भारत के महान पत्रकार कुलदीप नैयर नहीं रहे

Rajesh Badal : भारत के महान पत्रकार कुलदीप नैयर नहीं रहे। क़रीब अड़तीस बरस पहले उनसे परिचित हुआ था। ज़िन्दगी भर वे मानव अधिकारों के लिए समर्पित रहे। अस्सी से अधिक अखबारों में लिखा, जो एक विश्व रिकॉर्ड है। मेरी उन्हें श्रद्धांजलि। मेरी श्रद्धांजलि।

Aflatoon Afloo : वरिष्ठ पत्रकार और जम्हूरियत व मानवाधिकारों के प्रबल पैरोकार श्री कुलदीप नय्यर का कल रात देहांत हो गया।  समाजवादी जन परिषद की सादर श्रद्धांजलि, आखिरी सलाम। वे हमेशा प्रेरणास्रोत बने रहेंगे।

Amitaabh Srivastava : बुज़ुर्ग पत्रकार और स्तंभकार कुलदीप नय्यर का निधन। 95 साल के नय्यर साहब जवाहरलाल नेहरू के दौर की पत्रकारिता से लेकर अंतिम दिनों तक लगातार सक्रिय रहे। वह आजीवन एक आज़ाद प्रेस, लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों और धर्मनिरपेक्ष राजनीति के पक्षधर रहे। हम लोगों ने उन्हें सिर्फ पत्रकारिता करते हुए ही नहीं देखा, बल्कि नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए तमाम छोटे-बड़े संघर्षों में सड़क पर उतर कर अगुआई करते भी देखा है। उनसे हुई मुलाकातों में काफ़ी सीखने को मिला। विनम्र श्रद्धांजलि।

Gurdeep Singh Sappal : कुलदीप नायर अंतिम श्वास तक मीडिया में अंतरात्मा की आवाज़ बन कर बुलंद रहे। वो हमेशा भारत के सर्वोच्च सम्पादकों में गिने जाते रहेंगे। श्रद्धांजली।

Devpriya Awasthi : कुलदीप नैयर का निधन भारतीय पत्रकारिता की अपूरणीय क्षति है। उन्होंने जितना लंबा जीवन पाया उससे ज्यादा ही काम किया। भारत-पाक संबंधों पर उनकी दृष्टि और चिंतन बहुत सार्थक और व्यावहारिक था। 1975-1977 की इमर्जेंसी के दौर में वे उन गिने-चुने पत्रकारों में थे जिन्होंने घुटने नहीं टेके थे। काश, हमारी पत्रकार बिरादरी नैयर साहब के दिखाए रास्ते पर चल सके।

Umesh Chaturvedi : वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर नहीं रहे..गांव में जब रहता था तो वहां आने वाले आज दैनिक जागरण अखबार में उनका साप्ताहिक कॉलम ‘बिट्वीन द लाइंस’ पढ़ता था…पत्रकार बनाने में उस कॉलम का भी अवचेतन में बड़ा योगदान रहा.. बाद के दिनों में उनकी किताब पहले अंग्रेजी में The Scoop नाम से पढ़ी..उसका विस्तृत संस्करण हिंदी में ‘एक जिंदगी काफी नहीं’ नाम से पढ़ी। नैय्यर ने इस किताब में पत्रकारिता जीवन से जुड़ी कई घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया है.. लेकिन दो घटनाओं और लोगों पर वे संकेत में ही बात कह कर निकल गए हैं.. वे लालबहादुर शास्त्री के सूचना अधिकारी थे और इसी हैसियत से ताशकंद भी गए थे। लेकिन वहां हुए उनके निधन पर उन्होंने साफगोई से नहीं लिखा है.. इसी तरह स्टेट्समैन के संपादक रहते वक्त बंगाल से राज्यसभा में आए सांसद के घर उसके अनुरोध पर गए..उसकी माली हालत का बयान किया और बाद में वह सांसद राष्ट्र का बड़ा आदमी बना.. दोनों के ही बारे में अगर जागरूक पाठक ना हो, खासकर पत्रकारिता की पृष्ठभूमि का, तो सही-सही अंदाज नहीं लगा सकता..भले ही नैय्यर की अपनी विचारधारा थी….लेकिन वे बड़े पत्रकार थे…. उन्हें सादर नमन.

