी कहानी उसमे प्रकाशित होती थी । वे धर्मयुग की सम्पादकीय टीम का हिस्सा बने जो तब सबसे आदर की पत्रिका थी ।

हरीश जी ने कथा और पत्रकारिता दोनो की यात्राएं जुगलबंदी के साथ जारी रखीं। वे कुबेर टाइम्स से लेकर राष्ट्रीय सहारा तक के संपादक रहे लेकिन कहानियां लिखते रहे । उनके कहानी संग्रह आते रहे । सरे आम ,गुम होता आदमी,नदी के तीर उनके चर्चित कहानी संग्रह आये । मप्र का गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता सम्मान,यूपी हिंदी संस्थान के सम्मान सहित सैकड़ों सम्मान उन्हें मिल चुके है । हाल ही में उनकी शोध पुस्तक आंचलिक पत्रकारिता पर आई जो एक दुर्लभ दस्तावेज है । इसको लेकर ग्वालियर में ग्रामीण पत्रकारिता विकास संस्थान ने उनका अभिनंदन भी किया था ।

मेरी श्री पाठक जी से मित्रता दशको पुरानी है । इस दोस्ती की शुरुआत की पहल से ही उनकी जीवनशैली का अंदाज़ा लगा सकते है । मैं ग्वालियर से प्रकाशित आचरण में जूनियर रिपोर्टर था लेकिन मुम्बई में बैठे हरीश जी की इस अपरिचित पत्रकार की लेखनी पर निगाह थी । मुम्बई में सीरियल बम ब्लास्ट हुए थे । पूरी दुनिया मे इसकी चर्चा थी इसी दौरान पुलिस ने एक शिप पकड़ी थी जिसमे आरडीएक्स का अकूत जखीरा था । इसे पकड़वाने पाला एक श्वान था । जिसका नाम था – जंजीर ।

कुत्तो को प्रशिक्षण बीएसफ टेकनपुर में दिया जाता था । एक शाम ऑफिस के फोन पर कॉल आया । मुझसे बात करने । बोले – मैं हरीश पाठक बोल रहा हूँ। ग्वालियर से ही हूँ । अब धर्मयुग में हूँ । आपसे एक स्टोरी कराना है । शीर्षक है – ऐसे बनते है जंजीर?। कवर स्टोरी होगी इसलिए कुछ बॉक्स भी हो । साक्षात्कार बगैरह भी । डॉग ट्रेनिंग स्कूल बीएसएफ जाकर करनी होगी । कर सकोगे?

मेरे लिए यह कॉल काठ मारने जैसा । भिंड का लड़का ,धर्मयुग में लिखेगा । कवर स्टोरी छपेगी । पहले लगा मजाक है लेकिन बातचीत इतनी आत्मीय थी । शहर के सभी मूर्धन्य पत्रकारों की कुशलक्षेम पूँछी । मैने हाँ भी की और वह कवर स्टोरी छपी भी । उसके बाद मुझे माया से लिखने का ऑफर मिला ।

तब शुरू हुई यह अनमिली मुलाकात अनवरत जारी रही । फोन से । फिर मिलना -जुलना । आज भी निरंतर जारी है । हरीश जी मुम्बई हिंदी प्रेस क्लब के चुनाव भारी मतों से जीते और एक बार मुझे वहां लेकर भी गए ।

वे जीवंत व्यक्ति है । साफ बात कहते है खुलकर हंसते है । हाल ही में दिल्ली में आयोजित पुस्तक मेले में मिले तो सुप्रसिध्द कथाकार ममता कालिया सहित अनेक लेखकों से मिलवाया । वे फक्कड़ हैं । मस्ती में रहते है । संध्या बैठकों मर दोस्तो के साथ अट्टहास लहजे में।हंसते है और सबसे खुद फोन करके संपर्क को जीवित रखते है । वे लेखन के जरिये ही नही व्यक्तित्व के जरिये भी सहजता के इतिहास रच रहे हैं ।

64 वां जन्मदिन मुबारक
हरीश जी आप शतायु हों!

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