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किसान महापंचायत और न्यूज़ चैनल : इन दो एंकरों की तो दुर्गति हो गई!

यशवंत सिंह-

मुज़फ्फरनगर महापंचायत : आजतक की रिपोर्टर चित्रा त्रिपाठी को भीड़ ने घेरा. धक्का मुक्की. भारी पुलिस फ़ोर्स मौके पर. चित्रा त्रिपाठी को एक स्थानीय पत्रकार के आफिस में बैठाया गया. बाहर पुलिस तैनात.

क्या ये ग़ुस्सा आजतक की भक्ति पत्रकारिता के ख़िलाफ़ है?

चित्रा त्रिपाठी का video देखें, नीचे दिए लिंक पर क्लिक करें-

https://twitter.com/yashbhadas/status/1434415205098819584?s=21


पंकज चतुर्वेदी-

किसान महापंचायत मुजफ्फरनगर में सरकार से ज्यादा गुस्सा मीडिया पर दिखा। आजतक की चित्रा त्रिपाठी वाला वीडियो तो घर घर पहुंच गया। वहां जगह जगह कई ऐसे भी पोस्टर लगे थे।

एक बात और सुबह प्रशासन ने कुछ देर को वहां इंटरनेट भी बन्द किया था ताकि यू ट्यूब, फेसबुक आदि के डिजिटल मीडिया असली ख़बर न दिखा सके।


कुमुद सिंह-

जिस प्रकार से ये पत्रकार अदानी-अंबानी की दलाली करते थे, उससे तय था कि एक दिन भारत का आम आदमी इनको ऐसे ही खदेड़ देगा.. किसी भी चीज की एक सीमा होती है. ये लोग पत्रकार के लिबास में अदानी-अंबानी के एजेंट बन चुके हैं. आम लोगों को गाली देते हैं, उनसे सवाल पूछते हैं कि तुम गुलाम क्यों नहीं बनना चाहते हो. आप पार्टी बनकर आइयेगा तो यह उम्मीद न करें कि जनता आपको पत्रकार मानेगी. निष्पक्षता का मजाक बना दिया है अरूण पुरी की इन नाजायज औलादों ने..यह तो होना तय था, बहुत पहले हो जाना चाहिए था.. पत्रकार बनकर आनेवाले पूंजीपतियों के हर कुत्ते को ऐसे ही खदेड़ दो.. ये भारत के दुश्मन हैं..


नकुल चतुर्वेदी-

किसान महापंचायत में आज तक की एंकर चित्रा त्रिपाठी को इस तरह से घेरे जाने की मैं कड़े शब्दों में निंदा करता हूं… लेकिन इसके साथ ही चैनलों में बैठे एडिटर, संपादकों से भी यह निवेदन करना चाहता हूं कि वह कम से कम जनता के लिए जबरदस्त रिपोर्टिंग करें तभी मीडिया के खिलाफ पनप रहा आक्रोश खत्म होगा, मीडिया संस्थानों को ये समझना होगा कि सरकारें जनता को नहीं जनता सरकारों को बनाती है.. इसीलिए हर हाल में जनता का साथ देना ही होगा।


उर्मिलेश-

मुजफ्फरनगर किसान महा-पंचायत की जितनी तस्वीरें देखीं, उससे इस महा-पंचायत की विशालता का अंदाज लगाना कठिन नहीं.

अपने आकार, कंटेंट, हिस्सेदारो की सामाजिक-क्षेत्रीय विविधता और तीन कृषि कानूनों के खात्मे की मांग पर बेमिसाल एकजुटता इस महा पंचायत को ऐतिहासिक बनाती है.

हमारे देश में आज यानी 5 सितम्बर की निस्संदेह यह बड़ी घटना थी.

मैने घटना की विस्तृत जानकारी पाने के लिए आज काफी समय बाद ‘राष्ट्रीय’ कहे जाने वाले कुछ प्रमुख टीवी चैनलों को बारी बारी से देखना शुरू किया.

ऐसे कुल 12 चैनलों को खोला. उस समय शाम के ठीक 6 बजे रहे थे. जानते हैं, मैने क्या देखा, क्या पाया?

एक हिंदी और एक अंग्रेजी चैनल(दोनों एक ही मीडिया संस्थान से संचालित) को छोड़कर अन्य किसी भी चैनल पर किसान महा पंचायत की खबर नहीं आ रही थी. इन 10 चैनलों में किसान महा पंचायत का उल्लेख तक नहीं!



