बॉब डिलन का एक गीत “Masters of War” तो वाकई क़माल का है!

Om Thanvi : बीकानेर में छात्रजीवन में मेरे कमरे की दीवार पर बॉब डिलन का एक पोस्टर चिपका रहता था, लाल और काले महज़ दो रंगों में। JS (जूनियर स्टेटसमन) में कुछ अंकों में क़िस्तों में छपा था, जोड़कर टाँग दिया। मगर डिलन के बारे में जाना बाद में। उनका काव्य, उनके गीत और गान। फिर बरसों बाद कवि-मित्र लाल्टू ने डिलन के गीतों का एक कैसेट दिया। मैंने उसे आज तक नहीं लौटाया। अक्सर उसे सुना और अपनी सम्पत्ति बना लिया।

गीत हमारे यहाँ तो ज़्यादातर रूमानी होते हैं; डिलन ने उनमें विद्रोह का रंग भरा। उस रंग को जिया। नोबेल समिति ने डिलन का अभिनंदन कर अपनी जड़ता को ख़ूबसूरती से तोड़ा है। मित्र Tribhuvan ने बॉब डिलन को नोबेल घोषित होने पर सुंदर टिप्पणी लिखी है। साझा करता हूँ। प्रतिरोध का जज़्बा अमर रहे – इस जज़्बे के धारक जो भी हों, जहाँ भी हों! और हां, मेरे निजी संग्रह में बॉब डिलन पर बनी एक फ़िल्म है- ‘नो डायरेक्शन होम बॉब डिलन’। वृत्तचित्र (डॉक्युमेंटरी)। मार्टिन स्कोरसेज़ी ने ग्यारह साल पहले बनाई थी। अपने जलसाघर (होम थिएटर) के बड़े परदे पर फिर चलाने का मन है। इतवार को चार-छह मित्र बुलाता हूँ। गीत, संगीत, यायावरी और हादसों से भरी साढ़े तीन घंटे की फ़िल्म पता नहीं कितने लोग देखने को तैयार होंगे!

Tribhuvan : कितनी सुहानी घड़ी है कि बॉब डिलन को साहित्य का नोबेल मिला है। मैंने बॉब डिलन का नाम पहली बार अपने बच्चों से सुना और उन्होंने मुझे और मेरी पत्नी को उनके “Blowin’ in the Wind”, “The Times They Are a-Changin'”, “Subterranean Homesick Blues” and “Like a Rolling Stone” जैसे गीत सुनने बाध्य किया। यह मेरे लिए एक अलग अनुभव था और साहित्य के नभ का एक नया वातायन भी। मेरे बच्चों ने ये गीत गंगानगर, जयपुर, दिल्ली और जहां भी मैं रहा, हर जगह खूब गाए और सुनवाए।

बॉब डिलन के कितने ही तराने मैंने बाद में सुने और पढ़े। कई बार मैं महससू करता रहा हूं कि आख़िर ऐसी भाव-व्यंजनाएं हमारे यहां लोकगीतों में क्यों नहीं आती हैं? और क्यों हमारे यहां गीतकारों और ऐसे गैरफ़िल्मी गायकों को ज़्यादा लोकप्रियता नहीं है। बॉब डिलन का एक गीत “Masters of War” तो वाकई क़माल का है। युद्ध पिपासु लोगों के लिए लिखा गया यह गीत मनुष्यता को गहराई से देखता है और बताता है कि युद्ध और हिंसा के कारोबारी कितने विकराल दैत्य और मानव भक्षी राक्षस हैं।

बॉब डिलन के अलावा कई ऐसे गीतकार हैं, जो जादू सा जगाते हैं। मुझे बॉब डिलन की तरह ही बहुत ज्यादा झकझोरा जॉन लेनन ने। उनका गीत “इमेजिन” तो मेरे लिए त्रिकाल संध्या और पांच बार की नमाज़ जैसा है। ऐसे लगता है, जैसे गुरबाणी को जॉन लेनन ने किसी लिरिकल प्रार्थना में पिरो दिया है। यही क्यों, बच्चों ने जब पहली बार ऑजी ऑसबॉर्न का गीत “मा-मा आई ऐम कमिंग होम” सुनवाया या कभी घर में बजाया तो इस गीत ने चुपचाप राेने को विवश कर दिया।

सचमुच, मुझे लगता है, मेरे बच्चे किसी नोबेल पुरस्कार समिति से कम प्रतिभा नहीं रखते हैं। चलिए तो आप सुनिए “मास्टर्स ऑव वार”…बॉब डिलन की गीतिका, जो मनुष्य की संवेदनाओं और हिंसक इरादों वाले रक्तपिपासुओं को आत्मग्लानि में दबा देती है।

“Masters Of War”

Come you masters of war
You that build all the guns
You that build the death planes
You that build all the bombs
You that hide behind walls
You that hide behind desks
I just want you to know
I can see through your masks.

You that never done nothin’
But build to destroy
You play with my world
Like it’s your little toy
You put a gun in my hand
And you hide from my eyes
And you turn and run farther
When the fast bullets fly.

Like Judas of old
You lie and deceive
A world war can be won
You want me to believe
But I see through your eyes
And I see through your brain
Like I see through the water
That runs down my drain.

You fasten all the triggers
For the others to fire
Then you set back and watch
When the death count gets higher
You hide in your mansion’
As young people’s blood
Flows out of their bodies
And is buried in the mud.

You’ve thrown the worst fear
That can ever be hurled
Fear to bring children
Into the world
For threatening my baby
Unborn and unnamed
You ain’t worth the blood
That runs in your veins.

How much do I know
To talk out of turn
You might say that I’m young
You might say I’m unlearned
But there’s one thing I know
Though I’m younger than you
That even Jesus would never
Forgive what you do.

Let me ask you one question
Is your money that good
Will it buy you forgiveness
Do you think that it could
I think you will find
When your death takes its toll
All the money you made
Will never buy back your soul.

And I hope that you die
And your death’ll come soon
I will follow your casket
In the pale afternoon
And I’ll watch while you’re lowered
Down to your deathbed
And I’ll stand over your grave
‘Til I’m sure that you’re dead.

Som Prabh : बॉब डिलन का पुरस्कृत होना बराक ओबामा को शांति का नोबेल मिल जाना नहीं है। जो चौंक रहे हैं वे शायद छपी हुई किताबों को ही साहित्य समझते हैं। साहित्य सिर्फ छपी हुई किताबें नहीं है। 75 साल के बुजुर्ग गायक और गीतकार बॉब डिलेन के चुनाव का मजाक उड़ाने वाले दरअसल अपना ही उपहास कर रहे हैं। यह दूर की कौड़ी लग सकती है, लेकिन इससे सीख लेकर भारतीय साहित्य में आंदोलनों में सक्रिय या समाज को किसी तरह उद्वेलित करने वाले ऐसे गायकों, गीतकारों को पहचानने और पुरस्कृत करने की परंपरा की शुरुआत करनी चाहिए, जो समाज में मरियल हो चुके साहित्य से कहीं अधिक प्रभावी भूमिका निभा रहे हैं और उनमें राजनैतिक प्रतिरोध और समकालीन सवालों से भिड़ंत की अद्भुत क्षमता है। इससे जनांदोलनों के तमाम अदृश्य चेहरे भारतीय समाज की पहचान बन सकेंगे। इससे वह खाई भी पाटी जा सकेगी जो लिखित और मौखिक परंपराओं में पैदा हुई है। जानता हूं कि यह होेगा नही? साहित्य का कारोबार जिनके हाथों में हैं उनके पास इतनी हिम्मत नहीं है कि वे ऐसा कर सकें। फिर भी सपने देखने से खुद को क्यों रोका जाए।

