इंडियन एक्सप्रेस-जनसत्ता की चर्चित हड़ताल की याद!

संजय कुमार सिंह-

इंडियन एक्सप्रेस – जनसत्ता की हड़ताल… उस समय आरोप था कि यह हड़ताल कांग्रेस ने करवाई थी। काश! अब कोई भाजपा से उपकृत ‘पत्रकारों’ और प्रचारकों की गिनती कोई करता। एक पत्रकार की अखबार यात्रा का ये हिस्सा पढ़िए..

गणेश प्रसाद झा-

इंडियन एक्सप्रेस की हड़ताल भी देशभर में चर्चित रही… आमतौर पर हर सरकारी और निजी प्रतिष्ठानों में कर्मचारियों का अपना एक संगठन होता है जिसे हम कर्मचारी यूनियन कहते हैं। य़ह एक ट्रेड यूनियन होता है। ट्रेड यूनियनें कर्मचारियों के हितों की बात करती हैं और कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए लड़ती भी हैं। श्रम कानूनों में ट्रेड यूनियन को वैधानिक मान्यता दी गई है। ये यूनियनें कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर हड़ताल भी करती हैं जिसका उन्हें कानूनी अधिकार हासिल है। इंडियन एक्सप्रेस, फाइनेंसियल एक्सप्रेस और जनसत्ता का प्रकाशन करनेवाली कंपनी इंडियन एक्सप्रेस न्यूजपेपर्स (बंबई) प्राइवेट लिमिटेड की दिल्ली यूनिट में भी कर्मचारियों का एक मजबूत यूनियन था। करीब 670 कर्मचारियोंवाली इस यूनिट में छोटी-बड़ी कई हड़तालें हुईं। इंडियन एक्सप्रेस की तमाम हड़तालें देश भर में चर्चा का विषय रहीं। देश के बड़े-बड़े मजदूर नेता इसमें किसी न किसी रूप में शामिल जरूर रहे।

जनसत्ता अभी शुरू भी नहीं हुआ था। जो लोग अखबार निकालने के लिए रखे गए थे उन लोगों की रोजाना दफ्तर में संपादकों के साथ बैठकें हो रही थी जिसमें यह सब चर्चा होती थी कि जनसत्ता को कैसा निकालना है और कैसे निकालना है। अखबार निकालने की बाकी तैयारियां भी चल रही थीं। एक दिन जनसत्ताके लोग दफ्तर में जुटे ही थे कि तभी अचानक एक्सप्रेस कर्मचारी यूनियन ने कंपनी के फ्लैगशिप अखबार इंडियन एक्सप्रेस में एक दिन की हड़ताल कर दी।

जनसत्ता के सभी लोग बिल्कुल नए थे। उनकी वहां के लोगों से पहचान भी नहीं थी। वे तो सिर्फ जनसत्ता के अपने संपादक प्रभाष जोशी को ही जान रहे थे। संपादक प्रभाष जोशी जी ने उस दिन की बैठक में इस हड़ताल में अंग्रेजी का अखबार इंडियन एक्सप्रेस को निकालने की चुनौती को सबके सामने रख दिया। हिंदी के लिए आए लोगों को अंग्रेजी का अखबार निकालना है। क्या चुनौती ली जाए। फिर भी अति उत्साह में कई लोगों ने हामी भर दी। जनसत्ता के सारे पत्रकार इंडियन एक्सप्रेस के डेस्क पर बैठे। अंग्रेजी की पत्रकार राधिका रॉय इंडियन एक्सप्रेस डेस्क पर थीं और जनसत्ता के लोगों ने पहली बार अंग्रेजी में अखबार निकाला।

