किसान विरोधी दैनिक जागरण ने तो सत्ता की चाटुकारिता की हद पार कर दी!

नवीन कुमार-

आज के बाद दैनिक जागरण में छपने वाले हर लेखक और कवि का बहिष्कार कीजिए। उसके कार्यक्रमों में जाने वालों का बहिष्कार कीजिए।

वो लेखक और कवि उन हत्यारों की टोली में शामिल हैं जिन्होंने किसानों को रौंदा है। जो लेखक और कवि दैनिक जागरण के लंपटपन का विरोध नहीं करते वो हिंदी समाज के लिए शर्म हैं।

अपने रंगा सियार कवियों और लेखकों को पहचानिए।

अशोक कुमार पांडेय-

यह हत्यारों का मुखपत्र है। हमारे साहित्यकार इसके आयोजनों में हिंदी का भला करने जाते हैं। मैं अपनी पूरी ताक़त से थूकता हूँ इस पर। आऽऽऽक थू!

श्याम मीरा सिंह-

आप लोग अपने शहरों में कुछ अधिक नहीं कर सकते, तो अकेले ही “दैनिक जागरण” अख़बार की प्रतियाँ जलाइए. सोशल मीडिया पर इसकी तस्वीरें डालिए. ताकि सबको पता चला कि ये अख़बार मोदी की दलाली कर रहा है.

हैशटैग- #दैनिक_जागरण_दलाल_है

शुभम पांडेय-

My problem is that those who do the dirty job, in this case, the reporter who filed, the sub who edited this, the ones at the lowest end in a corrupt set-up get paid the least.

The cream goes to the top level folks. The owners, the editors. Hopefully, a day comes when everyone is paid equally in a corrupt organisation.

हेमराज सिंह चौहान-

दो अखबार दो नज़रिए। कौन कहां खड़ा है काफ़ी है समझने के लिए।

धर्मवीर-

तीन अख़बार … तीनों में एक ही ख़बर। लिखने के तरीक़े से ही आप समझ जाएँगे कि दैनिकजागरण कोई अख़बार नहीं बल्कि गुप्ता परिवार के लिए दलाली कर माल बनाने का माध्यम है। दरअसल यह अख़बार वर्षों पहले से ही पत्रकारिता को कलंकित करने के पाप में शामिल है। इसके मालिकान के लिए पैसा ही माई बाप है और उसके लिए यह लोग सांप को रस्सी और रस्सी को सांप लिखने में लगे रहते हैं।

(उपर- जागरण , अमर उजाला और भास्कर के चित्र।)

आयुष सिंह-

दो अखबार दोनों की हेडलाइन देख लीजिए। पता चल जाएगा कि कौन जनता के पक्ष में खड़ा है और कौन सरकार के पक्ष में।

एक अखबार सच कहने का साहस कर रहा है तो दूसरा चारण परंपरा का उदाहरण पेश करते हुए सरकार की नजर में अपना नंबर बढ़ा रहा है।

मनोज सिंह गौतम-

सबेरे बस स्टाप रेलवे स्टेशन पर जाकर दैनिक चाटरण को ऐसे सबक सिखाये और इनकी प्रेस से जो गाड़ियां निकल रही है उनसे अखबार सङक पर गिराकर जलाई जाये।

अजय पाठक-

जो भी इस अखबार को पढ़ता है उससे गदहा समझो, अभी भी उसके दिमाग का स्तर संघियों वाला ही है। इस अखबार को पढ़ने वाला जन्मजात मंदबुद्धि है।

और ये तय मानो कि सबसे बड़ा और सबसे पुराना आईटी सेल यही अखबार है और भगत लोग इसी अखबार को पढ़ कर व्हाट्स एप और फेसबुक यूनिवर्सिटी से पीएचडी की डिग्री हासिल करते है ।

कनुप्रिया-

सरकार का मंत्री किसानों पर गाड़ी चढ़ाकर उनकी हत्या कर देता है. पुलिस विपक्ष के नेताओं को अरेस्ट करती है.

गोदी अख़बार ख़बर देता है उपद्रवी किसानों ने भाजपा नेताओं की हत्या की. गोदी मीडिया को सुशांत सिंह, रिया चक्रवर्ती और आर्यन ख़ानों से फुर्सत नहीं.

भक्त धर्म की अफ़ीम चाट कर, बेशर्म और बेरहम बने बैठे हैं. हिन्दुत्व का मुद्दा हर मुद्दे पर भारी है. उत्तरप्रदेश में राम राज्य स्थापित हो गया है, अगले चुनाव में और मज़बूत होगा.

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Comments on “किसान विरोधी दैनिक जागरण ने तो सत्ता की चाटुकारिता की हद पार कर दी!

  • पुरुषोत्तम त्रिपाठी says:

    दो कौड़ी का अखबार है दैनिक जागरण। यह बीजेपी का मुखपत्र है। यही कारण है कि इसे बीजेपी शासन काल में सरकारी विज्ञापन खूब मिल रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले इसने दो पेज में योगी सरकार की महिमा का बखान किया था। यहां पत्रकार और संपादक नहीं बल्कि परचून की दुकान के सेल्समैन काम करते हैं। जिन्हें एक सेल्समैन जैसा ही वेतन दिया जाता है। दैनिक जागरण को भी कर्मचारी चाहे जितना वेतन बढ़ाकर बताए, लेकिन हकीकत यह है कि उसे मात्र 25000 रुपये ही मिलते हैं।

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