कई बार ‘द टेलीग्राफ’ को पढ़ते हुए जर्मन अखबार ‘द म्युनिक पोस्ट’ की याद आती है!

मनोज झा-

कई बार ‘द टेलीग्राफ’ को पढ़ते हुए मुझे इस जर्मन अखबार की याद आती है। ‘द म्युनिक पोस्ट’ ने लगभग 12 साल तक हिटलर का सामना किया। हिटलर ने जब 1923 में एक मीटिंग के दौरान हवा पिस्टल फायर किया ‘म्युनिक पोस्ट’ ने जनता को आगाह किया कि ये नार्मल पॉलिटिक्स नही। इस अखबार ने लगातार 1920 से 1933 तक हिटलर के व्यवहारों की तीखी आलोचना की। मखौल उड़ाया। उसे हत्यारी मानसिकता वाला दरिंदा तक कहा। नाज़ी पार्टी की हर आपराधिक कामों का लेखा जोखा प्रकाशित करता रहा।

जनता पर तो इसका कोई खास प्रभाव नही पड़ा। पर नाज़ी पार्टी लगातार इससे प्रभावित हुए। हिटलर इस अखबार को दुष्प्रचारित करने के लिए एन्टी नेशनल शब्दावली प्रयोग में लाने लगा। इसे किचन पोइजन भी कहा जाने लगा।

हिटलर ने नाज़ी झूठ का प्रचार करने और समाचार मीडिया की प्रासंगिकता को कम करने के लिए तमाशा, बड़े पैमाने पर रैलियों और रेडियो प्रसारणों को नियोजित किया। चुनाव अभियानों के दौरान, वह किराए के हवाई जहाज में आसमान से उतरते थे, जैसे कोई देवता नश्वर लोगों को सच्चाई प्रदान करने के लिए अवतरित हुआ। हिटलर की चुनावी रैलियों का रेडियो पर सीधा प्रसारण किया गया। इन घटनाओं से उत्तेजित सामान्य समाचार पत्रों के कवरेज प्रभावित हो गए। विशेष रूप से जर्मनों के बढ़ते जनसमूह के बीच जो आश्वस्त हो रहे थे कि फ्यूहरर ही उनका तारणहार था।

लेकिन म्यूनिख पोस्ट के कर्मचारी इस आडंबर को बिल्कुल तरजीह नही दे रहे थे। उन्होंने हिटलर का सही रूप ही देखा। वे जानते थे कि उसे रोकना होगा। और वे अपनी सुरक्षा के जोखिम पर भी हार मानने वाले नहीं थे। पर 1933 में हिटलर ने चांसलर बनते ही इस अखबार पर कहर ढा दिया। इसके सातों संपादक को या तो मार दिया गया या कॉन्सेट्रेशन कैम्प में फेंक दिया। पत्रकारों को गोली मारी गयी। म्युनिक पोस्ट को आग के हवाले कर दिया।

भले ही अंधी जनता ने म्युनिक पोस्ट को इग्नोर किया लेकिन हिटलर की सरकार लगातार डरती रही। आज जर्मन लोग इस अखबार को आदरपूर्वक याद करते है लेकिन सच है कि हिटलर ने उन्हें वर्षों तक रीढ़विहीन बनाए रखा। अतीत की घटनाओं को बदला नहीं जा सकता, लेकिन हिटलरी व्यवहारों को आज भी स्वीकार नही किया जा सकता। म्युनिक पोस्ट अपने समय का सच बयान करने वाला अख़बार था। उसने अपने समय का आंकलन किया।



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One comment on “कई बार ‘द टेलीग्राफ’ को पढ़ते हुए जर्मन अखबार ‘द म्युनिक पोस्ट’ की याद आती है!”

  • Ravindra nath kaushik says:

    लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है। उसके ऊपर कोई नहीं। न पत्रकारिता,न न्यायपालिका और न कार्यपालिका।

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