‘जानेमन जेल’ पढ़ने के बाद कोई भी निरपराध जेल जाने से भय नहीं खायेगा

: पुस्तक समीक्षा : पिछले दिनों हमारे एक वरिष्ठ पत्रकार मित्र ने स्वयं के जेल प्रवास पर स्वयं द्वारा लिखी पुस्तक के स्वरूप में आत्मकथा ‘जानेमन जेल’ मुझे सप्रेम भेंट के साथ पढ़ने के लिए दी। हालांकि मैं पुस्तक और खासतौर से किसी की आत्मकथा पढ़ने के मामले में ठेठ नशेबाज की श्रेणी में गिना जाता रहा हूं, लेकिन पिछले कुछ समय से एक मीडिया हाउस की आधारशिला रखने की जद्दोजहद में इतना मशगूल हो चुका हूं कि पुस्तक पढ़ने का वक्त ही नहीं निकाल पाता। 

आप सभी को आश्चर्य होगा कि मैं अपने मीडिया हाउस की परिकल्पना को साकार करने और उसे अस्तित्व में लाने के लिए इस तरह से बौराया हुआ हूं कि एक पत्रकार होने के बावजूद मैं दैनिक समाचार-पत्रों के समाचार भी विस्तृत रूप से नहीं पढ़ पाता। इस विषम परिस्थितियों मे हमारे पत्रकार मित्र की आत्मकथा ‘जानेमान जेल’ पढ़ना मुझे बोझ सरीखा लग रहा था। यूं ही अनमने मन से पुस्तक का एक पन्ना पढ़ा तो मित्र की आत्मकथा ने मुझे इस कदर से झकझोरा कि मैंने पुस्तक को टुकड़ों में पढ़ने के बजाए एक ही बार में पढ़ना ज्यादा उचित समझा। या यूं कह लीजिए, हमारे पत्रकार मित्र की लेखनी और उनकी जेल यात्रा पर आधारित आत्मकथा इतनी प्रभावशाली लगी कि उसने मुझे पूरी पुस्तक एकाग्रचित होकर पढ़ने पर विवश कर दिया। 

मुझे अपने पत्रकार मित्र की जेल यात्रा का वर्णन इतना भाया कि मैंने अपनी समाचार-पत्रिका ‘दृष्टांत’ में पुस्तक समीक्षा लिखने का मन बना लिया। इसके लिए बकायदा मैंने उनसे सहर्ष इजाजत भी ले ली। उनसे इजाजत लेने के बाद मैंने समाचार वेब पोर्टल ‘भड़ास 4 मीडिया’ के संस्थापक व संपादक यशवंत सिंह की 68 दिवसीय जेल यात्रा पर आधारित उनके द्वारा लिखी पुस्तक पर संस्मरण लिखने की कोशिश की है। 

जहां तक ‘भड़ास 4 मीडिया’ के संस्थापक व संपादक यशवंत सिंह की पत्रकारिता के सफर की बात है तो इन्होंने कई प्रतिष्ठित दैनिक समाचार-पत्रों में ट्रेनी के रास्ते संपादक के पद तक अखबारों में अपनी लेखनी से सबको प्रभावित किया है। किन्ही अपरिहार्य कारणवश प्रबंध तंत्रों से नहीं पटी, या यूं कह लीजिए, इन्होंने व्यवसायिक पत्रकारिता और तथाकथित सामंती मानसिकता वाले सीनियर पत्रकारों की फटकार नहीं सुनी तो इन पर कई तरह से दबाव बनाया जाने लगा। अंततः इन्होंने किसी की फटकार सुनने के बजाए स्वयं वेब मीडिया के सहारे अपनी पहचान बनाने की ठानी। परिणामस्वरूप उनका प्रयास ‘भड़ास4मीडिया’ समाचार वेब पोर्टल के रूप में सामने आया। 

समाचार वेब पोर्टल के सहारे इन्होंने मीडिया के महासागर से उन खूंखार मगरमच्छों के चेहरों से नकाब उतारी जिन्हें मीडिया जगत, शासन-प्रशासन और सियासी गलियारों से लेकर नौकरशाही तक दिग्गज के रूप में जाना जाता था। यशवंत सिंह की पत्रकारिता के प्रति जज्बे का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि उन्होंने जिस अखबार में ट्रेनी के रूप में पत्रकारिता का ककहरा सीखा, उसी अखबार के तथाकथित भ्रष्ट तंत्र के खिलाफ ‘भड़ास4मीडिया’ में ‘पोल खोल’ शीर्षक से समाचार प्रकाशित कर डाले। 

