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सुख-दुख

शाकाहारी खाओ, नशा मत करो, सेक्स के बारे में बात मत करो, जो करना है छुप के करो!

Jey Sushil-

हिंदुस्तान के लोगों ने हिंदुस्तान को खत्म करने का बीड़ा उठा रखा है. अभी कुछ लिखूंगा तो लोग बोलने लगेंगे कि आप दूसरों को मूर्ख समझते हैं. जबकि मैं सिर्फ वही बात लिखता हूं जो सर्वविदित है. मेरे पास जानकारियों का ऐसा कोई खजाना नहीं है जो किसी और को नहीं मिल सकता है.

मैंने ऐसी कोई किताब नहीं पढ़ी जो दुनिया में एक ही प्रति उपलब्ध हो लेकिन लोगों ने ठान लिया है कि मूर्ख बने रहना है तो कोई क्या कर सकता है. शाकाहार, नशाबंदी और सिंगल सेक्स पार्टनर जैसी अवधारणाएं इसी तरह की मूर्खतापूर्ण समझ की उपज है. इससे पहले कि आप इस पोस्ट पर टिप्पणी करें थोड़ा धैर्य धरकर मनुष्य के इतिहास को जानिए समझिए.

किसी भी चीज़ की अति बुरी होती है ये मनुष्य ने अपने अनुभव से जान समझ लिया है चाहे वो मांस हो, नशा हो या फिर सेक्स हो. ये सारी चीज़ें मानव ने पाईं हैं और इसी से मानव बना है.

भारत भूमि में भगवान तक शाकाहारी नहीं रहे हैं और न ही नशे को बुरा माना गया है. और तो और कई बीवियों का भी मामला है. अगर आप भगवान को मानते हैं तो ये उदाहरण हैं. अगर भगवान को नहीं मानते हैं तो आपसे समझदारी वाली बात की जा सकती है.

मांसाहार के बहुत सारे नुकसान हैं लेकिन ये भी सच है कि उससे प्रोटीन की मात्रा बहुत अधिक मिलती है किसी भी आदमी को और वो भी आसानी से. खेती कर के सब्जी उगाने से अधिक आसान हो सकता है जानवर पाला और उसे मार कर खा लिया जाए. समंदर में मछलियां भी खूब सारी हैं. खाइए जितना मन है.

नशे को लेकर भी कितना सारा भ्रम फैला हुआ है. आदिम काल से मनुष्य नशा कर रहा है. शिव जी भांग पीते ही थे. देवतागण भी सुरा-मदिरा का पान करते ही थे. पहले लोग खुद घर में मदिरा बनाते थे. अब दुकान दुकान में मिलती है मदिरा. जिसे पीना है वो पिए.

ज़रूरी नहीं कि वो शराब न पीता हो वो अच्छा आदमी हो. शराबी भी अच्छा हो सकता है. वो पीकर अपना नुकसान करता है दूसरे का नहीं. हिटलर ने शराब को कभी हाथ नहीं लगाया तो क्या वो बढ़िया आदमी हो गया.

स्टीव जॉब्स भी शराब नहीं पीते थे और मांस नहीं खाते थे. कमाल काम कर गया इसलिए ये कोई पैमाना नहीं है कि जो न पिए वो अच्छा ही होगा और जो पिए वो खराब होगा. दुनिया के कई दिग्गज लोग शराब पीते हैं. शराबी नहीं हैं. इस अंतर को समझ लीजिए.इसलिए इस तरह का आग्रह नहीं होना चाहिए किसी का कि कोई दूसरा क्या करे या न न करे.

सेक्स का भी ऐसा ही है. दो वयस्क लोग अपनी मर्जी से क्या करते हैं उस पर किसी को परेशान नहीं होना चाहिए. अठारह साल से ऊपर की उम्र के दो लोग अपनी मर्जी से जिसके साथ चाहें सेक्स करें. इसमें किसी को परेशान होने की ज़रूरत नहीं है. देवताओं की भी दो दो पत्नियां रही हैं. आदि आदि आदि…..

मैं बहुत चट कर ये पोस्ट लिख रहा हूं क्योंकि शराब की बात करो तो चार लोग पूछते हैं समर्थन क्यों कर रहा है. मेरे कहने से कोई शराबी हो जाता है क्या या मेरे कहने से कोई शराब छोड़ दे रहा है.

आदिवासियों के जीवन का एक हिस्सा शराब है. इसे लेकर महात्मा गांधी और वेरियर एल्विन के बीच गहरे मतभेद रहे हैं. गांधी चाहते थे कि आदिवासियों को हिंदूओं (गांधी वाला हिंदू जो मांस, शराब, सेक्स से दूर रहे) की तरह रहना चाहिए. गांधी खुद कभी आदिवासियों के साथ नहीं रहे. एल्विन अंग्रेज थे. ऑक्सफोर्ड से धर्म पढ़ कर आए थे. आदिवासियों के साथ रहने गए थे गांधी के कहने पर. उनके साथ रहने के बाद एल्विन का कहना था कि भोजन, नशे और सेक्स को लेकर आदिवासी समाज से बहुत कुछ सीखा जा सकता है.

जाहिर है कि ऐसा कभी हुआ नहीं. इस देश को गुजराती फर्जी हिंदुओं का श्राप लगा है. वो इस पूरे देश को शाकाहारी, हिंदुत्व के नशे में पागल आदमखोर बनाने की जुगत में लग गया है. सेक्सविहिन, हिंदुत्व के शाकाहारी आदमखोर मनुष्यों को खाएंगे.

यह देश बहुभाषी, बहुआयामी, बहुधर्मी, और तमाम तरह के लोगों से बना है और इसे ऐसा ही रहना चाहिए.

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