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सियासत

कश्मीर-फ़ाइल्स और केरला-स्टोरी जैसी फ़िल्में जिस असुरक्षा का दोहन करती है, वह हिंदू-मन में सदियों से पैठी है!

हिंदू धर्म के डीएनए में एकता नहीं है। लेकिन ऐतिहासिक घावों और साभ्यतिक चुनौतियों ने एकता के मुहावरे को लोकप्रिय बना दिया है। यह मुहावरा राजनीति के क्षेत्र में हिंदुत्व कहलाता है। इसकी ईजाद सावरकर ने की थी। सावरकर समझते थे कि एकत्व क़ायम किए बिना बाहरी शक्तियों से लड़ा नहीं जा सकेगा। यही कारण था कि वे जाति-प्रथा के विरोधी थे, क्योंकि जातिगत विभेद हिंदू-एकता में बड़ी बाधा थी। सावरकर एक राष्ट्र, एक जाति और एक संस्कृति की बात करते थे। आम्बेडकर भी जाति का विनाश करना चाहते थे और वे भी हिंदुओं और मुसलमानों को दो अलग राष्ट्र समझते थे। यानी इन दोनों बिंदुओं पर सावरकर और आम्बेडकर एकमत थे। इन दोनों ही बिंदुओं पर गांधी से उनका मतभेद भी था। गांधी के मन में क़ौमी एकता वाले हिन्दुस्तान की भावना पैठी हुई थी, जो कि उस समय मुख्यधारा का विचार था।

हिंदुत्व की राजनीति का आधार यह है कि अगर हम एक नहीं हुए तो हम पर आक्रमण होंगे, हमें नष्ट किया जाएगा और हमारे देश को तोड़ा जाएगा। अगर भारत के इतिहास में विदेशी आक्रमणों, औपनिवेशिकता और देश-विभाजन का परिप्रेक्ष्य नहीं होता तो हिंदू समाज आज अपनी बहुलता के साथ राज़ी-ख़ुशी होता, उसमें एक होने की इतनी ज़िद नहीं होती। वह ज़िद आज है। इसलिए वो कहते हैं कि आज हिंदू जाग गया है, हिंदू एक हो गया है। लेकिन यह पूरा सच नहीं है। क्योंकि एकता हिंदू धर्म के डीएनए में नहीं है। उनके पास एक किताब नहीं है, एक आचार-संहिता नहीं है, एक ईश्वर नहीं है और एक पैग़म्बर नहीं है। दूसरे, हिंदू लोग जातियों को यथावत रखते हुए एक होना चाहते हैं, यह भी एक बड़ी मनोवैज्ञानिक-बाधा है।

कश्मीर-फ़ाइल्स और केरला-स्टोरी जैसी फ़िल्में जिस असुरक्षा का दोहन करती है, वह हिंदू-मन में सदियों से पैठी है। आप लाख कहते रहें कि यह दुर्भावना से बनाया गया सिनेमा है और इसमें तथ्यगत भूलें हैं, पर वो फ़िल्में सामूहिक-अवचेतन में पैठे डर से संवाद करती हैं। उस डर के ऐतिहासिक आधार मौजूद हैं। यही कारण है कि हिंदू-एकता का विचार आज का सबसे लोकप्रियत राजनैतिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक विचार बनता जा रहा है। हिंदू-एकता की बात करने वाली पार्टी बहुमत जीत जाती है और हिंदू-एकता का नारा बुलंद करने वाले बाबाओं के यहाँ भक्तों की क़तारें लग जाती हैं।

वो पूछते हैं, ईसाइयों के अपने देश हैं, यहूदियों का अपना एक राष्ट्र है, मुसलमानों के पचास से ज़्यादा मुल्क हैं जिनमें से दो मुल्क तो भारत से ही टूटकर बने, पर हिंदुओं का अपना देश कौन-सा है? भारत सदियों से उनकी भूमि रही है और इसे ही एक स्वाभाविक हिंदू-राष्ट्र समझने की कल्पना उनके मन में बलवती है। समस्या यह है कि हिंदू यानी क्या, इसकी कोई एकरूप परिभाषा तय नहीं है। सिंधु के पार रहने वालों को हिंदू कह देने भर से बात नहीं बनती है। सनातन कहने से भी कोई एक वैसा समग्र चित्र नहीं उभरता है, जिसमें भारत की सभी विविधताएँ समा जाएँ।

शंकर ने बौद्धों के दार्शनिक आधार को खण्डित किया था। भक्तिकाल में संतों ने हिंदू-भावना को सजीव रखा। छत्रपति शिवाजी ने हिंदू-पद-पादशाही और हिन्दवी-स्वराज्य की बात कही थी। आधुनिक काल में विवेकानंद ने हिंदू-गौरव को जगाया। गांधी ने हिन्द-स्वराज नामक पुस्तक सावरकर के विचारों की प्रतिक्रिया में लिखी थी। कालान्तर में उस पुस्तक के आधार पर हिंदुत्व बनाम हिन्द-स्वराज का द्वैत निर्मित हुआ। गांधी के मुताबिक हिन्दुस्तान का मूल संघर्ष ब्रिटिश सत्ता से है, जबकि सावरकर को लगता था कि वास्तविक शत्रु अंग्रेज़ उतने नहीं जितने कि मुसलमान हैं। गांधी समझते थे कि औपनिवेशिक-अनुभव ने भारत की सामुदायिक-बुनावट को क्षति पहुंचाई है। और उसने भारत की देशज ज्ञान-परम्परा का भी अवमूल्यन किया है। गांधी धर्मालु थे। सावरकर नहीं थे। सावरकर को तो गोमाँस के सेवन से भी परहेज़ न था। उनके हिंदुत्व में धर्म का महत्व क्या राष्ट्र जितना ही था?

आज प्रश्न यह नहीं है कि हिंदू-राष्ट्र बनना चाहिए या नहीं या हिंदू-एकता स्थापित होनी चाहिए या नहीं। प्रश्न यह है कि अगर हिंदू-राष्ट्र बनता है तो क्या वह जाति-विहीन होगा, जैसा कि सावरकर सोचते थे? एकता का विचार ही जिसके डीएनए में नहीं है, वो अगर औरों से लड़ने को एक हो भी गया तो कब तक एक रहेगा? यहाँ तो राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र है, कर्नाटक में कन्नड़ नहीं बोलने वालों के साथ बदसलूकी की जाती है, तमिल लोगों को हिंदी भाषा नहीं चाहिए, पूर्वोत्तर के लोगों को भारत के लोग अपना नहीं समझते (मणिपुर में क्या हो रहा है, इससे ज़्यादा दिलचस्पी लोगों की आईपीएल में है)। ये सच है कि धर्म भारतीयों को एक करता है, लेकिन वह तो क्रिकेट और सिनेमा भी करता है। सभ्यताओं के संघर्ष पेचीदा होते हैं। एकेश्वरवाद दार्शनिक रूप से विपन्न वैचारिकी प्रस्तुत करता है। लेकिन सभ्यता-संघर्ष में वह बहुदेववादियों पर भारी पड़ता है, क्योंक सैन्यवाद को स्पष्ट निर्देश चाहिए। तब अगर बहुदेववादी भी अब्राहमिकों जैसे एकाग्र बनने को बेक़रार हो जावें तो अचरज नहीं। जो कि अब वो हो रहे हैं! लेकिन विडम्बना कि इसी फेर में ख़ुद को खो भी रहे हैं।

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