वैसे तो इंडियन एक्सप्रेस की दिल्ली यूनिट में छोटी-बड़ी कई हड़तालें हुईं। पर वर्ष 1987 के अक्तूबर महीने में हुई हड़ताल सबसे लंबी हड़ताल रही थी जो 48 दिनों तक चली थी। अखबार कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़ाने और दीपावली पर कर्मचारियों को मिलनेवाली बोनस की रकम को लेकर अखबार प्रबंधन और कर्मचारी यूनियन में पिछले कई महीनों से विवाद चल रहा था और इसी झगड़े को लेकर यह हड़ताल हुई थी। कर्मचारी तनख्वाह बढ़ाने और 20 फीसदी बोनस की मांग कर रहे थे और प्रबंधन तनख्वाह बढ़ाने को तैयार नहीं था और अधिकतम 15 फीसदी बोनस देने को ही राजी था। हड़ताल 14 अक्तूबर 1987 को शुरू हुई थी जो 01 दिसंबर तक जारी रही थी। प्रबंधन ने 23 नवंबर 1987 को कर्मचारी यूनियन से एक समझौता वार्ता की थी पर इसमें कोई सहमति नहीं बन पाई थी। उसके बाद अखबार प्रबंधन ने 27 नवंबर 1987 को ट्रेड यूनियन की धारा-18 के तहत इस हड़ताल के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट में मुकदमा दायर कर दिया था। हड़ताल के साथ-साथ अदालती कार्रवाई भी चलती रही। इस मुकदमे में कंपनी के वकील थे एफ एस नरीमन। इस मुकदमे की सुनवाई उसी दिन हो गई थी। अदालत ने दरियागंज थाने के एसएचओ (थानेदार) को आदेश दिया था कि एक्सप्रेस बिल्डिंग दफ्तर से 50 मीटर के दायरे में किसी भी हड़ताली कर्मचारी को न घुसने दिया जाए।

हड़तालियों ने हड़ताल के पहले हफ्ते से ही पूरी एक्सप्रेस बिल्डिंग को बाहर से सील कर दिया था और वे दिन-रात दफ्तर के बाहर पहरा देते थे। हड़ताल शुरू होने के 15 दिन बाद 28 अक्तूबर 1987 को एक्सप्रेस प्रबंधन ने अपने संपादकों और पत्रकारों की मदद से इस हड़ताल को तोड़ने की कोशिश की तो हड़ताली कर्मचारियों ने दफ्तर के लामने बड़ा बवाल मचाया था।

हड़तालियों ने जनसत्ता के मैगजीन एडीटर मंगलेश डबराल को पीट दिया था। कहते हैं इस बलवे में जनसत्ता के प्रधान संपादक प्रभाष जोशी पर भी हमला हुआ था। इस हमले में उनका चश्मा भी टूट गया था। इस हमले का जमकर प्रतिरोध हुआ था। हड़ताल तोड़ने की इस पहली कोशिश में हड़ताली कर्मचारियों ने किसी भी संपादक और पत्रकार को बिल्डिंग के अंदर नहीं जाने दिया था। भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली इकाई के कार्यकर्ता भी हड़ताल तोड़ने की कोशिश करनेवालों के साथ थे। वहां भारी पुलिस बंदोबस्त भी था। फिर भी प्रबंधन हड़ताल को तुड़वाने में कामयाब नहीं हो पाया था।

अखबार प्रबंधन ने इंडियन एक्सप्रेस के दूसरे संस्करणों से पत्रकारों को बुलाकर उनसे अपने अखबारों के दिल्ली संस्करण निकलवाने की योजना बनाई थी। पर हड़तालियों ने एक भी बाहरी आदमी को अंदर नहीं जाने दिया था। उल्टे पुलिस ने इंडियन एक्सप्रेस के उन बाहर से आए कर्मचारियों को भी हड़ताली समझकर पीट दिया था। पुसिल ने हड़तालियों पर भारी लाठीचार्ज किया था। इस लाठीचार्ज में पड़ोस के अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया और शहर के दूसरे अखबारों के कुछ कर्मचारी भी घायल हो गए थे जो इंडियन एक्सप्रेस की हड़ताल को अपना समर्थन देने वहां आ गए थे। पुलिसवालेटाइम्स ऑफ इंडिया के लोगों को खदेड़ते-पीटते हुएटाइम्स ऑफ इंडिया की बिल्डिंग में घुस गए थे। इस पुलिस लाठीचार्ज की जबरदस्त प्रतिक्रिया हुई थी औरटाइम्स ऑफ इंडिया के कर्मचारी तुरंत हड़ताल पर चले गए थे। शहर के बाकी अखबारों में भी कर्मचारियों ने उस दिन काम रोक दिया था। नतीजा यह हुआ था कि अगली सुबह दिल्ली का एक भी अखबार प्रकाशित नहीं हुआ था। टाइम्स ग्रुप के दोनों सांध्य दैनिक मिड डे औरसांध्य टाइम्स भी उस शाम नहीं छपे थे।

