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कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफज़ई को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार

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इस साल शांति का नोबेल पुरस्कार भारत के सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफज़ई को संयुक्त रुप से दिया गया है।

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इस साल शांति का नोबेल पुरस्कार भारत के सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफज़ई को संयुक्त रुप से दिया गया है।

दिल्ली में रहने वाले सत्यार्थी बाल मजदूरी के खिलाफ लंबे अर्से से लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने इसके लिए ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ नाम की ग़ैर सरकारी संस्था भी बनाई है और इसी के जरिए वो 1990 से बच्चों के अधिकारों पर काम कर रहे हैं।

कैलाश सत्यार्थी ने अब तक 1 लाख से ज्यादा बच्चों को मजदूरी से मुक्त कराया है। वे इंटरनेशनल सेंटर ऑन चाइल्ड लेबर और यूनेस्को से जुड़े रहे हैं।

 
नोबेल पुरस्कार से पहले सत्यार्थी को 1994 में जर्मनी का ‘द एयकनर इंटरनेशनल पीस अवॉर्ड’, 1995 में अमरीका का ‘रॉबर्ट एफ़ कैनेडी ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड’, 2007 में ‘मेडल ऑफ़ इटेलियन सीनेट’ और 2009 में अमरीका के ‘डिफ़ेंडर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी अवॉर्ड’ सहित एक दर्जन से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड मिल चुके हैं।

1954 में मध्य प्रदेश के विदिशा में जन्मे हुआ सत्यार्थी 8वें भारतीय हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है। पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर रहे कैलाश सत्यार्थी ने 26 वर्ष की उम्र में ही करियर छोड़कर बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था। उन्होने बाल श्रम के ख़िलाफ़ अभियान चलाकर हज़ारों बच्चों की ज़िंदग़ियों को बचाया है। इस समय वे ‘ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ (बाल श्रम के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान) के अध्यक्ष भी हैं।

सत्यार्थी का सफर आसान नहीं रहा है। बाल श्रम के खिलाफ आंदोलन चलाने और बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के अभियान के दौरान उन पर कई बार जानलेवा हमला भी हुआ। मार्च 2011 में दिल्ली की एक कपड़ा फ़ैक्ट्री पर छापे के दौरान उन पर हमला किया गया। इससे पहले 2004 में ग्रेट रोमन सर्कस से बाल कलाकारों को छुड़ाने के दौरान भी उन पर हमला हुआ था।

वहीं मलाला यूसुफज़ई को बच्चों के अधिकारों की कार्यकर्ता होने के लिए जाना जाता है। पाकिस्तान के क़बायली इलाकों में लड़कियों की शिक्षा की मुहिम चलाने के लिए महज़ 14 वर्ष की उम्र में चरमपंथियों की गोली का निशाना बनना पड़ा था। इस हमले वे बुरी तरह घायल हो गईं और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में आ गई।

मलाला ने 11 साल की उम्र में ही डायरी लिखनी शुरू कर दी थी। वर्ष 2009 में “गुल मकई” के छद्म नाम से बीबीसी ऊर्दू के लिए डायरी लिख मलाला पहली बार दुनिया की नजर में आई थी। जिसमें उसने स्वात में तालिबान के कुकृत्यों का वर्णन किया था और अपने दर्द को डायरी में बयां किया। वर्ष 2009 में न्‍यूयार्क टाइम्‍स ने मलाला पर एक फिल्‍म भी बनाई थी।

मलाला सबसे यूवा नोबेल पुरस्कार विजेता हैं।

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