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महाराष्ट्र के विधायकों को मिल रही पेन्शन के विरोध में मुंबई हाई कोर्ट मे पीआईएल

मुंबई। पिछले वर्षाकालीन अधिवेशन में महाराष्ट विधानसभा ने भूतपूर्व विधायकों की पेन्शन 25 हजार से बढ़ाकर 40 हजार रुपए प्रतिमाह करने का निर्णय लिया था। महाराष्ट्र के पूर्व विधायकों को 2004 में सिर्फ 4000 हजार रूपये पेन्शन मिलती थी। लेकिन पिछले दस साल में सात बार पेन्शन में बढ़ोतरी की गयी। आज जिन विधायकों ने एक कार्यकाल भी पुरा कर लिया उन्हे 40 हजार और जिन विधायकों ने दो कार्यकाल पुरे किये हे उनको दस हजार रूपये ज्यादा पेन्शन मिलती है। इस हिसाब से जिन विधायकों ने पांच या छह कार्यकाल पूरे किए हों उन्हे एक लाख रूपये तक हर माह पेन्शन मिलती है। इतना ही नहीं जिस विधायक की विधायक के रूप मे दुसरा कार्यकाल चल रहा है उसे पहले कार्यकाल की पेन्शन दी जाती है। महाराष्ट्र मे 900 भूतपूर्व विधायक और 700 के करिब भूतपूर्व विधायकों की विधवाएं हैं। इस प्रकार करीब 1600 लोगों को महाराष्ट्र सरकार हर माह कम से कम 40,000 और ज़्यादा से ज़्यादा 1,10,000 तक का पेन्शन दे रही है। इसके अलावा अन्य सुविधाये मिलती रहती हैं जिसमें मुफ्त इलाज, रेल का सफर, टेलिफोन सुविधाएं आदि प्रमुख हैं। इन सब को मिलकर महाराष्ट सरकार भूतपूर्व विधायकों के लिए सालाना 125 करोड़ रूपये खर्च करती है। जब की महाराष्ट्र में अन्य बहुत सारे ऐसे घटक है जो पिछले कई सालों से पेन्शन की मांग कर रहे है लेकिन सरकार उनकी मांग की अनदेखी करती आ रही है।

मुंबई। पिछले वर्षाकालीन अधिवेशन में महाराष्ट विधानसभा ने भूतपूर्व विधायकों की पेन्शन 25 हजार से बढ़ाकर 40 हजार रुपए प्रतिमाह करने का निर्णय लिया था। महाराष्ट्र के पूर्व विधायकों को 2004 में सिर्फ 4000 हजार रूपये पेन्शन मिलती थी। लेकिन पिछले दस साल में सात बार पेन्शन में बढ़ोतरी की गयी। आज जिन विधायकों ने एक कार्यकाल भी पुरा कर लिया उन्हे 40 हजार और जिन विधायकों ने दो कार्यकाल पुरे किये हे उनको दस हजार रूपये ज्यादा पेन्शन मिलती है। इस हिसाब से जिन विधायकों ने पांच या छह कार्यकाल पूरे किए हों उन्हे एक लाख रूपये तक हर माह पेन्शन मिलती है। इतना ही नहीं जिस विधायक की विधायक के रूप मे दुसरा कार्यकाल चल रहा है उसे पहले कार्यकाल की पेन्शन दी जाती है। महाराष्ट्र मे 900 भूतपूर्व विधायक और 700 के करिब भूतपूर्व विधायकों की विधवाएं हैं। इस प्रकार करीब 1600 लोगों को महाराष्ट्र सरकार हर माह कम से कम 40,000 और ज़्यादा से ज़्यादा 1,10,000 तक का पेन्शन दे रही है। इसके अलावा अन्य सुविधाये मिलती रहती हैं जिसमें मुफ्त इलाज, रेल का सफर, टेलिफोन सुविधाएं आदि प्रमुख हैं। इन सब को मिलकर महाराष्ट सरकार भूतपूर्व विधायकों के लिए सालाना 125 करोड़ रूपये खर्च करती है। जब की महाराष्ट्र में अन्य बहुत सारे ऐसे घटक है जो पिछले कई सालों से पेन्शन की मांग कर रहे है लेकिन सरकार उनकी मांग की अनदेखी करती आ रही है।

महाराष्ट्र में पत्रकार भी पिछले बीस साल से पेन्शन की मांग कर रहे हैं। अगर पत्रकारों को पेन्शन दी जाती है तो सरकार को सालाना सिर्फ 2 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। लेकिन सरकार पत्रकारों की मांग पुरी नही कर रही है। जिन विधायकों को सरकार पेन्शन दे रही है उनमें से ज्यादातर रईस हैं। कुछ लोग शुगर फैक्ट्री के मालिक है। कई लोग शिक्षाण संस्थाएं चला कर बहुत पैसा कमा रहे हैं। ऐसे लोगों को पेन्शन की जरूरत नहीं है। यह कानून के खिलाफ भी है। महाराष्ट्र सरकार के विधायकों को वेतन नहीं दिया जाता बल्की मानदेय दिया जाता है। पेन्शन कानून में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि जिनको वेतन मिलता है उन्हें ही पेन्शन की मांग करने का अधिकार है।

इन सभी मुद्दो को लेकर महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार तथा पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती के अध्यक्ष एसएम देशमुख ने 19 जून को मुंबई हाई कोर्ट मे एक जनहित याचिका ( पीआयएल) दायर करके सरकार के पेन्शन बढ़ाने के निर्णय का विरोध किया है। आशा है कि अगले हफ्ते इस पीआईएल पर कोर्ट सुनवाई करेगा।

गुजरात समेत बहुत से राज्यों में विधायकों को पेन्शन नहीं दी जाती है। कुछ राज्य मे 10 से 15 हजार तक पेन्शन दी जाती है। पिछले हफ्ते ही युपी के विधायको ने पेन्शन आौर मानदेय बढ़ाने की मांग की है। महाराष्ट्र सरकार पर 2 लाख 80 करोड का श्रुण है, लेकिन अन्य किसी भी राज्य से जादा पेन्शन यहां के विधायक लेते हैं। एसएम देशमुख का कहना है कि सरकार का यह निर्णय जनहित विरोधी है। वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप पाटिल एसएम देशमुख की ओर से कोर्ट मे पैरवी कर रहे हैं। इस विषय मे कोर्ट क्या फैसला लेता है इस तरफ समुचे महाराष्ट्र का ध्यान लगा हुआ है।

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