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‘मन की बात’ को मान्यता दिलाने के लिए हेडलाइन मैनेजमेंट और रिपोर्टिंग की गलतियां तथा मुश्किलें

संजय कुमार सिंह

नरेन्द्र मोदी डॉट इन (narendramodi.in) पर तीन अक्तूबर 2023 को एक आलेख प्रकाशित हुआ था जिसका शीर्षक है, मन की बात का परिवर्तनकारी प्रभाव: एसबीआई और आईआईएम बेंगलुरु का एक विश्लेषण। इसके आधार पर दि इकनोमिक्स टाइम्स ने उसी दिन खबर की थी और अंग्रेजी के शीर्षक को गूगल करने पर यह खबर ऊपर आती है। नरेन्द्र मोदी डॉट इन का नंबर इसके बाद है। दिलचस्प यह है कि दोनों से पहले दो खबरें हैं जो कहती हैं कि आईआईएम बेंगलुरु को ‘मन की बात’ से संबंधित अध्ययन के बारे में कोई जानकारी नहीं है। दूसरी खबर कहती है कि यह जानकारी आरटीआई के जवाब में मिली है।

यह तीन नवंबर 2023 की बात है। तब मुझे नहीं पता था कि आरटीआई दायर करने और उसके जवाब को ट्वीट करने वाले आईआईएम की फैकल्टी हैं। मैं वह जवाब आरटीआई के वेबसाइट या आईआईएम के वेबसाइट पर ढूंढ़ रहा था पर नहीं मिला। लेकिन इस क्रम में भारतीय स्टेट बैंक के वेबसाइट पर इसका संदर्भ मिला और तब मैंने तय किया कि खबर की पुष्टि या खंडन का  इंतजार किया जाए। आज द टेलीग्राफ की खबर से इस बात की तो पुष्टि तो हो गई कि आरटीआई के तहत जानकारी मांगने वाले आईआईएम की फैकल्टी हैं। इसलिए आरटीआई का जवाब सही है पर एसबीआई के इस दस्तावेज की चर्चा टेलीग्राफ की खबर में भी नहीं है।

इसमें अंग्रेजी में सेफ हार्बर शीर्षक के तहत कहा गया है,

“यह शोध कार्य आर्थिक अनुसंधान विभाग, भारतीय स्टेट बैंक, मुंबई द्वारा डिसीजन साइंसेंज, आईआईएम-बी के साथ एक संयुक्त अध्ययन है। इसका  उद्देश्य प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 105 एपिसोड में विभिन्न विषयों और जोर दिये गये क्षेत्रों पर पड़े प्रभाव का विश्लेषण करना है। भिन्न क्षेत्रों में हुए इन टिकाऊ या स्थायी परिवर्तन से जुड़ा यह अध्ययन भिन्न प्राचलों में मूर्त और अमूर्त बदलाव के लिए भी हो सकता है। इसके मकसद यह है कि महत्वाकांक्षी तौर पर प्रेरक कार्यक्रम इस साल 3 अक्तूबर 2023 से अपने दसवें वर्ष में प्रवेश कर रहा है।

हम डॉ. भुवनेश पारीक, सहायक प्रोफेसर, निर्णय विज्ञान, आईआईएम-बी जिनके साथ हमने मिलकर काम किया ताकि गूगल सर्च के आँकड़ों की विविधतापूर्ण दुनिया को दुरुस्त और व्यवस्थित किया जा सके। हम आईआईएम-बी के प्रोफेसर पुलक घोष को भी उनके बहुमूल्य इनपुट के लिए धन्यवाद देते हैं।

यह अध्ययन एक अरब से ज्यादा लोगों के मानस पर एक अभूतपूर्व जन संपर्क कार्यक्रम के परिवर्तनकारी प्रभाव का विश्लेषण करने का एक ईमानदार प्रयास है जो गुणात्मक और मात्रात्मक उपकरणों के जरिये किया गया। इसमें कुछ  ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं जो अधिक स्पष्टता की मांग करें या अभिनव प्रश्नों को जन्म दें। हम मानते हैं कि आगे बढ़ते हुए, अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष शासन के लिए नए विचारों को बढ़ावा देने, नवाचार का उपयोग करने और लोगों व नीतियों को आगे बढ़ाने तथा कनेक्ट करने के लिए स्प्रिंगबोर्ड हो सकता है। कई संबोधनों के मध्य में यही विचार है…”

