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सुख-दुख

एक लावारिस पत्रकार का वसीयतनामा!

दिनेश चौधरी-

जुगनू शारदेय: एक लावारिस का वसीयतनामा

जुगनू कोई आफ़ताब नहीं होता कि उसके बुझने से अंधेरा छा जाए। टिमटिमाती हुई रोशनी का होना क्या और न होना क्या- “ये चराग़ कोई चराग़ है न जला हुआ न बुझा हुआ।” हालांकि ये हालात हमेशा से न थे। भले ही जुगनू का अंतिम संस्कार बीते साल एक लावारिस की तरह हुआ लेकिन इस परिणति में खुद उनकी भी मौन सहमति रही होगी। जैसी उनकी आदत और फितरत थी, सोचकर ही रखा होगा कि इसी तरह जाना है। जिद्दी जुगनू, मुँहफट जुगनू लेकिन खुद्दार और ईमानदार जुगनू। अपने पेशे से कोई बेईमानी नहीं। इधर तो खबरनवीसों की एक नस्ल ने अपने आकाओं के हाथों सर्जरी करवाकर पीठ से हड्डी ही निकलवा ली है। तनकर खड़े होने की सारी झँझटे खत्म। जब चाहे झुक गए, जब चाहे रेंगने लगे।

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जुगनू शारदेय
जुगनू शारदेय

जुगनू का इस दुनिया-ए-फानी से इस तरह से कूच करना अखर गया। चाहते तो मेरी पेशकश ही कबूल कर लेते। कहा था कि ताला (बांधवगढ़) आ जाएं। जंगल की आबोहवा उन्हें खूब रास आती थी। बाहर की दुनिया से जुड़े रहने के लिए इंटरनेट था ही। यहाँ रहते और लिखते। लेकिन वो बहती हवा थे। उनकी फितरत “मैं हवा हूँ कहाँ वतन मेरा” वाली थी। आज यहाँ, कल कहीं और। उन्हें बहुतों से मिलना होता था, बहुतों से बतियाना होता था, बहुत से लोगों की छाती पर मूँग दलना होता था। बड़े से बड़े नेताओं से उनकी यारी थी, पर जुगनू उन्हीं की मिट्टी पलीद करने में कोई कोताही नहीं बरतते थे। दोस्ती अपनी जगह, रिसालों-अखबारों में लिखना अपनी जगह। यह नहीं कि अमुक से यारी है तो उसकी कुछ बातें हजम कर गए। उनका हाजमा बहुत खराब था। लिखना है सो लिखना है, भले ही दोस्त दुश्मन में बदल जाये। नीतीश ने उन्हें बड़ा ओहदा दिया, वे नीतीश के खिलाफ लिखते रहे। लालू को भी नहीं बख्शा। एक बहुत बड़े धर्मगुरु के पसीने छुड़वा दिए। खरी बात इस तरह से कहते कि ख़ट से निशाने पर लगे। इस बेबाकी की वजह यह थी कि कभी जोड़ने की जुगत में नहीं रहे। पैसे उनके पास आते थे, पर रहते नहीं थे। उनके हाथ खुले थे और जेब मे छेद थी। आज जेब में पैसे हैं तो स्कॉच पी ली, कल नहीं रहेंगे तो महुए से ही काम चल जाएगा। वे मंत्रियों-सन्तरियों, अफसरों के घर खाना तो खा लेते थे पर उनके पैसों की दारू नहीं पीते थे। मुफ्त की मय उनके लिए हराम थी।

