मैं इरोम हूं, मैं मरना नहीं चाहती, मैं भी खाना चाहती हूं…

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मैं सोचती हूँ, हर बार जब इरोम आत्महत्या के जुर्म में अदालत में पेश की जाती होगी, तो न्यायाधीश उसे देख कर क्या सोचते होंगे. उनके मन में क्या ख़याल आते होंगे जब उन्हें पता चलता होगा अगले दिन की लिस्ट देखकर कि आज इरोम को भी पेश होना है. कई महीनों बाद की तारीख देते हुए क्या वे सोचते होंगे कि पता नहीं यह लड़की क्या अगली तारीख पर भी आ पायेगी, क्या यह सच में तब तक जिंदा रह पाएगी?

क्या सच में कभी सोचते होंगे न्यायाधीश कि यह लड़की मेरे सामने खड़ी है दस साल से भी ज़्यादा समय हुआ बिना कुछ खाए इसको, क्या यह सच में सच्ची बात हो सकती है? क्या वे सोचते होंगे कि यह सच में हाड-मांस की ही बनी है कि जिंदा है अब तक. क्या वे सोचते होंगे कि कभी कि कैसे बन जाती है कोई हंसती-बोलती मासूम लड़की इरोम शर्मीला.

क्या वे कभी अपनी बच्ची के बारे में सोचते होंगे. कि वह भी किसी गलत बात से लड़ने के लिए इतनी जिद्दी न हो जाए जैसे कि इरोम. अगर उनकी बच्ची ने छोड़ दिया कभी अन्न तो वे कैसे देख पायेंगे उस निष्ठुर पल को. शायद उनकी बच्ची को मोमो और पिज़्ज़ा बहुत पसंद हों. शायद इरोम को भी पसंद हों.

क्या उस दिन न्यायाधीश सुबह का नाश्ता दोपहर लंच और रात डिनर कर पाते होंगे एक दस साल से खाना न खाई हुई लड़की से देखने मिलने के बाद. क्या कभी सोचा होगा न्यायाधीश ने. कैसे कोई लड़ सकता है अपनी मातृभूमि के लिए इस तरह.
 
चौबीस घंटे पहरा रहता है उस पर, पिछली बार उसने अदालत में कहा था कि मैं भी खाना चाहती हूँ, मरना नहीं चाहती! क्या सोचा होगा न्यायाधीश ने कि यह लड़की जो अदालत में खड़ी है अपनी ही हत्या के प्रयास के जुर्म में, वह सच में मरना नहीं चाहती. तो कौन है जो इंतज़ार कर रहा है इरोम की मौत का! कौन है जो इंतज़ार कर रहा है इस लड़की की मौत का- क्या न्यायाधीश ने सोचा होगा?
 
मैं सोचती हूँ फिर भी कि सच में एक दिन तो ऐसा आयेगा ही जब एक लोहे की बनी लड़की नहीं रहेगी इस दुनिया में.

यह सोचते हुए दिल जैसे अपनी जगह छोड़ देता है और दिमाग काबू में नहीं रहता कि सच में जिस दिन नहीं रहेगी वह लड़की, क्या बची रह जायेगी यह दुनिया, इसकी मानवता, इसका प्यार और भी न जाने क्या क्या… क्या तब भी बड़े बड़े शब्दों के अर्थ बचे रहेंगे सचमुच!

 

लेखिका संध्या नवोदिता कवि और सोशल एक्टिविस्ट हैं।



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