कल्बे कबीर : साहित्य के सद्य-नोबल-पुरस्कार से सम्मानित कवि-गायक बॉब डिलेन अमरीका-यूरोप में अपने देसी गीत-संगीत के लिये कितने लोकप्रिय हैं – मुझे कुछ ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं है, लेकिन यह तय है कि बॉब की ख्याति अपने ज़माने के हिंदुस्तानी शाइर जिगर मुरादाबादी से कम ही होगी । कहते हैं कि जिगर को देखने के लिये रेलवे-स्टेशनों पर भीड़ लग जाती थी। रेलें थम जाती थीं। जब जिगर अपनी लहकदार-खरज़दार आवाज़ में अपनी ग़ज़लों को गाते थे तो हज़ारों की भीड़ में सन्नाटा खिंच जाता था । समकालीन शाइर जिगर से इस बात पर रश्क़ रखते थे। उनमें जोश मलीहाबादी भी थे, जो गा नहीं सकते थे और अपनी बुलन्द आवाज़ में तरह में अपनी शाइरी पढ़ते थे। एक बार जोश ने तंज़ कसते हुये कहा – जिगर, तुम्हारा टेंटुआ तो किताबों में छप नहीं सकता! जोश अगर ज़िंदा होते तो देखते कि अब टेंटुआ भी किताबों में छपने लगा है! जो Bob Dylan की तुलना फ़िल्मी और मंचीय गीतकारों से कर रहे हैं वे मूर्ख हैं ग़रीबों-वंचितों के पक्ष में, कुलीनों के विरुद्ध और युद्ध के ख़िलाफ़ गीत लिखकर गाने वाले बॉब डिलेन की तुलना सिर्फ़ इकतारे पर गाने वाली मीरा, अभंग गाने वाले तुकाराम से की जा सकती है या किसी बाउल गायक से!

Nishant Jain : मुझे लगता है कि जाने-माने अमेरिकी गीतकार और गायक Bob Dylan को लिटरेचर का नोबेल मिलना साहित्य जगत में एक नए बदलाव की आहट है। उम्मीद है, इससे हिन्दी और भारतीय भाषाओं का अकादमिक साहित्य जगत थोड़ा उदार होगा और लोकप्रिय साहित्य-संगीत को ‘साहित्य’ के रूप में स्वीकारना शुरू करेगा। अकादमिक जगत के कुछ (सब नहीं, अतः कृपया दिल पर न लें) मठाधीश टाइप के लोग लोकप्रिय गीतकारों और लोक कवियों को ‘साहित्यकार’ की श्रेणी में नहीं गिनते। हिन्दी साहित्य जगत में तो स्थिति और भी ख़राब है।ऐसी कविता, जो एक सुशिक्षित व्यक्ति के भी पल्ले न पड़े, सिर्फ़ उसे ही साहित्य मानने की जिद और आम बोल-चाल की भाषा में रचे गए लयबद्ध गीतों और कविताओं को दोयम दर्जे का साहित्य मानना कहाँ तक तर्कसंगत है, उम्मीद है, कुछ विद्वान ही इस पर प्रकाश डालेंगे।

भूलना नहीं चाहिए कि साहित्य की तीन मूल विधाएँ -गीत, कहानी और नाटक, सभ्यता की शुरुआत से ही लोक-जीवन में रचे बसे हैं और अपनी लोक भाषा, लय और नाद सौंदर्य के बल पर आम जन की ज़ुबान पर चढ़ते रहे हैं। कबीर से लेकर निराला तक, कविता की तुकांतता ने निरंतर उसके नाद सौंदर्य के माध्यम से साहित्य को जन-जन तक पहुँचाया है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि हिन्दी वाले अकादमिक लोग भी अब पुनर्विचार करते हुए गुलज़ार साहब, गोपालदास नीरज, दुष्यंत कुमार, अदम गोंडवी, प्रसून जोशी, इरशाद कामिल, स्वानन्द किरकिरे जैसे बेहतरीन गीतकारों के लोकप्रिय गीतों के लिटरेरी योगदान को कुछ तवज्जो देंगे।

Arun Maheshwari : बॉब डिलेन को नोबेल पुरस्कार… अभी-अभी हम बीकानेर से हरीश भादानी समग्र के लोकार्पण समारोह से कोलकाता लौटे हैं । हरीश जी के गीतों और धुनों से सरोबार इस समारोह की ख़ुमारी अभी दूर भी नहीं हुई कि आज यह सुखद समाचार मिला – अमेरिकी गीतकार और गायक बॉब डिलेन को इस साल का साहित्य का नोबेल पुरस्कार घोषित किया गया है । शायद रवीन्द्रनाथ के बाद यह दूसरा गीतकार है जिसे उसके गीतों के लिये नोबेल दिया जा रहा है। बॉब डिलेन अमेरिका के पॉप संगीत के एक ऐसे अमर गीतकार और गायक रहे हैं जिनके छ: सौ से अधिक गीतों ने अमेरिका की कई पीढ़ियों को मनुष्यता और प्रतिवाद की नई संवेदना से समृद्ध किया है। यहाँ हम उनके एक प्रसिद्ध गीत – Blowin’ In The Wind को मित्रों से साझा कर रहे हैं और साथ ही तुरत-फुरत किये गये उसके एक हिंदी अनुवाद को भी दे रहे हैं –

Blowin’ In The Wind Lyrics

How many roads must a man walk down
Before you call him a man ?
How many seas must a white dove sail
Before she sleeps in the sand ?
Yes, how many times must the cannon balls fly
Before they’re forever banned ?
The answer my friend is blowin’ in the wind
The answer is blowin’ in the wind.

Yes, how many years can a mountain exist
Before it’s washed to the sea ?
Yes, how many years can some people exist
Before they’re allowed to be free ?
Yes, how many times can a man turn his head
Pretending he just doesn’t see ?
The answer my friend is blowin’ in the wind
The answer is blowin’ in the wind.

Yes, how many times must a man look up
Before he can see the sky ?
Yes, how many ears must one man have
Before he can hear people cry ?
Yes, how many deaths will it take till he knows
That too many people have died ?
The answer my friend is blowin’ in the wind
The answer is blowin’ in the wind

कितने रास्ते तय करे आदमी
कि तुम उसे इंसान कह सको ?
कितने समंदर पार करे एक सफ़ेद कबूतर
कि वह रेत पर सो सके ?
हाँ, कितने गोले दागे तोप
कि उनपर हमेशा के लिए पाबंदी लग जाए?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है ।

हाँ, कितने साल क़ायम रहे एक पहाड़
कि उसके पहले समंदर उसे डुबा न दे ?
हाँ, कितने साल ज़िंदा रह सकते हैं कुछ लोग
कि उसके पहले उन्हें आज़ाद किया जा सके?
हाँ, कितनी बार अपना सिर घुमा सकता है एक आदमी
यह दिखाने कि उसने कुछ देखा ही नहीं ?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है ।

हाँ, कितनी बार एक आदमी ऊपर की ओर देखे
कि वह आसमान को देख सके?
हाँ, कितने कान हो एक आदमी के
कि वह लोगों की रुलाई को सुन सके?
हाँ, कितनी मौतें होनी होगी कि वह जान सके
कि काफी ज्यादा लोग मर चुके हैं ?
मेरे दोस्त, इनका जवाब हवा में उड़ रहा है
जवाब हवा में उड़ रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी, त्रिभुवन, सोम प्रभ, कल्बे कबीर, निशांत जैन, अरुण माहेश्वरी की एफबी वॉल से.

