हिंदुस्तान अख़बार की इस शीर्षक के कारण हो रही आलोचना

दया शंकर राय-

लगता है यह पत्रकारिता का अन्त्येष्टि काल चल रहा है अन्यथा लोकतंत्र के इस तथाकथित चौथे खंभे को इतना तो पता होना ही चाहिए कि विपक्ष लोकतंत्र का अटूट और अनिवार्य हिस्सा होता है और बिना उसके लोकतंत्र की कल्पना भी बेमानी है..! लेकिन लगता है बुलडोजर संस्कृति के जरिये आज की चुनावी जीत लोकतांत्रिक चेतना को रौंदकर ही लाई जा रही है जिसकी परिणति यहाँ तक आ पहुंची है..! रौंदे गये इस तथाकथित चौथे खंभे को विनम्र श्रद्धांजलि..!


राघवेंद्र दुबे-

आप भी थूकें ऐसी पत्रकारिता पर… कोई अखबार अपनी लीड में ऐसी हेडिंग लगा सकता है। पत्रकारिता न फौरी या जल्दीबाजी का साहित्य रही, न ‘रफ ड्राफ्ट आफ हिस्ट्री’ और न नैसर्गिक विपक्ष।

उत्तर प्रदेश की कुल आबादी के 32 प्रतिशत लोगों ने धर्मोन्माद और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति के खिलाफ वोट किया।

कभी ऐसी भी पत्रकारिता थी देश में — पंडित नेहरू के खिलाफ डॉ. राम मनोहर लोहिया को तकरीबन 50 हजार वोट ही मिले । पंडित नेहरू लाखों के अंतर से जीते । तब एक अंग्रेजी अखबार ने लिखा — ‘ 50 हजार लोगों ने नेहरू को नकारा ‘ । आज हिंदी का एक प्रमुख अखबार लिख रहा है — ‘ बुलडोजर ने सबको रौंदा ‘ । थू है ऐसी पत्रकारिता पर ।

इस अखबार के ग्रुप एडिटर को यह नहीं मालूम कि बुलडोजर ने पत्रकारीय विवेक , कमिटमेंट और आजादी को भी रौंदा होगा । लोकतांत्रिक मूल्यों को भी । सरकार कुछ रौंदने के लिये नहीं सृजित करने के लिये होनी चाहिए । ग्रुप एडिटर , बुलडोजर स्तुति लिख रहा है ।



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