परमेंद्र मोहन-

न किसान का क पता है। ना खेती का ख पता है। न ही मंडी का म पता है। बस चाटुकारों की तरह खालिस्तानी, पाकिस्तानी, जाटिस्तानी करके किसान आंदोलन की छवि बिगाड़नी है तो फिर क्या जरूरत है कवरेज की औपचारिकता निभाने की? स्टूडियो में दो चार छंटे हुओं को बैठा कर चाटुकार चौपाल जमाएं और नौकरी बजा कर घर को जाएं।

बार बार किसानों का अपमान करने और कराने वाले कुछ लोगों को बहुत बुरा लग रहा है कि मुजफ्फरनगर में किसानों ने उनका सम्मान नहीं किया, अलग छांट दिया, तो भैयाओं और मोहतरमाओं आपने भी तो अलग ही छांट कर रखा है ना उन्हें, फिर काहे को घडिय़ाली आंसू? बार बार समझाते हैं कि जो है वो बताएं वही दिखाएं, जो नेता हैं वो जैसे अपनी पार्टी का हुक्म बजा रहे हैं, जो चाटुकार हैं वो जैसे अपने नेता का काम कर रहे हैं वैसे ही जो आपका काम है वही कीजिए लेकिन जब मलाई के लिए दीन ईमान सब बेच खाए हैं तो सच का सामना करने से काहे बिलबिलाते हैं, बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से पाएंगे।

किसानों का क्या है, उन्हें तो आपने विलेन साबित करके रखा ही हुआ है, अब मॉब लिंचर बताएं, फर्जी बताएं, नशेड़ी, बलात्कारी, जुआरी, गंवार, देशद्रोही जो मर्जी बता दें क्योंकि उनके लिए तो आज के बाल्कनी क्लास चाटुकारों के डर से कोई बोलने वाला भी तो नहीं छोड़ा आपने।

ये क्लास लाठी से किसान का सिर फोड़कर जान से मारे जाने का समर्थन करता है, गोली और तोप से भुनवाने की मांग करता है, खुद बाप की कमाई पर छल्ले उड़ाने वाला डेढ़ जीबी के डेटाबाज उनके पसीने की कमाई के खर्च पर टेसूए बहाता है और इतने सारे उकसावे पर दो चार कुछ रिएक्ट कर दे तो मसाला ढूंढ लाता है।

मन तो करता है कि लिख मारूं खींच के लेकिन चलिए छोडिए क्यों संडे खराब करना है, बाद में कभी किसान आंदोलन और मीडिया पर लिखूंगा विस्तार से। अब इस पोस्ट पर भी काला क्या सफेद क्या और टिकैत डकैत बकैत लाल किला डकैत विला और कार्पोरेट राग वगैरह वगैरह सुनाने मत आ धमकिएगा क्योंकि ये पोस्ट जिनके लिए है उन्हीं के लिए है और वो समझ जाएंगे।



सौमित्र रॉय-

मुजफ्फरनगर में आज की किसान महापंचायत को मिशन यूपी नाम दिया गया है। सिर्फ़ बीजेपी ही नहीं, पेडिग्री मीडिया में भी इसे लेकर खलबली है।

पीलीभीत-यानी यूपी के मिनी पंजाब से बीजेपी सांसद वरुण गांधी का ट्वीट उनकी बेचैनी को दर्शाता है।

अगर सब-कुछ सही दिशा में रहा तो 2022 के यूपी चुनाव में बिष्ट के लिए किसान आंदोलन बड़ी मुसीबत बनेगा। सड़क ही देश का भविष्य बदल सकती है।

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2 Comments

2 Comments

  1. Anurag

    September 6, 2021 at 7:18 am

    मोदी भक्ति में लीन हैं सारे एंकर. मेनस्ट्रीम मीडिया तो सत्ता की दलाली में जय जय मोदी हो चुका है. बहुत बढ़िया आर्टकिल है ये…

  2. Bhadaas from public

    September 6, 2021 at 7:17 pm

    भड़ास साईट बेबाक पत्रकारिता का प्रतीक है… मीडिया वालों को भड़ास से सबक लेना चाहिए. पत्रकार और मीडिया का काम होता है सत्ता सिस्टम की कमियों को सामने लाना. सत्ता सरकार को आइना दिखाते रहना. पर यहां तो देश का 99 प्रतिशत मीडिया जय जय मोदी की मुद्रा में है पिछले दस सालों से…. एंकरों संपादकों को चेत जाना चाहिए वरना पब्लिक सड़क पर इन भक्त भक्ताइन कलमाकरों को पीटेगी.

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