Shambhunath Shukla : मैंने जब 1980 में दैनिक जागरण में बतौर प्रशिक्षु ज्वाइन किया तब कुल साढ़े चार सौ रूपये महीने के मिलते थे. उन दिनों अखबार के संपादकीय पेज पर कुलदीप नैय्यर का “बिटवीन द लाइंस” नाम से एक कालम छपता था. ज़ाहिर है, वे अपना कालम अंग्रेजी में लिखते थे, लेकिन हिंदी में अनूदित अपना यह स्तंभ भी वे पढ़ते ज़रूर थे. एक दिन उनको अनुवाद पसंद नहीं आया तो नरेंद्र मोहन जी से उन्होंने थोड़ी नाराज़गी जताई. मोहन बाबू ने अपने संयुक्त संपादक स्वर्गीय हरिनारायण निगम से इसका अनुवाद किसी और से कराने को कहा. निगम साहब के समक्ष श्री विजयकिशोर मानव (वे तब दैनिक जागरण में साहित्य संपादक थे) ने मेरा नाम प्रस्तावित किया. निगम साहब ने मुझे नरेंद्र मोहन जी से मिलाया। मोहन बाबू ने कहा यह हर हफ्ते छपेगा, इसके 50 रूपये प्रति कालम मिलेंगे, पर शर्त यह है कि ‘ऑफिस ऑवर्स’ के बाद करोगे. मुझे पैसों की सख्त जरूरत थी, मैंने हामी भर दी. इस बहाने मुझे कुलदीप नैय्यर को आद्योपांत पढ़ने का पूरा मौक़ा मिला. शुरू-शुरू में दिक्कत हुई पर बाद में मज़ा आने लगा और अनुवाद में भी निखार आने लगा. फिर मुझे जार्ज फर्नांडीज़ का कालम भी अनुवाद करने को मिल गया. इस तरह चार सौ रूपये की यह अतिरिक्त आय मेरे लिए और अंग्रेजी पुस्तकें एवं लेखकों को खरीद कर पढ़ने का माध्यम बनी. कुलदीप नैय्यर लाज़वाब लेखक थे. एक बार उनके कालम में बताया गया कि कैसे भारत सरकार की नौकरशाही की अड़ंगेबाजी के चलते जापान के अपना निवेश खारिज कर दिया क्योंकि भारतीय नौकरशाहों की फौज ने जापान सरकार के प्रपत्र में लिखी अंग्रेजी में हिज़्ज़ों की गलतियां निकाल कर उन्हें भेज दीं. कुलदीप जी ने लिखा कि भारत की सरकार अंग्रेजी सुधारने की मंशा के लिए अपनी मातृभाषाओं की क़ुर्बानी करती रहती है. ऐसे महान पत्रकार कम ही होते हैं. उनके निधन से पत्रकारिता का एक स्तंभ ढह गया. उन्हें अश्रुपूरित श्रद्धांजलि!

Jaishankar Gupta : वरिष्ठ और बुजुर्ग पत्रकार कुलदीप नैयर के निधन के बाद भारतीय पत्रकारिता का एक और मजबूत स्तंभ, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पहरुआ आज ढह गया। सादर नमन। उम्र के 95 साल पूरा करनेवाले नैयर साहब से अभी चंद रोज पहले ही 11 अगस्त को उनके निवास पर न्यूज वेबसाइट ‘द्रोहकाल’ को जारी करने के अवसर पर मिले थे। वेबसाइट जारी करते समय वह पूरी तरह से सक्रिय और जीवंत लग रहे थे। देर तक उन्होंने देश और समाज, राजनीति और पत्रकारिता से जुड़े सवालों पर चर्चा करते रहे। हम लोग उनके उम्र का शतक लगाने की उम्मीद पाले उनसे इस तरह से बातें कर रहे थे जैसे हम दोस्त आपस में बातें करते हैं। उनके निधन से हम जैसों के लिए संकट की घड़ी में एक बड़ा सहारा नहीं रहा। भारतीय पत्रकारिता के शलाका पुरुष, जन समस्याओं-सरोकारों तथा संघर्षों के साथी प्रवक्ता रहे नैयर साहब को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि।

अनिल जैन : देश के वरिष्ठ और जाने-माने पत्रकार कुलदीप नैयर नहीं रहे। कल देर रात उनका निधन हो गया। 94 वर्षीय नैयर के निधन से न सिर्फ भारत में बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप में पत्रकारिता के एक युग का अंत हो गया। उनका निधन दक्षिण एशिया में मानवाधिकार आंदोलन के लिए भी एक बडी क्षति है। नैयर साहब का अंतिम संस्कार आज दोपहर 1 बजे लोधीरोड स्थित विद्युत शवदाह गृह में होगा।