संपादक प्रभाष जोशी पर हुए इस हमले के लिएजनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार परमानंद पांडेय और उनके कुछ साथियों को जिम्मेदार माना गया था और उनपर विभागीय कार्रवाई हुई थी। उस घटना के चश्मदीद रहेजनसत्ता के कई पत्रकारों ने परमानंद पांडेय के खिलाफ गवाही दे दी थी। कहते हैं इस हमले के कुछ दिन बाद संपादक प्रभाष जोशी जी ने जनसत्ता के सभी साथियों से इस मामले में बातचीत की थी। फिर आम सहमति बनने पर प्रभाष जोशी जी ने परमानंद पांडेय पर कार्रवाई करने की प्रबंधन से सिफारिश कर दी थी। फिर इसी गवाही के आधार पर प्रबंधन ने परमानंद पांडेय पर कार्रवाई करते हुए उनको गोरखपुर ट्रांसफर कर दिया था। उस समय गोरखपुर में जनसत्ता का कोई दफ्तर या ब्यूरो भी नहीं था इसलिए परमानंद पांडेय वहां नहीं गए। प्रबंधन ने उनपर आगे की कार्रवाई जारी रखी। फिर एक इन-हाउस न्यायिक कमेटी गठित की गई जिसने परमानंद पांडेय को प्रबंधन का आदेश न मानने की वजह से कंपनी की सेवा शर्तों का उल्लंघन करने का दोषी पाया गया और उनको नौकरी से निकाल दिया गया।

पर परमानंद पांडेय अखबार प्रबंधन की इस कार्रवाई के खिलाफ कोर्ट चले गए थे। बरसों की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार परमानंद पांडेय यह मुकदमा जीत गए थे। कोर्ट ने एक्सप्रेस प्रबंधन की इस एकतरफा कार्रवाई को गैरकानूनी माना था और परमानंद पांडेय की नौकरी बहाल ऱखी थी। यह एक्सप्रेस प्रबंधन की जबर्दस्त हार थी। कोर्ट के आदेश पर एक्सप्रेस प्रबंधन ने परमानंद पांडेय को वापस नौकरी पर लिया और कई साल का पूरा वेतन और तमाम दूसरे बकाए भी दिए। परमानंद पांडेय जी अदालत के आदेश पर अपनी नौकरी पर तो लौट आए पर उन्होंने जनसत्ता में फिर काम नहीं किया। योगदान करने के तुरंत बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया। (इसके बाद से परमानंद पांडेय वकालत के पेशे में आ गए। परमानंद पांडेय आज दिल्ली के जानेमाने वकीलों में गिने जाते हैं औऱ सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते हैं। उन्होंने मीडिया में शीर्ष स्तर पर व्याप्त भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन भी चला रखा है। वे पत्रकारों के अखिल भारतीय संगठन भारतीय श्रमजीवी पत्रकार संघ (IFWJ) से भी जुड़े रहे हैं।)

