लाइव इंडिया वेब पोर्टल में होता है युवा पत्रकारों का उत्पीड़न, पढ़ें आपबीती

भारतीय जनसंचार संस्थान मैं अप्रैल के आखिरी सप्ताह में लाइव इंडिया जो कि क्वॉर्इंट मीडिया ग्रुप का हिस्सा है वह प्लेसमेंट के लिए आती है। हिंदी पत्रकारिता विभाग के छात्रों के लिए यह आखिरी मौका था जिससे उन्हें उम्मीद थी कि उनका प्लेसमेंट हो जाएगा। प्लेसमेंट में करीब 20 छात्रों को चुना जाता है और उसी दिन ऑफर लेटर भी दे दिया जाता है। लगभग सभी 20 लोगों की जॉइनिंग मई के पहले हफ्ते में थी। एक छात्र को छोड़कर सभी ने लाइव इंडिया वेब पोर्टल ज्वाइन कर लिया।

शुरुआती कुछ दिन काम करने का माहौल अच्छा था। लेकिन धीरे-धीरे स्थिति बदलती गई। सभी को दिन का एक टारगेट दिया जाने लगा। टारगेट पूरा ना होने पर संपादक के द्वारा कर्मचारियों को तलब किया जाने लगा। दबाव बढ़ता जा रहा था फिर भी सब लोग काम करने को मजबूर थे।

लाइव इंडिया का दफ्तर नोएडा सेक्टर 132 में है। सेक्टर 18 से कंपनी कैब की सुविधा देती है। जब हमने कंपनी ज्वाइन की थी तब बिना एसी वाली गाड़ी चिलचिलाती धूप में लगभग 10 किलोमीटर तक सभी को ले जाती थी। इसके लिए मैंने संपादक से कई दिनों तक कहा जिसके बाद इस समस्या का समाधान कराया गया। एसी वाली गाड़ी आने लगी।

जिस जगह लाइव इंडिया का दफ्तर है वह बिल्कुल ही वीरान जगह है। खाने पीने की कोई सुविधा नहीं है। मेरे साथी भूखे पेट 8 घंटे काम कर रहे थे। कुछ साथी जब खाने के लिए जाते तो बाकी साथियों से यह कहा जाता है कि यह लोग कितनी बार बाहर जाएंगे। काम का दबाव लगातार बढ़ता जा रहा था। हमारी नियुक्ति कॉपी एडिटर की पोस्ट के लिए हुई थी लेकिन हमसे कंटेंट और और वीडियो बनाने के लिए भी कहा जाने लगा। सबसे महत्वपूर्ण था कि रोज एक टारगेट तय कर दिया जाता था जिसके पूरा ना होने पर आपको संपादक को जवाब देना होता था।

इन सबसे इतर कंपनी के पास सोशल नेटवर्किंग टीम भी नहीं है जो न्यूज़ को फेसबुक, इंस्टाग्राम पर पोस्ट करें। यह काम भी हम लोगों से कराया जाता था। मेरे कुछ साथियों को तो यह भी कहा गया कि आप रोज 50 न्यूज़ को पोस्ट करेंगे। न्यूज़ बनाने के टारगेट से लेकर न्यूज़ पोस्ट करने का टारगेट।

मैंने संपादक से कई बार इस सिलसिले में बात की। मैंने कहा सर अगर हमारे दिमाग में टारगेट रहेगा तो हम ठीक तरीके से काम नहीं कर पाएंगे। खबर लिखते समय रिसर्च की जरूरत होती है। उसके लिए समय लगता है। संपादक की तरफ से जवाब आता है कि हमें क्वालिटी से ज्यादा क्वांटिटी पर करना है। इसका मतलब है कि जितनी न्यूज़ बनेगी, उनका उतना ही फायदा होगा। चाहे उसमें सूचनाएं हो या न हो।

इस जवाब के बाद मेरा वहाँ काम करने का मन नहीं कर रहा था। लेकिन मैंने सोचा कि थोड़ा समय देते हैं। शायद चीजें बदले। कई बार और कोशिश की इस सिलसिले में संपादक से बात करने की लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ।

