Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

मसाला किंग की कहानी

विवेक शुक्ला-

करोल बाग से महाशय जी का सफर… करोल बाग की कृष्णा गली में गुरुवार को महिला-पुरुष छोटे-छोटे समूहों में खड़े होकर महाशय धर्मपाल गुलाटी की बातें कर रहे थे। उधर मंजी पर बैठकर जाड़ों की गुनगुनी धूप का सुख ले रही वाली महिलाएं भी एक-दूसरे को बता रही थी कि महाशय जी उनके घरों में कब-कब आए थे। महाशय धर्मपाल गुलाटी का गुरुवार को निधन हो गया।

कृष्णा गली, मकान नम्बर 371-372

देश के मसाला किंग बनने और कहलाए जाने से पहले उन्होंने करोल बाग की इसी कृष्णा गली के मकान नंबर 371-372 में मसाला कूट-कूटकर दुकानों और घरों में बेचने का काम शुरू किया था। इसी घर में उनका परिवार देश के विभाजन के बाद स्यालकोट से बारास्ता जम्मू होता हुआ आया था। वे कठिन दौर था। पर नौजवान धर्मपाल गुलाटी अपने पिता चुन्नी लाल गुलाटी के साथ बिना वक्त बर्बाद किए मसाले बनाने और बेचने लग गए थे।

गुलाटी परिवार मसालों का काम स्यालकोट में भी करता था। इसलिए वे इस धंधे की बारीकियों से परिचित थे। शुरूआती वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद उन्होंने आर्य समाज रोड में सरकारी डिस्पेंसरी के पास एक छोटी सी दुकान किराए 1960 के शुरू में किराए पर ली। वे यहां पर मसालों के साथ-साथ 5 पैसे में जल जीरा का गिलास भी बेचते थे।

बेचते थे मसाले बुद्ध जयंती पार्क में और शास्त्री जी

इसके साथ ही महाशय जी सुबह करोल बाग से सैर करने पैदल ही बुद्ध जयंती पार्क जाते तो झोले में मसालों के पैकेट भी भर लिया करते थे। वहां पर वे सैर करने के लिए आने वालों को मसाले बेचने लगे। बुद्ध जयंती पार्क में उन्हें रोज नए-नए ग्राहक मिलने लगे।

एक बार महाशय धर्मपाल गुलाटी बता रहे थे कि जब लाल बहादुर शास्त्री जी ने 25 अक्तूबर 1964 को बुद्ध जयंती पार्क का उदघाटन किया था वे उस दिन भी वहां पर मौजूद थे। ये वह समय था जब वे बीच-बीच में कुतुब रोड से टांगा भी चलाया करते थे। उन्हें पैसा कमाने का जुनून था। पर वे पैसा सही रास्ते पर चलकर ही कमाना चाहते थे। उन्होंने कभी एक पैसा भी गलत हथकंडे अपनाकर नहीं कमाया था।

करोल बाग़ का रूपक स्टोर

महाशय जी को करीब से जानने वाले जानते हैं कि उनका एक बड़ा सपना तब साकार हुआ था जब उन्होंने करोल बाग मेन बाजार में रूपक स्टोर खोला था। इसे शुरू हुए भी अब आधी सदी तो हो ही गई है। उसके बाद महाशय जी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। रूपक स्टोर को ड्राई फ्रूट और मसालों की सबसे बड़ी दुकान माना जाता है। इसे अब उनके भाई का परिवार चलाता है। रूपक स्टोर की भाऱी कामयाबी के बाद उन्होंने कीर्ति नगर में एमडीएच मसाले की पहली फैक्ट्री खोली। ये 1970 की बातें हैं। कीर्ति नगर की फैक्ट्री ने सफलताके नए-नए मानदंड रचने चालू कर दिए। इसने उन्हें देश का मसाला किंग बना दिया।

अब वे एमडीएच केब्रांड एंबेसेडर के रूप में अखबारों, टीवी चैनलों वगैरह में रोज बार-बार प्रकट होने लगे। एक तरह से वे भारत की किसी कंपनी के पहले स्वामी या सीईओ थे जो अपनी कंपनी के ब्रॉड एंबेसेडर बने।अब तो एमडीएच का सालाना कारोबार दो हजार करोड़ रुपए का है।