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

घपलों-घोटालों और कैलाश सत्यार्थी का चोली-दामन का साथ रहा है, नोबेल मिलना कुशल मीडिया मैनेजमेंट का नतीजा है

वर्ष 2006 में कैलाश सत्यार्थी पहली बार नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित हुए थे। उस वक्त हिंदी साप्ताहिक अख़बार द संडे पोस्ट ने उनके काम, व्यक्तित्व, विवाद और जीवन के आयामों का जायजा लेते हुए एक स्पेशल रिपोर्ट प्रकाशित की थी। यह रिपोर्ट इस वर्ष के नोबल शांति पुरस्कार के विजेता कैलाश सत्यार्थी के काम की जांच करते हुए उनके जिस रूप को सामने लाती है वह इस पुरस्कार के विजेता को कठघरे में खड़ा करने के साथ पुरस्कार की चयन प्रक्रिया को ही विवादित बना देता है। और ऐसा शायद पहली ही बार हुआ है कि इतने बड़े सम्मान से एक भारतीय के सम्मानित होने पर भी प्रशंसा से अधिक सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसा क्यों हो रहा है इसे जानने के लिए पढ़िए स्पेशल  रिपोर्ट-

कैलाश सत्यार्थी का नाम आते ही जेहन में उन बेहाल बच्चों की तस्वीर उभरती है जिन्हें असमय श्रम की भट्टी से मुक्ति दिलायी गयी थी। यह मुक्ति कैलाश सत्यार्थी और उनकी संस्था ‘बचपन बचाओ’ के कार्यकर्ताओं ने दिलायी। ‘बचपन बचाओ’ के कार्यकर्ता इन बच्चों को उद्योग मालिकों के यहां से आजाद कराते हैं जहां वे मामूली पैसों पर मजदूरी करने को विवश होते हैं। इसी नेक मुहिम के चलते इस वर्ष  कैलाश सत्यार्थी नोबल शांति पुरस्कार के लिए नामित किये गये हैं। लेकिन कैलाश सत्यार्थी के पुराने सहयोगी उन्हें सवालों—संदेह के घेरे में खड़ा करते हैं जो उनके दूसरे रूप को सामने लाता है। उनका यह दूसरा पहलू लोगों के बीच निर्मित उनकी धवल छवि को धूमिल करता है।

फैक्ट्रियों में दम तोड़ रहे बचपन को आजाद करने के नाम पर दुनियाभर की दानदाता एजेंसियों से ‘दक्षिणा’ लेने वाले कैलाश सत्यार्थी पर करोड़ों रुपये का घपला करने तथा ट्रस्ट कागजातों के साथ हेराफेरी करने का आरोप है। इन्होंने न सिर्फ मुक्ति प्रतिष्ठान से संचालित ‘मुक्ति आश्रम’ पर कब्जा कर लिया है, बल्कि स्वामी अग्निवेश के पावर ऑफ अटॉर्नी वाले शेख सराय की बिल्डिंग को भी हथिया लिया है। फंडिंग का रास्ता खुलते देख सत्यार्थी ने दिल्ली के इब्राहिम पुर स्थित ‘मुक्ति आश्रम’ को संपत्ति उगाहने के केंद्र के रूप में विकसित किया और एक के बाद एक कई ट्रस्ट खोले। महत्वपूर्ण बात तो ये रही कि ‘मुक्ति आश्रम’ में ही सत्यार्थी ने तमाम दूसरे ट्रस्टों के पंजीकृत कार्यालय खोले, मगर अन्य ट्रस्टियों को इसकी मौखिक जानकारी तक नहीं दी। हद तो तब हो गयी जब ट्रस्टी शेओताज सिंह, राजेश त्यागी, प्रभात पंत और खूबीराम की सहमति के बगैर ‘आवा’ नाम का एक नया ट्रस्ट अस्तित्व में आया और उसके भी ट्रस्टी कैलाश सत्यार्थी और उनकी पत्नी सुमेधा सत्यार्थी ही थे। तकनीकी तौर पर बचने के लिए सत्यार्थी ने एक नई स्कीम पेश की और सालभर में 25 रुपये दान में देने वालों को भी ट्रस्टी बनाया। इसका सिर्फ एक मकसद रहा कि आगे चलकर कोई यह न कहे कि उनके ज्यादातर ट्रस्ट सत्यार्थी दंपत्ति के प्रबंधकीय और मालिकाना हक में चलते हैं।

देश ही नहीं दुनियाभर के ‘कॉर्पोरेट बुद्धिजीवियों’ के बीच सुर्खियों में रहने वाले सत्या​र्थी आज अपने जुगाड़ की बदौलत ‘नोबल शांति पुरस्कार’ के लिए नामित हो गये हैं। एक के बाद एक आधा दर्जन से अधिक ट्रस्ट खोलने वाले सत्यार्थी वही हैं, जिन्होंने झूठी प्रतिष्ठा पाने के लिए पानीपन की एक फैक्टरी पर फर्जी इल्जाम लगाये थे और आपराधिक मुकदमे पर जेल गये। बचपन बचाने से लेकर सूचना के अधिकार की पैरोकारी करने वाले सत्यार्थी किसी तरह की सूचना मांगने पर मामले को दबा जाने में माहिर हैं और हेराफेरी करने में उनका कोई जवाब ही नहीं है। महीने का पखवाड़ा विदेश में बिताने वाले सत्यार्थी के खिलाफ उनके कर्मचारी भी खड़े हो गये हैं। कुछ कर्मचारियों ने उनके खिलाफ अदालत मे मामला दायर किया है।

सत्यार्थी ने पैक्स नाम की विदेशी दानदाता एजेंसी की शर्तों के मातहत मुक्ति आश्रम को कर दिया। फंडिंग का रास्ता खुलता देख मध्य प्रदेश के विदिशा वासी सत्यार्थी ने साक्स (SACCS) नाम की भी एक संस्था खोल दी। इस प्रकार सत्यार्थी साउथ एशियन कॉलिशन ऑन चाइल्डहुड सर्विस के स्वनामधन्य चेयरमैन और ‘मुक्ति आश्रम’ के सेक्रेटरी हो गये। जिसके बाद 1994 में बनाये गये एसोसिएशन फॉर वॉलंटरी एक्शन (आव) को इब्राहिमपुर स्थित ‘मुक्ति आश्रम’ की 14 बीघा 8 बिस्वा जमीन लीज पर दे दी गयी। आगे चलकर बचपन बचाओ फाउंडेशन का निर्माण किया और इस फाउंडेशन का रजिस्टर्ड ऑफिस भी मुक्ति आश्रम को ही रखा। इतना ही नहीं शेख सराय में जनता पार्टी के पूर्व सांसद बापू कालदांते द्वारा सांसद कोटे से दिये गये 24—सी एमआईजी फ्लैट को भी सत्यार्थी ने हथिया लिया। आजकल सुनने में आ रहा है कि शेख सराय का वह फ्लैट सत्यार्थी ने किसी तीसरे को बेच दिया है, ज​बकि उसकी पावर ऑफ अटॉर्नी स्वामी अग्निवेश के पास है। उल्लेखनीय है कि 1982 से 1992 तक बाल शोषण के खिलाफ संगठित तौर पर सत्यार्थी और अग्निवेश ने साथ काम किया।