जिस दिन लोकसभा चुनाव के नतीजे आए थे उसके बाद से दबाव लगातार बढ़ रहा था। न्यूज स्टोरी का टारगेट भी बढ़ता जा रहा था। जिनको हम सभी लोग रिपोर्ट करते थे वह सभी को कहते कि यहां कुछ ऐसे भी लोग हैं जो दिन में 50 स्टोरी भी करते हैं। उनकी यह बात सुनकर मैं हैरान हुआ। मैंने सोचा कि 8 घंटे की शिफ्ट में कोई 50 स्टोरी कैसे कर सकता है। उनके दावे की मैं पुष्टि नहीं करता।

मैंने उनसे कहा अगर कोई 50 स्टोरी करता है तो इसका मतलब है कि हर 4-5 मिनट में एक स्टोरी, जो कि असंभव है। मेरे इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं था। फिर भी मैं काम करता रहा अपनी पूरी ईमानदारी के साथ। धीरे-धीरे कुछ लोगों को नौकरी से निकाला जाने लगा। कुछ को टारगेट पूरा न करने की वजह से और कुछ को सवाल पूछने की वजह से। मेरा मन व्यथित था यह सब देखकर। मेरे साथी लगातार दबाव में काम कर रहे थे, ठीक से बिना कुछ खाए।

एक दिन मैंने अपने कोऑर्डिनेटर से कहा कि हमें एक महीने से भी ज्यादा हो गया है काम करते हुए, अभी तक हमें सैलरी की रसीद नहीं मिली है और न ही पीएफ एकाउंट खुला है। उनका जवाब था 2-3 दिनों में आप लोगों को मिल जाएगा। लेकिन 3 दिन बाद भी ये सब नहीं मिला।

18 जून को फिर से हमारे कोऑर्डिनेटर सबको बोलते हैं कि आज से सब लोग 10 स्टोरी करोगे। मेरा नाम लेकर कहा जाता है कि तुम 10 स्टोरी करोगे। मेरे सब्र का बांध टूट गया। मैंने कहा सर देखिए – मैं अपनी क्षमता से ज्यादा काम कर रहा हूं। आप लोगों की तरफ से लगातार दबाव बनाया जा रहा है। ये ठीक नहीं है। अच्छी स्टोर करने के लिए समय चाहिए होता है।

इसके बाद मैं उनकी आंखों में खटकने लगा। मेरे प्रति उनका रवैया भी बदलता जा रहा था। साथ ही मेरे साथी भी लगातार कह रहे थे कि काम का बहुत दबाव बढ़ रहा है। यह सब मानसिक शोषण की तरह था हम सब के लिए।

फिर मैंने सोचा कि इस बारे में कुछ लिखा जाए और मन को थोड़ा शांत किया जाए। मैंने 21 जून को फेसबुक पर एक पोस्ट लिखा जिसका शीर्षक था – ‘आखिर मेरे साथी कर क्या रहे हैं’। इस पोस्ट का मेरे साथियों ने समर्थन किया। कुछ ने कमेंट करके और कुछ ने प्रत्यक्ष तौर पर। उन्होंने कहा जो हम नहीं कह पा रहे थे वो बात तुमने आज कह दी है।

21 जून को मैं दफ्तर पहुंचा। सब समान था। हम सब फिर टारगेट पूरा करने में लग जाते हैं। पत्रकारिता की हत्या करते हुए। शाम के 6 बजे के करीब मुझे कोऑर्डिनेटर द्वारा बुलाया जाता है और कहा जाता है यह तुमने फेसबुक पर क्या लिखा है। मैं समझ गया कि उनका इशारा किस ओर है। मैंने कहा देखिए सर वह मेरा व्यक्तिगत स्पेस है, उसके लिए मेरी आपके प्रति जवाबदेही नहीं है। उन्होंने कहा आपने हमारे संस्थान के ऊपर टिप्पणी की है। मैंने कहा मेरे पोस्ट में ऐसा कुछ नहीं है। बस मेरे साथियों की व्यथा और पीड़ा है।

उन्होंने कहा कि आप कुछ दिनों की छुट्टी ले लीजिए, आपको आराम की जरूरत है। आप मानसिक दबाव में हैं। मैंने कहा आप कहना क्या चाहते हैं, साफ-साफ कहिए। वह यह कह नहीं पा रहे थे कि आप कल से मत आइए, पर मैं समझ गया। मैंने कहा ठीक है सर, मैं इस्तीफा दे देता हूं। लेकिन एक बात कह देता हूं कि मीडिया द्वारा ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को कुचलना सरासर गलत है।