मीडिया के इन बडे़ घरानों को यशवंत सिंह का दुस्साहस रास नहीं आया। परिणामस्वरूप मीडिया घरानों के कथित दिग्गज संगठनों ने अपने प्रभाव का दुरूपयोग कर ऐसा जाल बिछाया कि यशवंत सिंह न सिर्फ उसमें उलझ कर रह गए बल्कि उन्हें 68 दिन गाजियाबाद की ‘डासना’ की जेल में बैरक नम्बर 5 में व्यतीत करने पडे़। आमतौर पर एक पत्रकार जेल का नाम सुनते ही भयग्रस्त हो जाता है। यशवंत ने भी अपनी पुस्तक ‘जानेमन जेल’ जाने से पूर्व कुछ इसी तरह से अनुभव का वर्णन किया है। 

यशवंत ने अपनी पुस्तक में एक पत्रकार की जेल यात्रा पर आधारित ‘जानेमन जेल’ में इतना खूबसूरत वर्णन किया है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद कोई भी निरपराध जेल जाने से भय नहीं खायेगा। जेल के ‘कोड’ शब्दों का भी इतनी खूबसूरती के साथ वर्णन किया गया है कि इसे पढ़ने के बाद ऐसा लगता है जैसे जेल जाने से पूर्व ट्रेनिंग के लिए यह किताब लिखी गयी हो। यशवंत सिंह ने धारावाहिक संस्मरण ‘जानेमन जेल’ लिखने की घोषणा जेल में रहते हुए ही कर दी थी। श्री सिंह ने अपनी पुस्तक में जेल में दूसरे अन्य सजायाफ्ता बंदियों और कैदियों के बारे में भी लिखा है। जेल में कुछ उनके मित्र भी बने तो कुछ से उन्होंने दूरी बनाकर रहने में ही भलाई समझी। 

श्री सिंह ने अपनी पुस्तक में स्वयं को जेल में रहने के लिए ढालने सम्बन्धी बातों का भी उल्लेख किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक में अपने कर्मयोगी साथी अनिल सिंह की भी जमकर तारीफ की है। बकौल यशवंत, ‘अनिल सिंह ही एकमात्र ऐसे पत्रकार थे जिन्होंने हर वक्त उनका साथ दिया’। गौरतलब है कि वेब पोर्टल को पर पूरी तरह से ताला जड़ने के लिए मीडिया घरानों के दिग्गजों ने यशवंत सिंह के जेल जाने के एक माह बाद ही उनके कर्मयोगी साथी कंटेंट एडीटर अनिल सिंह को भी जेल भिजवा दिया था। इस बात का उल्लेख भी इस किताब में किया गया है। यशवंत सिंह ने अपनी इस पुस्तिका में एक हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र के कुकर्मों का भी जमकर खुलासा किया है। यहां तक उस अखबार के प्रबंध तंत्र पर उंगली उठाते हुए लिखा गया है कि उक्त अखबार ने पत्रकारिता से विरत भ्रष्ट तरीकों से उगाही का धंधा चला रखा है। 

यशवंत अपनी किताब में लिखते हैं कि जेल से लौटने के बाद उनमें हौसला अफजाई हुई है। अब वे और तीव्र गति से मीडिया के महासागर में फल-फूल रहे भ्रष्टाचार के मगरमच्छों को सबक सिखाने की ठान चुके हैं। इस किताब के जरिए उन्होंने उन मीडिया घरानों को संदेश भी देने की कोशिश की है जिन्होंने उन्हें जेल तक का सफर तय करवाया। उन्होंने अपनी किताब में लिखा है, ‘एक पत्रकार से बात बरास्ते पुलिस और अदालत से नहीं की जाती, कलम के जरिए की जाती है, और कलम आप लोग कब के गिरवी रख चुके हो। सो आप लोग समझ नहीं सकते। इसलिए यही कहूंगा कि ‘तुम सितम और करो, टूटा नहीं दिल ये अभी’।

फिलहाल पूर्वी उत्तर-प्रदेश (गाजीपुर) के एक गांव से निकलकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद वेब पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले यशवंत सिंह की भावी योजना अपने वेब पोर्टल ‘भड़ास4मीडिया’ के सहारे प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के तथाकथित महाभ्रष्टों के चेहरों से नकाब उतारने की तैयारी में हैं। जहां तक जेल प्रवास पर लिखी उनकी किताब ‘जानेमन जेल’ की बात है तो यह किताब उन सभी ईमानदार और तेज-तर्रार पत्रकारों के लिए संजीवनी साबित हो सकती है जो जेल जाने के भय से भ्रष्ट लोगों का खुलासा करने से कतराते हैं। यह किताब उन पत्रकारों के लिए भी नसीहत के समान होगी जिन्होंने उस पत्रकार की ऐन वक्त पर मदद नहीं की जो ईमानदारी के रास्ते पर चल कर कुछ बदलाव की तस्वीर दिल में संजोकर चल रहा है।

जानेमल जेल का रिव्‍यू लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं.

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