जनकल्याण का लबादा ओढ़े, जनता और ट्रस्ट की संपत्ति को व्यक्तिगत हितों में इस्तेमाल करने वाले सत्यार्थी का यह विद्रूप चेहरा स्वामी अग्निवेश से हुयी एक बातचीत में सामने आया। विदेशी दान के करोड़ों रुपये डकारने वाले शांतिदूत कैलाश सत्यार्थी पर उंगली मुक्ति आश्रम के कर्मचारियों की शिकायत के बाद उठी थी। चारों ट्रस्टियों शेओताज सिंह, खूबीराम, प्रभात पंत, राजेश त्यागी से ‘मुक्ति आश्रम’ के कर्मचारियों ने सत्यार्थी की मनमानी किये जाने, ट्रस्ट के धन को व्यक्तिगत हितों में इस्तेमाल करने तथा हेरा—फेरी करने के गंभीर आरोप लगाये। इन तमाम आरोपों के मद्देनजर कैलाश सत्यार्थी, सुमेधा सत्यार्थी और एकाउंटेंट विट्ठल राव से जब ट्रस्टी शेओताज सिंह ने सफाई चाही तो सत्यार्थी दंपत्ति ने कोई जवाब नहीं दिया, मगर बिट्ठल राव ने शुरुआत में सहयोग किया। ऐसी स्थिति में उक्त चारों ट्रस्टियों की तरह से एक जांच अधिकारी नियुक्त किया गया। जांच के दौरान सत्यार्थी पर लगाये गये कर्मचारियों के आरोपों की सिलसिलेवार और तथ्यगत पुष्टि हुयी। जांच अधिकारी ने अक्टूबर 1995 में अलीपुर थाने में सत्यार्थी के खिलाफ मामला भी दर्ज कराया।

ट्रस्ट का मामला ट्रस्ट में ही निपटा लेने के मकसद से 1994 में स्वामी अग्निवेश के नेतृत्व में आर्य समाज और ट्रस्ट से जुड़े लोगों की आसफ अली रोड पर मीटिंग बुलायी गयी। लेकिन आर्य समाज के कार्यालय में घंटों तक चली इस बैठक का कोई सकारात्मक नतीजा नहीं निकला। अंतत: सदस्यों ने सर्वसम्मति से सत्यार्थी दंपति को ‘मुक्ति प्रतिष्ठान’ से निष्कासित कर दिया। चूंकि इब्राहिमपुर का ‘मुक्ति आश्रम’ जंतर मंतर स्थित ‘मुक्ति प्रतिष्ठान’ कार्यालय से संबद्ध था लिहाजा सत्यार्थी को ‘मुक्ति आश्रम’ से सारे रिश्ते स्वत: खत्म हो जाने चाहिए थे। बावजूद इसके स्वामी अग्निवेश के शब्दों में ‘सत्यार्थी की बदमाशियां जारी रहीं।’

‘मुक्ति आश्रम’ की नियमावलियों के मुताबिक यह स्थान गरीब, बीमार एवं विकलांग बच्चों के आर्थिक, सामा​जिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक विकास के लिए बनाया गया था। परंतु ऐसा न होते देख जांच अधिकारी शेओताज सिंह एवं अन्य तीन ने मिलकर जनवरी 1997 में दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में उक्त भ्रष्टाचार के आरोपी ट्रस्टियों के खिलाफ याचिका दायर की।

सत्यार्थी के खिलाफ शिकायतों का पुलिंदा देख अप्रैल 1997 में अतिरिक्त जिला न्यायाधीश बीएस चौधरी ने कोर्ट की तरफ से राना प्रवीन सिद्दीकी को जांच अधिकारी नियुक्त किया। सिद्दीकी ने भी जांच के बाद पेश की गयी रिपोर्ट में ‘मुक्ति आश्रम’ में हो रही अनियमितताओं को रेखांकित किया और पाया कि बेहद सुनियोजित तरीके से आर्थिक मामलों में हेरफेर की गयी है। रिपोर्ट में उल्लेख किया कि कैश बुक को देखने से ऐसा लगता है कि मानो एक ही आदमी ने कई जगह अगूंठे लगा रखे हैं। उन्होंने रिपोर्ट में आगे उल्लेख किया है कि 81 से 84 तक की जो कैशबुक है उनका कोई वाउचर नहीं है तथा संस्था को अनुदान किन स्रोतों से कितना प्राप्त हो रहा है इसका भी कोई उल्लेख नहीं है। 1980 से 89 तक का मुक्ति आश्रम में कोई रजिस्टर नहीं है। यहां तक कि मीटिंगों के दौरान लिए जाने वाले नोट्स भी उपलब्ध नहीं हैं। राना प्रवीन सिद्दीकी ने अपनी रिपोर्ट में स्वामी अग्निवेश तथा शेओताज सिंह पर जांच में सहयोग न करने तथा असंवैधानिक व्यवहार करने का भी जिक्र किया है।

एक के बाद एक तीन स्तरों से एक ही ढंग से लगाये गये आरोप उजागर भी हुए, परंतु सत्यार्थी ‘नोबल शांति पुरस्कार’ तक पहुंच गये। सत्यार्थी के विरोधियों और सहयोगियों दोनों का कहना है कि उनका यहां तक पहुंचना मीडिया मैनेजमेंट की कुशल कारीगरी का ही नतीजा है।

सत्यार्थी पर लगाये गये आरोपों के मद्देनजर जब उनका पक्ष जानने के लिए ‘दि संडे पोस्ट’ ने संपर्क किया तो कालकाजी स्थित उनके कार्यालय से जवाब आया कि ‘सत्यार्थी जी इस पर बातचीत नहीं करना चाहते हैं।’ फोन पर हुयी बातचीत में उनके मीडिया प्रभारी राकेश सेंगर ने न्यायिक सलाहकार का हवाला देते हुए कहा कि ‘न्यायालय में चल रहे इस मामले में कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।’ ट्रस्ट बनाम सत्यार्थी का मामला कोर्ट में गये नौ साल हो गये हैं, लेकिन अब तक कोई फैसला नहीं हो पाया है। न्यायालय पर टिप्पणी किये बिना इतना जरूर कहा जा सकता है कि याचिकाकर्ता बेहद सुस्त हो चुके हैं। इसी सुस्ती का परिणाम हुआ कि याचिकाकर्ता सुनवाई की तारीख में नहीं पहुंचे और कोर्ट ने केस ही खत्म करने का आदेश दे दिया, लेकिन केस देख रहे वकील आरके गौड़ की सक्रियता का परिणाम रहा कि केस की पुनर्वहाली के लिए अर्जी दे दी गयी।

आंखिन देखी सच

दिल्ली के सुदूर गांव इब्राहिमपुर में ‘मुक्ति आश्रम’ परिसर में ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के नारे लिखे हैं। लगभग 3.5 एकड़ में स्थित यह आश्रम फार्म हाउस मार्का है। अंदर बचपन की किलकारियां नहीं कुत्तों की आवाज है। यहां अनाथ बच्चे नहीं बल्कि विदेशी ब्रांड के कुत्ते रहते हैं। इन कुत्तों की देखरेख के लिए दरबान लगे हैं। आगंतुक कक्ष में लालटेन में भी बल्ब लगा हुआ है। एक-दो कट्ठे में बनी सामने एक ईमारत खड़ी है। कर्मचारी बताते हैं कि यहीं साठ बच्चे छह महीने के लिए आते हैं। यानी प्रत्येक साल यहां 120 बच्चों को शिक्षा-दीक्षा दी जाती है। परंतु बाल मजदूरी से पचासों हजार बच्चों को सत्यार्थी का संगठन मुक्त कराता है। बहरहाल, इस समय वाले साठ बच्चे कहां हैं? पूछने पर जवाब मिलता है अभी नहीं हैं। यहां हर आदमी का अपना एक ग्रेड है। दरबान और पानी लाने वाली दाई को छोड़ सब सभ्रांत दिखते हैं। सवाल जवाब कर रहा कर्मचारी भी नौकरी छोड़ जाने वाला है। वह सुमन जी (मुक्ति आश्रम की निवर्तमान निदेशक) का हर एक वाक्य के बाद जिक्र करता है। यहां जो कुछ भी हो रहा है वह इससे संतुष्ट नही है। अपनी भावनायें व्यक्त करते हुए कहता है- ‘आपके पास तो कहने का औजार है हमारे पास क्या है।’ चाय खत्म कर बाहर निकलने पर सूख रही फूल-पत्तियों से घिरा ‘बालिका मुक्ति आश्रम’ दिख जाता है। यहां एक भी लड़की नहीं है जबकि दावा चालीस का किया जाता है। वहां की महिला कर्मचारी बताती है कि दस-बारह थीं, दो-चार दिन पहले चली गयीं।