पत्रकारों पर तेजाब से हुआ हमला

पहली बार की नाकामी के बाद फिर 01 दिसंबर 1987 को दूसरी बार हड़ताल तोड़ने की कोशिश हुई। इस बार यह कोशिश सफल रही जब करीब 500 कर्मचारी पुलिस और भाजपा कार्यकर्ताओं की सुरक्षा में एक्सप्रेस बिल्डिंग में दाखिल हो गए। भाजपा की वसुंधरा राजे सिंधिया और मदनलाल खुराना जैसे कई दिग्गज नेता भी एक्सप्रेस बिल्डिंग में आए। उस समय भी हड़तालियों ने मारपीट की थी और हंगामा किया। नई दिल्ली के बहादुरशाह जफर मार्ग पर स्थित एक्सप्रेस बिल्डिंग पर उस दिन हुए इस बवाल में दोनों गुटों में जमकर मारपीट हुई और लाठियां भी चलाई गईं। इसमें कुछ लोगों को सिर में भी चोट आई। हड़ताल तुड़वाने की कोशिश करनेवाले कर्मचारियों पर तेजाब भी फेंका गया। इस एसिड अटैक में जनसत्ता के तीन पत्रकार प्रदीप कुमार सिंह, संजय कुमार सिंह और महादेव चौहान गंभीर रूप से घायल हो गए थे। तेजाब उनके चेहरे पर पड़ा था। उनकी आंखें बाल-बाल बचीं। इनके अलावा इस हमले मेंजनसत्ता के ही शंभूनाथ शुक्ल, मनोज चतुर्वेदी और अजय शर्मा भी घायल हुए थे पर उन्हें कम चोटें आई धीं। संजय कुमार सिंह को तो हड़तालियों ने इतना पीटा था कि उनके सिर में 12 टांके लगाने पड़े थे। हमले मेंजनसत्ता के कुल 16 पत्रकार चोटिल हुए थे। सभी घायलों को पहले पास के लोक नायक जय प्रकाश नारायण अस्पताल में और फिर वहां से ले जाकर साउथ एक्सटेंशन स्थित भाजपा नेता डा. जेके जैन के जैन नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया था। इस हमले का असर भी हुआ। कर्मचारी यूनियन की भरपूर निन्दा हुई। पुलिस पर हड़तालियों का पक्ष लेने और अखबार निकालने की इच्छा रखनेवालों को सुरक्षा मुहैया न कराने के आरोप लगे। यह सब सरकार के इशारे पर होने का आरोप भी लगा। इसके बाद हड़ताल चलने लायक भी होती तो आगे नहीं चल पाती और यही हुआ भी। हड़तालियों में से कुछ को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। कुछ लोग गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हो गए और कर्मचारियों से मारपीट करने के आरोपी लोगों के खिलाफ कंपनी ने भी कानूनी कार्रवाई की। इस घटना को लेकर एक्सप्रेस प्रबंधन ने नई दिल्ली के दरियागंज थाने में आईपीसी की धारा 307 के तहत हड़ताली कर्मचारियों पर एक एफआईआर भी दर्ज करा दी थी।

हमले के अगले दिन 02 दिसंबर 1987 को कंपनी प्रबंधन की ओर से जारी घोषणा पत्र के बारे में जनसत्ताने लिखा था, “प्रबंधन ने जनसत्ता के बहादुर पत्रकारों पर कायराना हमले की निन्दा की है। प्रबंधन ने कहा है कि जनसत्ता के प्रदीप कुमार सिंह, संजय कुमार सिंह और महादेव चौहान पर टीएम नागराजन के गुंडों ने हमला किया। नागराजन अपने गुंडों और कुछ बाहरी राजनैतिक ताकतों की मदद से इंडियन एक्सप्रेस औरजनसत्ता के दिल्ली के संस्करणों को बंद कराने पर तुले हुए थे। दिल्ली दफ्तर के बहादुर साथियों ने उनकी इस कोशिश को नाकाम कर दिया। जनसत्ता के ये तीन साथी भी इन्हीं में से थे। जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस को निकालने के संकल्प के साथ जुटे इन युवकों की कोशिशों से दोनों अखबार निकले पर गुंडे नहीं चाहते थे कि अखबार हॉकरों तक पहुंच पाए। जब तक प्रदीप कुमार सिंह, संजय कुमार सिंह और महादेव चौहान जैसे लोग रहेंगे जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस को निकलने से कोई नहीं रोक सकता।

प्रबंधन को इन बहादुर साथियों पर हुए हमले से गहरी ठेस पहुंची है। वह इन युवकों के साहस के सामने श्रद्धा से सिर झुकाता है क्योंकि वे खतरे से आमने- सामने मुकाबला करते हुए घायल हुए हैं ना कि उससे कतराते हुए। हमले में पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल, मनोज चतुर्वेदी और अजय शर्मा भी घायल हुए हैं। ये युवक दिन भर की मेहनत को अखबार विक्रेताओं तक पहुंचाने की गारंटी करने का असाधारण काम कर रहे थे। वह अखबार पहुंचाने वाली गाड़ियों की पहरेदारी कर रहे थे। प्रबंधन की घोषणा में कहा गया है कि वह सच्चाई के हक में इन साथियों के समर्थन की कोई भरपाई नहीं कर सकता लेकिन कृतज्ञता के एक छोटे से प्रतीक के रूप में प्रबंधन ने प्रदीप कुमार सिंह, संजय कुमार सिंह और महादेव चौहान के लिए 10,001 रुपए प्रत्येक और मनोज चतुर्वेदी, शंभूनाथ शुक्ल और अजय शर्मा के लिए 2001रुपए प्रत्येक की कृतज्ञता राशि की घोषणा की है।