Pankaj Chaturvedi : बात अभी १२ अगस्त की है, आज से बमुश्किल दस दिन पहले, उस दिन भी वे चल फिर पाने में तकलीफ महसूस कर रहे थे, लेकिन बात दक्षिणी एशिया में शान्ति के ऐसे प्रयास की थी , जिसे उन्होंने स्वयं शुरू किया था सो राजघाट के पास गणाधि स्मारक निधि के हाल में पहुँच गए, बोले भी , शायद वह उनका अंतिम सार्वजनिक उदबोधन भी हो- मसला था आज़ादी की रात को भारत-पाक सीमा पर अमन की आशा में शमाएँ रोशन करने का . वे तो इस बार बाघा सीमा जा नहीं सके, लेकिन उनकी उम्मीदें वहाँ जरुर पहुंची. रामनाथ गोयनका अवॉर्ड से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैयर का पिछली रात को दिल्ली के एक अस्पताल में 95 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वे 1990 में ब्रिटेन के उच्यायुक्त भी बने थे। कुलदीप नैयर काफी दशकों से पत्रकारिता क्षेत्र में सक्रिय थे। उन्होंने इंडिया आफ्टर नेहरू समेत कई किताबें भी लिखी थीं। कुलदीप नैयर ने अपने करियर की शुरुआत बतौर उर्दू प्रेस रिपोर्टर की थी। वह दिल्ली के समाचार पत्र द स्टेट्समैन के संपादक भी रह चुके थे। पत्रकारिता के अलावा वह बतौर एक्टिविस्ट भी कार्यरत थे। इमरजेंसी के दौरान कुलदीप नैयर को भी गिरफ्तार किया गया था। नैयर 1996 में संयुक्त राष्ट्र के लिए भारत के प्रतिनिधिमंडल के सदस्य थे। 1990 में उन्हें ग्रेट ब्रिटेन में उच्चायुक्त नियुक्त किया गया था, अगस्त 1997 में राज्यसभा में नामांकित किया गया था। हिदुस्तान में अमन, आज़ादी और लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा पहरुआ चला गया.

Ambrish Kumar : अस्सी के दशक की शुरुआत थी. किसी कार्यक्रम के सिलसिले में अपने समूह ने कुलदीप नैयर को लखनऊ बुलाया. राजीव हेम केशव कार्यक्रम के कर्ताधर्ता थे. मुझे दो जिम्मेदारी दी गई. लखनऊ विश्विद्यालय के डीपीए गेस्ट हाउस में नैयर साहब को ठहराने के इंतजाम की और तीन दिन उनके साथ रहकर उन लोगों से मिलवाने की जिनसे वे मिलना चाहते थे. स्टेशन से उन्हें लेकर जब गेस्ट हाउस पहुंचा तो बताया गया कि उनके कमरे की बुकिंग रद्द कर दी गई है. अपने लिए यह एक झटका था. विश्विद्यालय छात्र संघ का प्रतिनिधि भी था इसलिए पंद्रह बीस छात्र साथ रहते ही थे. हंगामा हुआ. नैयर साहब बोले, किसी होटल में रुक जाते हैं. पर हम लोग अड़ गए कि रुकना यहीं होगा, यह अंधेरगर्दी है. खैर बाद में विश्विद्यालय प्रशासन झुका और कमरा मिला. दूसरे दिन विजय शर्मा ने पाइनियर अख़बार में खबर दी कि इमरजेंसी का विरोध करने की वजह से नैयर साहब का कमरा रद्द किया गया था. खैर तब मित्रों के पास मोटर गाड़ी की सुविधा बहुत कम होती थी. हम नैयर साहब के साथ रिक्शे पर घूमे. स्वतंत्र भारत के तत्कालीन संपादक वीरेंद्र सिंह से मिलने गए. संपादक वीरेंद्र सिंह का कमरा पूछा तो एक चपरासी ने बताया कि गैलरी में पहले मोड़ पर है. कमरा खुला हुआ था और एक सज्जन मेज के पीछे बैठे लिख रहे थे. मैंने उनसे पूछा कि संपादक जी कहां बैठते हैं. दरअसल वह कमरा बहुत छोटा और सामान्य सा लगा. उन्होंने चेहरा उठाया और बोले, क्या मैं आपको चपरासी नजर आता हूं. मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ. नैयर साहब को रिशेप्शन से बुलाकर लाया. इन्ही वीरेंद्र सिंह ने मुझे जीवन की पहली नौकरी बुलाकर दी थी. सन छियासी में. ट्रेनी पत्रकार बनाया और छह सौ रुपए पारश्रमिक दिया. फिर किसी विवाद के चलते बाहर भी कर दिया. बहरहाल नैयर साहब से वह मुलाकात भूलती नहीं. बाद में दिल्ली में कुछ मुलाक़ात हुई. पर रिक्शे पर बैठकर उनसे तरह तरह के मुद्दों पर चर्चा करना आज भी याद है. पत्रकारिता का एक और स्तंभ आज नहीं रहा. श्रद्धांजलि.

सौजन्य : फेसबुक

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