इसलिए सहयोगियों ने छोड़ा साथ

‘कैलाश सत्यार्थी के काम का चरित्र वैसा ही है जैसा कि स्वयंसेवी संगठनों का है। ये संगठन मूलत: इस तरह के सामाजिक काम पैसा कमाने के लिए कर रहे हैं। ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ के मुखिया बाल बंधुआ मजदूरों को मुक्त तो कराते है, परंतु वे बच्चे पुन: उस नर्क में वापस न जायें, इसका कोई विकल्प खड़ा नहीं करते। उनकी आर्थिक समृद्धि का विकल्प खड़ा किये बिना इस तरह के सारे प्रयास बेमानी हैं। कैलाश सत्यार्थी को दूसरे देश के संगठनों से तो समर्थन मिलता है, परंतु संकट की घड़ी में उन्हें अपने ही देश भारत में कोई समर्थक नजर नहीं आता। –आनंदस्वरूप वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता

बात दशकों पहले की है इसलिए मुझे ठीक-ठाक याद नहीं कि मैंने पावर ऑफ अटार्नी बदली थी या नहीं। हां, इतना मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि मैंने पावर ऑफ अटार्नी स्वामी अग्निवेश को दी थी। बाद में कैलाश सत्यार्थी और स्वामी अग्निवेश का आपस में झगड़ा हो गया और उस बीच मेरे पास सत्यार्थी और अग्निवेश दोनों आये थे। मैंने झगड़े में न पड़ते हुए अग्निवेश से कहा था कि 24—सी, शेख सराय वाला मकान दे दें, क्योंकि उस समय मेरे पास रहने के लिए घर नहीं था। लेकिन अग्निवेश ने कहा था कि यह फ्लैट अब विवादों में है जिसका मामला कोर्ट में चल रहा है। –बापू कालदांते, पूर्व सांसद जनता पार्टी

सत्यार्थी कहते हैं कि उन्होंने शिकायतकर्ता चारों ट्रस्टियों को ट्रस्ट से निष्कासित कर दिया है। यह जवाब वे तब देते हैं जब उनकी मनमानी और अनियमितताओं पर सवाल खड़ा होता है। सफाई के लिए ‘मुक्ति प्रतिष्ठान’ से जुड़े लोगों की बैठक करायी जाती है। उस फैसलाकून बैठक में साजिशन तरीके से फर्जी फोटोस्टेट के दस्तखत वाले नये ट्रस्टियों की बहाली की प्रतियां सत्यार्थी द्वारा दिखायी जाती हैं, जिसमें फर्जी हस्ताक्षर रामशरण जोशी और मधु जोशी के हैं, जबकि उन्होंने बहुत पहले ही ट्रस्ट छोड़ दिया था। हमने इस कागजात की कॉपी कोर्ट में भी लगायी है। अदालत द्वारा सुझाये गये ट्रस्ट कानूनों को ताक पर रखकर सत्यार्थी ने जो मनमानी की है, वह पूर्णतया आपराधिक मामला है। सत्यार्थी दंपत्ति जिन ट्रस्टों में भागीदार रहे हैं उनकी तहकीकात की जाये तो ज्यादातर ट्रस्टों की मैनेजिंग कमेटी में सत्यार्थी पाये जायेंगे। –राजेश त्यागी, वकील सुप्रीम कोर्ट एवं ट्रस्टी ‘मुक्ति प्रतिष्ठान’

बहुत पुरानी बात हो गयी है अब तो मैं ट्रस्टी भी नहीं हूं। हां, मुझे इतना याद है कि सत्यार्थी द्वारा किये गये हेर-फेर के खिलाफ शेओताज सिंह ने अदालत में याचिका दायर की थी। यह पूरा मामला सत्यार्थी बनाम अग्निवेश का है। उन्हीं से इस बारे में पूछिये। –प्रभात पंत, मुक्ति प्रतिष्ठान ट्रस्टी

 

अजय प्रकाश

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मीडिया को कैलाश जैसों से मतलब नहीं वो तो आमिर-अमिताभ को महिमामंडित करता है जिनके पीछे करोड़ों का बाज़ार खड़ा है

बचपन में फिल्मों के प्रति दीवानगी के दौर में फिल्मी पत्र-पत्रिकाएं भी बड़े चाव से पढ़ी जाती थी। तब यह पढ़ कर बड़ी  हैरत होती थी कि फिल्मी पर्दे पर दस-बारह गुंडों से अकेले लड़ने वाले होरी वास्तव में वैसे नहीं है। इसी तरह दर्शकों को दांत पीसने पर मजबूर कर देने वाले खलनायक वास्तविक जिंदगी में बड़े ही नेक इंसान हैं। समाज के दूसरे क्षेत्र में भी यह नियम लागू होता है। कोई जरूरी नहीं कि दुनिया के सामने भल मन साहत का ढिंढोरा पीटने वाले सचमुच वैसे ही हों। वहीं काफी लोग चुपचाप बड़े कामों में लगे रहते हैं। बचपन बचाओ आंदोलन के लिए नोबल पुरस्कार पाने वाले कैलाश सत्यार्थी का मामला भी कुछ ऐसा ही प्रतीत होता है। ये कौन हैं… किस क्षेत्र से जुड़े हैं… किसलिए… वगैरह – वगैरह। ऐसे कई सवाल हवा में उछले जब कैलाश सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। क्योंकि लोगों की इस बारे में जानकारी बहुत कम थी।

बचपन बचाओ आंदोलन की चर्चा यदा-कदा शायद अखबारों में पढ़ी भी गई हो, लेकिन इसे चलाने वाले और अंत में नोबल पुरस्कार पाने वाले कैलाश सत्यार्थी के योगदान से अधिकांश लोग लगभग अनभिज्ञ ही थे। भले ही नोबल पुरस्कार मिलने के बाद से तमाम चैनल और समाचात्र पत्र आज उनकी तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हों। कैलाश से ज्यादा प्रचार तो अपने देश में तालिबानियों के हमले का शिकार हुई मलाला युसूफजई को मिला। यह मामला एक सुपात्र की उपेक्षा का ही नहीं, बल्कि इस बहाने मीडिया की कार्यशैली व क्षमता भी सवालों के घेरे में कैद हो जाती है। सवाल उठता है कि अगर देश की राजधानी दिल्ली से अपना आंदोलन चलाने वाले कैलाश सत्यार्थी अब तक मीडिया की रौशनी से वचित रहे, तो उन हजारों  निस्वार्थ स्वयंसेवकों का क्या, जो देश के कोने-कोने में खुद दिए की तरह जल कर समाज को रोशन करने का कार्य कर रहे हैं।

