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सुख-दुख

‘नागर दिल्ली आ रहे हैं, ख़्याल रखना!’

नीरेन्द्र नागर-

आज हमारी मेड जब सुबह के काम के लिए आई तो देखा कि उसकी आँखें आई हुई थीं। उसने किसी तरह घर का काम किया। जब जा रही थी तो पत्नी ने कहा, शाम को मत आना। उसने भी कहा कि शाम को वह डॉक्टर को दिखा देगी।

इस घटना से मुझे आज से 37-38 साल पहले की वह घटना याद आ गई जब मैं मुंबई नवभारत टाइम्स में था और संपादकीय पेज देखा करता था। लेख और संपादकीय तो दिल्ली से आ जाते थे लेकिन चिट्ठियाँ वहीं संपादित होती थीं।

उस रोज़ मेरी आँखें बिल्कुल चिपकी हुई थीं और मैं बहुत मुश्किल से अगले दिन के लिए चिट्ठियाँ संपादित कर रहा था। अचानक मुंबई नवभारत टाइम्स के तत्कालीन संपादक टहलते हुए मेरी टेबल पर आए और मेरी अवस्था देखी। उन्होंने कुछ कहा नहीं लेकिन दो ही मिनट के बाद लौटे। हाथ में एक संपादित लेख था। बोले, कल के लिए यह एक और लेख ले लो। मैं समझ गया, वे ऐसा क्यों कह रहे हैं। जब पेज पर दो के बजाय तीन लेख लगेंगे तो चिट्ठियों के लिए जगह बहुत कम बची रहेगी। मुझे कल के लिए बहुत कम चिट्ठियाँ एडिट करनी होंगी। मेरी आँखों में आँसू आ गए। ये आँसू आँखों के प्रदाह के कारण बह रहे आँसुओं से भिन्न थे।

उस घटना के 37-38 साल हो गए और मुझे याद नहीं आ रहा कि वे एसपी थे या Vishwanath Sachdev जिन्होंने मेरी आँखों का बुरा हाल देखकर मेरी मदद की थी। कारण, उन दोनों का स्नेह एक जैसा था। एसपी 1986 में दिल्ली चले गए। कुछ महीनों के बाद मेरा भी दिल्ली तबादला हो गया। उस तबादले के समय भी कुछ ऐसा हुआ जो आज भी मुझे याद है और अगर बढ़ती उम्र के साथ स्मृतिलोप नहीं हुआ तो आजीवन याद रहेगा।

दिल्ली जाने के दिन क़रीब आ रहे थे। एक दिन विश्वनाथ जी ने पूछा, ‘दिल्ली में कहाँ रहोगे?’ मैंने कहा, ‘किसी होटल या धर्मशाला में।’ वे बोले, ‘नहीं, दिल्ली के होटल ठीक नहीं हैं।’ उन्होंने दफ़्तर के क़रीब गाँधी शांति प्रतिष्ठान में मेरे टिकने की व्यवस्था करनी चाही लेकिन वहाँ कमरे ख़ाली नहीं थे। फिर मेरे एक रूममेट की मदद से फ़रीदाबाद में किसी के यहाँ दो-तीन दिन ठहरने का इंतज़ाम हुआ।

मैंने विश्वनाथ जी को बता दिया कि जाते ही फ़रीदाबाद में टिकूँगा और फिर कमरा खोजूँगा। वे निश्चिंत हुए।

मुंबई को अलविदा कहने का समय आ गया। आख़िर के दिनों में उन्होंने पूछा, ‘दिल्ली ऑफ़िस में किसी को जानते हो?’ मैंने कहा, ‘नहीं।’ उन्होंने तभी ख़बरें लिखने वाले पैड से एक पन्ना फाड़ा। उसपर कुछ लिखा। फिर एक छोटे-से लिफ़ाफ़े में उसे डालकर कहा, ‘इसे दिल्ली ऑफ़िस में Bal Mukund Sinha को दे देना।’

मैं दिल्ली आया। ऑफ़िस में पहले ही दिन बालमुकुंद नाम के सज्जन को खोजकर वह चिट्ठी पकड़ाई। उन्होने चिट्ठी खोली। पढ़कर पूछा, ‘कहाँ ठहरे हैं?’ मैंने कहा, ‘फ़रीदाबाद में।’ सुनकर उस अनजान-अपरिचित व्यक्ति ने जो कहा, उससे मैं अवाक रह गया।

कहा, ‘घर आ जाइए।’

‘मतलब?’

‘मतलब सामान लेकर घर आ जाइए।’

मुझे नहीं पता था, उनके घर में कौन-कौन हैं और मैं किसी पर बोझ नहीं बनना चाहता था। सो कहा, नहीं, आप कोई किराये का घर खोज दीजिए।

कुछ ही दिनों में बालमुकुंद ने अपने पड़ोस में ही एक कमरा खोज दिया और समय के साथ हमारे संबंध बहुत ही प्रगाढ़ हो गए जो आज भी बने हुए हैं।

मुंबई छोड़ने के बाद विश्वनाथ जी से ज़्यादा मेलजोल नहीं रह सका। लेकिन यह सवाल मेरे दिमाग़ में अकसर उठता रहता कि उन्होंने उस चिट्ठी में क्या लिखा था जिसे पड़कर एक अनजान व्यक्ति बिना झिझक मेरा दिल खोलकर स्वागत करने को तैयार हो गया।

सालों बाद मैंने बालमुकुंद से पूछा – क्या लिखा था विश्वनाथ जी ने उस चिट्ठी में?

जवाब मिला – लिखा था, नागर दिल्ली आ रहे हैं। ख़्याल रखना।

बस दो वाक्यों की चिट्ठी। लेकिन लिखने वाले ने जिस अधिकार और विश्वास के साथ ये दो लाइनें लिखी थीं कि पाने वाले ने उसका उतना ही सम्मान करते हुए तत्काल मुझे घर पर ठहरने का प्रस्ताव दे डाला। एक नए और अनजान-अपरिचित शहर में जो ठगनगरी के नाम से बदनाम है, इस तरह का प्रस्ताव पाकर मुझे वैसा ही सुकून मिला जैसा भीड़ में खो गया कोई बच्चा अपनी माँ या पिता को देखकर सुकून पाता है।

साथ की तस्वीर मुंबई के दिनों की है। तत्कालीन समाचार संपादक डॉ. बलसे के रिटायरमेंट के दिन की। विश्वनाथ जी सामने की रो में बीच में हैं और मैं (दिनेश ठाकुर की ढब में) सबसे पीछे की रो में विश्वनाथ जी की सीध में। बीच की क़तार में मेरे ठीक नीचे और विश्वनाथ जी के ठीक ऊपर जो सज्जन हैं, उन्हें पहचान रहे हैं? ग़ौर से देखिए। आजकल अडानी जी के ख़ास हैं और NDTV India के नए डायरेक्टरों में से एक हैं। संजय पुगलिया!

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