इससे पहले जनसत्ता के रविवारीय संपादक मंगलेश डबराल पर हमला हो चुका है। उन्हें अस्पताल में अपना इलाज कराना पड़ा। जनसत्ता के सुरेश शर्मा भी हमले में घायल हुए थे। जनसत्ता के मुख्य उप संपादक श्रीश चंद्र मिश्र और अमेरन्द्र कुमार राय भी हमले में घायल हो चुके हैं। उनके साहस और समर्पण के लिए प्रबंधन ने श्री डबराल और श्रीश मिश्र के लिए 2001 रुपए प्रत्येक और बाकी लोगों के लिए 1001 रुपए प्रत्येक की कृतज्ञता राशि की घोषणा की है। प्रबंधन ने कर्मचारियों को सूचित किया है कि 28 अक्तूबर को श्री हाजरा और दूसरे कर्मचारियों के लिए घोषित कृतज्ञता राशि भी दी जा चुकी है। श्री हाजरा को 5001 रुपए और दूसरों को1001 मिल चुके हैं। कल रात की घटना पर आज राज्यसभा में गहरी चिन्ता व्यक्त की गई।”

इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक कर्नाटक के तत्कालीन मुख्यमंत्री रामकृष्ण हेगड़े ने प्रबंधन को एक तार भेजकर कहा था, “मैं एक दिसंबर को इंडियन एक्सप्रेस ऑफिस में उपस्थित रहने का बहुत उत्सुक था पर अपरिहार्य कारणों से न आ सकने का मुझे बेहद अफसोस है। अदालत के आदेश को लागू कराने को मैं अपना पूरा समर्थन देता हूं।”

एक्सप्रेस ग्रुप की इस घोषणा के साथ हमले की खबरजनसत्ता, इंडियन एक्सप्रेस और फाइनेंशियल एक्सप्रेस तीनों अखबारों में प्रमुखता से छपी। दिनांक 03 दिसंबर 1987 के जनसत्ता में पहले पेज पर इस बारे में छपी खबर के साथ प्रधान संपादक प्रभाष जोशी का एक विशेष आलेख भी प्रकाशित हुआ था। आलेख का शीर्षक था- “तेजाब से बची आंखें”। अपने इस आलेख में उन्होंने लिखा था, “एक्सप्रेस बिल्डिंग के कोने में लगे तंबू से कुछ थके लोग नारे लगा रहे हैं – मजदूर,मजदूर भाई-भाई और मजदूर एकता जिन्दाबाद। इन्हीं में से तीन-चार लोगों ने परसों रात जनसत्ता के उन आठ साथियों पर गुंडों से तेजाब, पत्थरों, लाठियों और सरियों से हमला करवाया जो प्रसार विभाग के मजदूरों की रक्षा में अपने दफ्तर से प्रताप भवन जाकर लौट रहे थे। इन उप संपादकों और संवाददाताओं से प्रसार विभाग के साथियों ने संरक्षण मांगा था क्योंकि हिंसा, आतंक और सरकारी मदद से “हड़ताल” करने वाले मजदूर नेताओं ने अखबार न बंटने देने की धमकी दे रखी थी। लेकिनजनसत्ता के ये साथी अढ़तालीस दिनों बाद निकले अपने अखबार को पाठकों तक पहुंचाना चाहते थे। टाइम्स बिल्डिंग के सामने कोई पंद्रह-बीस लोगों ने उनपर घात लगाकर हमला किया। तेजाब से अपनी आंखें बचाकर भागते साथियों में से ट्रेनी उपसंपादक संजय सिंह गिर गया। उस लड़के को इन “हड़ताल बहादुरों” ने इतना पीटा कि सिर पर दर्जन भर टांके आए।