आज कैलाश सत्यार्थी और उनके आंदोलन को लेकर दर्जनों तरह की खबरें चलाई जा रही है। लेकिन इससे पहले तो उनके विषय में रुटीन खबरें तक नहीं चली। उनके बदले कभी अन्ना, तो कभी केजरीवाल व मोदी ही मीडिया के कैलाश बने रहे। देशवासियों को उनके बारे में पता तब ही चला जब विदेशियों ने उन्हें नोबल पुरस्कार देने की घोषणा की। इस बहाने क्या मीडिया को आत्ममंथन नहीं करना चाहिए। दरअसल मीडिया के साथ यह विडंबना पुरानी है। कश्मीर में बाढ़ आती है तो मीडिया में उस के कवरेज के लिए टूट पड़ता है, लेकिन असम समेत देश का पूर्वोत्तर क्षेत्र आज भी बाढ़ की चपेट में है, लेकिन उस पर एक लाइन की भी खबर मीडिया में नजर नहीं आती।

छात्र जीवन में क्रिकेट के प्रति दीवानगी के दौर में समाचार पत्र व पत्रिकाओं में नामी क्रिकेट खिलाड़ियों के खेल स्तंभ पढ़ कर मैं आश्चर्य में पड़ जाता था। बाद में पता चला कि यह खिलाड़ियों की कमाई का जरिया है। खिलाड़ी लिखते नहीं बल्कि मीडिया घराने अपने मतलब के लिए खिलाड़ियों से लिखवाते और छापते हैं। फिर राजनेताओं के अखबारों में स्तंभ लेखन का दौर चला। जिसे पढ़ कर सोच में पड़ जाना पड़ता है कि हमारे राजनेता अपने पेशे से इतर अच्छा कलम भी चला लेते हैं। चैनलों का दौर शुरू होने पर किसी न किसी बहाने राजनेताओं का चेहरा दिखाने की होड़ तो लगभग हमेशा मची ही रहती है।

आज ही एक अग्रणी अखबार खोला तो उसमें अपने सांसद से मिलिए स्तंभ के तहत एक सांसद का जीवन परिचय छपा मिला। दूसरे में राज्यपाल बन कर अचानक चर्चा में आए एक अन्य राजनेता की चार कविताएं नजर आई। जिसके जरिए यह साबित करने की कोशिश की गई कि महामहिम अच्छे कवि तो हैं ही, देखो हम उनके कितने निकट हैं। जो उनसे कविता लिखवा कर आप तक पहुंचा रहे हैं। यह कहना अनुचित होगा कि मीडिया में राजनेताओं व अन्य सितारों को बिल्कुल स्थान नहीं मिलना चाहिए। लेकिन यदि कैलाश सत्यार्थी जैसों की उपेक्षा कर मीडिया अपने कैलाश लोगों पर थोपने की कोशिश करता रहे, तो विरोध तो होना ही चाहिए।

आश्चर्य कि कभी केजरीवाल तो कभी मोदी की माला जपने वाले मीडिया को देश की राजधानी के कर्मयोगी कैलाश सत्यार्थी की सुध तभी आई जब उन्हें नोबल पुरस्कार से नवाजा गया। इससे पहले तक तो मीडिया आमिर खान के सत्यमेव जयते, आइपीएल या अमिताभ बच्चन के कौन बनेगा करोड़पति को महिमामंडित करने में जुटा था। क्या इसलिए कि इसके पीछे करोड़ों का बाजार खड़ा है।

 

लेखक तारकेश कुमार ओझा दैनिक जागरण से जुड़े हैं। संपर्कः 09434453934

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भारत में ग़ैर सरकारी संगठनों का उभार और कैलाश सत्यार्थी को नोबेल मिलना महज़ इत्तेफाक नहीं

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यह संभवतः सन 2005 की बात है, एक शाम मैं सहारा समय समाचार चैनल देख रहा था तो एक समाचार प्रसारित हुआ कि कैलाश सत्यार्थी का नाम नोबल पुरस्कार के लिए प्रस्तावित हुआ है। मुझे इस  बात पर आश्चर्य हुआ। मैं तब मध्य प्रदेश के धार जिले में था वहां से मैंने इस बात की पुष्टि करनी चाही। उन दिनों सहारा समय के विदिशा के पत्रकार बृजेन्द्र पांडे हुआ करते थे वहीँ से यह समाचार लगा था।  बृजेंद्र पांडे, मेरे और कैलाश के सहपाठी थे सन 1967-69 में विदिशा के हायर सेकेण्ड्री स्कूल में। बाद को कैलाश ने इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमीशन ले लिया, मैंने और बृजेंद्र ने बीएससी में।

मैंने उन्हें फ़ोन लगाया और इस बाबत उनसे पूछा। उन्होंने बताया कि कई लोगों ने कैलाश का नाम प्रस्तावित किया था। नोबल पुरस्कार लिए तब उन्हें नामांकित नहीं किया गया था। आज जब मैं बेटी से मिलने वैंकूवर पहुंचा तो उसने बताया कि आपके मित्र कैलाश सत्यार्थी अंकल को ‘पीस’  नोबल पुरस्कार मिला है। कुछ महीने पहले मैं मेरी पत्नी तथा बेटी कैलाश के अलवर जिले के आश्रम गए थे। वहां उनकी पत्नी तथा बेटी भी थी। आज यह समाचार सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ। मलाला युसुफ़ज़ई के साथ सम्मिलित रूप से उन्हें 2014 का शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। यह पुरस्कार उन्हें बच्चों और युवाओं के दमन के ख़िलाफ़ कार्य करने तथा सभी को शिक्षा के अधिकार के लिए संघर्ष करने के लिए दिया गया है।

कैलाश बंधुआ मजदूरी एवं बाल श्रम के विरुद्ध भारतीय अभियान में 1990 के दशक से ही सक्रिय रहे हैं, आंदोलन करते रहे हैं। कहा जाता है कि उनके द्वारा संचालित संगठन ‘बचपन बचाओ आन्दोलन’ ने लगभग 80 हजार बाल श्रमिकों को मुक्त कराया है और उनके पुनर्वास एवं शिक्षा की व्यवस्था में सहायता की है। कैलाश सत्यार्थी पिछले दो दशकों से वे बालश्रम के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं और इस आंदोलन को वैश्विक स्तर पर ले जाने के लिए जाने जाते हैं। हायर सेकंड्री तक कैलाश एक मेधावी छात्र थे। इंजीनियरिंग में प्रवेश के बाद उनका ढर्रा बदलने लगा। वह आर्य समाजी तो थे ही फिर लोहियावादी भी हो गए। जाति-पांति में कैलाश का विश्वास नहीं था।

एक दिन विदिशा के नीमताल चौराहे पर कैलाश ने दलित अछूतों से भोजन बनवाया और बिना किसी की परवाह किये बीच चौराहे पर बैठ दलित बंधुओं के साथ हम लोगों ने भोजन किया। आपातकाल के बाद जब चुनाव हुए तो उन्होंने समाजवादी दल के प्रत्याशी का दल बल के साथ प्रचार किया था। चुनाव के परिणाम आने के बाद कैलाश मुझे भोपाल के विधायक निवास ले गए और वहां तब निर्वाचित विधायक रघु ठाकुर से भेंट कराई थी। आर्य समाज तो उनका प्रथम प्रेम था जिसके चलते वह स्वामी अग्निवेश  संपर्क में आए और बंधुआ मुक्ति मोर्चा में शामिल हो गए। यही उनकी इस क्षेत्र में पहली पाठशाला थी। बंधुआ बाल श्रमिकों को मुक्त कराना उनकी प्राथमिकता बन गई और पैशन भी।

