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डॉ हरिवंश राय बच्चन के सबसे योग्य शिष्य थे कवि अजितकुमार!

चित्तौड़गढ़ । सुप्रसिद्ध हिंदी कवि और साहित्यकार अजितकुमार के निधन पर संभावना संस्थान ने शोक व्यक्त किया है। संस्थान की एक बैठक में अध्यक्ष डॉ के सी शर्मा ने कहा कि पिछली पीढ़ी के बड़े हिंदी साहित्यकार का निधन दुखद है। अजितकुमार ऐसे लेखक थे जिन्हें बचपन में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा और सुमित्रानन्दन पंत जैसे महान लेखकों का सान्निध्य मिला था। डॉ कनक जैन ने कहा कि हिंदी जगत उन्हें डॉ हरिवंश राय बच्चन के सबसे योग्य शिष्य के रूप में भी जानता है। उन्होंने महाकवि बच्चन की रचनावली का सम्पादन किया था।

चित्तौड़गढ़ । सुप्रसिद्ध हिंदी कवि और साहित्यकार अजितकुमार के निधन पर संभावना संस्थान ने शोक व्यक्त किया है। संस्थान की एक बैठक में अध्यक्ष डॉ के सी शर्मा ने कहा कि पिछली पीढ़ी के बड़े हिंदी साहित्यकार का निधन दुखद है। अजितकुमार ऐसे लेखक थे जिन्हें बचपन में सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा और सुमित्रानन्दन पंत जैसे महान लेखकों का सान्निध्य मिला था। डॉ कनक जैन ने कहा कि हिंदी जगत उन्हें डॉ हरिवंश राय बच्चन के सबसे योग्य शिष्य के रूप में भी जानता है। उन्होंने महाकवि बच्चन की रचनावली का सम्पादन किया था।

डॉ जैन ने बताया कि संभावना संस्थान द्वारा प्रारंभ की गई चर्चित साहित्यिक पत्रिका ‘‘बनास जन’’ के वे नियमित स्तम्भ लेखक थे और इस स्तम्भ में उन्होंने अनेक महत्त्वपूर्ण लेखकों पर यादगार संस्मरण लिखे। व्याख्याता विकास अग्रवाल ने कहा कि संस्मरण लेखन में उनका नाम अग्रणी रहेगा। उन्होंने अँधेरे में जुगनू, दूर वन में,  निकट मन में और जिनके संग जिया जैसी संस्मरण पुस्तकों से हिंदी साहित्य में बड़ा स्थान बनाया है। आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास ने उनके यात्रा संस्मरणों को आख्यानों  के स्तर की रचनाएं बताया जिनमें ‘सफारी झोले में’ को राजस्थान के प्रसंगों के लिए विशेष याद किया जाएगा।

व्याख्याता गोपाल जाट ने कहा कि नयी कविता के दौर में रोमानी भाव से सर्वथा भिन्न यथार्थवादी कविताओं के लिए अजितकुमार को हिंदी कविता में अलग से याद किया जाता है। संतोष शर्मा ने बताया कि उन्हें दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम ‘पत्रिका’ के संचालक के रूप में भी खूब प्रसिद्धि मिली। 09 जून, 1933 को लखनऊ में जन्में अजितकुमार दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल काॅलेज में हिन्दी के प्रोफेसर रहे और वहीं से सेवा निवृत हुए। उनके कईं कविता संग्रह प्रकाशित हुए जिनमें प्रमुख हैं – अकेले कंठ की पुकार (1958), अंकित होने दो (1962), ये फूल नहीं (1970), घरौंदा (1987), हिरनी के लिये (1993), घोंघे (1996), ऊसर (2001)।

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