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‘हिंदुस्तान’ अख़बार का यह चुनावी संकल्प कितना भरोसेमंद!

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अभिरंजन कुमार-

आज के मीडिया में क्या-क्या हो रहा है और लगभग सारे मीडिया हाउस क्या-क्या करते रहे हैं– इसका एक अंदाज़ा आप हिंदुस्तान अखबार के इस “संकल्प” से लगा सकते हैं। यह संकल्प भी महज एक राज्य के चुनाव तक और केवल चुनाव तक ही सीमित प्रतीत हो रहा है!

फिर, इस चुनावी संकल्प पर भी कितना भरोसा किया जा सकता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि मैनेजमैंट कब तक अपना लोभ-संवरण कर पाएगा और कब उसे फिर से अपना रेवेन्यू/प्रॉफिट कम होने की चिंता सताने नहीं लगेगी।

यह भी है कि संपादक से लेकर नीचे तक की कड़ी के तमाम लोग भी इस संकल्प को अपने व्यक्तिगत कार्यों-व्यवहारों में उतार पाते हैं या नहीं? क्योंकि जब सोच, आदत और संस्कृति एक बार भ्रष्ट हो जाती है, तो सुधरना इतना आसान भी तो नहीं होता!

मैंने कितने शराबियों को कितनी बार संकल्प लेकर तोड़ते देखा है।

खैर, आप समझ सकते हैं कि हम जैसे जनपक्षधर, आदर्शवादी और पत्रकारिता के बुनियादी सिद्धांतों पर हमेशा अटल रहने वाले पत्रकार/संपादक क्यों मीडिया की मुख्यधारा को छोड़कर अपनी अलग राह, अपनी अलग कंपनी बनाने को मजबूर हुए।

सच बताऊँ, आज के मीडिया में ज़िम्मेदार पदों पर रहते हुए ईमानदारी और नैतिकता के साथ काम करना असंभव है। और नीचे भी चाहे आपको पता हो या न हो, अहसास हो या न हो, लेकिन आप वही एजेंडा लागू कर रहे होते हैं, जो ऊपर के लोग तय कर देते हैं।

इसलिए जनरल वीके सिंह ने मीडिया को “प्रेस्टीट्यूट” कहा था तो गलत नहीं कहा था। यह अलग बात है कि आज राजनीति सहित हमारे समाज और लोकतंत्र के हर एक अंग का यही हाल है।

हम लोग चूँकि हमेशा से समाज और राजनीति के साथ-साथ मीडिया की भी सफाई के लिए संघर्षरत रहे हैं, इसलिए इस कड़वे और खतरनाक सच पर पर्दा डालने की कोशिश नहीं करेंगे। धन्यवाद।

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  • There is a multi-million dollar question: What was the need for such an oath?
    The organisation knows where it stands as far as trust of readers is concorned so is d clarifications... But, still not easy to get back the trust and credibility it has already lost...

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