एक बार इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य ने उनसे पूछा था कैलाश तुम्हारी योग्यता क्या है तब कैलाश ने कहा था आप देख रहे हैं जो कुछ में कर रहा हूं यही मेरी योग्यता है। तब कैलाश की इस योग्यता पर शायद किसी को विश्वास न रहा हो लेकिन आज यह प्रमाणित हो गया है कि कैलाश की यह योग्यता किसी अकादमिक योग्यता से कहीं बड़ी थी। ह्यूमन राइट्स वॉच के द्वारा जारी की गई रिपोर्ट के अनुसार “भारत में बाल यौन उत्पीड़न घरों, स्कूलों तथा आवासीय देखभाल केंद्रों में आम बात है। दिल्ली बलात्कार कांड के बाद सरकार द्वारा कानूनी और नीतिगत सुधार सुझाने के लिए गठित की गई समिति ने पाया कि बाल सुरक्षा नीतियाँ “स्पष्ट रूप से उन लक्ष्यों को पूरा करने में विफल रही हैं जिनका उन्होंने बीड़ा उठाया था।”

भारत में बाल यौन उत्पीड़न से निपटने की प्रणाली और सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदम बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने में अपर्याप्त हैं। अनेक बच्चों को दोबारा दुर्व्यवहार का शिकार होना पड़ रहा है। उसका कारण है पीड़ादायक चिकित्सीय जाँच और पुलिस और अन्य अधिकारी जो या तो उनकी बात सुनना नहीं चाहते या फिर उन पर विश्वास नहीं करते। सरकारी तंत्र बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा पीड़ितों के साथ व्यवहार के मामलों को रोक पाने में विफल रहा है। यूं तो स्कूलों को बच्चों का वर्तमान व भविष्य गढ़ने का केन्द्र माना जाता है। लेकिन बीते कुछ सालों से स्कूलों के भीतर से बच्चों के शोषण और उत्पीड़न की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक बीते तीन सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाली शारारिक प्रताड़ना, यौन शोषण, दुर्व्यवहार, हत्या जैसे मामलों में तीन गुना बढ़ोतरी हुई है। मौजूदा परिस्थितियां भी कुछ ऐसी हैं कि बच्चों के लिए हिंसामुक्त और भयमुक्त माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने का सवाल अब बहुत बड़ा सवाल बन चुका हैं। सस्ते श्रमिक, बंधुआ मजदूर, बच्चों एवं महिलाओं की तस्करी और उनपर किये जाने वाले जुल्म बढ़ रहे हैं। दिल्ली में छत्तीसगढ़ और झारखण्ड से घरों में काम करने वाले बच्चों को लाया जाता है और उनके साथ लगातार अन्याय किया जाता है। दिल्ली की हाल ही की घटना इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

विकलांग बच्चों के जीवन के जन्म पहले दिन से बहिष्कार शुरू हो जाता है। सरकारी मान्यता के अभाव में, उन्हे अपने अस्तित्व और संभावनाओं के लिए महत्वपूर्ण सामाजिक सेवाओं और कानूनी सुरक्षा से काट दिए जाता हैं। उनकी उपेक्षा ही भेदभाव बढ़ाती है। द स्टेट ऑफ द वर्ल्डस चिल्ड्रन’स 2013: चिल्ड्रन विथ डिसेबिलिटी कहती है कि विकलांग बच्चों को स्वास्थ्य देखभाल प्राप्त करने या स्कूल जाने की कम से कम संभावना होती है। वे हिंसा, उत्पीड़न, शोषण और उपेक्षा के सबसे बडी कमजोरी के बीच होते है खास कर जब अगर उन्हे छिपाया जाता है या संस्थानों में डाला जाता हैं- कई सामाजिक कलंक के कारण या उन्हें उठाने की खर्च के कारण। वे दुनिया में सबसे उपेक्षित लोगों के बीच में है।

गरीबी में रहने वाले बच्चों को अपने स्थानीय स्कूल या क्लिनिक में कम से कम में भाग लेने की संभावना होती है, लेकिन जो गरीबी में रहते हैं और विकलांग भी हैं  उन लोगों में ऐसा कर पाने की संभावना कम होती है। भारत में बच्चों के लिए हज़ारों एनजीओ काम कर रहे हैं, फिर भी हर लाल-बत्ती पर बच्चे भीख मांगते हैं, हर खान-खदान-ढाबे-फैक्टरी में बच्चे काम करते हैं, हज़ारों बच्चे ग़ायब कर दिये जाते हैं, अनगिनत की करके हत्याएं कर दी जाती हैं। कैलाश को ये सम्मान मिलने के साथ ही कई सवाल भी उठने लगे है। नोबेल की राजनीति विचित्र है। गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार देने से इंकार करते हुए उन पर रंगभेदी होने का आरोप भी लगा दिया गया और विडंबना देखिये कि गांधी नाम का उपयोग करने के लिए कैलाश सत्यार्थी को यह पुरस्कार दे दिया गया।

पिछले कुछ समय में जिन लोगों को शान्ति का नोबेल पुरस्कार दिया गया है, उसने तो नोबेल की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। बराक ओबामा, अल-गोर, हेनरी किसिंगर जैसे को क्या सोचकर नोबेल का शान्ति पुरस्कार दिया गया, इस पर अनुसन्धान की आवश्यकता पड़ेगी! इससे जुड़ी इनामी रकम और दूसरी सुविधाओं की वजह से इन पुरस्कार के लिए लॉबिंग पहले से कहीं ज्यादा होने लगी है। कुल मिलाकर, इस बार कैलाश सत्यार्थी को जो नोबेल शान्ति पुरस्कार मिला है और अतीत में जिन शान्तिदूतों को यह पुरस्कार दिया जाता रहा है, वह नोबेल पुरस्कार के पीछे काम करने वाली पूरी राजनीति का चेहरा साफ कर देता है। शेख हसीना के हवाले से कहा गया था कि नार्वे की टेलीनॉर कंपनी ने यूनुस के लिए लॉबिंग की और भारी भरकम धनराशि क्लिंटन फाउंडेशन को दान में दी, जिसके कारण उन्हें वर्ष 2006 में नोबल पुरस्कार मिल सका।

अमेरिका की मशहूर मैग्जीन फोर्ब्स में काम करनेवाली महिला पत्रकार मेघा बाहरी ने कैलाश सत्यार्थी को शांति का नोबेल पुरस्कार दिए जाने पर सवाल उठाए हैं। मेघा ने अपने पुराने अनुभवों को याद करते हुए उन पर आरोप लगाया है। मेघा ने कैलाश के एनजीओ बचपन बचाओ आंदोलन पर गलत तरीके से फंड जुटाने का आरोप लगाया है। मेघा ने उन्हें नोबल पुरस्कार दिए जाने पर सवाल खड़ा किया है। मेघा बहरी ने लिखा है कि कैलाश सत्यार्थी नोबेल योग्य नहीं हैं। मेघा ने उनकी संस्था ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ पर गंभीर आरोप लगाते हुए लिखा है कि 2008 में कैलाश सत्यार्थी के एक सहयोगी ने यूपी के एक गांव में बाल मजदूरी को लेकर जो दावे किए थे वो झूठे निकले। उन्होंने लिखा है कि ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ ज्यादा से ज्यादा विदेशी फंड हासिल करने लिए बाल मजदूरी के झूठे आंकड़े देती है।

अपने लेख में उन्होंने सत्यार्थी पर आरोप लगाते हुए लिखा है कि 2008 में फोर्ब्स  के लिए भारत में बाल श्रम के उपयोग पर एक आर्टिकल लिखते वक्त मैं बचपन बचाओ आंदोलन से मिली। संस्था से जु़ड़े व्यक्ति ने उन्हें बताया कि उत्तर प्रदेश का कार्पेट बेल्ट जहां गांव के हर घर के बच्चे दूसरे देशों को भेजे जाने वाले कालीन को बनाने में लगे हैं। जब मेघा से उस जगह को दिखाने की बात कही तो वो शख्स उन्हें घुमाता रहा। वो मेघा को यूपी के एक गांव में लेकर गया। मेघा ने अपने लेख में लिखा है कि मुझे उस गांव में कोई बच्चा काम करता नहीं दिखा। जब मैंने उससे सवाल किए तो वो मुझे एक घर के पास लेकर गया जहां कालीन का काम कर रहे लोगों के पास दो बच्चे बैठे थे। दोनों बच्चों में खास बात यह थी कि वे स्कूल ड्रेस में थे।