मैंने अपना इस्तीफा लिखा और संपादक के कमरे में गया। संपादक ने मेरे अंदर घुसते ही कहा कि हम आपको 5 मिनट में बुलाते हैं।

मैं इंतजार कर रहा था। कोऑर्डिनेटर ने मुझे फिर बुलाया और कहा संपादक से मिलकर क्या करोगे। ऐसे ही जाओ। मैंने कहा – मुझे लिखित तौर पर या मेल करके यह नहीं बताया गया कि हम आपको नौकरी से निकाल रहे हैं। मैं इस्तीफा देकर आपकी नौकरी छोड़ रहा हूं। बस एक बार संपादक से मिलना चाहता हूं। उन्होंने कहा कि अभी उनके पास आपसे मिलने का समय नहीं है। मैं हैरान था ये सुनकर। जो व्यक्ति मुझसे अपने कैबिन में आधे-आधे घंटे तक बात करता था, उसके पास मेरे लिए 2 मिनट का भी समय नहीं था। मैंने कहा, ठीक है, ये रहा मेरा इस्तीफा और मैं आपकी नौकरी छोड़ रहा हूं।

मेरे इस फैसले से मेरे साथियों में निराशा है, डर है। 22 जून को पता चलता है कि मेरे एक और साथी को नौकरी से निकाल दिया गया है। उसका दोष सिर्फ यह था कि उसने फेसबुक कमेंट कर मेरा समर्थन किया था।

कई और साथियों पर नौकरी से निकाले जाने का खतरा है। डर के माहौल में सभी काम कर रहे हैं। अपने हक के लिए के लिए भी आवाज नहीं उठा पा रहे हैं। पत्रकारों की आवाज को सुनियोजित और संस्थागत तरीके से दबाया जा रहा है।

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Comments on “लाइव इंडिया वेब पोर्टल में होता है युवा पत्रकारों का उत्पीड़न, पढ़ें आपबीती

  • लल्ला लल्ला लोरी says:

    एकदम सच लिखा है, इस साहस के लिए सलाम पहुंचे !
    मैं वहीं काम करता हूं इसलिए मैं ज़िक्र में आई किसी भी घटना से इनकार नहीं कर सकता ! यह सब मेरी आंखो देखी घटना है
    लाईव न्यूज़ का एडिटर मालिक/ दलाल/ दल्ला/मोगहा/ धूर्त बुसंत झा2 को न्यूज़ सेंस की रत्ती भर भी अक्ल नहीं है । मेहरों की तरह पीला दांत दिखाकर ससुरा खुदको प्रभाष जोशी समझता है !

    इससे बेहतर तो पटना यूनिवर्सिटी के वो लड़का लोग है जो भर दिन बक्चोदी करने के बाद भी काम की बात कायदे से करता है । मुझे तो लगता है किसी के जांघिया में लटक के पैसा जुगाड लाया है और स्वघोषित पत्रकार है _|_

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  • आशीष चौकसे says:

    मैंने दैनिक भास्कर और पत्रिका जैसे संस्थानों में काम किया है। छत्तीसगढ़ में नक्सली नेताओं से वाँट्सएप्प में खुल्लम खुल्ला जान से मारने की धमकी भी सुनी है। लेकिन अपने तेवर नहीं बदले। मेरा अन्दाज़ है ठोकने का छत्तीसगढ़ में ऐसा कोई नहीं जो मेरा नाम ना जानता हो। भड़ास ने अच्छा सपोर्ट किया था। मेरे स्टिंग और ख़बरें डेलीहंट ने भी पब्लिश की। फिर व्यक्तिगत कारणों से मैंने लिखना कम कर दिया था जिसे वापस शुरू किया।

    कहने का मतलब यह है कि शेर को पहचान नहीं बतानी पड़ती उसकी दहाड़ काफ़ी होती है। संपादकों का उत्पीड़न वो सहते हैं जिनमे ठोकने की क्षमता नहीं होती। मुझसे भी सम्पादक अड़े थे आज मेरी ख़बरों के ख़ौफ़ में रहते हैं।

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  • pradeep sharma says:

    भाई, आपने मीडिया मे काम कर रहे युवाओं की व्यथा को अच्छे से समझा है लेकिन ये भी एक विडम्बना है कि पूरे देश में ऐसे ही मीडिया घराने खुले हुये हैं, जहां पर युवाओं के सपने दम तोड़ते रहते हैं।

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