एक घटना याद आ रही है। एक दिन अचानक जुगनू का फोन आया। कहा कि अगले दिन पातालकोट चलना है। मैंने हामी भर दी। भोपाल में प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो के कमिश्नर ललित जोशी का आग्रह था कि जुगनू वहाँ के आदिवासियों पर एक स्टोरी कर लें। वे मंडला आए और हम लोग जीप से तामिया पहुँचे। वहाँ के गेस्ट हॉउस में अफसरान ने जुगनू के स्वागत में कई तरह की बोतलों का इंतज़ाम कर रखा था। पूछा कि कौन-सी पियेंगे या कोई और पीते हों तो उसका भी बंदोबस्त हो जाएगा। जुगनू ने इनकार कर दिया। शाम को 6 बजे के आस-पास के एक ढाबे में पहुँच गए और उसके मालिक से दोस्ती गाँठ ली। गेस्ट हॉउस के इंतजामात को छोड़कर यहीं खाना भी खा लिया। मालिक से पूछा कि पातालकोट कैसे जा सकते हैं? उसने बताया कि मेरे पास दो बाइसिकल हैं, चाहें तो उसे ले जाएं। जुगनू ने गाड़ी के साथ किसी अफसर का इंतज़ार नहीं किया। सुबह जल्दी उठ गए और किसी के पहुँच पाने से पहले ही साइकिल पर सवार होकर हम लोग पातालकोट के लिए रवाना हो गए। तब दिल्ली-भोपाल में प्रचार यह था कि पातालकोट के लोग अब भी प्रागैतिहासिक काल के जीव हैं और आम की गुठली खाकर जिंदा रहते हैं। हमने कुछ ऊंचाई से ही देखा कि हैण्डपम्प पर बच्चों की भीड़ है और उनके हाथों में दातून के बदले टूथब्रश है। घरों में गए तो राजीव-इंदिरा की तस्वीरें मिलीं। पूछने पर पता चला कि वे किसी रैली में दिल्ली होकर आए हैं। दिल्ली पलट इंसान प्रागैतिहासिक काल का जीवन नहीं जी सकता। जुगनू ने लौटकर रिपोर्ट फाइल की और कई तरह की प्रचारित और वास्तविक स्थितियों का खुलासा किया। एक गलती यह की कि किसी को अपने दफ्तर का नम्बर दे दिया था। टेलोफोन दिन में कई-कई बार घनघनाता। जुगनू की रिपोर्ट के कारण कई सरकारी अफसरान और कर्मचारी थोक के भाव निलंबित हो गए थे। इस तरह की रिपोर्टिंग के लिए लाज़मी होता था कि वे किसी भी तरह के दबाव में नहीं आएं। हमप्याला होकर तो कतई नहीं।

जेपी के आंदोलन के दौरान उन्हें पटना में देखा तो था, पर ठीक-ठाक परिचय कान्हा में हुआ। मैं बतौर मैनेजर टूरिज्म कारपोरेशन के लिए काम कर रहा था। जुगनू जंगल-जंगल घूमने के शौकीन थे। सफेद शेरों पर “मोहन प्यारे का सफेद दस्तावेज” नाम की उनकी किताब, उनकी इसी मोहब्बत का नतीजा थी। टेलीफोन से उनके आने की खबर मिली। शाम को आना था, पर दूसरे दिन सुबह पहुँच सके थे। दरअसल तब किसली के लिए जबलपुर से एक ही बस चलती थी। यदि शाम को देर ही जाए तो जंगल मे बस के प्रवेश की अनुमति नहीं थी, उसे खटिया गेट में ही रुकना होता था। बस के ड्राइवर और कंडक्टर एक ढाबे में अड्डा मारते थे। जुगनू उस दिन बस के इकलौते सवार थे। ढाबे के मालिक ने खाने के अलावा एक चारपाई का भी इंतज़ाम कर दिया। बस की सीट गद्दों के रूप बिछा ली गयी और जुगनू महुए के उड़नखटोले में सवार होकर किसी और दुनिया की सैर को निकल गए। अगले दिन सुबह यूथ हॉस्टल पहुँचे। उन्हें वाइल्ड-लाइफ पर एक कवर स्टोरी करनी थी। “धर्मयुग” इस विषय पर एक विशेषांक निकाल रहा था और सम्भवतः हिंदी पत्रिका के इतिहास में यह इस तरह का पहला आयोजन था। मालूमात हासिल करने की उनकी लिस्ट में मेरा नाम भी शामिल हुआ। वे आये तो उन्हें बताया कि पटना में उन्हें देख चुका हूँ। उन्हें कुछ वैसी ही खुशी हुई जैसे किसी जंगल में एक परिचित के मिल जाने पर हो सकती है। मैंने उनसे कहा कि वे यूथ हॉस्टल से अपना बोरिया-बिस्तर उठाकर मेरे कॉटेज में आ जाएं। उन्होंने मेरी दोस्ती कबूल की क्योंकि मैं कभी भी उनकी किसी योजना-परियोजना का लाभार्थी नहीं हो सकता था। हम लोगों के तार आपस में मिलने लगे थे। ये बात और है कि एक इंसान होने के नाते उसने एक-दो एहसान मुझ पर भी किये। एक का जिक्र करूँगा।