मेघा आगे बताती है कि मैं वहां से खुद ही निकल पड़ी और कई जगह देखा। मेघा ने 2008 की इस पूरी घटना का जिक्र किया है और इसके पीछे की मंशा पर भी सवाल उठाया है। उन्होंने सवाल उठाते हुए लिखा है कि जितने बच्चों को आप बचाते हुए दिखाते हैं विदेशों से उतना ही बड़ा चंदा आपको मिलता है। भारत में ज़्यादातर एनजीओ को लेकर तमाम सवालात उठ रहे हैं, उन्हें हो रही विदेशी फंडिंग और उसके पीछे की मंशा पर चिंता जताई जा रही है, भारत के एक एनजीओ संचालक को नोबेल मिला है और इसे बैलेंस करने के लिए पाकिस्तान की एक बच्ची के साथ उसे बांट दिया गया है।

इस नोबेल पुरस्कार की टाइमिंग से इतना कन्फर्म है कि इसे दुनिया के प्रभावशाली मुल्कों, ख़ासकर अमेरिका का संरक्षण-समर्थन हासिल है। यह अकारण नहीं है। क्या अजीब इत्तेफ़ाक है कि भारत में पिछले तीन-चार साल में एनजीओ का ज़बर्दस्त उभार देखा जा रहा है। एक-एक प्रोजेक्ट पर दुनिया के बड़े-बड़े दिमागों और इवेंट मैनेजरों द्वारा मंथन किया जाता है। मिलते-जुलते नज़ारे दुनिया के कुछ अन्य देशों में दिखाई देते हैं, जिससे लगता है कि हो न हो, इन सारे इवेंट्स की प्लानिंग और फंडिंग करने वाले लोग कॉमन हैं।

 

शैलेंद्र चौहान। संपर्क: ३४/२४२, प्रतापनगर, जयपुर – ३०२०३३ (राजस्थान),
मो. 917838897877

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जब कैलाश सत्यार्थी को ग्रेट रोमन सर्कस के मालिक ने बुरी तरह मारा था

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हर भारतीय की तरह मैं श्री कैलाश सत्यार्थी के नोबेल शांति पुरस्कार जीतने की ख़ुशी में फूला नहीं समा रहा हूँ और जून 2004 की करनैलगंज, गोंडा की उस घटना को याद कर रहा हूँ जब श्री सत्यार्थी को नेपाली सर्कस बालाओं को मुक्त करने के प्रयास में ग्रेट रोमन सर्कस के मालिक द्वारा बुरी तरह मारा-पीटा गया था.

हम पहली बार सर्कस में ही मिले थे जहां उनके सिर से बहुत खून निकल रहा था. मेरे प्रयास और गोंडा पुलिस की तत्परता से हम समय रहते उन्हें विषम स्थिति से निकाल सके थे और साथ ही कई नेपाली लड़कियों को भी मुक्त करने में सफल रहे थे, जिसकी श्री सत्यार्थी और मीडियाकर्मिओं ने भूरी-भूरी प्रशंसा की थी.

इस अवसर पर मैं अपने आप को अत्यंत सौभाग्यशाली समझता हूँ कि जीवन के किसी मोड़ पर मैं इस महान विभूति के संपर्क में आया और उनके किसी काम आ सका था.

 

अमिताभ ठाकुर

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कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफज़ई को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार

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कैलाश सत्यार्थी और मलाला यूसुफज़ई को मिला शांति का नोबेल पुरस्कार

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इस साल शांति का नोबेल पुरस्कार भारत के सामाजिक कार्यकर्ता कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला यूसुफज़ई को संयुक्त रुप से दिया गया है।

दिल्ली में रहने वाले सत्यार्थी बाल मजदूरी के खिलाफ लंबे अर्से से लड़ाई लड़ रहे हैं। उन्होंने इसके लिए ‘बचपन बचाओ आंदोलन’ नाम की ग़ैर सरकारी संस्था भी बनाई है और इसी के जरिए वो 1990 से बच्चों के अधिकारों पर काम कर रहे हैं।

कैलाश सत्यार्थी ने अब तक 1 लाख से ज्यादा बच्चों को मजदूरी से मुक्त कराया है। वे इंटरनेशनल सेंटर ऑन चाइल्ड लेबर और यूनेस्को से जुड़े रहे हैं।

 
नोबेल पुरस्कार से पहले सत्यार्थी को 1994 में जर्मनी का ‘द एयकनर इंटरनेशनल पीस अवॉर्ड’, 1995 में अमरीका का ‘रॉबर्ट एफ़ कैनेडी ह्यूमन राइट्स अवॉर्ड’, 2007 में ‘मेडल ऑफ़ इटेलियन सीनेट’ और 2009 में अमरीका के ‘डिफ़ेंडर्स ऑफ़ डेमोक्रेसी अवॉर्ड’ सहित एक दर्जन से ज्यादा राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवॉर्ड मिल चुके हैं।

1954 में मध्य प्रदेश के विदिशा में जन्मे हुआ सत्यार्थी 8वें भारतीय हैं जिन्हें नोबेल पुरस्कार मिला है। पेशे से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर रहे कैलाश सत्यार्थी ने 26 वर्ष की उम्र में ही करियर छोड़कर बच्चों के लिए काम करना शुरू कर दिया था। उन्होने बाल श्रम के ख़िलाफ़ अभियान चलाकर हज़ारों बच्चों की ज़िंदग़ियों को बचाया है। इस समय वे ‘ग्लोबल मार्च अगेंस्ट चाइल्ड लेबर’ (बाल श्रम के ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान) के अध्यक्ष भी हैं।

सत्यार्थी का सफर आसान नहीं रहा है। बाल श्रम के खिलाफ आंदोलन चलाने और बाल श्रमिकों को मुक्त कराने के अभियान के दौरान उन पर कई बार जानलेवा हमला भी हुआ। मार्च 2011 में दिल्ली की एक कपड़ा फ़ैक्ट्री पर छापे के दौरान उन पर हमला किया गया। इससे पहले 2004 में ग्रेट रोमन सर्कस से बाल कलाकारों को छुड़ाने के दौरान भी उन पर हमला हुआ था।

वहीं मलाला यूसुफज़ई को बच्चों के अधिकारों की कार्यकर्ता होने के लिए जाना जाता है। पाकिस्तान के क़बायली इलाकों में लड़कियों की शिक्षा की मुहिम चलाने के लिए महज़ 14 वर्ष की उम्र में चरमपंथियों की गोली का निशाना बनना पड़ा था। इस हमले वे बुरी तरह घायल हो गईं और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया की सुर्खियों में आ गई।

मलाला ने 11 साल की उम्र में ही डायरी लिखनी शुरू कर दी थी। वर्ष 2009 में “गुल मकई” के छद्म नाम से बीबीसी ऊर्दू के लिए डायरी लिख मलाला पहली बार दुनिया की नजर में आई थी। जिसमें उसने स्वात में तालिबान के कुकृत्यों का वर्णन किया था और अपने दर्द को डायरी में बयां किया। वर्ष 2009 में न्‍यूयार्क टाइम्‍स ने मलाला पर एक फिल्‍म भी बनाई थी।

मलाला सबसे यूवा नोबेल पुरस्कार विजेता हैं।

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