इस हमले के डेढ़ घंटे बाद आए एसीपी वीरेन्द्र सिंह ने वहां तैनात बीसियों पुलिस वालों से यह नहीं पूछा कि उनके होते हुए हमला कैसे हुआ और हमलावर क्यों नहीं पकड़े गए। उन्होंने कहा कि इन जर्नलिस्टों को रात में वहां जाने की क्या जरूरत थी? दरियागंज पुलिस ने कहा कि ये पत्रकार चाय पीने निकले थे और हड़तालियों के तंबू के सामने से गुजरे इसलिए झगड़ा हो गया। लेकिन एसीपी वीरेन्द्र सिंह की सीख और पुलिस की गलतबयानी का क्या गिला? जिस बिल्डिंग के सामने इन पत्रकारों पर हमला हुआ वहां से निकलने वाले टाइम्स ऑफ इंडिया के स्वनामधन्य संपादक गिरिलाल जैन से कोई पूछे तो वे भी कहेंगे कि पत्रकारों को अखबार निकालने की जरूरत क्या थी? हड़ताल है अपने घर में बैठो।

पत्रकार का आखिर क्या रोल है? क्या वह अंगरक्षक है जो अखबार लादने वालों के साथ जाए?उसका काम गुंडों से मजदूरों को पिटते देखना है और जब उसके खुद के साथ ही कोई बदसलूकी हो तो अपने अखबार में हड़ताल करवा के दूसरे दिन संपादकीय लिखना है। पत्रकार पर्यवेक्षक है जबतक उसकी कार रोककर पुलिस आइडेंटिटी कार्ड न मांगे। अगर पुलिस ऐसा कर दे तो पत्रकार को तथ्यों से आंख मूंदकर लिखने की आजादी है लेकिन यह भी तभी तक जब तक सरकार न रोके।

ऐसे गिरिलाल जैन सब तरफ हैं इसलिए 28 अक्तबूर को अपना अखबार निकालने की एक्सप्रेस के लोगों की कोशिश पर जमीन आसमान एक कर देने वाले वाले आज चुप हैं। वे दबी जुबान से इसकी निन्दा भी नहीं करते हैं क्योंकि जैसा कि दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट की एक बैठक में कोई महासंघ के किसी अध्यक्ष संतोष कुमार ने कहा था, ‘हड़तालों में तो ऐसी हिंसा होती ही है।’ यूनियन हिंसा हिंसा न भवति! जनसत्ता के सोलह पत्रकार साथी यूनियन नेताओं के बताने पर गुंडों से पिट चुके हैं। न पुलिस ने कुछ किया है न पत्रकारों के वाचाल संघों ने।

भले ही लोकतंत्र हो, सरकार की थोपी गई हड़ताल को तोड़ने और अखबार निकालने की कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी। संजय सिंह, प्रदीप सिंह, महादेव चौहान और मंगलेश डबराल ने अपने खून से यह कीमत चुका दी है और अभी किसी का भी उत्साह चुका नहीं हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया था कि एक्सप्रेस बिल्डिंग से 50 मीटर दूर तक धरना देनेवालों को पहुंचाया जाए। उन्हें नहीं हटाया गया। पुलिस को एक्सप्रेस के लोगों के आने-जाने की सुरक्षा करने को कोर्ट ने कहा था। और बिल्डिंग के बाहर बीसियों पुलिस वालों के बावजूद तंबू से निकले लोगों ने हमला करवा दिया और वापस आकर सो गए लेकिन पुलिस ने नहीं देखा। जब घायल पत्रकार पानी के लिए चिल्लाते एक्सप्रेस भवन में भागे आए और उन्हें अस्पताल पहुंचा दिया गया तब भी पुलिस को कुछ मालूम नहीं हुआ। जब एक्सप्रेस के लोग हल्ला करते हुए पुलिस के पीछे पड़े तो किसी अफसर ने पूछा – कहां हुआ हमला, क्यों हल्ला मचा रहे हो ! मौके पर तैनात दरियागंज के थानेदार कालिया को जीप में सोते हुए से मैंने जब जगाया तो हमला हुए को आधा घंटा हो गया था। इसके बाद से रक्षा में तैनात पुलिस लगातार शिकायत करती रही कि पत्रकारों को बाहर जाने की क्या जरूरत थी और जाना ही था तो बता कर क्यों नहीं गए? सोने वालों और हमला होते हुए न देखने वालों को बताने से फायदा? पुलिस की पहरेदारी और वफादार प्रेस की पहरेदारी में कोई फर्क नहीं है। संजय सिंह, प्रदीप सिंह और महादेव चौहान भगवान की कृपा मानो कि मुंह पर फेंके गए तेजाब से तुम्हारी आंखें बच गईं। यही आंखें तुम्हे अपनी पत्रकारिता की सच्चाई दिखाएंगी।”



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