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यह शायद वर्ष 97 की बात है। बांधवगढ़ में पर्यटन को प्रोत्साहित करने के लिए मैंने दौरा कार्यक्रम रखा। टीम में कोई 14 लोग थे और सभी विदेशी चित्रकार थे। मुल्क के बाहर के लोगों को खींचने के लिए इससे बेहतर कोई योजना नहीं हो सकती थी। घूमना-फिरना ठीक-ठाक चल रहा था। एक सुबह एक डच बुजुर्ग चित्रकार नाश्ते की मेज पर समय पर नहीं पहुँचे। उनका इंतजार किया गया। फिर नाश्ता खत्म हो जाने के बाद भी जब वे नहीं पहुँचे तो उनकी खोज-खबर ली गई। वे अचेतावस्था में मिले। उनके जो हालात थे, बांधवगढ़ तो क्या, जबलपुर में भी इलाज मुमकिन नहीं लग रहा था। यही समझ में आया कि उन्हें एयर-लिफ्ट कर दिल्ली पहुँचाया जाए। पर सबसे पास का हवाई अड्डा जबलपुर का और वह तब सिर्फ सेना के लिए था। मुझे लगा कि इस हालात में जुगनू ही कुछ कर सकता है। मैंने उन्हें फोन खड़काया। तब मुलायम सिंह यादव रक्षा मंत्री थे। मुलायम पुराने समाजवादी और जुगनू खाँटी समाजवादी। जुगनू ने मरीज को लेकर जबलपुर पहुंचने को कहा। कोई आधे घण्टे में ही मरीज के एयर-लिफ्ट करने का इंतजाम हो गया। विडम्बना देखिए कि इस बदहवासी में मुझे कार के इंतजाम का न सूझा। उड़नखटोले का इंतज़ाम हो गया था और कार ढूँढी जा रही थी। खजुराहो से कुछ पर्यटक आए थे। उनकी कार में मैं मरीज को लेकर जबलपुर भागा। हवाईअड्डे के पहले ही गाड़ियों को रोका जा रहा था। मिलिट्री के एक ऑफिसर सबसे पूछताछ करते जा रहे थे। जैसे ही उन्हें हमारे बांधवगढ़ से होने की खबर मिली, मरीज को एक मिलिट्री वाहन में डाल दिया गया। डॉक्टर मुस्तैद थे। शुरुआती इलाज भी चालू हो गया। मरीज दिल्ली पहुँचा और ठीक भी हो गया। वे जब तक जिंदा रहे, हर साल मुझे 5-6 ग्रीटिंग कार्ड बिलानागा भेजते रहे।

जुगनू का जलवा कुछ ऐसा ही था। एक बार नीतीश की प्रेस-कॉन्फ्रेंस में अपने दूत के हाथों मोबाइल भिजवा दिया। नीतीश नम्बर डायल कर एक हाथ में मोबाइल पकड़े रहे और जुगनू उनकी कॉन्फ्रेंस को ‘लाइव’ करते रहे। कहते हैं कि ‘धर्मयुग’ में उनकी किसी भी स्टोरी को-चाहे वह आधे पेज की ही क्यों न हो-कवर स्टोरी से एक रुपया ज्यादा मिलता था। एक बार जब मैंने कैलाश नारद की किसी स्टोरी का ज़िक्र किया तो उन्होंने कहा, “वो क्या खाक स्टोरी करेगा। जो भी भेजता है, मुझे रि-राइट करना पड़ता है.. हाँ! ये बात है कि उसे लिखने के जितने पैसे मिलते हैं, उससे ज्यादा मुझे ठीक करने के मिलते हैं।

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मुंबई में एक बार उनके हाथों में कुछ ज्यादा ही पैसे आ गए थे। पहले तो कहा कि कोई घर खरीद लेता हूँ। फिर ख्याल आया कि मैं तो रमता जोगी हूँ, घर का क्या करूँगा? फ़िल्म बनाने का ख्याल आया। संघर्ष के दिनों में नसीरुद्दीन शाह और ओमपुरी जुगनू के मीरा रोड वाले घर में फर्श पर निद्रासन करते थे। स्मिता पाटिल, राज बब्बर वगैरह से दोस्ती थी। फ़िल्म “सोते रहो” का काम शुरू हुआ। मुंबई की फिल्मी दुनिया बहुत प्रोफेशनल है, यहाँ शौकिया काम नहीं चल पाते। जो कुछ भी काम हुआ, डिब्बे में बंद हो गया। इस बीच पैसे ख़तम हो गए होंगे। अपन ने तो पहले ही कहा था कि जुगनू के हाथ खुले थे और उनकी जेब में छेद था!

कम लोगों को पता है कि जुगनू ने एक शादी भी की थी। वे मुझे पुणे आने को कह रहे थे। कारण नहीं बताया। मेरी छोटी बहन रानी की शादी थी, इसलिए जाना मुमकिन न था। जुगनू ही गाँव आये। यह बायां गाँव था, रहटी के पास। रहटी में अपना बचपन गुजरा जहाँ परसाई जी की बहन रुक्मिणी देवी ब्याही गयी थीं। उनके बेटे अशोक से अपनी अच्छी दोस्ती रही। रुक्मिणी देवी उस जमाने में भी प्रगतिशील आंदोलन से जुड़ी थीं और सरकार की कोई नीति जन-विरोधी लगती तो गाँव वालों को लेकर जुलूस निकाल देतीं। बहरहाल जुगनू जब गाँव आये तो पता चला कि उनके साथ कोई महिला है। यह उनकी सद्य-ब्याहता पत्नी थी और वे इसीलिए मुझे पुणे बुला रहे थे। वे एक दिन गाँव में रहे और अगले दिन बांधवगढ़ के लिए रवाना हो गए। बहुत बाद में ‘टाइम्स ऑफ इण्डिया’ की एक पत्रकार मित्र ने उनकी शादी की पुष्टि की और कहा कि शादी की खरीदारी में वे भी शामिल थीं। उनकी यह शादी कुल 8 दिनों तक चली।

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आठ दिनों की एक शादी के अलावा जुगनू ने एक वसीयत भी की थी। वसीयत का मजमून कुछ इस प्रकार था:

“में जुगनू शारदेय, शारदा देवी और जगन्नाथ प्रसाद का सबसे बड़ा बेटा अपनी वसीयत कर रहा हूँ, यह वसीयत मैंने 25 जुलाई 2003 को लिखी है।

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अपना जीवन मैंने अपने ढंग से जिया, कभी दुःख और अफसोस भी होता था, अब नहीं होता लेकिन अपनी ही लिखी कविता की पंक्तियाँ बार-बार याद आती हैं:

अवशेष अभी भी है अभिलाषाएं
देह के खंडहर में सुरक्षित

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मेरे बचपन के दोस्त डॉक्टर मृणाल रंजन सिन्हा से अनुरोध है कि मेरा जो भी पैसा है वह मेरे भाइयों और बहनों की बेटियों को ही मिले, हालांकि मेरा भाई दुर्गा शारदेय बैंकों में और अन्य जगहों पर पैसा पाने के लिए नामांकित है। अन्य सम्पत्ति, किताबें, कम्प्यूटर, टेलीविजन सेट, म्यूजिक प्लेयर वगैरह पर अधिकार मेरे मित्र सत्येंद्र कुमार तिवारी का है।

मेरा शरीर किसी भी मेडिकल कॉलेज को दे दिया जाए, हालांकि 1985 में अपने ऑपरेशन के दौरान यह शरीर क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज, वेल्लूर, तमिलनाडु को दिया जा चुका है, पर अब मृत्यु स्थल के आस पास का कोई भी मेडिकल कॉलेज हो सकता है…।”

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जुगनू को यह वसीयत नहीं करनी थी, क्योंकि लावारिसों की कोई वसीयत नहीं होती। लावारिस होना खुद उनका चुनाव था। कम से कम मैं तो उनका इंतजार कर ही रहा था। उनकी देह न वेल्लूर पहुँच सकी और न किसी आस-पास के मेडिकल कॉलेज में। वह बस फूँक दी गई। उनके देह के खंडहर में सुरक्षित उनकी अभिलाषाएं भी देह के साथ जलकर बुझ गयी होंगी। अभिलाषाओं के जुगनू ऐसे ही बुझते हैं!

(वाइल्ड लाइफ़ फोटोग्राफर Satyendra Tiwari से बातचीत पर आधारित। संयोग कि यह लिखते हुए जाना कि आज ही राष्ट्रीय प्रेस दिवस है। इंटैक कटनी के साथी Mohan Nagwani और Rajendra Singh Thakur के आमंत्रण पर तिवारी जी से यह बातचीत पुरातात्विक अवशेषों को देखते हुए हुई। अग्रज लेखक Rajendra Chandrakant Rai और मित्र Rupendra Patel भी साथ थे।)

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