अध्ययन के निष्कर्ष इसके बाद हैं पर इस सेफ हार्बर और बाकी तथ्यों से जाहिर है कि मामला आईआईएम-बैंगलोर के प्रोफेसर से जुड़ा हो भी तो संस्थान से अधिकृत रूप से नहीं जुड़ा हुआ है और प्रधानमंत्री के वेबसाइट पर, एसबीआई और आईआईएम बेंगलुरु का एक विश्लेषण – दावा भ्रम फैलाता है। आईआईएम-बैंगलोर के प्रोफेसर का इस अध्ययन से जुड़ा होना और दूसरी फैकल्टी का आरटीआई लगाना, उसके सवाल और जवाब किसी विवाद का कारण भी हो सकता है।

दूसरी ओर, यह भी स्पष्ट है कि एसबीआई ने अगर स्वेच्छा से अध्ययन किया भी तो प्रधानमंत्री को सूचना मिलते ही उसे वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया और इसमें तथ्यों को सही ढंग से प्रस्तुत करना जरूरी नहीं समझा गया जो प्रधानमंत्री के स्तर पर जरूरी था और इस प्रयास में यह पोल खुल गई कि ‘मन की बात’ कार्यक्रम को जबरन मान्यता दिलाने की कोशिश है। वरना अध्ययन तो इसपर होना चाहिए था कि एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं करने का क्या प्रभाव रहा।

आप जानते हैं कि अभी इस कार्यक्रम का दस साल पूरा होना संदिग्ध है और दावे चाहे जो किये जाएं इससे ना क्रांति होनी थी ना हुई है। शायद इसलिए भी नौ साल पूरे होने पर यह अध्ययन कर-करवा लिया गया।      

तीन अक्तूबर को ही पीटीआई ने इस अध्ययन की खबर जारी की थी और इसे द प्रिंट ने भी प्रकाशित किया था। पीटीआई ने लिखा था कि मोदी ने इसे अपने वेबसाइट पर साझा किया है। वेबसाइट पर इसे एडमिन द्वारा प्रकाशित बताया है। प्रधानमंत्री (@narendramodi) ने इसे 3 अक्तूबर 2023 को दोपहर बाद 3:00 बजे ट्वीट भी किया था जिसे तीन नवंबर तक 10 हजार लोगों ने पसंद किया है तीन हजार लोगों ने रीट्वीट किया है और मुझे लगता है कि पहले के मुकाबले यह बहुत कम है। पीआईबी ने भी इस दिन एक विज्ञप्ति जारी की थी जिसका शीर्षक था मन की बात ने नौ साल पूरे किये। यह प्रधानममंत्री के ट्वीट पर आधारित लगता है और समय 3:30 बजे लिखा है। हालांकि यह भी प्रधानमंत्री के वेबसाइट की खबर पर ही आधारित है। प्रधानमंत्री के ट्वीट में @TheOfficialSBI और @iimb_official को टैग किया गया था। लेकिन @deepak_malghan ने एक ट्वीट के जरिये जानकारी दी कि एक आरटीआई के जवाब में आईआईएम ने कहा है कि उसे ऐसे किसी अध्ययन की जानकारी नहीं है। हिन्दी में यह खबर अमर उजाला के साइट पर है और तीन अक्तूबर की ही है। आज के ट्वीट के मद्देनजर कहा जा सकता है इस खबर को प्रकाशित करने वाले सौरभ पांडेय को खबर चेक कर लेना चाहिये था जैसी अपेक्षा आम रिपोर्टर से की जाती है पर क्या रिपोर्टर आईआईएम से पूछता कि narendramodi.in पर प्रकाशित फंला खबर की आप पुष्टि करते हैं कि नहीं। लेकिन आरटीआई के जवाब से तो लगता है कि पूछना चाहिये था। इस लिहाज से मुझे @deepak_malghan और आरटीआई से पूछना चाहिये पर पूछूं कैसे या किसलिये? 

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