मन्दिर था करोल बाग़ उनके लिए

इसके साथ ही महाशय धर्मपाल गुलाटी ने करोल बाग को छोड़ दिया। ये 1980 के दशक की बातें हैं। अब वे राजधानी के पॉश वसंत विहार में शिफ्ट कर गए। लेकिन करोल बाग को उनके दिल से कोई निकाल नहीं सकता था। वे हर दूसरे-तीसरे दिन करोल बाग में कुछ देर के लिए घूमते हुए नजर आने लगे। करोल बाग में घूमते तो कभी जूते या सैंडल नहीं पहनते। कहते थे- “यार, मैंने करोल बाग को मंदिर माना है। इसने मुझे सब कुछ दिया है। इधर मैं जूते नहीं पहन सकता।” वे करोल बाग वालों के सुख दुख में शामिल होने लगे।

महाशय जी को करीब से जानने वाले बताते हैं कि करोल बाग छोड़ने के बाद वे कुछ मामले में यहां समाज के हमारे हरेक सुख-दुख में शामिल होने लगे। वे एक तरह से ये सिद्द करना चाहते थे कि वे यहां से जाने केबाद भी उनके करीब हैं। वे सत नगर श्मशान भूमि और पंचकुईया रोड श्मशान भूमि में लगभग रोज ही पहुंचे होते। कहने वाले तो कहते हैं कि उन्होंने अपने जीवनकाल में हजारों अत्येष्टि कार्यक्रमों में भाग लिया होगा।

21 करोड़ सैलरी लेने वाले महाशय जी

दिल्ली आने के सात दशकों के बाद यानी 2017 में महाशय जी देश की उपभोक्ता उत्पाद (कंज्म्यूर प्रॉडक्ट) के कारोबार में लगी किसी भी कंपनी के सबसे अधिक सैलरी लेने वाले सीईओ बन गए। पर ये भी सच है कि महाशय जी की कमाई और एमडीएच के लाभ का एक बड़ा भाग जनकल्याण योजनाओं में जाता रहा है। वे राजधानी में कई अस्पताल, स्कूल और धर्मशालाएं चला रहे थे जिनमें सैकड़ों कर्मी काम करते हैं। महाशय जी के करीबियों को पता है कि वे घनघोर मितव्ययी किस्म के इंसान थे। वे धन का दुरुपयोग किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं करते थे।

महाशय जी के मसालों और उद्मशीलता से हटकर बात करें तो वे पक्के आर्य समाजी थे। वे राजधानी में गुजरे दशकों से आर्य समाज के कार्यक्रमों को हर तरह का सहयोग दे रहे थे। वे आर्य समाज कीर्ति नगर और हनुमान रोड से जुड़े हुए थे। वे वेदों का निरंतर अध्ययन करते थे। आर्य समाज से जुड़ा साहित्य बांटते थे।

उनके जीवन पर पिता और दयानंद सरस्वती का गहरा असर था। वे समाज मे व्याप्त रूढ़ियों, कुरीतियों, आडम्बरों, पाखण्डों पर लगातार आर्य समाज के कार्यक्रमों में हल्ला बोलते थे। वे हिन्दी-उर्दू के पक्के समर्थक थे, जबकि उनकी मातृभाषा पंजाबी थी। उनके निधन से दिल्ली और देश ने एक समाजसेवी उद्यमी को खो दिया है।

(नवभारतटाइम्स में छपे लेख के सम्पादित अंश)

Kumar Sanjoy Singh : मैं महाशय धर्मपालजी के बारे में ज़्यादा कुछ नहीं जानता था, सिवाय इसके कि ये एक बड़ी मसाला कम्पनी के मालिक हैं। टीवी पर आनेवाले कम्पनी के विज्ञापनों में ये जब-तब दिख भी जाते थे। आयु का शतक लगाते-लगाते चूक गए, 98 वर्ष के इस वृद्ध के बारे में उनकी मृत्यु के बाद नेट वग़ैरह पर काफी कुछ पढ़ने को मिला। और जो जान पाया, उससे उनके जीवट के लिये मन में सम्मान जगा।

दूसरी, एक और बात अच्छी लगी। ढेर सारे व्यावसायिक घराने हैं जहाँ सब कुछ करने-धरने के बाद, बुढ़ापे में परिवार के मुखिया घर के कोने में समेट दिए गए। इस परिवार की भी प्रशंसा होनी चाहिए कि उन्होंने मृत्यपर्यंत इस वृद्ध को पूरा मान दिया। वैसे, ये कारण भी हो सकता है कि कम्पनी की मिल्कियत का बड़ा हिस्सा (शेयर्स) इनके नाम हो। फिर भी, प्रशंसा तो बनती है भाई।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन