हलाल होना बकरे का और मौज लूटना दढियल संपादक का

: हम्पी–डम्पी सेट ऑन अ वाल जी हां, संजय विचार मंच : दिमाग तो उर्वर था ही इन लोगों के पास. बस फिर क्या था, कुछ ही दिनों में इन लोगों ने दारूलशफा को प्रदेश के दूर-दराज से आने वाले अनजान कर्म-कामी लोगों को हलाल करने वाले कत्लगाह में तब्दील कर दिया. हालांकि संजय विचार मंच और उसके पदाधिकारियों की शौर्यगाथा खासी ख्याति पा चुकी थी और इस मेनका समेत उनके मंच को भी पैदल कर दिया गया था.

हम्फी-डम्फी तक पैदल हो चुके थे, लेकिन इसके बावजूद अपना काम करवाने वाले चार-छह लोग दारूलशफा स्थित मंच में अपना त्राण पाने पहुंच ही जाते थे और कहने की जरूरत नहीं कि जैसे ही कोई शख्स मंच के दफ्तर में घुसता, सारे के सारे पदाधिकारी उसे हलाल करने के लिए अपनी-अपनी छुरियां सान पर चढ़ा देते. हर शख्स को नाटकीयता में महारत थी और वे तत्काल भूमिका में आ जाते थे.

ऐसे में एक दिन आजमगढ़ का एक युवक मंच के दरवाजे पर पहुंचा. दारोगा सिंह सामने थे.

बोले:- बोलो. 

युवक:- त्रिपाठी जी से मिलना है. 

दारोगा सिंह:- मिल लो, किसी ने मना तो किया नहीं है. काम क्या है ? 

तब तक अंदर से त्रिपाठी की आवाज गूंजी. लगा, किसी को हड़का रहे हैं. बुरी तरह, कुछ ही लम्हों बाद भीमकाय त्रिपाठी अंदर से आया और उसके पीछे-पीछे एक अन्य‍ युवक भी, जिसे उन्होंने डांट-फटकार कर दफा किया. फिर टेलीफोन पर दसियों कॉल लगायी. एक-एक कॉल पर 15-20 नंबर डायल किये. यह जताने के लिए जिससे बात करे रहे हैं, वह खासी दूरी पर है. मसलन, दिल्ली या मुंबई वगैरह-वगैरह. वैसे जितनी दूरी, उतने नंबर डायल करने की स्टाइल त्रिपाठी की उर्वर-दिमाग की मूल उपज नहीं थी. लखनऊ विश्वविद्यालय का एक बकवादी कांग्रेसी छात्र नेता सत्येन्द्र पाण्डेय यही काम करता था. जब उसे दूर-दराज के छात्रों-लौंडों पर रूतबा झाड़ना पड़ता था. दीगर बात है कि सत्येन्द्र आज तक कभी किसी चुनाव में नहीं जीत पाया था. लेकिन सत्येन्द्र की इस स्टाइल को त्रिपाठी ने चांप लिया था. जबकि दारोगा सिंह तो चूतिया ही था इस मामले में, पक्का चूतिया. आजमगढ़ से आया नवागंतुक युवक सहम गया. डरते-डरते उसने चुपचाप त्रिपाठी का चरण-स्पर्श कर खुद को धन्य करने की कोशिश की. इस बीच पानी के कई ग्लास पेश किये गये. कई बार चाय-पकौड़ी और बंद-मक्खन के लिए गर्राबी आवाज लगायी गयी.

दीगर बात रही कि चाय-पकौड़ी-बंद-मक्खन को न तो आना था और न ही वह पेश किया गया. मंच के स्थाई बाशिंदों को सख्त हिदायत पहले ही दे चुकी थी कि जब भी कोई मुर्गा मंच में पहुंचे, उसके सामने चुनही-तम्बाकू का सेवन नहीं करेगा. बहुत तलब लगे तो बाहर निकल कर हथेली-रगड़ तम्बाकू इस्तेमाल कर सकता है. अन्यथा अगर पैसा हो तो सीधे पान खा ले. दीगर बात थी कि दीवारों पर पिच्च-पिच्च की पच्चीकारी सजी हुई थी. खैर, 

इसके बाद पेशी हुई आजमगढ़ी युवक की. युवक ने बताया कि उसका काम अमुक अफसर के पास फंसा हुआ है और यह अफसर अमुक मंत्री के विभाग का है. लेकिन दिक्कत यह है कि न उस अमुक अफसर से कोई जुगाड़ है और न ही उस अमुक मंत्री से. अब यह काम अगर हो जाए तो उसका फंसा हुआ करीब डेढ़ लाख रूपया उसे वापस मिल जाएगा.

काम बहुत महत्वपूर्ण था. इसका समर्थन वहां मौजूद 4-5 लोगों ने भी किया. हालांकि यह लोग उस आजमगढ़ी युवक को नहीं पहचानते थे, लेकिन चूंकि मामला पूर्वांचल से जुड़ा था, इसलिए सवाल ज्यादा नहीं, सर्वाधिक महत्वपूर्ण हो गया था जिसका समाधान देश-विदेश की किसी भी समस्या से ज्यादा जरूरी था. आसानी से समझा जा सकता है कि बिना पूर्वांचल को हासिल किये, कांग्रेस को जमीनी जीत कैसे मिल सकती है और केवल संजय विचार मंच इसी काम के लिए तो बना है. 

कुल मिला कर दृश्य यह बन गया कि यह युवक की समस्या उसकी निजी नहीं, बल्कि पूरी देश की बन गयी. कमरे में मौजूद हर शख्स इस युवक की समस्या बरास्‍ते पूर्वांचल, कांग्रेस, देश और मानवता पर जोर-जोर से पैरवी करने लगा. दारोगा सिंह और त्रिपाठी ने इस अति गंभीर प्रश्न पर मिल रही दलीलों को समझने की लगातार कोशिश की. मसलन, यह मामला बहुत पेचीदा है. खासकर देश की मौजूदा राजनीतिक हालातों के मद्देनजर तो और भी कठिन है. अगर हां, मंच की मुखिया मेनका गांधी जी चूंकि इंदिरा गांधी जी बहू हैं, इसलिए वहां से काम हो सकता है. अलग बात है कि सास-बहू में अब ज्यादा पटरी नहीं खाती है, लेकिन जब मेनका जी किसी सवाल पर जोर देंगी तो इंदिरा जी और राजीव जी उनकी बात को तो टाल नहीं ही सकेंगे, है कि नहीं? आखिरकार अब यह पूर्वांचल-पार्टी-देश का सवाल बन चुका था, कोई इंदिरा-मेनका की निजी मूंछ का नहीं.

यह तो पक्का ही है, है कि नहीं,,, ऐसे ही समस्या और उसके समाधान लगातार त्रिपाठी और दारोगा के सामने प्रस्तुत किये जा रहे थे. और यह दोनों लोगों की पेशानी पर दिक्कतों की लकीरें गहरी हो रही थीं और कभी समाधानों की बाढ़ में ऐसी लकीरें एकदम से कम भी होती जा रही थीं.

आखिरकार तय हुआ कि इस सवाल का समाधान करने के लिए कोई न कोई दिल्ली जाएगा ही जरूर और अगले दो-चार दिन में ही और मुमकिन हुआ तो आज शाम या बहुत ज्यादा हुआ तो कल. क्योंकि अब ज्यादा देरी करना उचित नहीं है. जनता पार्टी और दमकिपा और दीगर जातिवादी पार्टिंयां तो जुटी ही रहती हैं कि मौका मिले, और चांप दें पूर्वांचल, पार्टी और देश को. 

त्रिपाठी ने इन विरोधी पार्टियों की माता-बहन पर एक मोटा परचा काटते हुए भर्त्सना की शैली में खंखारा और एक कर्रा थूक का बंडल बाहर सड़क की ओर उछाल दिया. वह तो यह युवक सतर्क था, सो बच गया। हालांकि हल्की छीटें कान के आसपास महसूस हुईं, जिसे उसने सावधानी से अपने उल्टे हाथ से पोंछ लिया, लेकिन अब तक उसके मन-मस्तिष्क में त्रिपाठी-दारोगा के प्रति असीमित सम्मान बढ़ गया.

लेकिन दिल्ली-प्रस्थान की योजना के इस फैसले से ही मामला झंझट में फंस गया. सवाल उठा कि इस मुर्गे के साथ और उसके खर्चे पर कौन मजा लूटने दिल्ली जाएगा. चूंकि यह विवाद इन-हाउस और क्लोज-डोर ही होना चाहिए. इसलिए इशारे में ही झगड़े को मुल्तवी करने के लिए त्रिपाठी ने उससे पूछा कि वह दारू-शारू का सेवन करता है या नहीं और यह कहते ही त्रिपाठी ने अपने हाथ अपनी जेब की ओर बढ़ाया, लेकिन अब तक भावावेश के उबाल से सराबोर आजमगढ़ी युवक ने लपक कर उनके हाथ को रोका और यह सेवा खुद करने की जिद की. यह दीगर बात है कि इस क्रम में इस युवक की आंखों में आंसू आ गये. उसे यकीन हो गया कि हो न हो, त्रिपाठी जी और दारोगा जी ही उसके असली तारण-कार हैं, जो सीधे देवलोक से केवल उसके लिए ही अवतार किये हैं. त्रिपाठी ने उसकी आंखों में अश्रुओं को भांप लिया और कुर्सी पर बैठे-बैठे पूरी शालीनता और आत्मीयता के साथ उसे गले लगा लिया. हां, हां, युवक की जिद भी मान ली गयी.

इसके बाद ओल्ड मॉंक की पूरी पांच बोतलें मंगायी गयीं. कई दर्जन अंडों की आहुति इस श्राद्ध में हुई. उद्यापन के तौर पर कई प्लेट बिरयानी, टांग वाले मुर्गे, चंद किलो मछली और सलाद के कई बर्तन खाली गये. आखिर कई पत्रकार भी इस महाभोज में आमंत्रित किये गये थे.

अरे हां, उस दारू-मुर्ग-भोज में भी वह भी मौजूद थे. जी हां, वह संपादक भी, जो दिल्ली-फ्राम-फैजाबादी-वाया-लखनऊ है.

हां, उस रात “सरकाय ल्यौ खटिया जाड़े लगै” वाला हादसा होने से बच गया क्योंकि वह दुबला-पतला आजमगढ़ी चेचकमुंही युवक उस संपादक को रास नहीं आया और इस तरह आजमगढ़-पूर्वांचल की आन-बान-शान पर धब्बा नहीं लग सका.

लेखक कुमार सौवीर यूपी के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

उत्तराखंड में पत्रकारों की बेकदरी

उत्तराखंड ही देश का शायद ऐसा राज्य होगा, जहां का सूचना महानिदेशक अपनी तैनाती से लेकर आज तक किसी भी पत्रकार को नहीं मिला होगा और न ही उसने किसी पत्रकार का फोन उठाया होगा.  उत्तराखंड में सूचना महानिदेशक आर. मिनाक्षी सुंदरम एक ऐसे सूचना महानिदेशक है, जिनके पास मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण में वीसी के पद सहित सिडकुल जैसे महत्वपूर्ण विभाग हैं. वहीं दूसरी तरफ इसी विभाग के सचिव बंसीधर तिवारी को भी सूचना विभाग का ओएसडी बना दिया गया है. 

ये दोनों ही अधिकारी राज्य के पत्रकारों से इस तरह पेश आते हैं, जैसे की वे एमडीडीए के ठेकेदार हों. अपनी तैनाती से लेकर आज तक वे सूचना निदेशालय में बैठने के बजाय सूचना निदेशालय को मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण के कार्यालय से चला रहे हैं. जिससे राज्य के पत्रकारों में रोष है. कुछ चुनिंदा तथाकथित पत्रकार जो एमडीडीए की दलाली करते हैं, वे जरूर इनके आस-पास मंडराते नजर आते हैं, लेकिन एक कर्तव्य निष्ठ पत्रकार इनसे बात करना भी पसंद नहीं करता. 

सूचना निदेशालय के कुछ अधिकारियों की अंगुली पर नाचने वाले ये दोनों अधिकारी पत्रकारों को दोयम दर्जे का नागरिक समझते हैं. खबरों के अनुसार महानिदेशक आर. मिनाक्षी सुंदरम बीते कुछ दिन पूर्व मुख्यमंत्री के पास इसलिए गए कि वे सूचना महानिदेशक का पद छोड़ना चाहते थे, लेकिन मुख्यमंत्री ने उन्हें यह लताड़ कर भगा दिया कि मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण और सिडकुल जैसे विभाग के साथ आपको सूचना निदेशालय इसलिए दिया गया है, ताकि आप मीडिया पर काबू रख सको, लेकिन आप तो मैदान छोड़कर भाग रहे हो.

लेखक राजेन्द्र जोशी उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क rajendrajoshiua@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

के.पी सिंह ने दिया जागरण से इस्तीफा, जीएम डीके शर्मा बने प्रकाशक और मुद्रक

वरिष्ठ पत्रकार के.पी सिंह ने दैनिक जागरण (पंजाब) के गुरदासपुर जिला मुख्यालय से इस्तीफा दे दिया है. के.पी सिंह यहां बतौर वरिष्ठ रिपोर्टर कार्यरत थे. के.पी सिंह पिछले 14 वर्षों से दैनिक जागरण (पंजाब) से जुड़े हुए थे. फिलहाल उनके इस्तीफा देने की वजह का पता नहीं चल पाया है. 
खबर ये भी है कि आने वाले कुछ दिनों में जागरण जालंधर में कुछ और विकेट गिर सकते हैं. वहीं दूसरी तरफ इसी संस्थान के महाप्रबंधक निशिकांत ठाकुर के रिटायर होने के बाद जालंधर के वरिष्ठ जीएम डी.के शर्मा को प्रकाशक और मुद्रक का नाम दिया गया है. पंजाब से प्रकाशित होने वाले पंजाबी जागरण के जीएम नीरज शर्मा को दैनिक जागरण पंजाब के जीएम का पदभार भी सौंप दिया गया है. 

पीआरओ ने दी जान…!

बीते रविवार 5 जनवरी को तापमान करीब 5.5 डिग्री था. कड़ाके की इस ठंड में एक खबर ने अजमेर के पीआरओ साब माफ कीजिएगा असिस्टेंट डायरेक्टर, पब्लिक रिलेशन ऑफिसर के पसीने छुड़ा दिए. फोन पर फोन आए जा रहे थे और पीआरओ साहब सबको सफाई दिए चले जा रहे थे. 

गफलत हुई एक लोकल केबल चैनल से. उसने एक खबर चला दी जिसका स्क्रोल रोल था, ‘पीआरओ ने दी जान’, हैडिंग के बाद किसी को समझाने की जरूरत नहीं थी कि पता नहीं कैसे क्या हालात हो गए कि बेचारे पीआरओ को आत्म हत्या करनी पड़ गई. इसी शहर में पला-बड़ा, पढ़ा-पत्रकार बना, एपीआरओ बना और उसी कुर्सी पर एपीआरओ बना रहा, पीआरओ बना और उसी कुर्सी पर पीआरओ बना रहा, डिप्टी डायरेक्टर बना और उसी कुर्सी पर डिप्टी डायरेक्टर बना रहा, असिस्टेंट डायरेक्टर बना और उसी कुर्सी पर असिस्टेंट डायरेक्टर बना रहा.

मोहनलाल सुखाडिया, हरिदेव जोशी, माथुर, अशोक गहलोत, वसुंधरा राजे जैसे कई मुख्यमंत्री, उनके जनसंपर्क मंत्री, अजमेर के कलेक्टर, सांसद, विधायक आए और गए. पीआरओ उसी कुर्सी पर जमे रहे फिर ऐसा क्या हो गया कि जान दे दी. जिंदगी में जो ले सकते थे लिया, जो पा सकते थे पाया, जो मिल सकता था मिला. फिर ऐसा क्या हुआ कि जान दे दी. किसी के समझ में नहीं आया. मोबाइल की घंटियां घनघना उठीं. इधर एक और नई मुसीबत. जिला कलेक्टर ने बुलाकर ठंड के कारण स्कूलों में छुट्टी की खबर थमा दी.

साथ ही हिदायत दी कि सब अखबारों में छपनी चाहिए वरना कल सुबह बच्चे और उनके मां-बाप परेशान होंगे. रविवार का दिन था. छुट्टी के दिन प्रेस नोट निकालते नहीं हैं. सो बेचारे खुद लगे पत्रकारों को फोन पर खबर बताने. पत्रकार लोग खबर लें बाद में हाल-चाल पूछें पहले. चलो पत्रकारों को तो बात समझ में आ गई. रिशतेदारों और सरकारी अफसरों को समझाना भारी पड़ गया. एक-एक को केबल न्यूज चैनल की तकनीक समझाई. बताया कि चैनल को लिखना था, ‘पीआरओ ने दी जानकारी’ और चैनल सिर्फ इतना ही लिखकर रह गया कि, ‘पीआरओ ने दी जान’.  

लेखक राजेंद्र हाड़ा राजस्थान के मीडिया विश्लेषक हैं. उनसे संपर्क 09549155160 या 09829270160  के जरिए किया जा सकता है.

श्री न्यूज की छवि खराब करने के लिए फैलाई जा रही हैं अफवाहें

प्रिय यशवन्त जी, 
नमस्कार मैं भी श्री न्यूज से जुड़ा हुआ हूं श्री न्यूज के बारे में आप के द्वारा प्रकाशित समाचार मैंने पढ़ा जिसको पढ़कर मैं काफी आहत हुआ. श्री न्यूज अपने सारे स्ट्रिंगरो के साथ सदैव अच्छा व्यवहार करता है और उनकी समस्याओं का समाधान भी करता है. मैं आपको बता दूं की संस्थान से निकाले गये लोगों के द्वारा यह भ्रामक खबरें प्रकाशित करवायी जा रही हैं.
ये जो लोग इसमें शामिल हैं वो संस्थान के हित में काम नहीं कर रहे थे उनके गलत आचरण के कारण उनको संस्थान ने उन्हें बाहर निकाला है. 
श्री न्यूज लगातार सही लोगों के आगे बढ़ाने का काम करता आया है और जो लोग यह बात कह रहे कि संस्थान लोकसभा चुनाव से पहले बंद हो सकता है उनको मैं बताना चाहता हूं कि श्री न्यूज अपने कई और नये रीजनल चैनल लाने की तैयारी में है बस जल्द ही अफवाह फैलाने वाले लोगों के मुह में ताला लग जायेगा.
वहीं दूसरी तरफ श्री न्यूज के सारे ब्यूरो ऑफिस युद्ध स्तर पर अपना काम कर रहे हैं. अभी संस्थान अपने कई और ब्यरो ऑफिस का विस्तार भी करने जा रहा है. मैं आपको बता दूं कि जिन लोगों को संस्थान से बाहर निकाला गया है यह उनका ही षड्यंत्र है. यशवन्त जी आपसे से निवेदन है कि खबर की पुष्टी करके ही उसे प्रकाशित किया करिये. 
 
धन्यवाद 
अनुपम कुमार (श्री न्यूज)
anupammishra.mishra80@gmail.com
 

उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन का गठन, हेम भट्ट बने अध्यक्ष और वीरेंद्र बिष्ट बने महासचिव

नैनीताल : उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की नैनीताल नगर इकाई का 5 जनवरी 2014 को विधिवत तरीके से गठन हो गया है. इस यूनियन का गठन उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की नैनीताल नगर इकाई के पूर्व नगर अध्यक्ष श्री माधव पालीवाल की अध्यक्षता में हुई बैठक के दौरान किया गया.
बैठक में पर्यवेक्षक तथा चुनाव अधिकारी के रूप में जाने-माने रंगकर्मी जहूर आलम मौजूद रहे. बैठक में समाचार पल्स के संवाददाता हेम भट्ट को अध्यक्ष और साधना न्यूज के संवाददाता वीरेंद्र बिष्ट को सर्वसम्मति उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की नैनीताल नगर इकाई का महासचिव चुना गया.
उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के वरिष्ठ सहयोगी एवं दैनिक जागरण के संवाददाता किशोर जोशी यूनियन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष चुने गए. जबकि जैन टीवी के रिपोर्टर विनोद कुमार (उपाध्यक्ष), जी न्यूज के रिपोर्टर राजू पाण्डे एवं धर्मा चंदेल (सचिव) और के. न्यूज के संवाददाता सुनील बोरा सर्वानुमति से कोषाध्यक्ष निर्वाचित हुए.
दैनिक जनमोर्चा के संवाददाता ललित जोशी, इंद्र सिंह नेगी, स्वतंत्र पत्रकार संजय नागपाल एवं सहारा समय के संवाददाता हेमंत रावत को नैनीताल नगर इकाई की ओर से यूनियन का जिला पार्षद चुना गया.
उत्तराखंड के वरिष्ठ रंगकर्मी जहूर आलम को सर्वसम्मति से उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की नैनीताल नगर इकाई का संरक्षक चुना गया. बैठक में यूनियन के वरिष्ठ सदस्य रविन्द्र देवलियाल, के. एस. देव समेत नगर के अनेक वरिष्ठ पत्रकारों के साथ उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन के प्रांतीय महासचिव प्रयाग पांडे भी मौजूद थे.  
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सहरसा में नाट्य निर्देशक आरटी राजन की पुण्यतिथि पर रंगकर्मियों का समागम

शशि सरोजनी रंगमंच सेवा संस्थान के तत्वाधान में शनिवार को सुपर बाजार, सहरसा के प्रांगण में नाट्य निर्देशक आरटी राजन की पुण्यतिथि पर आयोजित स्मृति समारोह का उद्घाटन वरिष्ठ संस्कृतिकर्मी एवं संपादक: रंग अभियान, डॉ. अनिल पतंग ने दीप प्रज्जवलित कर किया. 
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए डॉ. पतंग ने कहा कि दिवंगत राजन अपने और अपने परिवार के लिए तो कुछ नहीं किया लेकिन देश व समाज में रंगमंच के मामले में बड़े ही धनी माने जाते थे. उनके कृतित्व को आज भी लोग याद करते है. सभी अतिथियों को पाग व चादर से सम्मानित किया गया. उपस्थित अतिथियों व रंगकर्मियों ने नाट्य निर्देशक राजन के तस्वीर पर पुष्प अर्पित कर श्रद्धांजलि दी. 
वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. हरिशंकर श्रीवास्तव ‘शलभ‘ के अध्यक्षता में आयोजित समारोह में मुख्य अतिथि संस्थान के संरक्षक अधिवक्ता अशोक कुमार वर्मा, बिहार के प्रगतिशील लेखक संघ के प्रदेश प्रवक्ता अरविंद श्रीवास्तव, वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार सिंह, जदयू महिला प्रकोष्ठ के प्रदेश महासचिव स्मिता सिन्हा, वाटिका युवा क्लब के अध्यक्ष अनिल मिश्रा ने समारोह को संबोधित किया.
संस्थान के सचिव वन्दन कुमार वर्मा ने आगत अतिथियों का स्वागत करते हुए दिवंगत राजन के व्यक्तित्व व कृतित्व पर प्रकाश डाला. 
इस अवसर पर संस्थान के नन्हें-मुन्ने कलाकार शिल्पी, अदिति, अनु, कशिश, हंसिका, निशा, रिया, रिधि नंदनी, शाल्वी, रिधि, समीक्षा ने लोक नृत्य की प्रस्तुति से स्व. राजन को श्रद्धांजलि दी.
वहीं कुन्दन कुमार वर्मा के निर्देशन में संस्थान के मदन मोहन माधव, रौशन, सुमन, अमनेश, बंटी, प्रितम, अभिषेक, अखिलेश, प्रताप व आशिष ने श्रीकांत लिखित नाटक ‘मै बिहार हूं‘, जन संस्कृति मंच की नाट्य इकाई, रंगनायक, बेगुसराय के रंगकर्मी दीपक सिन्हा के निर्देशन में ‘माईकल जैक्सन की टोपी‘ व मिथलेश राय, स्नातक, राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली के निर्देशन में भरत नाट्य कला केन्द्र, पूर्णियां के रंगकर्मियों ने आरटी राजन लिखित नाटक ‘बोलो सियाराम जी हरि’ का मंचन किया. 
इसके बाद कन्हैया सिंह कन्हैया ने अपने गीतों व गजलों से समा बांध दिया तथा नाल पर मुकेश कुमार झा ने संगत किया. उद्घाटनकर्ता डॉ. पतंग एवं अरविंद श्रीवास्तव ने बेगूसराय व पूर्णियां के रंगकर्मियों को अंगवस्त्र एवं प्रशस्ति-पत्र प्रदान कर सम्मानित किया.
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में चले कवि गोष्ठी में युवा कवि कुमारी अमृता चैहान, शिंकु कुमार, मुकेश मिलन, नीरस झा निरंजन, आदि ने अपने-अपने कविताओं के माध्यम से दिवंगत राजन को श्रद्धांजलि दी. इस अवसर पर डॉ. बीके यादव, डॉ. बबन कुमार सिंह, वरिष्ठ रंगकर्मी रणजीत राणा, राजन कुमार, अभय कुमार मनोज, अमित सिंह जय जय, आदि उपस्थित थे.
धन्यवाद ज्ञापन संस्थान के मीडिया प्रभारी साकेत कुमार ने किया. समारोह को सफल बनाने में चन्द्र किरण रीना, डॉ. प्रियंका यादव, सोनू कुमार, आलोक कुमार, जितेन्द्र पासवान, राधव, अमृष, मनोज भारद्वाज, प्रिया कुमारी, मणीकांत कुमार, मुकेश कुमार, सोनू पाठक, किशन ठाकुर, करूण, प्रताप आदि ने भरपूर सहयोग किया.
 
अरविंद श्रीवास्तव 
मधेपुरा (बिहार)
09431080862

आई नेक्स्ट का पटना किला भी हुआ ध्वस्त

आई नेक्स्ट के 13 एडीशन में से पटना ही एक ऐसा किला था जो पिछले पांच साल तक सुरक्षित था, लेकिन वह भी पिछले साल ध्वस्त हो गया. यहां एक के बाद एक 11 लोगों ने आई नेक्स्ट को अलविदा कह दिया.
इसकी शुरूआत सब एडीटर पारुल प्रसून से हुई. लांचिंग के बाद से रवि प्रकाश के इंचार्ज रहने तक आई नेक्स्ट में टीम बनी रही, लेकिन उसके बाद के अधिकारी टीम को टूटने से नहीं रोक पाएं.
रिपोर्टर से सब एडीटर बने पवन प्रकाश ने दैनिक भास्कर ज्वाइन किया. रिपोर्टिंग में सबसे मजबूत पीलर थे सुधीर. उन्होंने भी हिन्दुस्तान ज्वाइन कर लिया है. सुधीर की स्पोर्टस और आर्थिक बीट में मजबूत पकड़ है. बीते दिनों उन्हें रेल की जिम्मेवारी दी गई थी. तब उन्होंने कई खबरें ब्रेक की थी.
जब आई नेक्स्ट में कोई मामला फंसता तो सुधीर को ही पूरा करने के लिए दिया जाता था और वे उसे बखूबी पूरा करते थे. पवन और सुधीर के झटके से आई नेक्स्ट उबरा नहीं था कि रिंकू झा ने प्रभात खबर का दामन थाम लिया. रिंकू लोअर एजुकेशन में मजबूत मानी जाती थी. इंचार्ज से उनके मतभेद की बातें हमेशा सामने आती थी. तीनों के जाने के बाद रिपोर्टिंग में एक मात्र पुराने आदमी शशी रमण बच गए हैं.
वे भी हिन्दुस्तान, दैनिक भास्कर में चक्कर काटने के बाद प्रभात खबर में जुगाड़ लगाने की कोशिश कर रहे हैं. इससे पूर्व आई नेक्स्ट के सभी एडीशन में टीम बहुत पहले ही टूट चुकी थी. आई नेक्स्ट पटना से अबतक सब एडीटर पारुल प्रसून, फोटोग्राफर मनीष सिन्हा, शैलेंद्र कुमार, सब एडीटर पवन प्रकाश, रिपोर्टर सुधीर कुमार, रिंकू झा और ले आउट आर्टिस्ट मनोज जा चुके हैं. 
नए लोग उनकी कमी पूरी कर पाने में अभी तक सफल नहीं हो पा रहे हैं. टीम टूटने की पीछे आई नेक्स्ट के नंबर दो अधिकारी के रूखे व्यवहार और पक्षपात करने की बातें सामने आ रही हैं.
                     
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26 श्रमिक संगठनों की प्रबंधन से मांग, लोकमत के सभी 61 कर्मचारियों को काम पर बिना शर्त वापस लें

नागपुर शहर के विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत 26 श्रमिक संगठनों ने लोकमत प्रबंधन से लोकमत पत्र समूह की सेवा से गैराकानूनी तरीके से हटाए गए 61 पत्रकार/गैर-पत्रकारों को बिना शर्त काम पर वापस लेने की मांग की है.
श्रमिक संगठनों की हाल में हुई एक बैठक में इस कार्रवाई के लिए प्रबंधन की कड़े शब्दों में निंदा की गई और इस आशय का एक प्रस्ताव भी पारित किया गया. प्रस्ताव में केंद्रीय-राज्य सरकार के कर्मियों, ऑटोचालक, रिक्शा चालक और हॉकर्स संगठनों के प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर हैं.
बैठक में उपस्थित सभी 26 संगठनों के प्रतिनिधियों ने प्रस्ताव में कहा है कि लोकमत पत्र समूह के कर्मचारी अपनी न्यायिक मांगों को लेकर पिछले कई सालों से शांतिपूर्वक आंदोलन कर रहे हैं. इनमें पालेकर अवार्ड से लेकर तो मजीठिया अवार्ड तक की सभी सिफारिशों को लागू करने, समान काम के लिए समान वेतन देने, वर्षों से ठेके पर कार्यरत कर्मचारियों को नियमित और स्थायी करने की मांगें शामिल हैं.
स्पष्ट है कि प्रबंधन ने इन मांगों को लेकर कर्मचारियों के शांतिपूर्ण आंदोलन से चिढ़कर ही इस तरह की कड़ी कार्रवाई की है.
प्रस्ताव में लोकमत श्रमिक संगठन पर अवैध रूप से कब्जा करने की प्रबंधन की कार्रवाई की भी कड़े शब्दों में निंदा की गई है. इसके तहत लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई कार्यकारिणी को हटाकर नई फर्जी कार्यकारी समिति थोप दी गई.
प्रस्ताव में लोकमत प्रबंधन की इस कार्रवाई को न्याय के लिए संघर्ष कर रहे आम आदमी की आवाज को बंद करने की कार्रवाई निरूपित किया गया है और कहा गया है कि यह ऐसे समय हुआ है जब लोकमत पत्र समूह के दोनों प्रमुख मालिक संसद और राज्य विधानसभा  में जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं और जनता की आवाज बने बैठे हैं.
प्रस्ताव में 26 संगठनों के प्रतिनिधियों ने सभी 61 पत्रकारों/गैर-पत्रकारों को अतिशीघ्र काम पर बिना शर्त वापस नहीं लेने पर आगे तीव्र आंदोलन की चेतावनी भी दी है.
                                                            
अशोक थूल (अध्यक्ष)
गुरप्रीत सिंह (सचिव)
 

श्री न्यूज का हाल बेहाल, ऑफिस का किराया देना तक हुआ मुश्किल

श्री न्यूज के सितारे इन दिनों गर्दिश में चल रहे हैं. जहां एक तरफ चैनल में काम कर रहे लोगों को सैलरी समय से नहीं मिल रही है तो वहीं दूसरी तरफ इस चैनल के देहरादून ब्यूरो के ऑफिस का किराया ६ महीने से नहीं दिया गया है.

ऑफिस में लगी गाड़ियां ४ महीने पहले हटा ली गयी थी, लेकिन अभी तक ट्रैवल वाले का हिसाब नहीं किया गया है. सैलरी भी २ महीने में एक बार आती है वो भी काफी फोन करने के बाद. उत्तराखंड के रिपोर्टरों का लगभग १० महीनों से भुगतान नहीं हुआ. सब परेशान हैं लेकिन मेनेजमेंट को कोई फर्क नहीं पड़ रहा है. 

देहरादून के रिपोर्टर खुद ही ऑफिस का खर्चा उठा रहें हैं. इस कारण कई लोग चैनल्स से विदाई ले चुके हैं, बांकी जो बचे हैं वो परेशान हैं और नई नौकरी की तलाश मे हैं. लगभग ६ महीने पहले ब्यूरो चीफ रमन ममगाईं के बाद अब कैमरामैन तारा जोशी ने भी इस्तीफा दे दिया है. मैनेजमेंट द्वारा उत्तराखंड के रिपोर्टरों पर विज्ञापन का दवाब डाला जा रहा है. रिपोर्टरों का कहना है कि जब चैनल देहरादून के अलावा कहीं दिखता ही नहीं तो विज्ञापन कौन देगा.

देहरादून से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

समाजसेविका डॉ. नूतन ने केजरीवाल से पूछा सरकारी प्रेस कांफ्रेंस में कुमार विश्वास का क्या काम ?

लखनऊ की एक सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को 1992 बैच के आईएएस अधिकारी विजय कुमार, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, दिल्ली जल बोर्ड द्वारा स्थापित शासकीय नीति और व्यवस्था के विरुद्ध शासकीय कार्यों में राजनैतिक व्यक्तियों को सम्मिलित किये जाने के संबंध में जांच करा कर उत्तरदायित्व निर्धारित करने का निवेदन किया है.
केजरीवाल को पत्र लिखकर डॉ. नूतन ने कहा है कि, 30 दिसंबर 2013 को दिल्लीवासियों को निशुल्क पानी दिए जाने की सरकारी घोषणा के समय विजय कुमार ने आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास को भी अपने साथ रखा था. एक गैर-सरकारी व्यक्ति के रूप में कुमार विश्वास को सरकारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्थान देने और अपनी भाव-भंगिमा से उनकी उपस्थिति को अत्यंत वांछनीय दिखने के लिए विजय कुमार पूर्णतया उत्तरदायी हैं, क्योंकि उनकी नियुक्ति सरकार गठन के तत्काल बाद आनन-फानन में हुई थी. अतः यह आवश्यक है कि इस मामले की तत्काल किसी उच्च अधिकारी से जांच करा कर यमसंगत कार्यवाही कराई जाए ताकि यह संदेश ना जाए कि विजय कुमार के मुख्यमंत्री के “पसंद के अधिकारी” होने के नाते उन पर अलग नियम लागू होते हैं.
 
डॉ. नूतन ठाकुर द्वारा अरविंद केजरीवाल को भेजा गया पत्र- 
 
सेवा में,
श्री अरविंद केजरीवाल,
मुख्यमंत्री,
नई दिल्ली 
 
विषय- 1992 बैच के आईएएस अधिकारी श्री विजय कुमार, वर्तमान में मुख्य कार्यकारी अधिकारी, दिल्ली जल बोर्ड द्वारा शासकीय कार्यों में नियमविरुद्ध तरीके से राजनैतिक व्यक्तियों को सम्मिलित किये जाने विषयक    
महोदय,
       कृपया निवेदन है कि आपकी सरकार द्वारा दिनांक 30/12/2013 को दिल्ली वासियों को निशुल्क पानी दिए जाने के संबंध में कतिपय घोषणाएं की गयीं. ये घोषणाएं आपके आवास पर वर्तमान मुख्य कार्यकारी अधिकारी, दिल्ली जल बोर्ड जल श्री विजय कुमार द्वारा की गयीं.
लेकिन श्री विजय कुमार ने आपके आवास के बाहर किये जा रहे अत्यंत महत्वपूर्ण शासकीय घोषणा के दौरान श्री कुमार विश्वास, नेता, आम आदमी पार्टी को भी अपने साथ रखा था जो श्री विजय कुमार के ठीक बगल में बैठे थे और इस पूरे कार्यक्रम के दौरान श्री विजय कुमार के साथ थे. आप सहमत होंगे कि श्री विजय कुमार द्वारा एक शासकीय घोषणा का प्रेस कॉन्फ्रेंस पूर्णतः शासकीय कार्यक्रम है. मेरी जानकारी के अनुसार वर्तमान में श्री कुमार विश्वास किसी शासकीय पद पर नहीं हैं, यद्यपि कल को आपकी सरकार द्वारा उनकी नियुक्ति किसी पद पर भले की जा सकती है.
ऐसे में श्री विजय कुमार द्वारा अपने साथ श्री कुमार विश्वास को एक शासकीय प्रेस कॉन्फ्रेंस में बैठाना मेरी जानकारी में एक ऐसी घटना है जैसा अत्यंत विरले होता है कि शासकीय प्रेस कॉन्फ्रेंस में सम्बंधित अधिकारी ने सरकार के बाहर के एक राजनैतिक व्यक्ति को अपने साथ स्थान दिया हो.
श्री कुमार विश्वास आज की तारीख में एक गैर-सरकारी व्यक्ति हैं और जाहिर है कि यदि शासकीय अधिकारियों द्वारा अनुमति मिले अथवा अनुरोध किया जाए तो वे कहीं भी सहर्ष उपस्थित हो जायेंगे, चाहे वह अत्यंत गोपनीय शासकीय मीटिंग हो अथवा कोई शासकीय प्रेस कॉन्फ्रेंस.
अतः यदि कोई व्यक्ति इस पूरे घटनाक्रम के लिए उत्तरदायी हैं तो वे आपकी सरकार के अधिकारी श्री विजय कुमार हैं जिन्होंने श्री कुमार विशवस के साथ इस अत्यंत महत्वपूर्ण प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंच साझा ही नहीं किया, बार-बार अपनी भाव-भंगिमा से यह स्पष्ट सन्देश भी दिया कि श्री कुमार विश्वास की उपस्थिति से वे उपकृत्य हैं और उनकी उपस्थिति अत्यंत वांछनीय है.
श्री विजय कुमार 1992 बैच के आईएएस अधिकारी हैं और आपके द्वारा सरकार गठन के तत्काल बाद ही उन्हें बोर्ड का मुख्य कार्यकारी अधिकारी नियुक्त किया गया था. यह नियुक्ति सरकार गठन के मात्र एक-दो दिनों के अन्दर की गयी थी जब आपने पद संभालते ही कतिपय आईएएस अधिकारियों की आनन-फानन में नियुक्ति की. अतः इस रूप में स्पष्ट है कि श्री विजय कुमार आपकी “पसंद के अधिकारी” हैं. आप सहमत होंगे कि शासकीय दायित्वों में व्यक्तिगत पसंद और नापसन्दी के लिए कोई स्थान नहीं होता है बल्कि मात्र नीतियाँ और क़ानून ही सबों को संचालित करते हैं.
ऐसे में जब आपके द्वारा अत्यंत उच्च आदर्शों के आधार पर जनता का मत प्राप्त किया गया है तो आपसे यह निश्चित रूप से अपेक्षा की जायेगी कि आप निरंतर उन आदर्शों का निर्हवान करेंगे. अतः आपसे निवेदन है कि व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से ऊपर उठ कर शासकीय नीति, रीति तथा व्यवस्था के विरुद्ध श्री विजय कुमार द्वारा अत्यंत महत्वपूर्ण शासकीय प्रेस कॉन्फ्रेंस में एक राजनैतिक व्यक्ति को बैठाने और इसके माध्यम से जनमानस में गलत सन्देश देने और स्थापित शासकीय व्यवस्था का उल्लंघन किये जाने के सम्बन्ध में किसी वरिष्ठ अधिकारी से जांच करा कर जांच आख्या में दोषी पाए जाने की दशा में नियमानुसार उनका उत्तरदायित्व निर्धारित करने की कृपा करें जाए ताकि यह संदेश ना जाए कि विजय कुमार के मुख्यमंत्री के “पसंद के अधिकारी” होने के नाते उन पर अलग नियम लागू होते हैं.
 
पत्र संख्या- NT/Delhi/VK                                                                          भवदीय
दिनांक-04/01/2014
डॉ. नूतन ठाकुर                                                                                               5/426,विराम खंड,
गोमती नगर, लखनऊ
094155-34525

इमर्जेंसी को समझने के लिए “नसबंदी” या “कटरा बी आर्जू” बांच लीजिए

न संजय, न विचार, न मंच, यानी लुटियाचोरों की पौ-बारह यादों के कब्रिस्तान में सड़ांध मारता संजय-मेनका का धंधा लुच्चा कांग्रेसियों का लै-मार संगठन था संजय विचार मंच किसी भी चुनाव के रंगारंग मौके पर यादों के कब्रिस्तान से संजय विचार मंच जैसी सड़ी-गली और बेतरह दुर्गंध फैलाती लाश की याद आ ही आती है. वजह यह कि पिछले 35 बरसों के बीच के राजनीति-अखाड़ा में इतना कोई बदबूदार संगठन नहीं मिला है, जितना संजय विचार मंच.

वाकई बेमिसाल था यह मंच, जहां न तो कोई विचार थे और न कोई मंच-फंच. लेकिन देश के अधिकांश और खासकर हिन्दी-बेल्ट में तो गली-गली में संजय विचार मंच के बोर्ड ही लग गये थे. देश के जितने भी लुम्पेन-एलीमेंट्स थे, संजय विचार मंच के पदाधिकारी बन गये. यह मंच सिर्फ पदाधिकारियों का था, कार्यकर्ताओं का नहीं. वार्ड स्तर तक कार्यकारिणी हुआ करती थीं, जिसमें इंदिरा-संजय-मेनका के बाद किसी लै-मार दबंग नेता को क्षेत्रीय संरक्षक बनाने के बाद अपनी पूरी टोली को पदाधिकारी मनोनीत किया जाता था.

इमरजेंसी में इसी टोली ने अराजकता का पूरा खुला नंगा नाच किया. परिवार-नियोजन के नाम पर किशोरों से लेकर कब्र पर पांव लटकाये बुजुर्गों तक की नसबंदी करायी थी संजय-टोली ने. विरोधियों को बधिया करने के लिए भी नसबंदी तक को औजार बनाया गया और उन्हें तहस-नहस करने के लिए जेलों में अभूतपूर्व प्रताड़ना का दौर चला. आप अगर उस इमर्जेंसी को समझना चाहें तो आईएस जौहर की फिल्म “नसबंदी” देख लीजिए अथवा विरोधियों को तबाह करने की साजिशों-करतूतों को समझने के लिए राही मासूम रजा का लघु-उपन्यास “कटरा बी आर्जू” बांच लीजिए. हां, संजय ने सहजन और यूकेलिप्टस का सघन वृक्षारोपण जरूर कराया.

दरअसल हकीकत तो यह थी कि संजय के पास जब कोई विचार था ही नहीं, तो उनके विचार के किसी मंच का औचित्य ही क्या था, लेकिन जब कोई न कोई दूकान खोलनी ही थी, तो संजय विचार मंच जैसा कोई आकर्षक शटर तो दिखना ही चाहिए.

लाखैरा टाइप समर्थकों के पापी पेट का सवाल भी तो था, जिनमें भुनी-तली मछलियों का मदिरा-इक्वेरियम किलोल नियमित होता रहे. इसी बीच अचानक इन सक्रिय-निष्ठावान-समर्पित पदाधिकारियों की किस्मत से छींका फूटा और इंदिरा गांधी का नूर-ए-चश्म यानी लाडला बेटा संजय गांधी सफदरजंग एयरपोर्ट पर एक हवाई दुर्घटना में मारा गया. जाहिर है कि पूरा गांधी कुनबा के लिए यह हादसा अब तक का सबसे बड़ा झटका था. इंदिराजी ने अपने संयम और क्षमता का परिचय देते हुए राजीव गांधी को पायलेट की नौकरी छुड़वा कर कांग्रेस का महासचिव बना दिया और देश-कांग्रेस को सम्भालने के अपने नारे-संकल्प को साकार करना शुरू कर दिया.

इधर तो यह चल रहा था, उधर संजय की संहारक-टोली अपने द्रव्य‍—भोजन की जुगत में भिड़ी थी. इन्हें पदाधिकारियों ने समय भांप लिया. वे समझ गये कि संजय गांधी की मौत से आहत इंदिरा-राजीव समेत पूरे परिवार की सिम्पेथी पैसों की बारिश करवा सकती थी. इन पदाधिकारियों को इसके लिए मेनका गांधी के आंसुओं को पोंछने का प्रदर्शन ज्यादातर संजय-कार्यकर्ताओं को मुफीद लगा. इंदिरा गांधी के लाड़ले के लुच्चे समर्थकों की पूरी की पूरी टोली मौजूद थी ही, जो येन-केन-प्रकारेण द्रव्य-भोजन पर जिन्दा थे.

नतीजा, संजय विचार मंच की कार्यकारिणी की कई-कई शाखाएं गली-कूचों में विस्तार पा गयीं. मकसद रहा कि सिर्फ और सिर्फ उगाही. कैसे भी हो, बस उगाहो. जो भी मिले, ले उड़ो और मौज उड़ाओ. हां, इस मंच के जो हम्पी-डम्पी सेट ऑन अ वाल जैसे बड़े नेता तो राष्ट्रीय स्तर पर धंधा चमका रहे थे, लेकिन प्रदेश स्तरीय नेताओं का जीवन हमेशा की ही तरह केवल नियमित तौर पर बोतल और भोजन तक ही सीमित रहा.

तो आइये, यूपी की हालत पर चर्चा कर ली जाए. यूपी वाले अकबर अहमद डम्पी संजय के दोस्त थे. संजय ने अपने विचार मंच को लखनऊ के दारूलशफा में एक फ्लैट अलॉट करा दिया था. बहराइच वाले दारोगा सिंह इस मंच के अध्यक्ष बने और भीमकाय विनोद त्रिपाठी महामंत्री बन गये. इसके बाद तो यह दोनों ही लोगों ने खुद को अपने इन पदों से फेवीकोल के साथ चिपका लिया. ऐसे लोग ही तो ब्राह्मण-क्षत्रिय एकता का सबसे बड़ा आलाप होते हैं.

लेकिन हाय दैव-योग. इंदिरा जी ने इतालवी एयर-होस्टेस को अपने कलेजे से लिपटा लिया और सन पत्रिका की मालकिन को घूरे पर पटक दिया. संजय विचार मंच के लोगों ने भी मेनका और संजय विचार मंच से किनारा करने की जुगत भिड़ानी शुरू की. लेकिन अंदर तक फंसी फांस इतनी आसानी से कहां निकलती है भइया.  तो भइया, बदले हालातों में संजय विचार मंच और उसके मठाधीशों का भांडा फूटने लगा.

लेखक कुमार सौवीर लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

 

श्री न्यूज के एच.आर और स्ट्रिंगरो के बीच गाली-गलौज, साल भर से नहीं हुआ पेमेंट

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड बेस रीजनल न्यूज चैनल श्री न्यूज की हालत नए साल में और खराब होती दिख रही है. आलम ये है कि अब श्री न्यूज के एच.आर विभाग के लोग आये दिन फोन पर गालियां सुन रहे हैं. दरअसल हुआ ये है कि श्री न्यूज में पिछले अक्टूबर महीने के बाद से किसी को भी सेलरी नहीं दी गयी.
चैनल के स्ट्रिंगरो को जनवरी 2012 से पेमेंट नही हुआ है. स्ट्रिंगर जब डेस्क पर फोन करते हैं तो उसे ये कहा जाता है कि बस चेक तैयार है, अकाउंट में जाने वाला है, यही नहीं कुछ जिलों के स्ट्रिंगर अब लेबर कौर्ट में भी जाने कि तैयारी भी कर रहे हैं.
जिसका आधार उन लोगों ने बनाया है कि अकाउंट में आने वाला चेक और खबरों कि गयी स्क्रिप्ट, श्री न्यूज ने कुछ ब्यूरो आफिस बंद हो चुके हैं. जैसे गोरखपुर, कानपूर आदि. कुछ ऐसी ही हालत देहरादून के रिपोर्टर कि है.
यही नहीं श्री न्यूज ने इलाहबाद और वाराणसी में तो अपने पुराने रिपोर्टरो को हटाकर दोनों जगहों पर पुलिस रिकार्ड में दर्ज दलालों, मुखबिरों को रिपोर्टर बना कर रख दिया है. इन दोनों जिलो के पहले के रिपोर्टरो को  हटाने के लिए श्री न्यूज उनका तबादला एक महीने पहले नोयडा कर दिया था. इलाहबाद के रिपोर्टर सैयद ने तो रिजाइन दे कर अपना बकाया तीस हजार रुपया लड़-झगड़ कर एच.आर से लिया.
बनारस  का मामला एक थाने में विचाराधीन है, क्योंकि पुराने रिपोर्टर ने नोएडा जाने से पहले अपने बकाये कि रकम ९० हजार के बदले कैमरा अपने पास रख लिया था, लेकिन बीच में जब एच.आर ने थानेदार को भरोसा दिया तो पुराने रिपोर्टर बकाये मूल्य के बराबर कैमरे को थानेदार को दे दिया, क्योंकि थानेदार ने भरोसा दिलाया है कि उसका और कैमरा मैन का बकाया अगर एक हफ्ते में नहीं मिला तो थानेदार अपने यहां कंपनी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करेगा. उसके बाद कंपनी ने कैमरा नोएडा वापस मंगा लिया.
कुछ यही आलम आगरा और मेरठ ब्यूरो को भी है, यहां भी वार्निग दी गयी है कि हर महीने २ लाख का विज्ञापन दो नहीं तो इस्तीफा दे दो. लगभग ७ -८  महीने से किसी भी ब्यूरो में कन्वेंस नही भेजा गया है, ३- ४ महीने कि सैलरी सबकी बकाया है.
लखनऊ का आलम ये है कि जहां कभी ९ – १० रिपोर्टर हुआ करते थे वहा अब मात्र २ रिपोर्टर और ५ कैमरा मैन बचे है. मकान मालिक ने भी चैनल को नोटिस दे रखा है. यहां के भी इंचार्ज को विज्ञापन लाने के लिए दवाब डाला गया है. लखनऊ के आफिस में विज्ञापन हेड और रिपर्टरो में हर रोज बहस भी  हो रही है. नोएडा आफिस से भी दर्जनों लोगों  ने छोड़ा है, जिनको कही नौकरी नही मिल रही है वही केवल इस आशा में नौकरी कर रहे हैं कि सैलरी मिल जाय तो छोड़ दिया जाये.
यही नहीं नोएडा आफिस के स्टाफ जब पैसा मांगते है तब एच.आर कहता है कि रिजाइन दे दो ,और दो महीने बाद आकर पैसा ले जाओ.
लखनऊ से निकले रिपोर्टरो से तो एच.आर का गाली गलौज तक हो गयी है. श्री न्यूज में काम कर रहे सभी स्टाफ केवल सैलरी कि आशा लगाये बैठे हैं. चैनल के लोग इंतजार कर रहे हैं कि कब लोकसभा चुनाव की घोषणा हो और विज्ञापन मिले.
सूत्रों कि माने तो लोकसभा चुनाव के पहले ही ये चैनल बंद हो सकता है क्योंकि पिछले दो महीने से ये चैनल किसी भी जगह दिखायी भी नहीं दे रहा है. यही नहीं केवल चैनल बेबसाइट पर आ रहा है. डेस्क पर कोई ऊर्जावान नही रह गया है और न ही आउट पुट पर, बस रोज लोग दिन गिन रहे है और आफिस के लोग अपने एक आका कि शादी में व्यस्त है. चैनल के मालिक को कोई परवाह नही है , जिसकी वजह से आकाउंट और एच.आर के लोग जवाब देते देते मानसिक संतुलन खोते जा रहे है और इसी  वजह से उनका हर रोज स्ट्रिंगरो और रिपोर्टरो से फोन पर झगड़ा हो रहा है.
 
एक स्ट्रिंगर द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित…

लचर प्रधानमंत्री हैं डॉ. मनमोहन सिंह

देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने एक बार फिर देशवासियों को निराश किया है. जिस प्रकार प्रेस कान्फ्रेंस में उनकी लाचारी व बेबसी साफ तौर पर उनके चेहरे पर दिख रही थी. प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफे की अटकलों पर विराम लगाते हुए उन्होंने साफ कर दिया की वह कांग्रेस को नये पीएम उमीदवार को जिम्मेदारी सौपने को तैयार हैं.

जिस प्रकार उनकी सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी जैसे मुद्दे पर आपनी विफलता के बावजूद भी अपनी सरकार की तारीफ की. उनकी बातों में कोई उत्साह देखने को नही मिला और न ही अपनी सरकार के डिफेंस में कोई ठोस तर्क. उन्होंने अपने मौजूदा काम को परिस्थतियों के हिसाब से अच्छा बताया और अपनी ईमानदार छवी की भी खूब प्रशंसा की.  

बार-बार मौन कहे जाने वाले प्रधानमंत्री ने मीडिया के लोगों के सभी सवालों के जबाब देते हुए अपनी सरकार की खूब प्रशंसा की और राहुल को देश का रखवाला बताते हुए अगला प्रधानमंत्री बनाने की भी आपिल कर दी. पर विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद भी उन्होंने राहुल और UPA की अध्यक्ष की जम कर तारीफ की अपनी विफलता को छुपाते हुए उन्होंने बीजेपी के पीम पद के उमीदवार नरेंद्र मोदी को विध्वंसकारी तक कह डाला. 

पर मनमोहन एक बार फिर देश के कई अहम मुद्दों महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार पर एक बार फिर लाचार ही दिखे. पर अब ये लाचारी नही चलेगी प्रधानमंत्री साहब देश को इन मुददों पर जबाब की तलाश है. आपकी ईमानदारी की नही !!!

लेखक आदर्श तिवारी से संपर्क 09792187038 के जरिए किया जा सकता है.

मीडिया पर भडके वीरभद्र बोले, आई विल पुट यू इन द कार एंड सेंड टू चंडीगढ़

ऊना : हिमाचल प्रदेश के सीएम वीरभद्र सिंह इन दिनों अपने दामन पर लगे दागों को लेकर इस कदर परेशान है कि, उन्हें वो अपने गुस्से पर भी काबू नहीं कर पा रहे हैं. वीरभद्र सिंह अपने और पत्नी पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों पर मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह लगता है पूरी तरह बौखला गए हैं.
शुक्रवार को हिमाचल प्रदेश के ऊना नगर में एक न्यूज चैनल के रिपोर्टर ने जब उनसे उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बारे में जानना चाहा तो वे पूरी तरह भडक गए. वीरभद्र सिंह ने सबके सामने यहां तक कहा कि ‘मैं तुम्हे अभी कार में बैठाकर वापस चंडीगढ़ भेज दूंगा.’ यहां तुम्हारी मर्जी से कुछ नहीं चलेगा.
दरअसल यह पत्रकार चंडीगढ़ से वीरभद्र सिंह का इंटरव्यू लेने यहां आया था. गौरतलब है कि भ्रष्टाचार के मामले में फंसते जा रहे हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की कुर्सी खतरे में पड़ती नजर आ रही है. दरअसल, उनके मामले में कांग्रेस आलाकमान भी पसोपेश में है. आज प्रधानमंत्राी मनमोहन सिंह ने भी उनसे किनारा कर लिया. इस्पात मंत्री रहते वीरभद्र सिंह पर लगे आरोपों पर सीबीआइ जांच तेजी पकड़ रही है.
वहीं, भाजपा ने हितों के टकराव के दो मामलों को उछालकर वीरभद्र पर हमला बोल दिया है. मौजूदा सियासी माहौल व कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त रवैये के चलते वीरभद्र को सफाई देने के लिए दिल्ली जाना पड़ा था. फिलहाल पार्टी उनके बचाव में तो है, लेकिन वीरभद्र को जिस तरह कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से मिले बिना हिमाचल लौटना पड़ा, उससे उनको अभयदान नहीं मिलने के भी स्पष्ट संकेत मिले हैं.
सूत्रों के मुताबिक, वीरभद्र पर कार्रवाई से पहले पार्टी नेतृत्व उन्हें आरोपों से निकलने का मौका देना चाहता है. इसके लिए कांग्रेस कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर लड़ेगी, लेकिन भ्रष्टाचार पर राहुल के सख्त रवैये के चलते अगर इस मुद्दे पर छवि की बात आई तो हिमाचल में नेतृत्व परिवर्तन से भी पार्टी परहेज नहीं करेगी. भाजपा के आरोपों और सीबीआइ की जांच के मद्देनजर कांग्रेस आलाकमान के निर्देश पर वीरभद्र ने पार्टी प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी को हर मुद्दे पर अपनी सफाई दी है. सिंघवी पूरे मामले पर कानूनी राय से कांग्रेस नेतृत्व को अवगत कराएंगे. जाहिर है कि वीरभद्र के मामले में आलाकमान के फैसले में सिंघवी की रिपोर्ट की अहम भूमिका होगी.
खबर है कि पार्टी में एक बड़ा खेमा हर हाल में वीरभद्र के बचाव में खड़े होने का पक्षधर है, लेकिन राहुल ने साफ कर दिया है कि अगर बात छवि तक पहुंची तो समझौता नहीं होगा. इसीलिए कांग्रेस ने वीरभद्र से कहा है कि वह हिमाचल में ही भाजपा युवा मोर्चा के अध्यक्ष अनुराग ठाकुर के क्रिकेट स्टेडियम बनाने में अनियमितताओं जैसे मामलों में आक्रामक राजनीतिक जवाब दें. हिमाचल की प्रभारी अंबिका सोनी से भी वीरभद्र की मुलाकात हुई है. मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री ने भरोसा दिलाया कि वह भाजपा के साथ-साथ सीबीआइ जांच से भी उबरने में कामयाब रहेंगे. फिलहाल सोनिया ने वीरभद्र से न मिलकर साफ संकेत दे दिया है कि अगर बात बढ़ी तो उन्हें हटना पड़ेगा. भाजपा नेता अरुण जेटली के आरोपों पर दिए जवाब में भी वीरभद्र ने हितों के टकराव को स्वीकार कर लिया है. वीरभद्र ने स्वीकार किया है कि उन्होंने हिमाचल में वेंचर एनर्जी एंड टेक्नोलॉजी लिमिटेड से कर्ज लिया था.
गौरतलब है कि इसी कंपनी को ऊर्जा परियोजना मिली है. वीरभद्र का दावा है कि कंपनी के मालिक वाकामूला चंद्रशेखर उनके पारिवारिक दोस्त हैं. हालांकि, उन्होंने इस कर्ज की जरूरत का जिक्र नहीं किया. वाकामूला चंद्रशेखर की दूसरी कंपनी तारिणी इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड में प्रतिभा सिंह, अपराजिता सिंह और विक्रमादित्य सिंह समेत वीरभद्र के शेयर हैं. भाजपा के आरोपों का जवाब देते हुए वीरभद्र ने कहा है कि उन्होंने कंपनी व सेबी एक्ट गाइडलाइंस का पालन करते हुए कीमत देकर शेयर खरीदे हैं. परिजनों पर कहा कि वे बालिग हैं और उनसे उनका मतलब नहीं. इस मामले में भ्रष्टाचार साबित न भी हो तो हितों के टकराव का मामला सामने आएगा. इसी पर सिंघवी को रिपोर्ट देनी है.
सीबीआई ने उनके इस्पात मंत्री रहते मिली डायरी की जांच को आगे बढ़ाकर समस्याएं बढ़ा दी हैं. जेटली ने वीरभद्र पर एक बिजली कंपनी को घूस लेकर फायदा पहुंचाने का आरोप लगाया था. वहीं उनकी पत्नी सांसद प्रतिभा सिंह ने उनके बैंक खाते में 60 लाख रुपये की ट्रांजेक्शन होने की सफाई दी है. उनका कहना है कि उन्होंने वाकामुल्ला कही कंपनी में 34 लाख रुपये के शेयर खरीदे थे लेकिन चुनाव से पहले यह वापस बेच दिए गए थे. यह पैसा उन शेयरों का है. उन पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं. गौरतलब है कि एक न्यूज चैनल ने सांसद प्रतिभा सिंह के खाते में वाकामुल्ला की कंपनी की ओर से 60 लाख रुपये जमा करवाने का खुलासा किया था.
 
विजयेन्दर शर्मा

नक्सली हमले के शिकार पत्रकारों को शहीद का दर्जा दिलाने के लिए संघर्ष जारी

30 दिसंबर को राजधानी मार्च (रायपुर) तमाम जेबी पत्रकार संघ के असहयोग और असफल करने की कोशिश के बाद भी सफल रहा. स्व. नेमीचंद जैन और स्व. साई रेड्डी को शहीद का दर्जा देने की मांग को लेकर बूढ़ा तालाब स्थित धरना स्थल पर हमेशा सत्य-संघर्ष को प्रोत्साहित करने वाले वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार आदरणीय गिरीश पंकज की उपस्थिति से मिडिया की स्वतंत्रता और सम्मान के लिए शुरू किये गए इस संघर्ष को ताकत मिली.
इस धरना में छत्तीसगढ़ प्रेस क्लब व छत्तीसगढ़ इलेक्ट्रानिक मिडिया एसोसिएशन के महा सचिव साथी अहफाज रशीद ने उपस्थित होकर इस मुद्दे के समर्थन में समस्त पत्रकारों की एकजुटता की आवश्यकता पर बल दिया. पत्रकारों की इस न्यायोचित मांग के समर्थन में " समाचार पत्र कर्मचारी संघ " का भी समर्थन मिला, संघ की और से साथी सनत तिवारी भी धरना स्थल में उपस्थित हुए. इनके साथ ही वरिष्ठ पत्रकार राज कुमार सोनी (पत्रिका), याग्वलक्य वशिष्ठ (हरिभूमि), पीसी रथ (नई-दुनिया), संजय दुबे (हिंदुस्तान समाचार), रवि कुमार माथुर, उत्तम राज देवांगन, डॉ. दिनेश मिश्रा, अखिलेश शुक्ला, तामेश्वर सिन्हा, प्रभात सिंह, सुभाष विश्वकर्मा, मनोज ध्रुव, प्रदीप चन्दौल, पंकज कुमार, चंद्रमोहन द्विवेदी, सूर्य कान्त देवांगन, शीतला प्रसाद गुप्ता आदि का भी हार्दिक आभार व्यक्त किया.
इन सभी की उपस्थिति, समर्थन और सलाह से ये आंदोलन अगले पडाव की ओर चल पड़ा चला है.
निर्भीक और निरपेक्ष पत्रकारिता के लिए हर संघर्ष में अगुवा रहने वाले सुधीर सक्सेना "आजाद" और सिकंदर बाघ जिन्होंने कम समय में सूचना में व्ययवस्था बनाने और मिडिया में उचित कवरेज दिलाने के लिए प्रयास किया. उनसे इस आंदोलन को निर्णायक स्थिति में पहुंचाने तक सक्रियता की अपेक्षा है.
३० दिसंबर को सभी साथियों से सलाह कर निर्णय लिया गया कि मुख्यमंत्री रमन सिंह से मिलकर ज्ञापन देने के बजाय, पूरे प्रदेश के सभी पत्रकार साथी अलग-अलग, अपने-अपने ओर से केवल अपने पद और नाम से नक्सल हिंसा के शिकार पत्रकार साथी नेमीचंद जैन व साई रेड्डी को शहीद का दर्जा दिया जाये.
भविष्य में भी नक्सल हिंसा में वाले साथियों को शहीद का दर्जा देने के लिए अध्यादेश जारी किया जाये. निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता को प्रोत्साहित करने के लिए पत्रकार साथी साई रेड्डी के नाम से पुरस्कार की घोषणा की जाये. जिन्हें अपनी निर्भीक कलम की वजह से प्रदेश सरकार और नक्सली दोनों की प्रताड़ना का शिकार होना पड़ा. ज्ञापन अपने मेल या एसएमएस से अथवा कोरियर या डाक से सीधे मुख्यमंत्री रमन सिंह, मुख्य सचिव सुनील कुमार, गृह मंत्री राम सेवक पैकरा व अपने विधायक को भेजें.
ज्ञापन देने का यह अभियान ५ जनवरी से २५ जनवरी तक चलाया जायेगा. सभी साथी जिम्मेदारी और जवाबदारी से अधिक से अधिक संख्या में ज्ञापन भिजवाने के लिए जुट जाएं. 
ओरछा से  बीजापुर तक पदयात्रा की तिथि घोषित गणतंत्र दिवस से शुरू और गांधी पुण्यतिथि को संपन्न होगी. इसके साथ ही माओवादियों से मिडिया की स्वतंत्रता बनाये रखने की अपील, मिडिया का मुंह दबाने की कोशिश के खिलाफ व निर्भीक निरेपक्ष होकर पत्रकारिता का माहौल बनाने का संदेश देने के लिए नारायणपुर जिले के ओरछा से बीजापुर तक पदयात्रा की तिथि भी इस दिन घोषित कर दी गयी है. पद यात्रा गणतंत्र दिवस से शुरू होगी और गांधी जी की पुण्यतिथि को संपन्न होगी.
इस पदयात्रा में शामिल होने से पहले आप जान लें कि पदयात्रा का लगभग 65किमी मार्ग अबुझमाड़ से होकर जायेगा जो मिडिया और सरकार के अनुसार नक्सलियों के प्रभाव का इलाका है. इस आंदोलन में शामिल होना आपकी इच्छा और खुद के रिस्क पर है. हिंसा को आंदोलन का हथियार बताने वालों के मिडिया नीति के खिलाफ यह अपनी तरह का पहला आंदोलन है. पदयात्रा में 26 जनवरी को पहला पड़ाव 13किमी दूर आदेर ग्राम है. जहां से 19 किमी दूर जाटलूर 27 जनवरी को दूसरा पड़ाव होगा. संभवतः 28 जनवरी को अगला पड़ाव लंका और 29 को कुटरु (जिला-बीजापुर) हो सकता है. 
 इस पदयात्रा में शामिल होने की सहमति अब-तक गिरीश पंकज, राजीव रंजन प्रसाद, बप्पी राय, तामेश्वर सिन्हा, अब्दुल हमीद सिद्दीकी, प्रभात सिंह, सुधीर तम्बोली आजाद, मनोज ध्रुव, नितिन सिन्हा, याज्ञवाल्मीकि वशिष्ठ का मिल चुका है. जिन अन्य साथियों को इस यात्रा में शामिल होना है वे कृपया इस पोस्ट के कमेंट बाक्स में सहमति प्रदान करें. पदयात्रा में शामिल होने के लिए आपको आवश्यक दवा, हल्का वजन वाला गर्म कपडा, पिट्ठु  बैग के साथ 25 जनवरी को नारायणपुर पहुचना है.

टीआरपी : 52वां हफ्ता : ‘इंडिया टीवी’ को पछाड़ते हुए जी न्यूज ने बनाई टॉप-3 में जगह

टैम ने वर्ष 2013 के अखिरी 52वें सप्‍ताह की टीआरपी जारी कर दी है. पिछली कई बार की तरह इस बार फिर आजतक लगातार नंबर वन के पायदान पर बना हुआ है. एबीपी न्यूज ने एक बार फिर नंबर दो के स्थान पर कब्जा कर लिया है. तो वहीं तीसरे नंबर पर विराजमान इंडिया टीवी के हाल और खस्ता होते दिख रहे हैं, इंडिया टीवी को और एक पायदान नीचे धकेलते हुए जी न्यूज ने टॉप 3 में अपनी जगह बना ली है.
52वें हफ्ते की टीवी न्यूज चैनल्स की टीआरपी इस प्रकार है-
 
WK 52 2013, (0600-2400)
Tg CS 15+, HSM:
Aaj Tak 20.6 up 0.8
ABP News 13.1 dn 0.6
ZN 10.5 up 0.9
India TV 9.7 dn 1.8
India news 9.3 dn 0.7
News24 7.9 up 0.6
News Nation 7.8 up 0.5
IBN 6.9 up 0.7
NDTV 6.6 same
Samay 3.1 dn 0.4
Tez 2.6 up 0.2
DD 1.9 dn 0.3
 
Tg CS M 25+ABC
Aaj Tak 21.1 up 1.4
ABP News 12.9 dn 1.6
ZN 10.9 up 1.4
India TV 10.1 dn 0.9
India news 9.1 dn 0.8
NDTV 7.6 dn 0.6
IBN 7.5 dn 0.9
News24 7.1 up 0.5
News Nation 6.9 up 0.2
Samay 3.0 dn 0.5
Tez 2.4 up 0.2
DD 1.5 dn 0.2

दैनिक भास्कर के रफी मौहम्मद शेख को लाडली मीडिया अवार्ड

नई दिल्ली : मीडिया में लिंग संवेदनशीलता के प्रति अपने योगदान के लिए दैनिक भास्कर डीबी स्टार इंदौर के प्रिसिंपल करस्पोंडेंट रफी मोहम्मद शेख को यूनाइटेड नेश्नस पापुलेशन फंड 'लाड़ली मीडिया अवार्ड' 2012-2013 प्रदान किया गया है.
शेख को बेस्ट इनवेस्टिगेटिव कैटेगरी में नॉर्दन रीजन के 10 प्रदेशों के विभिन्न प्रविष्ठियों में सर्वश्रेष्ठ रहने पर यह अवार्ड दिया गया है. इसमें 653 प्रविष्ठियां आई थी. उन्हें ये पुरस्कार दूसरी बार मिला है पूर्व में 2010-2011 में उनकी स्टोरी को सर्वश्रेष्ठ ह्यूमन स्टोरी कैटेगरी का अवार्ड मिला था.
लोधी रोड स्थित चिन्मय मिशन ऑडिटोरियम में आयोजित इस समारोह में योजना आयोग की सचिव सिंधुश्री खुल्लर युनाइटेड नेशन पॉपुलेशन फंड की कंट्री रिप्रेजेंटेटिव फ्रेडिका मैजर, लोकसभा टीवी के सीईओ राजीव मिश्रा और सेंट्रल फॉर सोशल रिसर्च की डायरेक्टर रंजना कुमारी व पॉपुलेशन फसर्ट की डायरेक्टर डॉ.एएल शारदा ने यह पुरस्कार प्रदान किया.
प्रिंट कैटेगरी में हिंदी, अंग्रेजी, पंजाबी व उर्दू व अंग्रेजी भाषा, टीवी व वेब कैटेगरी में हिंदी- अंग्रेजी, रेडियो कैटेगरी हिंदी-उर्दू श्रेणियों में विभिन्न पुरस्कार दिए गए. लाडली मीडिया अवार्ड समिति द्वारा गत वर्ष प्रकाशित समाचार, फीचर ब्लॉग के आधार पर इन पुरस्कारों के लिए नॉर्दन रीजन से चंडीगढ़, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर, मध्य प्रदेश, पंजाब, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड से प्रविष्ठियां आमंत्रित की गई.
इन प्रविष्ठियों में से अवार्ड ज्यूरी ने इन पुरस्कारों की घोषणा की. रफी मोहम्मद शेख की स्टोरी 'अंधविश्वास का थर्ड डिग्री टॉर्चर' को प्रिंट हिंदी में सर्वश्रेष्ठ इनवेस्टिगेटिव स्टोरी माना गया. अब रफी इन कैटेगरीज में नेशनल अवार्ड के लिए नामांकित किए हैं. रफी मोहम्मद शेख को पूर्व में चार बार गोपीकृष्ण गुप्ता अवार्ड सहित राजेंद्र माथुर रिपोर्टिंग व संपादन अवार्ड मिल चुका है. उन्हें विकास संवाद द्वारा प्रदेशस्तरीय फैलोशिप भी मिल चुकी है. 
 

आपदा के लिए आया राशन बांटा नहीं सड़ा डाला फिर नदी में बहा डाला, भाकपा माले बेहद नाराज

पिथौरागढ़ : धारचूला के विधायक हरीश धामी के गांव मदकोट में आपदा के लिए आया राशन खराब हो जाने के बाद गोरी नदी में फेंक दिया गया. इस घटना के बाद भाकपा माले ने पिथौरागढ़ और मुनस्यारी में विधायक धामी का पुतला जलाकर जोरदार प्रदर्शन किया. 
उन्होंने कहा कि पंचायत चुनाव में लाभ लेने के लिए इस राशन को कांग्रेसियों ने पिछले काफी समय से अपने कब्जे में रखा था. भाकपा माले ने इस घटना की जांच उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश के अध्यक्षता में कमेटी बनाकर करने की मांग की है और कहा है कि मुनस्यारी के उपजिलाधिकारी का तत्काल तबादला किया जाए.
इनके रहते मुनस्यारी में निष्पक्ष पंचायत चुनाव होना संभव नहीं है. माले के नगर इकाई के आह्वान पर पार्टी कार्यकर्ता गांधी चौक में जमा हुए. कार्यकर्ताओं ने नगर सचिव सुशील खत्री के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की. गांधी चौक में माले कार्यकर्ताओं ने गोरी नदी में आपदा के राशन को खराब होने के बाद फेंकने वालों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग भी की है. इस मौके पर हुई सभा में पार्टी के जिला सचिव जगत मर्तोलिया ने कहा कि पंचायत चुनाव से पूर्व आपदा का राशन बांटकर राजनीतिक लाभ लेने की मंशा से कांग्रेसियों ने इस राशन को प्रशासन के साथ सांठ-गांठ करते हुए अपने कब्जे में रखा था.
29 दिसंबर को मदकोट में विधायक के मुख्य कर्ताधर्ता कांग्रेस नेताओं ने राशन बांटना शुरू किया तो पता चला कि राशन खराब हो चुका है. फिर इस खराब हुए राशन को मजदूरों के जरिए गोरी नदी में फेंकने लगे. उन्होंने कहा कि विधायक के दबाव में मुनस्यारी के उपजिलाधिकारी ने राशन वितरण के लिए एक कमेटी बनाई थी. उस कमेटी के सदस्य जो मदकोट में रहते हैं और विधायक के नजदीकी है.
उनकी ओर इशारा करते हुए कहा कि इन्होनें आपदा प्रभावितों के राशन को समय से बंटवाने की जगह राशन को मदकोट के एक गोदाम में रखा. रविवार को गोदाम से राशन बांटने के लिए मदकोट के लोंगो को बुलाया गया तो पता चला कि 90 प्रतिशत राशन खराब हो चुका है. उन्होंने कहा कि जिले में पटवारी से लेकर डीएम तक विधायक और कांग्रेस सरकार के दबाव में है. इसलिए हमें प्रशासनिक जांच पर कोई भरोसा नहीं है. इस घोटाले की जांच के लिए न्यायिक जांच जरूरी है. उन्होंने कहा कि यह तो मात्र एक घटना है. धारचूला और मुनस्यारी में कांग्रेसियों के घरों और गोदामों में अभी भी आपदा का राशन सड़ रहा है. भाकपा माले के नगर सचिव सुशील खत्री ने कहा कि आपदा के नाम पर आए राशन के घोटाले की उच्चस्तरीय जांच जरूरी है, तभी पता चलेगा कि इसमें किन-किन नेताओं ने हाथ धोए है.
इस मौके पर भाकपा माले के जिला प्रवक्ता गोंविंद कफलिया, हीरा सिंह मेहता, भूपेंद्र बिश्ट, विरेंद्र बिश्ट, सुरेंद्र वर्ती, अभिशेक पुनेठा, रेखा उप्रेती, नीरू पाठक, बसंती सौन, रोहित बिश्ट, विनोद तिवारी, विनय भट्ट, मुकुल, मौजूद थे. इधर मुनस्यारी में भाकपा माले के ब्लॉक सचिव सुरेंद्र बृजवाल के नेतृत्व में शास्त्री चौक पर विधायक का पुतला जलाया गया. इस मौके पर हुई सभा में माले नेता बृजवाल ने कहा कि आपदा के समय सीमांत के लोगों को 100 रुपये किलो चावल खाना पड़ा. विधायक के संरक्षण में हजारों कुंटल चावल और आटा कांग्रेसियों ने गोदामों में सड़ने दिया. उन्होंने कहा कि मुनस्यारी के एसडीएम की प्रतिक्रिया विधायक की चमचागिरी को साबित करती है.
गोरी नदी में राशन फेंकने वाले कांग्रेसी और क्षेत्रीय विधायक को सीमांत की आपदा के समय भूख से लड़ती जनता कभी भी माफ नहीं करेगी. इस मौके पर नारायण बृजवाल, प्रहलाद दरियाल, हरीश नितवाल, मन्नू पांगती, पंकज बृजवाल, दीपक सिंह, भुवनेश नितवाल, पवन बृजवाल, त्रिलोक बिश्ट, कुंदन कुमार मौजूद थे. 
 

पिथौरागढ़ में विधायक की दावत से तर पत्रकार

पिथौरागढ़ : यह कोई नई बात नहीं है कि जब पत्रकारों की दावत की बात हो रही हो इस प्रसंग को इसलिए इस बार लिखने को मजबूर हुए हैं कि पत्रकारों की आंखे खुल सके. चुनाव में करोड़ रुपये खर्च करने के बाद विधायक बनने वाले हमारे रहनुमा पांच साल में इतनी दौलत जुटा लेते है कि सात पीढ़ियों तक साहूकार रह सकें.
इसके बदले में पत्रकार मित्रों को केवल साल में एक दावत जिसमें दो-चार शराब के पैग और चूसने के लिए कुछ हड्डिया. घबराईये नहीं हम खुलासा भी कर रहे हैं. 30 दिसंबर की रात्रि को पिथौरागढ़ नगर के नगर पालिका चौक के निकट एक होटल में धारचूला के विधायक हरीश धामी ने जिला मुख्यालय के पत्रकारों को दावत दी. शहर के दो-चार पत्रकारों को छोड़कर सभी दावत में थे. यह दावत ऐसे वक्त पर हुई है जब विधायक आपदा प्रभावितों के लिए आए राशन को गोरी नदी में फेंकने के मामले में विवादित चल रहे है. घटना यह है कि 29 दिसंबर को विधायक हरीश धामी के गांव मदकोट में सांसद प्रतिनिधि नरेंद्र सिंह रावत ने अपने घर में आपदा के समय में डंप राशन को बांटने के लिए मदकोट के लोगो को बुलाया. कुछ दिनों के बाद पंचायत चुनाव होना है. 
विधायक के करीबी नरेंद्र रावत मुनस्यारी में क्षेत्र प्रमुख पद के दावेदार हैं और उन्हें मदकोट से क्षेपं सदस्य का चुनाव लड़ना है. पंचायत चुनाव की तारीख घोषित होते ही विधायक के करीबी कांग्रेसी नेता ने अपने द्वारा कब्जाए गए राशन को बांटना शुरू किया तो पता चला कि राशन तो सड़ चुका है. जानवरों के लिए कुछ राशन लोग ले गए और शेष खराब राशन मजदूर लगाकर गोरी नदी में डाला जा रहा था कि इस पर मीडिया की नजर पड़ गई. 
30 दिसंबर को समाचार पत्रों के पहले पन्ने में यह खबर सुर्खी बन गई. मुनस्यारी के एसडीएम ने एक आपदा राशन बांटने की कमेटी बनाई थी. जिसमें उक्त व्यक्ति सदस्य था. विधायक के दबाव में प्रशासन इन लोगो को राशन देता रहा और आज यह नौबत आ गई कि सारा राशन खराब हो गया. आपदा के समय प्रभावित एक-एक दाने के लिए तरसते रहे और उनके नाम पर आया राशन डंप कर दिया गया इससे घबराए विधायक ने मीडिया मैनेजमेंट के लिए पिथौरागढ़ के जिला मुख्यालय के पत्रकारों को फिर दो पैग शराब और हड्डी डाल दी. पत्रकार भी हड्डी को चूसने लगे. यहां पर बता दे कि बिते वर्ष विधायक के भांजे ने मदकोट इंटर कालेज में घुसकर एक छात्रा के साथ अशलील हरकत की.
इस खबर को भी दबाने के लिए पत्रकारों को दावत दी गई. इस दावत में तो एक पत्रकार ने जो नया था इतनी शराब पीकर उसे पैंट में ही सू-सू हो गई. इतना ही नहीं पिछली बार और इस बार की दावत में पत्रकार मित्र शराब की बची बोतल और पत्नी के लिए ताजा मुर्गा लेजाना नहीं भूले.
हर साल घटना होती रहे और पत्रकारों को दावत मिलती रहे. यहां के पत्रकारों को इतनी भी तमीज नहीं है कि अन्य समय में दावत खा लेते लेकिन अब तो यह आरोप लगेगा ही कि आप मैनेज हो रहे है. हांलाकि तब और अब अखबार में खबरें तो छपी. बेचारे विधायक को मालूम नहीं है कि सड़क में जनता उतरेगी तो खबर तो बनेगी ही. इतना जरूर है कि उनकी शराब और हड्डी यह कार्य तो कर रही है कि समाचार में असल बातों को छुपाकर गोलमाल जैसा किया जा रहा है.
इस घटना में तो पिछली बार तो एक अखबार ने पुतला जलाने के बाद भी विधायक का नाम तक नहीं छापा. टीवी और अखबार दोनों विधायक की दावत की कीमत चुका रहे है. हाल यह है कि शहर में आम चर्चा है कि ये पत्रकार हैं कि किसी के पालतू………….  चलिए पिथौरागढ़ के पत्रकारों ने तो थर्टी फर्स्ट तीस को ही मना लिया.
   
पिथौरागढ़ के एक पत्रकार द्वारा 

कानूनी डंडे के सहारे सच छिपा रही है पुलिस, वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी को कर रही है प्रताड़ित

संतरविदास नगर भदोही के वरिष्ठ पत्रकार सुरेश गांधी के मामले में कानूनी डंडे के सहारे सच छिपाने की हर हथकंडे आजमा चुकी पुलिस अब न्यायालय को भी गुमराह करने में जुट गई है. 
हाईकोर्ट नोटिस जवाब में पुलिस ने बगैर सबूत दो टूक में कहा है भदोही में दंगा या हिंसा की घटना हुई ही नहीं है और न ही अवैध बालू खनन. इतना ही नहीं गुंडा एक्ट, जिलाबदर व सरेराह मार-पीटकर घर-बार लूटे जाने सहित सभी आरोपों को डिनाई कर-कहा पुलिस एवं प्रशासनिक कार्रवाई कानून के दायरे में की गयी है.
अपने काले कारनामों से चौरतरफा घिरी व जनता सहित मीडिया में हो रही किरकिरी को देखते हुए पुलिस ने गांधी को पत्रकार न होने की बात कह कर घर-बार लूटने वाले माफियाओं की अब खुद पैरवी करने में अपने को सेफ समझ रही है. हर घटनाओं की तरह अपनी दादागिरी के बूते पत्रकार की उत्पीड़नात्म घटना को भी ठंडे बस्ते में दफन कर देना चाहती है, लेकिन शायद भूल गयी कि एक दशक पूर्व बाहुबलि सांसद धनंजय सिंह के नाम पर सरेराह एनकांउटर में चार निर्दोष युवकों की हत्या के मामले में 36 पुलिसकर्मियों को जेल के सलाखों में ढकलने सहित दलित महिला संतोषी बलात्कार कांड के आरोपी को अपनी कलम के ताकत पर न सिर्फ जेल भेजवा चुके गांधी किसी भी हाल में पीछे नहीं हटने वाले. न्यायालय में विश्वास व इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले गांधी का दावा है कि वह पूरे दमखम के साथ पुलिस व प्रशासनिक ज्यादितियों का मुकाबला करेंगे. 
पूर्वांचल के ईनामी माफियों के शरणदाता व बाहुबलि विधायक व माफियाओं के समर्थन से चल रही सपा के गुंडों को पनाह देने वाली पुलिस के शायद जेहन में नहीं है कि पिछले 16 सालों में दैनिक समाचार पत्र हिन्दुस्तान, जनसंदेश टाइम्स व आज तक टीवी न्यूज में बाईलाइन छपी खबरों के अलावा हजारों ससमसामयिक आर्टिकल व वीडियो फुटेज व अन्य घटनाओं समेत दूरसंचार कार्यालय, इनकम टैक्स, बैंक, एलआईसी के अभिलेखों आदि में अंकित व पूर्व के आरोपों में विभिन्न न्यायालयों व जनसूचना विभाग से जारी कार्डों आदि प्रमुख साक्ष्यों को कैसे हजम करेंगे. हाईकोर्ट के स्थगन आदेश व जिला न्यायालय से मिली जमानत के आदेशों की प्रतियों को कैसे फूकेंगे. जिन तीन मुकदमों को आधार बनाकर गुंडाएक्ट व जिलाबदर किया गया है उसमें खुद पुलिस ने आरटीआई रिपोर्ट में मुकदमों को खत्म होने की बात कही है. गत 25 नवंबर 2012 को भड़की हिंसा के दौरान दोनों पक्षों की रिपोर्ट व गिरफतारी जैसे साक्ष्य पुलिस व प्रशासनिक लापरवाहियों को उजागर करती घटनाएं किस कब्रगाह में दफन करेंगे.
यह सवाल आज भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है. दरअसल, वर्ष 2012 में तत्तकालीन जिलाधिकारी अमृत त्रिपाठी व पुलिस अधीक्षक अशोक शुक्ला के कार्यकाल में एक के बाद एक आपराधिक व हिंसक घटनाएं होती रही और बाहुबलि विधायक के बालू खनन से लेकर सड़कों के निर्माण में धांधली, जबरन प्रमुख कुर्सी पर कब्जा, पूर्वांचल के ईनामी माफियाओं से साठ-गांठ आदि काले कारनामें समाचार पत्र प्रकाशित व चैनल में समय-समय पर चलने से पत्रकार सुरेश गांधी से पुलिस व प्रशासन कुपित थी. खासकर 25 नवंबर 2012 मुहर्रम के तीन दिन पहले दरोपुर व घमहापुर में ताजिया रास्ते के विवाद को लेकर छपी खबर के बाद भी एलर्ट होने के बजाएं प्रशासनिक लापरवाही से भड़की हिंसा व तोड़फोड़ की घटना पेपर की सुर्खियां बनने से हुई छिछालेदर से डीएम एसपी काफी खफा हो गए थे.
महाशिवरात्रि के दिन अलसुबह हुए विस्फोट और कोतवाल संजयनाथ तिवारी की लापरवाही की खबर छपने के बाद पुलिस ने सारी सीमाएं लांघकर श्री गांधी के खिलाफ बिना किसी अपराध के गुंडाएक्ट व जिलाबदर की कार्यवाही की. इस बाबत श्री गांधी ने 23 मार्च 2013 को दोपहर मे एसडीएम न्यायालय में अपना जवाब दाखिल किया कि पुलिस द्वारा दर्ज की गई की कार्यवाही के तीनों मुकदमों मे पुलिस ने खुद फाइनल रिपोर्ट लगाई है या वह न्यायालय से दोषमुक्त है, तो कोतवाल संजयनाथ तिवारी ने मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता निवासी काजीपुर रोड भदोही को साजिश मे लेकर रंगदारी मांगने की झूठी रिपोर्ट दर्ज कर दी. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि दो साल से गांधी किराए पर रहते है और किराया नहीं देते. 23 मार्च को काजीपुर रोड स्थित मकान मालिक के घर में घुसकर मारपीट कर 5 लाख की रंगदारी मांगी. रंगदारी न देने पर जानसे मारने की धमकी दी. इस झूठी रिपोर्ट में पुलिस ने बिना छानबीन किए दो और पत्रकारों का नाम दर्जकर मकान मालिक के चहेतों की गवाही लेकर चार्जशीट लगा दी. सवाल यह कि श्री गांधी उस मकान में पिछले 15-16 सालों से रह रहे है. तभी से नाम व पते जगह-जगह सरकारी अभिलेखों समेत प्राइवेट संस्थानों में दर्ज है. अगर गांधी ने 23 मार्च को मकान मालिक के घर गए तो काल डिटेल के साथ ही मोबाइल लोकेशन आदि की छानबीन क्यों नहीं की गयी. जो व्यक्ति पिछले 16 सालों से पत्रकारिता कर रहा हो और तमाम प्रशासनिक आफिसर आए और चले गए तब किसी को गांधी गुंडा नजर नहीं आएं. किसी से रंगदारी नहीं मांगी और न ही किसी भी जनता ने कोई मुकदमा ही लिखाया. तो फिर अचानक तत्कालीन अफसरों की निगाह में कैसे गुंडा बन गया और सप्ताहभर में गुडांएक्ट की कार्यवाही कर जिलाबदर कर दी.
खास बात तो यह है कि किराए को लेकर मकान मालिक से विवाद था तो पहले क्यों नहीं रिपोर्ट लिखी गयी रपट उस उक्त लिखी गयी जब पुलिस के झूठे गुंडाएक्ट की कार्रवाई पर श्री गांधी ने एसडीएम न्यायालय में चैलेंज किया.     
पत्रकार गांधी जब गुंडाएक्ट व जिलाबदर के चलते जनपद से बाहर थे तो 7 मई 2013 को मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता पुत्र स्व. बाकेलाल निवासी काजीपुर रोड आदि ने कमरे का ताला तोड़कर विज्ञापन के 1.5 लाख नगद, जेवर, जरूरी कागजजात व तमाम साक्ष्य उठा ले गये. इस दौरान जब सायंकाल पत्रकार की पत्नी कमरे पर पहुंची तो पुलिस संरक्षण प्राप्त हौसला बुलंद मकान मालिक ने धमकी भी दी कि अभी तो नगदी, जेवर समेत रुपया व कागजात ले जा रहे है यदि तुम लोगो ने मेरा कमरा नहीं छोड़ा तो ताला तोड़कर फिर से सारा सामान उठा ले जायेंगे और बेघर कर देंगे, मेरा कुछ नहीं होगा क्योंकि मेरी कोतवाल संजयनाथ तिवारी से सेटिंग है और कोतवाल से मिलकर तुम्हारे पति का भी हाथ-पैर तोड़वा देंगे.
इसकी सूचना पत्रकार की पत्नी रश्मिी गॉधी ने कोतवाली से लेकर एसपी तक को दी, लेकिन रिपोर्ट दर्ज करना तो कोतवाल संजयनाथ तिवारी ने उनकी पत्नी को धमकी दी कि तुम्हारा पति बड़का पत्रकार है उसका हाथ-पैर तो तोड़ेंगे ही तुम भी कहीं कि नहीं रह जाओगी और कोतवाली से डाटकर भगा दिया. 30 मई 2013 को लूट की प्रार्थना पत्र तैयार कर पहली जून 2013 को सुबह सीजीएम न्यायालय मे 156 (3) जाब्ता फौजदारी के अंतर्गत याचिका दायर की और सुबह 10 बजे कमरे पर आकर अपनी मौसी के बेटे के शादी मे शामिल होने के लिए रांची चले गये. उसी दिन पुलिस की मौजूदगी मे शाम 4 बजे मकान मालिक विनोद गुप्ता व सुमित गुप्ता आदि कमरे का ताला तोड़कर 15 साल से तिनका-तिनका जुटाई गई 20 लाख से भी अधिक की संपत्ति व विवाह में मिले सामानों व जेवरात आदि लूट ले गए. फर्जी मुकदमों में हाईकोर्ट के स्थगन आदेश के बाद भी पत्नी को दी गयी धमकी को सच करने की नियत से 13 जून की शाम साढ़े 5 बजे स्टेशन रोड पीएनबी बैंक के पास से श्री गांधी को पकड़कर कोतवाल व उसके हमराहों ने सरेराह मारपीटकर बेइज्जत किया. जनता के भारी विरोध व डीजीपी के हस्तक्षेप पर 4 घंटे बाद तो तो छोड़ दिया लेकिन 14 जून को एक और फर्जी मुकदमा दर्ज करने के साथ ही पुलिस ने मकान मालिक द्वारा गलत तरीके से दर्ज मुकदमें में चार्जशीट लगा दी. इस उत्पीडन की शिकायत श्री गांधी ने कोतवाली पुलिस से लेकर मुख्यमंत्री, डीजीपी, आईजी, डीआईजी व एसपी को दी, लेकिन रिपोर्ट दर्ज नहीं की गयी. अब जब सुरेश गांधी व उनकी पत्नी की अलग-अलग प्रार्थना पत्र में जिला न्यायालय के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने 156(3) के तहत रिपोर्ट दर्ज करने का आदेश दिया तो मजिस्ट्रेट के आदेश पर पुलिस ने मुकदमा तो दर्ज कर लिया, लेकिन माफियाओं के दवाब में कार्यवाही नहीं कर रही. आरोपी खुलेआम घुम रहे है. लूटे गए सामानों की पुलिस बरामदगी नहीं कर रही है और जब दायर याचिका के मामले में हाईकोर्ट ने प्रमुख गृह सचिव समेत डीएम, एसपी व कोतवाल से जवाब मांगा है तो न सिर्फ गांधी को पत्रकार न होने व लूटपाट न होने सहित कई भ्रामक रिपोर्ट देकर लूटपाट के आरोपी मकान मालिक को बचाने में जुट गयी है. पत्नी रश्मि गांधी के बयान दर्ज करने के बजाएं पुलिस के खिलाफ न बोलने की धमकी दे रही है. श्री गांधी का कहना है कि उत्पीड़नात्मक कार्रवाई के दौरान से ही उच्चाधिकारियों समेत उच्च न्यायालय से अपने आवेदनों के जरिए कह चुके है कि पुलिस अपनी खामियों को छिपाने के लिए ही कार्रवाई कर रही है जो अब पुलिस अपने बचत में खामियों को छिपाकर न्यायालय को गुमराह कर रही है. जवाब में पुलिस कह रही है कि भदोही में हिंसा का घटना हुई ही नहीं है. केवी टेन पर पथराव व 25 नवंबर को तोडफोड हुई ही नहीं है. बालू खनन सहित खुलेआम गुंडागर्दी व अपराध की घटनाएं नहीं हो रही हैं. पुलिस की इस कार्रवाई न सिर्फ बच्चों की पढाई लिखाई चौपट हो रही है बल्कि श्री गांधी अपनी पत्रकारिता भी नहीं कर पा रहे हैं. 
 

कुछ रिश्तों को नाम की जरूरत नहीं होती

‘जमाना बड़ा खराब है’ – जमाने की शान में यह बात हम बचपन से सुनते आए हैं, लेकिन यह कब अच्छा होगा, इसका पुख्ता जवाब शायद ही किसी के पास हो. जमाना सौ फीसदी सही कब होगा, यह तो जमाना ही जाने, मैं तो सिर्फ इतना जानता हूं कि अगर हम खुद की भूमिका पर गौर करें तो भी हालात काफी बदल सकते हैं.
 हालांकि ऐसी कोशिशें न तो कभी अखबारों की सुर्खियां बनती हैं और न ही वहां इनके लिए कोई जगह है. अक्सर जिंदगी के किसी मोड़ पर एक दौर ऐसा आता है जब हमें किसी की मदद की जरूरत होती है. साल 2005 की वह ठंडी रात आज भी मुझे याद है जब रात घर के बिस्तर पर गुजरी और दिन ऑपरेशन थिएटर में. 
दरअसल एक भयंकर दुर्घटना के बाद मुझे करीब एक महीना जयपुर के एसएमएस अस्पताल में बिताना पड़ा. उस दौरान जिंदगी की डोर कई बार कमजोर हुई, लेकिन किसी तरह यह टूटने से बची रही. बीच में हालात कुछ ठीक हो जाने पर मैं घर चलने की जिद करने लगा. आखिरकार पिताजी मान गए और हमने दोपहर की ट्रेन से जाने का फैसला किया, क्योंकि उसमें भीड़ कम थी. साथ ही सड़क पर लगने वाले झटकों से भी यह सुरक्षित थी. ट्रेन में मेरे सामने एक महिला बैठी थी. उसने मुझसे कोई बात नहीं की, लेकिन हमारा सामान रखने में उसने बहुत मदद की. अभी ट्रेन मुश्किल से एक घंटा ही चली होगी कि मुझे चक्कर आने लगे और जल्द ही मैं बेहोश हो गया. इस स्थिति में उस साहसी महिला ने ट्रेन रुकवाई और मुझे नजदीक के अस्पताल तक पहुंचाया. अगर उस दिन वह नहीं होती तो मेरे जिस्म के पोस्टमार्टम में महज कुछ ही घंटों की दूरी शेष थी. खैर…. किसी तरह जान बची और कुछ दिनों बाद घर आए.
इस घटना के करीब सात साल बाद मुझे रात को जयपुर जाना था. मैं रात एक बजे जयपुर के लिए बस में बैठा. कुछ ही दूर चलने के बाद ड्राइवर ने मुझे साफ बता दिया कि अब किराया दोगुना लगेगा, साथ ही जहां मैं जाना चाहता हूं उससे बहुत पहले उतरना होगा. उसकी इन बेतुकी शर्तों से असहमत होकर मैं नीचे उतर गया और अपनी राह पकड़ी. रात के सन्नाटे में दूर-दूर तक सिवाय अंधेरे के और कुछ दिखाई नहीं दे रहा था. करीब दो किमी पैदल चलकर मैं नजदीकी रेलवे स्टेशन पहुंचा.
मुझे ड्राइवर पर बहुत गुस्सा आ रहा था जिसकी वजह से देर रात को पैदल परेड करनी पड़ी. अभी मैं स्टेशन पहुंचा ही था कि मैंने देखा, एक युवक भारी-भरकम थैले के साथ अपनी मां का हाथ पकड़कर धीरे-धीरे चला आ रहा है. बाद में उसने बताया कि उसकी मां का हाल में ही पेट का ऑपरेशन हुआ है. वह एसएमएस अस्पताल जा रहा था. उसने बेहद संकोच के साथ मुझसे निवेदन किया कि मैं उनका सामान ले चलूं ताकि वह मां का ख्याल रख सके. ट्रेन आने पर मैंने उनका सामान उठाया और एक सीट तलाशी. मैं और वह युवक फर्श पर अखबार बिछाकर बैठ गए और उसकी मां को सीट पर लिटा दिया. सुबह जयपुर पहुंचने पर मैं उनका सामान रिक्शा तक पहुंचाकर आया. रवाना होने पर उस महिला ने विदा में अपना हाथ उठाया तो मुझे लगा कि वह मुझे आशीर्वाद दे रही है. लेकिन इस दौरान मैं उनका नाम पूछना तो भूल ही गया, फिर भी मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं, क्योंकि कुछ रिश्तों को नामों की जरूरत नहीं होती.
 
राजीव शर्मा
ganvkagurukul.blogspot.com

रामपुर सीआरपीएफ कैंप मामला ‘राम भरोसे’

31 दिसंबर 2007 की रात नए साल का जश्न मनाने के दौरान सीआरपीएफ जवानों द्वारा शराब के नशे में आपस में गोलियां चल गयी थीं। इस घटना को छिपाने के लिए इसे आतंकी हमला करार दिया गया था.
सीआरपीएफ कैंप रामपुर की घटना के 6 साल बाद स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है. इस मुकदमें में अदालती कार्रवाई के नाम पर कुछ तारीखें जो किसी उल्लेखनीय प्रगति के बिना गुजर गयी.
 
उत्तर प्रदेश सरकार ने बिना स्पष्ट कारण बताए तथा उचित औपचारिक्ताएं पूरी कर अदालतों को मुकदमा वापसी का पत्र लिखा और हाई कोर्ट ने उस पर रोक लगा दी. मानवाधिकार एंव सामाजिक संगठनों की तरफ से इस घटना पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए कई धरने एंव विरोध प्रदर्शन हुए तथा अभियुक्तों के परिजनों की तरफ से कई बार ज्ञापन दिया गया. बेगुनाही के तथ्य दिए गए और न्याय की गुहार लगायी गई.
इस मुकदमें को फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाने की बार-बार मांग होती रही. लेकिन फास्ट या स्लो की बहस तो उसी समय समाप्त हो जाती है जब 6 सालों में मात्र दस गवाहियां होती हैं. कानून के जानकारों का मानना है कि मुकदमें विलंब से चलने से अभियोजन का पक्ष कमजोर पड़ता है. यही कारण है कि बचाव पक्ष की तरफ से मुकदमें की कार्रवाई में विघ्न डालकर उसे लंबित करने का प्रयास किया जाता है. लेकिन यहां मामला उलटा है. बचाव पक्ष तेजी से सुनवाई चाहता है और अभियोजन गवाहों को पेश करने में महीनों का
समय बर्बाद कर देता है.
कुछ इसी प्रकार की स्थिति उत्तर प्रदेश की अन्य आतंकी घटनाओं के मुकदमों की भी है. जहां सामान्य अपराधों के मामले में स्पेशल कोर्ट और फास्ट ट्रैक कोर्ट का प्रावधान किया गया हो वहां आतंकवाद से निपटने के लिए तेजी से मुकदमों को निपटाने के प्रति गंभीरता न दिखाने के मायने क्या हैं. जिस अपराध के लिए विशेष पुलिस बल का गठन राज्य और केन्द्र दोनों के स्तर पर किया गया हो, खुफिया एजेंसियां विशेष अभियान चलाती हों, उसका मुकाबला करने के लिए आधुनिक उपकरणों पर पानी की तरह पैसा बहाया जाता हो, हर घटना के बाद आतंकवादियों से सख्ती से निपटने के लिए कड़े कानून बनाने की बात की जाती हो उसको अदालतों में अभियोजन की तरफ से लटकाए रखने का क्या औचित्य हो सकता है.
अक्सर लोग अमेरीका की आतंकवाद से लड़ने की नीति की सराहना करते नहीं थकते और कई राजनेता तो उसी तर्ज पर सुरक्षा एंव खुफिया एजेंसियों को और अधिक  शाक्ति देने की वकालत करते हैं. लेकिन वहां की अदालतों की तरह तेजी से सुनवाई कर फैसला देने की बात कोई नहीं करता और न ही इन ऐजेंसियों की संसद के प्रति जवाबदेही की चर्चा होती है.
जहां तक रामपुर सीआरपीएफ कैंप की घटना का सवाल है तो कई मानवाधिकार संगठन इसे आतंकी घटना ही नहीं मानते. उनका मानना है कि नव-वर्ष के अवसर पर नशे में डूबे जवानों की आपसी गोलीबारी जैसी अपराधिक अनुशासन हीनता को छिपाने के लिए इसे आतंकवादी घटना का रूप दे दिया. यह बात भी सामने आई थी कि कुछ जवानों को डाक्टरों ने मनोरोगी बताते हुए उन्हें किसी भी प्रकार का शस्त्र न देने की सलाह दी थी. कथित आतंकवादियों द्वारा प्रयोग में लाए जाने वाले वाहन के मामले में भी अधिकारियों की तरफ से कई विरोधाभासी बयान आए थे. कुछ सवालों के जवाब तो मिले ही नहीं जैसे दो बजे रात में सीआरपीएफ कैंप का मुख्य गेट क्यों खुला था? 
इस केस में पकड़े गए प्रतापगढ़ के कौसर फारूकी के बारे में कहा गया कि हमले में प्रयुक्त हथियार उसकी दुकान में रखे गए थे. जब यह तथ्य सामने आया कि पहली जनवरी 2008 को कौसर फारूकी ने किराए की दूसरी दुकान में अपन सामान शिफ्ट किया था तो उस समय एसएसपी प्रतापगढ़ ने एसटीएफ के हवाले से यह कहा था कि हथियार उसने अपनी रामपुर की दुकान में छुपाया था. जबकि परिवार का कहना है कि उसकी रामपुर में कोई दुकान नहीं थी और यह कि परिवार का कोई सदस्य कभी रामपुर नहीं गया और न ही पुलिस अब तक इस प्रकार की कोई जानकारी जुटा पाई है.
इस संबंध में मानवाधिकार संगठनों द्वारा उठाए गए अनेकों प्रश्नों का अब तक संतोशजनक उत्तर भी नहीं मिल पाया है. घटना के बाद कुछ सीआरपीएफ जवानों से पूछताछ अवश्य की गई थी जो किसी प्रत्यक्षदर्शी या पीडित से जानकारी प्राप्त करने से अलग पूछताछ के दायरे में आती है. इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी यह किसी को नहीं मालूम.
उत्तर प्रदेश सरकार ने आतंकवाद के नाम पर पकड़े गए बेगुनाहों को रिहा करने का वादा किया था. यही मांग पीडित परिवारों और मानवाधिकार एंव सामाजिक संगठनों की तरफ से भी की गई थी. परन्तु प्रदेश सरकार ने इस प्रकार की कोई जांच नहीं करवाई जिससे उनको अपनी बेगुनाही साबित करने का मौका मिलता. हद तो यह है कि हकीम तारिक कासमी और मौलाना खालिद मुजाहिद की गिरफतारी को फर्जी बताने वाली निमेश आयोग की रिपोर्ट को भी दबाए रखा.
सरकार ने रिहाई के लिए पत्र लिखकर यह संकेत देने की कोशिश की कि वह बेगुनाहों को नहीं बल्कि आतंकवादियों को छोड़ने जा रही है जिसकी अनुमति कोई भी अदालत नहीं दे सकती थी और वही हुआ भी. आतंकवाद के नाम पर होने वाली राजनीति का यह अपने तरह का अनोखा उदाहरण है.
 
मसीहुद्दीन संजरी
(संयोजक रिहाई मंच आजमगढ़)
संजरपुर, आजमगढ़ उत्तर प्रदेश
08090696449

देयर वाज ए नेशन-वाइड यूनियन फॉर बैक्टीरिज, नेम्ड संजय विचार मंच

परजीवी तो समझते हैं ना आप ? परजीवी मतलब, कीट-बैक्टीरिया टाइप. तो, देयर वाज ए नेशन-वाइड यूनियन फॉर दैट टाइप सच बैक्टीरियाज, नेम्ड संजय विचार मंच. जी हां, ऐसे परजीवी लोगों का सांगठनिक गिरोह था. 
संजय विचार मंच परजीवी लोगों का जीवंत पर्याय था. जो खुद तो कुछ नहीं उपजा सकते थे, फीता-कृमि की तरह पूरे समाज ही पूरी आंत घायल कर डालते थे. इसमें शामिल हर इकाई-व्यक्ति था पक्का नौटंकीबाज, जिसमें था केवल आज या ज्यादातर कल-परसों के शराब-भोजन चरने का माद्दा. परसों से ज्यादा तक समेटने की कूवत-भसोट इन लोगों में थी ही नहीं. मुर्गीचोर और लुटियाचोरों को इससे ज्यादा का इल्म ही कहां होता है? यह दीगर बात थी कि बड़े खंडहरनुमा हवेलियों के स्वामी लोग ऐसे लोगों को अपने यहां पाल लेते थे. मकसद हुआ करता था कि ऐसे सांड़ जैसे लोग जहां मौजूद रहेंगे तो ऐसी प्रापर्टी की ओर से कोई भी नहीं देखेगा. 
यह लोग शहर और प्रदेश के चंद बड़े पत्रकारों-संपादकों के चंटू-टाइप मित्र हुआ करते थे. यह इनकी मजबूरी भी थी और इन पत्रकारों की आदत भी. जहां-तहां घरेलू पार्टी आयोजित करने के लिए इन चिंटुओं का दफ्तर बार-दारूखाना बन जाता था. जहां कभी-कभी आयोजित होने वाले दुष्कर्म के आनंद-पर्व भी ऐसे ही कार्यालयों में संपादित हो जाते थे. समवेत भाव में पत्रकार भी इसमें अपनी-अपनी तुरही बजा लेते थे. चाहे वे चंबल से लखनऊ पहुंच कर सुरमा लगा रहे हों या फिर फैजाबाद से पहुंच कर दिल्ली की जमीन खोद-गोड़ रहे हों. वैसे भी पत्रकारों की औकात मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सरेआम नंगी कर दी है. अखिलेश ने अपने सरकारी आवास में पत्रकारों को खूब बेइज्‍जत किया लेकिन किसी ने भी चूं तक नहीं की. पत्रकारों के नेताओं के पास तो और भी धंधे होते हैं, है कि नहीं ? वे अपनी दलाली चमकाने के लिए सरकारी लोगों की जूतियां चाटें या अवाम-जन अभिव्यक्ति बरास्ते अपने अपमान का विरोध जताएं. उनके इस चरित्र का असर आसन्न चुनावों में शर्तिया पड़ेगा. खैर लहर अब शुरू होनी ही वाली है. लेकिन इस बार की सर्दियों में तो यूपी की राजनीति की आग में तपती ही रहेगी. शुरूआत हो ही चुकी है. किसी के घर आटा गीला हो चुका है तो कहीं इतना कड़ा हो चुका है कि पत्थर तक शर्मिंदा हो जाए. किसी के चूल्हे में रोटियों कहीं सेंकी जा रही हैं, तो कहीं जलायी-फूंकी जा रही है. कहीं कोई अपनी पार्टी को मजबूत करने में जुटा है तो कोई अपनी ही लुटिया डुबोने में जुटा है. कई ऐसे लोग तो बहुतायत में मौजूद हैं जो इस चुनावी पॉलिटिकल-मैदान में अपनी रोजी-रोटी के साथ ही साथ दारू-भोजन खोजने में श्वान-श्रंगाल की तरह यत्र-तत्र-सर्वत्र विचरण कर रहे हैं. ऐसे मरभुक्खे लोगों का सूक्ति-वाक्य है:- पहले भोजन फिर साड़ी, भाड़ में जाए पार्टी.
खैर, देश में चुनाव की सुरमई सरगर्मी छा रही है. मेरी कलम बेचैन है. तो अब बिना किसी भूमिका के, मैं उन संगठनों, व्यक्तियों और व्यक्तिनुमा लोगों से आप लोगों का सीधा साक्षात्कार कराना चाहता हूं जो मेरे हिसाब से उपरोक्त शर्तों-पायदानों पर खरे उतरते हैं. पहला नाम है संजय विचार मंच.
 
लेखक कुमार सौवीर से  kumarsauvir@gmail.com के जरिए संपर्क किया जा सकता हैं.

अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान से अलंकृत होंगे डॉ.प्रेम जनमेजय

भोपाल : हिंदी की साहित्यिक पत्रकारिता को सम्मानित किए जाने के लिए दिया जाने वाला पं. बृजलाल द्विवेदी अखिल भारतीय साहित्यिक पत्रकारिता सम्मान इस वर्ष ‘व्यंग्य यात्रा’ (दिल्ली) के संपादक डॉ. प्रेम जनमेजय को दिया जाएगा. डॉ. प्रेम जनमेजय साहित्यिक पत्रकारिता के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर होने के साथ-साथ देश के जाने-माने व्यंग्यकार एवं लेखक भी हैं. वे पिछले नौ वर्षों से व्यंग्य विधा पर केंद्रित महत्वपूर्ण पत्रिका ‘व्यंग्य यात्रा’ का संपादन कर रहे हैं.
पुरस्कार के निर्णायक मंडल में सर्वश्री विश्वनाथ सचदेव, रमेश नैयर, डॉ. सच्चिदानंद जोशी, डॉ. सुभद्रा राठौर और जयप्रकाश मानस शामिल हैं. इसके पूर्व यह सम्मान वीणा (इंदौर) के संपादक स्व. श्यामसुंदर व्यास, दस्तावेज (गोरखपुर) के संपादक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, कथादेश (दिल्ली) के संपादक हरिनारायण, अक्सर (जयपुर) के संपादक डॉ. हेतु भारद्वाज और सद्भावना दर्पण (रायपुर) के संपादक गिरीश पंकज को दिया जा चुका है. त्रैमासिक पत्रिका ‘मीडिया विमर्श’ द्वारा प्रारंभ किए गए इस अखिल भारतीय सम्मान के तहत साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान करने वाले संपादक को 11,000 रुपए, शॉल, श्रीफल, प्रतीकचिन्ह और सम्मान पत्र से अलंकृत किया जाता है.
ये सम्मान समारोह आगामी 7 फरवरी 2014 को गांधी भवन, भोपाल में आयोजित किया जाएगा. मीडिया विमर्श पत्रिका के कार्यकारी संपादक संजय द्विवेदी ने बताया कि आयोजन में अनेक साहित्कार, बुद्धिजीवी और पत्रकार हिस्सा लेगें. इस अवसर पर ‘मीडिया और लोकजीवन’ विषय पर व्याख्यान भी आयोजित किया जाएगा.
 
संजय द्विवेदी

जन सहयोग से बनी फिल्म ‘नया पता’ की स्क्रीनिंग आज

नए साल की शुरूआत में ही फिल्म 'नया पता' की स्क्रीनिंग नई खुशी लेकर आने वाली है. 'नया पता' भोजपुरी में बनने वाली ऐसी पहली फिल्म है जिसका निर्माण crowd funding (जन सहयोग) से किया गया है.
इस फिल्म को रिलीज करने के लिए पिछले 2 साल से प्रयास किये जा रहे थे. 'नया पता' भोजपुरी फिल्मों से काफी अलग है. 'नया पता' बस एक फिल्म न होकर एक सपनों की एक यात्रा है और यह सपना है-पवन भाई का. मुझे खुशी है कि मैं उनका मित्र हूं. 
पवन भाई से मेरी दोस्ती 3 साल पहले फेसबुक पर हुई थी लेकिन जल्द ही यह फेसबुक की दुनिया से असल दुनिया में पहुंच गई और यह दिनों-दिन गाढ़ी होती गयी. फिल्म बनाने को लेकर पवन भाई शुरू से सपने देखा करते थे. जीवन के उतार-चढाव के बीच संयोग ने दस्तक दी और पवन भाई मुंबई पहुंच गए. वहां वे नितिन चंद्रा के सहयोगी के रूप में काम करने लगे. इस बीच फोन पर हमारी बातचीत होते रहती थी. कुछ दिनों बाद अचानक एक दिन रात के २ बजे के करीब पवन भाई का फोन आया. मैं उस समय पढ़ रहा था. पवन भाई ने फोन उठाते ही कहा कि -'पुनीत, मैंने अभी-अभी एक कहानी लिखी है', मैंने कहा-तो जल्दी सुनाइए. पवन भाई ने पूरी कहानी फोन पर सुनाई.
कहानी का अंत तब तक नहीं लिखा गया था. पहली बार में ही कहानी दिलो-दिमाग में छा गई. इसके अंत को लेकर हमने बहुत देर तक विचार-विमर्श किया. उस समय इस कहानी पर फिल्म बनाने का कोई इरादा नहीं बना था. थोड़े दिनों के बाद जब यह कहानी थोड़े फेरबदल के बाद पूरी हुई तो लगा कि इस पर फिल्म बन सकती है. कुछ समय बाद मैं गांव गया था, उस दौरान पवन भाई भी छपरा अपने घर आये हुए थे. पूरी कहानी सुनने की योजना बनी और पवन भाई छपरा से दरौंदा (मेरे गांव से नजदीक का स्टेशन) पहुंचे मुझे कहानी सुनाने के लिए. वहीं प्लेटफार्म पर बैठकर कहानी सुनी मैंने. फिर योजना पर बहुत देर तक विचार हुआ कि कैसे फिल्म बनाई जा सकता है. धीरे-धीरे मन बनता जा रहा था फिल्म बनाने को लेकर. स्क्रिप्ट तैयार की पवन भाई ने लेकिन अभी आत्मविश्वास तैयार होना बाकी था. पवन भाई ने फिल्मी दुनिया के लोगों से मिलना-जुलना शुरू किया और कहानी पर उनसे राय लेनी शुरू की. जिसने भी कहानी सुनी, उसकी तारीफ की और फिल्म बनाने के बारे में अपने अमूल्य सुझाव दिए. इस तरह धीरे-धीरे आत्मविश्वास का भी निर्माण होने लगा था. जब इंसान कोई काम करने की शुरुआत करता है तो संशय के बादल उसे घेरे रहते हैं लेकिन जैसे ही उस काम के बारे में सकारात्मक प्रतिक्रियाएं या तारीफ मिलनी शुरू होती है तो संशय के बादल छंटते जाते हैं और वह दुगुने उत्साह से खुले आसमान के सफर पर निकल पड़ता है. 
पवन भाई फिल्म बनाने का पक्का निर्णय ले चुके थे और दोस्तों का समर्थन इस निर्णय को मजबूत बनाता जा रहा था. लेकिन फिल्म बनाना इतना आसान होता तो न जाने कितनी फिल्में और कितने फिल्मकार होते. मूलभूत जरूरत 'पैसा' मूलभूत समस्या के रूप में सामने खड़ा था. और हमारे पास कोई समाधान नहीं था. हम मध्यवर्गीय परिवार के लोग सपनें तो बड़े-बड़े देखते हैं, उसको पूरा करने की काबिलियत, हौसला और जुनून भी रखते हैं पर संसाधनो की कमी हमें वापस जमीन पर ला पटकती है. 
जन सहयोग से फिल्म बनाने की बात दिमाग में थी तो लेकिन लगता था कि हमें कोई पैसा क्यों देगा? वो भी तब जब वापस मिलने की कोई गारंटी भी न हो?
उसी बीच पवन भाई की मुलाकात ' I AM ' फिल्म के निर्देशक ओनीर से हुई, जिन्होंने I AM का निर्माण जन सहयोग से ही किया था. ओनीर ने पवन भाई का हौसला बढ़ाया और अपने बहुमूल्य सुझाव दिए. फिर शुरू हुआ चंदा मांगने का काम. फेसबुक और जीमेल ने इस काम में बहुत साथ दिया और लोगों ने पवन भाई पर विश्वास जताते हुए फिल्म बनाने के लिए चंदा देना शुरू कर दिया. इसी दौरान पवन भाई ने अपनी जमा-पूंजी लगाकर काम धीरे-धीरे शुरू कर दिया था.
फिल्म बनाने के लिए कलाकार और actors और technicians की खोज हो चुकी थी और खुशी एवं उत्साह बढाने वाली बात यह थी कि लगभग सभी लोग फ्री में काम करने के लिए तैयार हो गए थे. फिर भी अन्य इंतजामों के लिए पैसा तो लगना ही था. लाइट और बाकी उपकरणों एवं अन्य जरुरी चीजों का प्रबंध पटना से ही हुआ था. पटना में इकट्ठा होकर टीम रोहतास के लिए रवाना हुई जहां शूटिंग शुरू होनी थी. जैसे-जैसे पैसा आता था वैसे-वैसे काम होता था. कई बार बीच में रुकना भी पड़ा. जेनरेटर के तेल तक के लिए पैसा जुटाना बहुत बड़ी समस्या थी. लेकिन लोगों के सहयोग ने इसे संभव बनाया. 150 से ज्यादा लोगों ने अपना-अपना सहयोग देकर इस सपने को साकार बनाया. रोहतास और छपरा की शूटिंग के बाद एक हिस्सा दिल्ली में भी शूट करना था. दिल्ली में भी कई मुश्किलों के बाद अंततः यह पूरा हुआ. 
शूटिंग पूरी होने के बाद पैसा की समस्या फिर खड़ी हो चुकी थी. साउंड रिकॉर्डिंग और एडिटिंग में मोटा पैसा लगना था. खैर,पैसे का तो इंतजाम हुआ लेकिन समय बहुत लग गया. इस बीच पवन भाई कई बार परेशान-हताश भी हुए. लेकिन दोस्तों का सहारा उन्हें हौसला देता रहा. उनका व्यवहार और व्यक्तित्व उन्हें मित्रों की कमी नहीं होने देता, उनकी मित्र सूची बहुत लंबी है. इस दौरान 'नया पता' को मीडिया अटैंशन भी मिलता रहा. यह बहुत उत्साहवर्धक था. लंबी मेहनत, धैर्य और लोगों के सहयोग से यह फिल्म पूरी हुई. इनमे से बहुत सारे लोगों को मैं जानता हूं लेकिन बहुत लोगों को नहीं भी जानता हूं. 
नए साल 2014 में आज शाम 7 बजे इंडिया हैबीटेट सेंटर के स्टेन ऑडिटोरियम में इसकी पहली स्क्रीनिंग होने जा रही है.
फिल्म की कहानी के बारे में जान-बूझकर चर्चा नहीं कर रहा हूं क्योकि मैं चाहता हूं कि आप आज इस फिल्म को जरुर देखें और अपनी कीमती राय देकर पवन भाई और उनकी टीम का उत्साह बढ़ाएं.
 
पुनीत पुष्कर  

आम आदमी पार्टी ने दिखाई राजनीति की नई ‘डगर’

आम आदमी पार्टी (आप) ने अपनी पहली राजनीतिक धमक से ही भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों को नया पाठ पढ़ा दिया है. राष्ट्रीय राजधानी की इस नवोदित पार्टी ने महज सवा साल के अंदर ही अपनी विशिष्ट पहचान बना ली है. दिल्ली विधानसभा के चुनाव में इसने जोरदार जीत हासिल करके बडे-बड़े राजनीतिक ज्ञानियों को भी हैरानी में डाल दिया है.
इस पार्टी के नए खिलाड़ी उस्तादी के ऐसे दांव दिखा रहे हैं कि उनसे स्थापित पार्टियों के घाघ नेता भी हैरान हो रहे हैं. अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली में सरकार बनी है. इस सरकार ने अपने कार्यकाल के महज दो कार्य दिवसों में ही दो बड़े फैसले कर डाले. ये फैसले ‘आप’ के प्रमुख चुनावी मुद्दे रहे हैं. मजबूत राजनीतिक संकल्प वाले नेतृत्व ने बगैर देरी के फैसले ले लिए, वो भी बड़ी विषम स्थितियों में. क्योंकि, मुख्यमंत्री केजरीवाल पिछले तीन दिनों से बीमार हैं. उन पर बुखार और डायरिया का प्रकोप जारी है. लेकिन, आम आदमी की सच्ची राजनीति करने वाले केजरीवाल ने अपनी बीमारी को भी ठेंगा दिखाने की कोशिश कर डाली.
 
दिल्ली चुनाव में इस पार्टी ने 70 में से 28 सीटें जीत ली हैं. यद्यपि यहां पर 32 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी है. लेकिन, वह बहुमत से चार सीटें पीछे रह गई, तो सत्ता उसके हाथ से फिसल गई. कांग्रेस यहां महज 8 सीटों तक ही सिमट गई है. सीटों के इस अंक गणित के चलते यहां कोई पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थी. ऐसे में, आशंका बढ़ गई थी कि यहां दोबारा चुनाव की नौबत आ सकती है. इसकी खास वजह यह थी कि बहुत पहले ‘आप’ ने घोषित किया था कि वह न तो किसी पार्टी को सरकार बनाने के लिए समर्थन देगी और न लेगी. इस सैद्धांतिक अड़चन के कारण कई दिनों तक सरकार गठन को लेकर दुविधा की स्थिति जारी रही थी. ऐसे में, कांग्रेस ने रणनीतिक कारणों से ‘आप’ को बगैर शर्त के समर्थन देने की पेशकश कर दी. इसी के बाद केजरीवाल के नेतृत्व में सरकार गठन की प्रक्रिया शुरू हुई. अंतत: 28 दिसंबर को केजरीवाल ने भारी जनसमूह के बीच मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.
 
सरकार गठन के साथ ही इसके कार्यकाल को लेकर कयासबाजी तेज हो गई है. कोई नहीं जानता कि ये सरकार कितने समय तक चल पाएगी? केजरीवाल खुद स्वीकार कर चुके हैं कि उनकी सरकार कभी भी गिर सकती है. वे इस खतरे को अच्छी तरह से समझ रहे हैं. लेकिन, इसको लेकर वे जरा भी चिंतित नहीं हैं. इस चिंता में वे जोड़-तोड़ की राजनीति तो सपने में भी नहीं करना चाहेंगे. लेकिन, उनका यह पक्का संकल्प है कि जब तक सरकार है, तब तक वे आम आदमी के हित वाले लगातार फैसले करते रहेंगे. वह भी बगैर किसी दबाव में आए. केजरीवाल की सरकार कांग्रेस के समर्थन पर जरूर टिकी है, लेकिन मुख्यमंत्री, कांग्रेस के किसी दबाव में नहीं दिखाई पड़ते. सत्ता में आने के बाद भी उन्होंने दोहरा दिया है कि जल्दी ही उनकी सरकार शीला दीक्षित के कार्यकाल के तमाम घोटालों की खबर लेगी. इन घोटालों की पड़ताल के लिए उच्चस्तरीय जांच कराई जाएगी. लक्ष्य यही रहेगा कि घोटालेबाजों को जल्द से जल्द तिहाड़ जेल भिजवाया जाए. 
 
‘आप’ के नेताओं ने यह भी कहा है कि भाजपा नेतृत्व वाले नगर निगम के घोटालों की भी वे लोग पड़ताल कराएंगे. क्योंकि, नगर निगम में भी पिछले वर्षों के दौरान करोड़ों रुपए के घोटाले हुए हैं.  नई सरकार के इस ऐलान से दिल्ली कांग्रेस के नेताओं में जबरदस्त गुस्सा रहा है. इसी गुस्से के चलते बीच-बीच में इस आशय की अटकलें बढ़ती जा रही हैं कि कांग्रेस के विधायक विश्वासमत के दौरान सरकार के पक्ष में वोट देंगे या नहीं? उल्लेखनीय है कि अगले दो दिनों में ही केजरीवाल सरकार को विधानसभा में अपना विश्वासमत लेना है. जाहिर है, कांग्रेस के सभी विधायकों ने यदि एकजुट होकर सरकार के पक्ष में वोट नहीं दिया, तो सरकार के अस्तित्व के लिए खतरा पैदा हो सकता है. इस आशय की खबरें लगातार आ रहीं हैं कि कांग्रेस के कई विधायक दबाव बना रहे हैं कि पार्टी का नेतृत्व सरकार के समर्थन के लिए उन पर दबाव न डाले. ताकि,वे मनमानी खेल कर सकें.
 
दरअसल, ये विधायक सरकार की कार्यशैली से शुरू में ही खौफ खाते देखे जा रहे हैं. मुख्यमंत्री कह चुके हैं कि क्षेत्रीय विकास के नाम पर हर साल दी जाने वाली विधायकों की निधि का प्रावधान वे खत्म कर देंगे. क्योंकि, सभी जानते हैं कि विकास की निधि के नाम पर जारी होने वाली इस मोटी रकम में भारी कमीशनखोरी होती है. ‘आप’ नेतृत्व ने तैयारी की है कि विधायकों के नाम आवंटित होने वाला करोड़ों का यह सालाना फंड मोहल्ला समितियों को सौंप दिया जाए, ताकि यही समितियां तय करें कि विकास निधि का उपयोग किस तरह से हो? सरकार के इस मंसूबे से कांग्रेस और भाजपा के विधायकों में बेचैनी देखी जा रही है. एक टीवी न्यूज चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन के जरिए कांग्रेस विधायकों का इस संदर्भ में असली चेहरा दिखाने की कोशिश की थी.
 
इस खुलासे में कांग्रेस के पांच विधायकों को यह कहते हुए दर्शाया गया कि यदि केजरीवाल सरकार ने कांग्रेस नेताओं के खिलाफ जांच बैठाई, तो वे लोग सरकार नहीं चलने देंगे. जरूरत पड़ेगी, तो विधानसभा में जमकर हंगामा करेंगे. विधायक निधि के प्रावधान में बदलाव के प्रकरण में एक विधायक ने तो यहां तक कह डाला कि यदि केजरीवाल सरकार ऐसा करेगी, तो वे लोग विधानसभा में ही जूत (जूता) बजा देंगे.
‘आप’ कोर ग्रुप के सदस्य योगेंद्र यादव कहते हैं कि मौजूदा स्थिति में यह सरकार इसी सप्ताह गिर सकती है, या हो सकता है कि जनता के दबाव में सरकार पांच साल का अपना कार्यकाल पूरा भी कर ले. क्योंकि, उन्हें अच्छी तरह से पता है कि आम जनता के दबाव की वजह से कांग्रेस नेतृत्व भी आसानी से उनकी सरकार गिराने का जोखिम नहीं लेना चाहेगा. लेकिन, कांग्रेस के फैसले को लेकर वे लोग जरा भी चिंतित नहीं हैं. क्योंकि, यह फैसला कांग्रेस का है. हमने इतना जरूर साफ कर दिया है कि उनके समर्थन की वजह से हम उनके लोगों के ‘पाप’ माफ करने नहीं जा रहे. घोटालों की जांच होगी, तो जो भी दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ कार्रवाई होगी. ऐसे में, चाहे कांग्रेस वाले नाराज हों, या भाजपा वाले. उन्हें परवाह नहीं है. 
‘आप’ के उदय के साथ ही देश की राजनीति में अंदर ही अंदर बदलाव की बयार तेज हो गई है. यदि ‘आप’ की राजनीति का दबाव नहीं होता, तो भाजपा नेतृत्व जोड़-तोड़ के जरिए आसानी से यहां सरकार बना लेता. क्योंकि, उन्हें तो सरकार बनाने के लिए महज चार विधायकों की ही दरकार थी.
 
यह काम उनके उस्तादों के लिए कोई मुश्किल नहीं था. क्योंकि, झारखंड से लेकर कई राज्यों में भाजपा के कारीगर अपनी जोड़-तोड़ की उस्तादी का कौशल दिखा चुके हैं. लेकिन, इन्होंने दिल्ली में ऐसा नहीं किया. इस पार्टी के नेता डॉ. हर्षवर्धन ने उपराज्यपाल नजीब जंग को जाकर बता दिया था कि उनके पास सरकार बनाने लायक ताकत नहीं है. इस परिघटना को भी बदलाव की राजनीति से जोड़कर देखा गया. इसके बाद कांग्रेस ने बगैर मांगे हुए केजरीवाल को समर्थन दिया. इतना ही नहीं पार्टी के नेतृत्व ने दबाव बनाया कि ‘आप’ वाले सरकार बना लें. इसके लिए उपराज्यपाल ने भी जोर लगाया. यहां तक कि राष्ट्रपति भवन से भी सरकार बनाने के लिए केजरीवाल को ज्यादा समय देना मंजूर किया गया. 
 
हैरानी की बात यह रही कि आखिरी क्षणों तक केजरीवाल कांग्रेस के खिलाफ हुंकार भरते रहे. वे यह कहने में नहीं चूके कि उनकी सरकार शीला दीक्षित के कार्यकाल में हुए घोटालों की जांच वरीयता के आधार पर कराएगी. इस पार्टी के नेताओं ने डंके की चोट पर कहा कि संभव है कि शीला दीक्षित के सरकार में रहे कई मंत्री 2014 में तिहाड़ जेल का रुख करते नजर आएं. इन जली-कटी बातों के बावजूद कांग्रेस नेतृत्व ने केजरीवाल को समर्थन देने का संकल्प जताया है, तो यह भी नई राजनीति का ही कमाल है. नई सरकार ने दो दिन में ही दो बड़े चुनावी वायदे निभा दिए. ये हैं, मुफ्त पेय जल देने और बिजली दरों में भारी कटौती का. 
 
आशंकाएं की जा रही थीं कि सत्ता संभालने के बाद केजरीवाल सरकार को पता चल जाएगा कि लोक-लुभावन वायदों को जमीन पर नहीं उतारा जा सकता. आलोचक कह रहे थे कि दिल्ली की बिजली कंपनियां अपनी दरों में बढ़ोत्तरी के लिए दबाव बना रही हैं. ऐसे में, यहां पर 50 प्रतिशत की कटौती असंभव है. यदि सरकार ने दबाव बनाया, तो पूरी बिजली व्यवस्था ही ध्वस्त हो सकती है. इसी तरह इस पार्टी ने वायदा किया था कि वे लोग सरकार में आएंगे, तो प्रति परिवार रोजाना 700 लीटर पेयजल मुफ्त मुहैया कराएंगे. इस मुद्दे पर भी तरह-तरह की बातें की जा रही थीं. शुरुआत में दिल्ली जल बोर्ड के अधिकारी भी कह रहे थे कि मुफ्त जल देने की व्यवस्था संभव नहीं है. लेकिन, सरकार ने मजबूत राजनीतिक संकल्प के तेवर दिखाए, तो फटाफट दोनों फैसले कर लिए गए. 
 
हैरानी की बात तो यह है कि इस बीच मुख्यमंत्री बीमार रहे हैं. वे अपना कामकाज संभालने के लिए दफ्तर भी नहीं जा पाए. लेकिन, उन्होंने दोनों फैसले दो दिन में करा दिए. इस तरह से ‘आप’ की सरकार ने दिल्ली की आम जनता को नए साल में दो बेहतरीन तोहफे दे दिए हैं. इसी के साथ इन लोगों ने यह जता दिया है कि वे लोग अलग तरह की राजनीति करने आए हैं. उनका मकसद जनसेवा का ही है. सत्ता के जरिए मालामाल होने का नहीं. जैसा कि अन्य राजनीतिक दलों की संस्कृति बन गई है. इस पार्टी ने अपनी धमाकेदार शुरुआत दिल्ली से की है. यहां राज्य स्तर पर चुनाव आयोग से उसे क्षेत्रीय दल की मान्यता भी मिल गई है. अब यह पार्टी लोकसभा के चुनाव में बड़े पैमाने पर अपने पैर पसारने की तैयारी में है. शुरू में तो लक्ष्य यही था कि करीब 100 सीटों पर ही ‘आप’ के उम्मीदवार उतारे जाएं. लेकिन, दिल्ली की सफलता के बाद इस पार्टी की पकड़ पूरे देश में मजबूत होती जा रही है. रोज हजारों लोग ऑनलाइन, पार्टी की सदस्यता ले रहे हैं. पिछले एक सप्ताह में ही इस पार्टी के साथ एक लाख से ज्यादा युवा जुड़ गए हैं. 
कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी को अमेठी में चुनावी चुनौती देने के लिए ‘आप’ के नेता कुमार विश्वास तैयार हैं. उन्होंने यहां से चुनाव लड़ने के लिए आवेदन भी कर दिया है.
 
खबर यह भी है कि ‘आप’ के एक तेज-तर्रार नेता भाजपा के ‘पीएम इन वेटिंग’ नरेंद्र मोदी को भी चुनावी चुनौती देंगे. उत्तर प्रदेश में ‘आप’ ने संजय सिंह को अपना संयोजक बनाया है. संकेत मिल रहे हैं कि ये पार्टी प्रदेश में लोकसभा की ज्यादातर सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी. खास तौर पर दिग्गज नेताओं के सामने पार्टी चुनावी चुनौती जरूर पेश करेगी. जिस तरह से दिल्ली में इस पार्टी के कार्यकर्ताओं ने बेमिसाल जनसंपर्क की शैली विकसित की है, उससे राष्ट्रीय दलों में भी बेचैनी है. राजनीति में जातिवाद, संप्रदायवाद व धनबल की भूमिका काफी बढ़ गई है. ‘आप’ ने दिल्ली के अंदर एक झटके में ही इन बंधनों को तोड़ दिया है. यह राजनीतिक प्रयोग पूरे देश ने देख लिया है. 
 
पिछले दिनों राहुल गांधी ने भी अपने लोगों से यही कहा था कि यदि पार्टी को जनता का विश्वास फिर से जीतना है, तो उसे केजरीवाल के लोगों से नई किस्म की राजनीति सीखनी होगी. अब भाजपा और कांग्रेस में भी ‘आप’ शैली की नकल करने की होड़ मची है. भाजपा के नेताओं ने भी अब ‘आप’ के राजनीतिक फंडों का इस्तेमाल करना शुरू किया है. इस पार्टी ने अपने कुछ नेताओं को आगे रखकर यह प्रचारित करना शुरू किया है कि उनकी पार्टी में भी केजरीवाल जैसे खांटी ईमानदार नेताओं की कमी नहीं है. सोशल मीडिया पर संघ परिवारियों ने एक फोटो गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पारिकर की पोस्ट की है. इस फोटो में वे एक साधारण ढाबे में खाना खाते दिखाई पड़ रहे हैं. इसमें लिखा गया है कि केजरीवाल की तरह वे भी आईआईटी से पास हैं. वे आज भी अपनी स्कूटी से विधानसभा जाते हैं. उनकी पत्नी गोवा में सब्जी लेने के लिए रिक्शे से जाती हुई दिख सकती हैं. आह्वान किया गया है कि इस पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा लोग शेयर करें, ताकि भाजपा की भी छवि कुछ निखरे. राहुल गांधी तो शुचिता की राजनीति के लिए कई ऐसे मुद्दों की पहल कर रहे हैं, जिनको लेकर केंद्र सरकार और कांग्रेस में हलचल का दौर तेज हो गया है. यह सब ‘आप’ की नई राजनीति का बढ़ा हुई दबाव तो ही है!
 
लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं.  इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

अखिलेश यादव ने की मीडिया फोटोग्राफर्स क्लब की वेबसाइट लांच

लखनऊ : उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने नए साल के पहले दिन मीडिया के हित में एक पहल की. जिसके अंतर्गत अखिलेश यादव ने बुधवार को अपने सरकारी आवास से मीडिया फोटोग्राफर्स क्लब की वेबसाइट को लांच किया. अखिलेश यादव ने कहा कि इंटरनेट ने ज्ञान और जानकारी को सर्वसुलभ बनाने में क्रांतिकारी भूमिका निभाई है, जिसके चलते वेबसाइटों में उपयोगी विवरण को शामिल किया जाना जरूरी है.
उन्होंने फोटोग्राफर्स की इस पहल की सराहना करते हुए उम्मीद जताई कि यह वेबसाइट संस्था के प्रयासों को आम जन तक पहुंचाने में सफल सिद्ध होगी. 
अखिलेश ने कहा कि फोटोग्राफर्स द्वारा खींचे गए चित्रों पर कॉफी टेबल बुक्स का प्रकाशन बेहद उपयोगी रहेगा. उन्होंने इलाहाबाद के कुंभ मेले, प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर और मुलायम सिंह यादव के व्यक्तित्व को दर्शाने वाली कॉफी टेबल बुक्स का प्रकाशन कराए जाने की बात कही. 
प्रदेश में आने वाले राजदूतों, विभिन्न दलों के नेताओं तथा अन्य महानुभाव को यह पुस्तकें उपहार स्वरूप भेंट की जा सकती हैं. साथ ही इन्हें विभिन्न दूतावासों को भी भेजा जा सकता है. इनके माध्यम से देश व दुनिया के लोगों को उत्तर प्रदेश के विभिन्न पहलुओं के बारे में उपयोगी व सार्थक जानकारियां उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी. 
इस मौके पर मीडिया फोटोग्राफर्स क्लब के अध्यक्ष एसएम पारी ने मुख्यमंत्री को जानकारी दी कि इस वेबसाइट में देश-प्रदेश व राजधानी के प्रेस फोटोग्राफर्स तथा स्वतंत्र फोटोग्राफर्स द्वारा खींचे गए चित्र तथा न्यूज चैनल कैमरामैनों की एक्सक्लूसिव वीडियो फुटेज प्रदर्शन हेतु शामिल की गई है.
इस वेबसाइट के माध्यम से राजधानी व प्रदेश की प्रमुख घटनाओं की फोटो प्रकाशन हेतु निःशुल्क प्राप्त की जा सकती है. इसके साथ ही इसमें प्रेस फोटोग्राफर्स तथा न्यूज चैनल कैमरामैनों के संपर्क नंबर और ई-मेल भी मौजूद हैं. आम जनता को भी इस वेबसाइट से काफी मदद मिल सकती है. उन्होंने संस्था की भावी गतिविधियों के बारे में भी बताया. 
राष्ट्रीय श्रमजीवी पत्रकार यूनियन (आईएफडब्लूजे) के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ पत्रकार के विक्रम राव ने इस मौके पर मुख्यमंत्री को श्रमजीवी कलमकार पत्रिका का अंक भेंट किया. इस अंक में संस्था के सदस्यों की भूटान यात्रा के संबंध में भी लेख प्रकाशित किया गया है. 

प्रसिद्ध हिंदी पत्रकार पुरुषोत्तम वज्र का दिल का दौरा पड़ने से निधन

प्रसिद्ध हिंदी पत्रकार पुरुषोत्तम वज्र का दिल का दौरा पड़ने के चलते एक निजी अस्पताल में निधन हो गया. वज्र को बीते 21 दिसंबर को दिल का दौरा पड़ा था, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. वो पिछले आठ साल से वेंटीलेटर पर थे. वज्र 60 वर्ष के थे. पुरुषोत्तम वज्र ने अपने पत्रकारिता करियर में दैनिक जनमान्य के संपादक के रूप में और संध्या वीर अर्जुन में बतौर चीफ रिपोर्टर के रूप में काम किया.
वज्र ने अपने जीवन में कविता और गजल के साथ-साथ कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की जीवन पर भी पुस्तक लिखी थी. उन्हें अपने जीवन में कई पुरस्कार मिले. वज्र 1970 के मध्य में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के साथ जुड़े थे और आपातकाल के दौरान जेल में बंद कर दिया गया था.

इंदौर में वरिष्ठ पत्रकार प्रतीक के प्लॉट पर कब्जा

इंदौर : इंदौर में एक वरिष्ठ टीवी पत्रकार के प्लॉट पर विवाद का मामला सामने आया है. इस पूरे मामले में पुलिस ने पत्रकार की रिपोर्ट पर दो लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है. तो वहीं इस मामले में एक पत्रकार ने गवाही दी है.
मामला इंदौर के खुडैल थाना क्षेत्र का है. टीवी पत्रकार प्रतीक श्रीवास्तव की रिपोर्ट पर पुलिस ने शनिवार को आरोपी आरपी पाल और अखिलेश पाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया. पुलिस से मिली जानकारी के अनुसार श्रीवास्तव का खुडैल क्षेत्र के बदियाकीमा में पांच हजार वर्ग फीट का प्लॉट था. ये प्लॉट उन्होंने वर्ष 2008 में अपनी पत्नी ज्योति के नाम से खरीदा था. लेकिन दोनों आरोपियों ने उस प्लॉट पर लगा उनका बोर्ड उखाड़ कर फेंक दिया. जब प्रतीक ने इसका विरोध किया तो उनके साथ धक्कामुक्की की गयी.

पत्रकार मर्डर केस में वॉन्टेड नक्सली गिरफ्तार

रायपुर : इस साल की शुरुआत में हुए एक पत्रकार के मर्डर में शामिल होने के आरोपी एक नक्सली को छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले से गिरफ्तार कर लिया गया है. इस पूरे मामले की जानकारी देते हुए सुकमा के एसपी अभिशेक शांडिल्य ने बताया कि एक सर्च ऑपरेशन के दौरान बंजामी हिडमा को तोंगपाल पुलिस थाना सीमा के तहत जंगल से पकड़ा गया.
एसपी ने बताया कि एक स्थानीय पत्रकार नेमी चंद जैन की हत्या के मामले में वो वांछित था और उससे जुड़ी सूचना के लिए 50,000 रुपये का इनाम भी घोषित किया गया था.
राज्य की राजधानी रायपुर से करीब 450 किलोमीटर दूर दक्षिण बस्तर के तोंगपाल में उसकी मौजूदगी संबंधी एक सूचना के आधार पर स्थानीय पुलिस की एक टीम ने घेराबंदी की और उसे पकड़ लिया गया फिलहाल उससे पूछताछ की जा रही है.

कानपुर प्रेस क्लब कार्यकारिणी समिति के चुनाव में मनोज यादव के मिले सर्वाधिक मत

कानपुर : 13 वर्षों बाद हुए कानपुर प्रेस क्लब चुनाव की कार्यकारिणी समिति के चुनाव परिणाम देर रात घोषित कर दिये गये. 
कार्यकारिणि चुनाव में सर्वाधिक मत मनोज यादव (257) हिंदुस्तान टाइम्‍स ने प्राप्त किये, बृजेश दीक्षित (स्‍वतंत्र चेतना), अजय अग्निहोत्री (आज), गजेन्‍द्र सिंह (हिंदुस्तान), ओम चौहान (टाइम्‍स आफ इंडिया), गौरीशंकर भट्ट (स्‍वतंत्र भारत), अधीर सिंह लल्‍ला (दैनिक जागरण), संजीव त्रिवेदी (आज), विकास मोहन (राष्‍ट्रीय सहारा), विक्की रघुवंशी (सियासत), संजय त्रिपाठी (हिंदुस्तान) ने कार्यकारिणी पद हेतु विजयी घोषित किये गये.

सृजनगाथा डॉट कॉम सम्मान डॉ. असंगघोष को

रायपुर : प्रथम सृजनगाथा डॉट कॉम सम्मान-2013 के लिए कवि डॉ. असंगघोष (जबलपुर) को चुना गया. यह सम्मान उन्हें उनकी कविता-कृति 'मैं दूंगा माकूल जबाब' के लिए दिया जाएगा. डॉ. असंगघोष की अब तक तीन कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनके नाम इस प्रकार है – मोश नहीं हूं मैं, हम गवाही देंगे और मैं दूंगा माकूल जबाब. वे तीसरा पक्ष पत्रिका के सह-संपादक भी हैं.
बीते 7 वर्षों से संचालित साहित्य, संस्कृति और भाषा की अंतर्राष्ट्रीय वेब पत्रिका सृजनगाथा डॉट कॉम द्वारा इस वर्ष से साहित्यिक, सांस्कृतिक, रचनात्मक व कलात्मक लेखन को प्रोत्साहित करने के लिए सृजनगाथा सम्मान का शुभारंभ किया गया है. डॉ. असंगघोष को सम्मान स्वरूप 21,000 की नगद राशि, प्रशस्ति पत्र, शॉल और श्रीफल प्रदान कर अंलकृत किया जाएगा. इस सम्मान को देने के लिए एक चयन समिति का गठन हुआ था, जिसमें गिरीश पंकज, पूर्व सदस्य साहित्य अकादमी व संपादक सद्भावना दर्पण, रायपुर, डॉ. सुशील त्रिवेदी (आईएएस) वरिष्ठ साहित्यकार, रायपुर, अशोक सिंघई, वरिष्ठ कवि, भिलाई, डॉ. बलदेव, वरिष्ठ आलोचक, रायगढ़ शामिल हैं.
चयन समिति के सदस्यों ने उन्हें 'अमानवीय होते समाज में मानवता के छूटते जा रहे पहलुओं को धैर्य और प्रामाणिकता के साथ रेखांकित करनेवाला कवि' बताया है. 
सृजनगाथा डॉट कॉम के संपादक जयप्रकाश मानस ने बताया कि यह सम्मान 8 वें अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन श्रीलंका कैंडी के मुख्य अलंकरण समारोह में 20 जनवरी के दिन दिया जाएगा. डॉ. असंगघोष को ये सम्मान हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक डॉ. खगेंद्र ठाकुर, श्रीलंका में पदस्थ भारत के द्वितीय सचिव व कवि विनोद पाशी तथा मॉरीशस की लेखिका रेशमी रामधोनी के कर कमलों से प्रदान किया जायेगा. 

उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और राज्यपाल ने संवैधानिक गरिमा को ताक पर रखा

स्वतंत्रता सेनानी और संविधान सभा के सदस्य स्वर्गीय रणबीर सिंह की 100वीं जयंति पर एमडीयू रोहतक में रणबीर सिंह शोधपीठ द्वारा आयोजित एक समारोह में जहां मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने तो अपने पिता को देवता बताया ही, वहीं देश और प्रदेश के संवैधानिक पदों पर बैठे हरियाणा के राज्यपाल महामहिम जगन्नाथ पहाडिया और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने भूपेंद्र सिंह हुड्डा और उनके सांसद बेटे दीपेंद्र हुड्डा की तारीफ के पुल बांधते हुए अपने पदों की मर्यादा को भी ताक पर रख दिया.
राज्य के गर्वनर पहाडिया साहब ने हुड्डा की सरकार के विकास कार्यों की आलोचना करने वाले उनके राजनीतिक विरोधियों को करारा जवाब देते हुए कहा कि हालांकि ये उनका विषय नहीं है लेकिन जो लोग हरियाणा में विकास के बारे में भ्रांति फैला रहे हैं वे हरियाणा में आकर देखें, उनकी आंखें खुल जाएंगी.
उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने रणबीर सिंह को कुशल प्रशासक बताते हुए कहा कि उन्हें खुशी है कि रणबीर सिंह के बेटे हरियाणा के मुख्यमंत्री भूपेंद्र हुड्डा और उनके पोते यानि दीपेंद्र हुड्डा जो रोहतक से सांसद हैं. रणबीर सिंह के दिखाए रास्ते पर चलकर उनकी जनकल्याण की नीतियों की हरियाणा में पालन कर रहे हैं. अब राज्यपाल पहाडिया साहब द्वारा हुड्डा की चापलूसी करने की बात तो समझ में आती है क्योंकि हुड्डा सरकार ने पहाडिया साहब को ओब्लाइज कर रखा है. हामिद अंसारी द्वारा दीपेंद्र हुड्डा तक की चापलूसी करना समझ में नहीं आता, हालांकि दीपेंद्र हुड्डा उस समय समारोह में मौजूद भी नहीं थे.
इस समारोह में मंच से कई बार कहा गया है कि ये खुशी की बात है कि आज रणबीर सिंह के जन्मदिन के अलावा शहीद उद्यम सिंह का जन्मदिन भी है लेकिन हुड्डा, पहाडिया और अंसारी ने उद्यम सिंह के बलिदान के बारे में एक शब्द भी कहना उचित नहीं समझा. याद दिला दें कि उद्यम सिंह ने जलियांवाला बाग में निर्दोश लोगों की हत्या के विरोध में इंग्लैंड जाकर जनरल डायर को गोली मार दी थी, लेकिन चूंकि उनके वंशज रणबीर सिंह के बेटे और पोते की तरह राजनीति में नहीं हैं इसलिए उन्होंने उनका नाम लेना उचित नहीं समझा. ये अलग बात है कि लोक संपर्क विभाग हरियाणा द्वारा अखबारों में उद्यम सिंह के बलिदान के बारे में विज्ञापन दिए गए थे लेकिन पूरे प्रदेश में कोई सरकारी समारोह नहीं किया गया. हालांकि हुड्डा ये कहते नहीं थकते कि वे स्वतंत्रा सेनानियों और शहीदों का सम्मान करते हैं. उनकी सरकार ने उन्हें कल्याण के लिए कई काम किए हैं. याद दिला दें कि उनके संरक्षण में स्वतंत्रता सेनानी उत्तराधिकार संगठन भी है जिसके अध्यक्ष उनके पिता रणबीर सिंह के दोस्त शीलबहादुर यायाजी के बेटे सत्यानंद यायाजी हैं. हुड्डा साहब ने सत्यानंद यायाजी को तो इतना बड़ा कालोनाइजर बना दिया कि उसने सोनिया गांधी के दामाद रोबर्ट वाड्रा को गुडगांव में जमीन बेची लेकिन हुड्डा साहब प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी श्रीराम शर्मा की पुत्रवधु की मृत्यु पर रोहतक स्थित उनके निवास पर शोक प्रकट करने भी नहीं गए. यही नहीं हुड्डा साहब उन दिनों लाहली के क्रिकेट स्टेडियम में क्रिकेट का मैच देखते रहे लेकिन उनके पास स्वतंत्रता सेनानी के घर जाने का समय नहीं था. गौरतलब है कि श्रीराम शर्मा ने झज्जर के टाउनहाल से अंग्रेजों का झंडा उतार कर तिरंगा फहरा दिया था जिससे नाराज होकर अंग्रेज पुलिस ने उन्हें जीप से बांधकर पूरे झज्जर शहर में घसीटा था और लाल मिर्च की खाली बोरी में बंद कर दिया था. जवाहर लाल नेहरू उनका धन्यवाद करने रोहतक आए थे लेकिन चूंकि उनका कोई परिवार राजनीति में नहीं इसलिए सरकार उन्हें पूछती नहीं. कोर्ट से झाड़ खाने के बाद भी रोहतक के कैनाल रेस्ट हाउस के सामने रणबीर सिंह का स्टैच्यु लगाने की तैयारियां चोरी-छिपे चल रहीं हैं. जबकि चौ. चरण सिंह का स्टैच्यु हुड्डा के दोस्त योगेंद्र दहिया के घर पिछले कई साल से पड़ा है, उसके लिए  अभी तक कोई जगह नहीं मिल पायी है.
 
पवन कुमार बंसल
08882828301

 

शारदा शुक्ला आजतक से जुड़ीं

पिछले माह आईबीएन 7 से इस्तीफा दे चुकी शारदा शुक्ला ने आजतक के साथ अपनी नई पारी शुरू की है.
शारदा की गिनती तेज तर्रार और बेहतरीन लेखन वाले पत्रकारों में की जाती है.
शारदा को पत्रकारिता करियर में काफी अनुभव है. इससे पहले भी वो काफी मीडिया संस्थानों के साथ काम कर चुकी है.

हुड्डा को रोहतक में जमीन अधिग्रहण का खामियाजा भुगतना पड़ेगा

कहते हैं कि एक घर तो डायन भी छोड़ देती है, लेकिन भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने जमीन अधिग्रहण नीति की आड़ में अपने गृहनगर रोहतक के लोगों को भी नहीं बख्शा. गोहाना रैली में हुड्डा ने दहाड़ते हुए कहा कि उनकी भूमि अधिग्रहण नीति देश में सर्वश्रेष्ठ है, जिसकी प्रषंसा राहुल गांधी ने भी की है.
रैली के बाद जब एक पत्रकार ने एक टीवी चैनल पर अधिग्रहण नीति की आलोचना कर दी तो सरकार इतनी खफा हुई कि ‘‘कुमार का कुमारी पर तो जोर नहीं बसा पर गधे के कान ऐंठ दिए’’ वाली नीति पर चलते हुए पुलिस को कह कर केबल आपरेटर के माध्यम से चलने वाले चैनल का प्रसारण ही बंद करवा दिया. अब हुड्डा के बेटे दीपेंद्र पत्रकारों को लंच दे रहे हैं, लेकिन अब जब पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय ने उनकी सरकार द्वारा रोहतक में विकास कार्यों के नाम से अधिग्रहण की गई किसानों की जमीन के अधिग्रहण आदेश रद्द कर दिए हैं. तो क्या हुड्डा नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देंगे और उन किसानों से माफी मांगेगे. रोहतक के लोगों ने जाट समुदाय के कद्दावर नेता देवीलाल को हुड्डा के मुकाबले तीन बार हराया लेकिन हुड्डा सरकार ने रोहतक में कोई नया सैक्टर नहीं काटा और हुड्डा के मौजूदा सैक्टरों में रजिस्ट्री के कोलेक्टर रेट इतने बढ़ा दिए कि लोगों को मजबूरी में प्राइवेट बिल्डर्स के पास जाना पड़ रहा है. इन बिल्डर्स ने कानून को धत्ता बताकर लाइसेंस मिलने से पहले ही अखबारों में विज्ञापन देकर प्लाट बेच दिए. इनके समारोह में दीपेंद्र हुड्डा जाते थे. जब रोहतक के लोगों ने एक कालोनाइजर की धींगा-मस्ती के खिलाफ आंदोलन कर दिया तो सरकार ने उसके खिलाफ कार्यवाही करने के बजाय डीसी रोहतक के दफतर में उनकी मीटिंग करवा दी.
ओमप्रकाश चैटाला रोहतक सरकार के लोगों से इसलिए नाराज थे कि केवल रोहतक शहर के लोगों के कारण देवीलाल तीन बार हुड्डा जैसे राजनीति में नौसिखिए से चुनाव हारे. हुड्डा की जमीन अधिग्रहण नीति अखबारों की सुर्खियां बनी हुई हैं. आईएएस अफसर अशोक खेमका ने डीएलएफ और वढेरा की जमीन सौदे को रद्द कर दिया तो हुड्डा उनके पीछे पड़ गई. रोहतक में मातू राम की याद में बने इंजीनियरिंग कालेज के लिए चंदा इकट्ठा करने को आयोजित एक सभा में हुड्डा ने कालोनाइजर डीएलएफ को हरियाणा के फाइनेंस किंग बताया था. डीएफएफ ने कालेज के लिए दो करोड़ रुपए दिए थे और उसके बदले में अरबों रुपए कमाए. हुड्डा से कालोनाइजर कितने खुश हैं इसका अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने हुड्डा के जन्मदिन पर अखबार में पूरे पेज का विज्ञापन देकर उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दी. यही नहीं उन्होंने हुड्डा साहब से आग्रह किया कि हमें भूमि अधिग्रहण कानून से बचाएं, जिससे कि राहुल गांधी ला रहे हैं. कालोनाइजर लोबी तो हुड्डा को प्रधानमंत्री बनाना चाहती है ताकि हरियाणा की तरह वे सारे देश को लूट सकें. गौरतलब है कि हुड्डा ने रोहतक में भूमि अधिग्रहण का विरोधी करने पर रमेश दलाल के खिलाफ मुकदमा दायर करवा दिया लेकिन रोहतक के एडिशनल सैशन जज शालिनी नागपाल ने उनकी अग्रिम जमानत कर दी नहीं तो ना जाने हरियाणा की बहादुर पुलिस उनके साथ क्या सलूक करती. मजाक में हुड्डा को क्लू की सरकार कहा जाता है.
 
पवन कुमार बंसल
08882828301
 

जनसंदेश टाइम्‍स गोरखपुर को बड़ा झटका, एक साथ पांच रिपोर्टरों ने दिया इस्तीफा

गोरखपुर : जनसंदेश टाइम्‍स गोरखपुर को सोमवार की सुबह एक बड़ा झटका लगा. ये झटका संस्थान को तब लगा जब यहां एक साथ पांच रिपोर्टरों ने संस्‍थान को टाटा-बाय-बाय कर दिया. 
खबर है कि वेतन समय पर न मिलने और संपादक एवं सिटी इंचार्ज द्वारा मानसिक दबाव बनाने के कारण रिपोर्टरों द्वारा यह फैसला लिया गया. हालांकि एक दिन पहले तक वह पूरी तन्‍मयता के साथ अपनी जिम्‍मेदारियों का निर्वहन कर रहे थे.
जनसंदेश टाइम्‍स गोरखपुर के तेज-तर्रार रिपोर्टर माने जाने वाले संतोष गुप्‍ता, उत्‍तम दुबे, नीरज श्रीवास्‍तव, सुनील त्रिगुणायत और स्‍वाति श्रीवास्‍तव ने सोमवार को संस्‍थान से अपना नाता तोड़ लिया. वहीं संस्‍थान को इस बात का डर सता रहा था कि नवंबर माह पूरा होते ही रिपोर्टर वेतन के लिए दबाव बनाने लगेंगे. पूर्व सिटी इंचार्ज सहित जिले के 11 लोगों के संस्‍थान छोडने के बाद से नये नवेले संपादक एवं सिटी इंचार्ज को इस बात का डर था कि नवंबर का वेतन मिलते ही ज्‍यादातर लोग संस्‍थान को टाटा कर सकते है. इसी कारण संस्‍थान द्वारा दिसंबर माह खत्‍म होने की कगार पर होने के बाद भी वेतन नहीं दिया गया था. दो माह का वेतन नहीं मिलने के बाद भी सभी लोग पूरी तन्‍मयता के साथ काम कर रहे थे.
 
किसी के संस्‍थान छोडकर जाने की बात नहीं थी लेकिन नए संपादक और इंचार्ज पिछले 15-20 दिनों से रिपोर्टरों व डेस्‍क के लोगों पर दबाव बनाने के लिए माहौल बना रहे थे कि जिसे छोडकर जाना है वह जा सकता है उसका हिसाब-किताब कर दिया जाएगा. इसके पीछे एक कारण यह भी है कि पीएफ व अन्‍य बकाया होने के कारण संस्‍थान के अधिकारी भारी दबाव में हैं. यह देखने के लिए कि कोई छोडकर जाने वाला तो नहीं है इसलिए इस प्रकार का माहौल बनाया जा रहा था जिससे जाने वाले लोगों को चिह्रनित किया जा सके. जब यह बात साफ हो गई कि कोई छोडकर जाने वाला नहीं है तो अनायास ही काम करने वाले रिपोर्टरों को ही बातों के मायाजाल में फंसाकर प्रताड़ित किया जाने लगा. नतीजा पिछले 15-20 दिनों से भारी दबाव में काम कर रहे पांचों रिपोर्टरों ने संस्‍थान को टाटा-बाय-बाय कह दिया. जबकि संपादक व सिटी इंचार्ज को इसका जरा भी एहसास नहीं था कि उनके अनावश्‍यक दबाव का खामियाजा उन्‍हें पांच रिपोर्टरों की कीमत देकर चुकाना पडेगा. आनन-फानन में कुछ नए लोगों को भर्ती करने के लिए संपादक व सिटी इंचार्ज ने हाथ-पांव मारना शुरू किया लेकिन वेतन नहीं मिलने के डर से कोई भी डूबती नाव में बैठने को तैयार नहीं होना चाहता है. भई जनसंदेश टाइम्‍स गोरखपुर की नैया अब डूबी ही समझो क्‍योंकि पीएफ अधिकारी कभी भी संस्‍थान में ताला जड़ सकते हैं.  

पत्रकार जगदीश चन्द्र के पिता का निधन

देहरादून : देहरादून के जनपद उधमसिंह नगर (रूद्रपुर) से प्रकाशित होने वाले सांध्य दैनिक उत्तरांचल दर्पण के वरिष्ठ पत्रकार जगदीश चन्द्र के पिता नंदन राम का लंबी बीमारी के बाद कल निधन हो गया. वे 65 वर्ष के थे. 
जगदीश के पिता की मृत्यु से मीडिया जगत में शोक व्याप्त है. स्व. नंदन राम के निधन पर प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा, वित्तमंत्री डॉ. श्रीमती इंदिरा हृदयेश ने शोक व्यक्त करते हुये कहा है कि ईश्वर उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे तथा उनके परिजनों को इस दुख को सहन करने की शक्ति प्रदान करे.

दिलीप ने दिया भास्कर से इस्तीफा, जागरण से जुड़े

दैनिक भास्कर में इन दिनों इस्तीफों का दौर चल रहा है. इसी क्रम में भास्कर श्रीगंगानगर राजस्थान से सब-एडिटर दिलीप नागपाल ने इस्तीफा दे दिया है. दिलीप यहां सिटी डेस्क पर कार्यरत थे. नागपाल ने अपनी नई पारी दैनिक जागरण लुधियाना पंजाब के साथ शुरु की है.
यहां उन्हें सिनिअर सब-एडिटर बनाया गया है. तीन साल से श्रीगंगानगर भास्कर में सिटी डेस्क पर काम करने के अलावा दिलीप भास्कर की मधुरिमा और अहा जिंदगी पत्रिका के लिए भी लिख रहे थे. बीते दिनों खबर आई थी कि वो दबंग दुनिया से जुड़ सकते हैं. लेकिन सोमवार को दिलीप ने अपने फसेबुक अकाउंट पर अपने जागरण से जुड़ने की घोषणा कर दी. उनसे पहले भी करीब दर्जनभर लोग भास्कर छोड़ जागरण पहुंच चुके हैं. वहीं इससे पहले श्रीगंगानगर भास्कर से डीएनइ के तरुण शर्मा और रीजनल इंचार्ज दिव्य्भानु श्रीवास्तव सहित आधा दर्जन लोग छोड़कर जा चुके हैं.

उपजा से जुड़े पत्रकारों ने की उपनिदेशक सूचना इलाहाबाद के निलंबन की मांग

इलाहाबाद : उत्तर प्रदेश जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन उपजा से जुड़े पत्रकारो ने इलाहाबद कमिश्नर से मिलकर जनसंपर्क विभाग में तैनात उपनिदेशक सूचना आर.पी द्विवेदी को निलंबित करने की मांग की है.
इस संबंध में कमिश्नर को एक ज्ञापन भी सौंपा गया, जिसमें उपनिदेशक सूचना द्वारा पत्रकारों के साथ किये जा रहे पक्षपात पूर्ण व्यवहार व सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं को मीडिया तक पहुंचाने से रोकने के बारे में जांच की मांग रखी गयी है. कमिश्नर ने कहा कि वह जल्द ही इस मामले में कठोर कार्रवाई करेंगे.
उन्होंने उपनिदेशक सूचना की कार्यप्रणाली जानकर आश्चर्य जताया और कहा कि सरकारी पदों पर बैठा व्यक्ति यदि ऐसा व्यवहार कर रहा है तो यह मामला काफी गंभीर है. उपजा इलाहाबाद इकाई के जिलाध्यक्ष राजीव चंदेल ने कमिश्नर से कहा कि उप निदेशक सूचना इलाहाबाद के कार्यव्यवहार से यहां मीडियाकर्मी त्रस्त हैं. मीडियकर्मियों के प्रति उनके पक्षपातपूर्ण रवैये के कारण आम जनता के लिए प्रदेश सरकार द्वारा चलायी जा रहीं लाभकारी व कल्याणकारी योजनाएं मीडिया तक समुचित ढंग से नहीं पहुंच पा रही हैं. इस वजह से बड़ी संख्या में आम-आवाम सरकारी योजनाओं के बारे में जानकारी से वंचित है. पत्रकारों का कहना है कि सरकारी कार्यक्रमों, कमिश्नर, डीएम के दौरे, प्रेस कॉफ्रेंस, प्रेस रिलीज, जनकल्याणकारी योजनाओं व जीओ के बारे में जनसंपर्क विभाग पत्रकारों को सूचना नहीं दे रहा है. मीडियाकर्मियों द्वारा फोन करने के बाद कुछ पत्र-पत्रिकाओं को जानकारी दी जाती है. इस मामले में ज्यादातर मीडियकर्मियों के साथ पक्षपात व भेद-भावपूर्ण बर्ताव किया जा रहा है. 
इसके अलावा अखबारों की कटिंग विभागवार प्रेषित नहीं की जाती है. जिन विभागों की गलत कार्यप्रणाली व उसमें व्याप्त घोर भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए मीडियकर्मी खबरें लिख रहे हैं, उससे उस विभाग के खिलाफ जांच न बैठ जाए, इसके लिए जनसंपर्क विभाग में बैठे उपनिदेशक सूचना मैनेज करने का काम कर रहे हैं. विभागों की कार्यप्रणाली व भ्रष्टाचार उजागार करने वाली खबरों की कटिंग को उच्च अधिकारियों तक पहुंचने से रोकने के लिए उपनिदेशक सूचना ने बकायदा सेंडिकेट बना रखा है.
जिसके माध्यम से वह अपने चहेते अधिकारियों को बचाने का काम करते हैं, तथा ईमानदारी से कार्यकरने वाले विभागाध्यक्षों के खिलाफ आधारहीन खबरें लिखने के लिए अफवाह उड़ाने का कार्य करते हैं. 
संगठन मंत्री नागेंद्र सिंह ने कहा कि उपनिदेशक सूचना के तानाशाहीपूर्ण रवैये के कारण जनसंपर्क विभाग में सभी अखबारों की फाइलें नहीं लगायी जाती हैं, इसके लिए भी मीडियाकर्मियों को काफी परेशान होना पड़ता है. पिछले कई सालों से यहां तैनात उपनिदेशक सूचना पत्र समूहों व पत्रकारों के बीच पक्षपात व भेदभाव पूर्ण व्यवहार करते हैं तथा पत्रकारों के बीच राजनीति करने का काम कर मीडियाकर्मियों को आपस में लड़वाने का भी काम कर रहे हैं. 
उपजा के मंत्री रवि सिंह ने कहा कि सरकारी कार्यक्रमों, वीवीआइपी व वीआइपी कार्यक्रमों के कवरेज के लिए पास जारी करने में भी उपनिदेशक सूचना द्वारा मीडिया कर्मियों के बीच भेदभाव व पक्षपातपूर्ण व्यवहार किया जा रहा है. एक पत्र समूह के ही कई पत्रकारों का पास जारी कर दिया जाता है, जबकि अन्य पत्र-पत्रिकाओं, चैनल के पत्रकारों को पास जारी करने की वजाय उन्हें जनसंपर्कविभाग से भगा दिया जाता है. कई बार तो पास जारी करने में धन उगाही करने की शिकायत सामने आ चुकी है.
कमिश्नर को ज्ञापन सौंपने वाले उपजा पदाधिकारियों में जिलाध्यक्ष राजीव चन्देल, महांमंत्री कुन्दन श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष शशिकांत सिंह, वरिष्ठ उपाध्यक्ष परवेज आलम, उपाध्यक्ष अनुराग तिवारी, पंकज सिंह, संगठन मंत्री नागेन्द्र सिंह, मंत्री अमरदीप चौधरी, भूपेश सिंह, रोहित शर्मा, आय-व्यय निरीक्षक उमाशंकर गुप्ता आदि सम्मिलित थे. 
 
राजीव चंदेल 

Dainik Hindustan Advertisement Scam:Supreme Court adjourns final hearing

New Delhi : The Supreme Court of India adjourned the hearing on the final disposal matters relating to the Special Leave Petition (criminal) No. 1603 of 2013 of Shobhana Bhartia, the Chairperson of M/S The Hindustan Media Ventures Limited,New Delhi on November 11, 2013. The Bench of Hon’ble Mr. Justice H.L.Dattu and Hon’ble Mr. Justice V.Gopala Gowda adjourned the final argument as M/S Karanjawala & Co.,counsels for the petitioner,Shobhana Bhartia sought time in writing in the court. The respondent No.02, Mr.Mantoo Sharma(Munger,Bihar) was present in the court in person.His counsel Mr.ShriKrishna Prasad(Munger,Bihar) was also present and ready to argue in the court.
The Registrar orders to list the matter before the court :
The Hon’ble Justice Mr.Sunil Thomas, the Registrar-II, the Supreme Court of India, on Sept,19,2013, in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603/2013(Shobhana Bhartia Versus State of Bihar and Another), passed an order to list the matter before the Hon’ble Court as per rules. The Court of the Hon’ble Registrar-II, the Supreme Court of India, on Sept, 19,2013, ordered , “In view of the urgency expressed by the parties and service being complete, list the matter before the Hon’ble Court as per rules after the expiry of three weeks.” The Hon’ble Court also mentioned in the order,” The Respondent No.-02,Mantoo sharma, Party-in-Person, has filed the Counter-Affidavit.The Respondent No.01, Mr.Samir Ali Khan, Advocate, seeks three weeks’ time for filing the Counter-Affidavit.” It is worth mentioning that the Respondent No.01,Mr.Samir Ali Khan, Advocate is the Hon’ble counsel for the State of Bihar.
Mantoo Sharma files his counter-affidavit in Supreme Court
mantoo sharma : Mr.Mantoo Sharma, Respondent No.-02 in the Special Leave Petition (Criminal) No. 1603 of 2013, filed by the Shobhana Bhartia, the chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited(New Delhi), has filed his counter-affidavit in 315 pages in the Supreme Court on Sept, 16 recently. Mr.Mantoo Sharma is the informant in the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011 in Bihar. Before filing his counter-affidavit, Mr.Sharma sent one set of the counter-affidavit to M/S Karanjawala & Co., Advocates for the petitioner, Shobhana Bhartia, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited, The Hindustan Times House, 18-20, Kasturba Gandhi Marg, New Delhi -110001 by the registered parcel and two sets of his counter – affidavit to the government lawyer of the Bihar government in the Supreme Court by hand.Four sets of the counter- affidavit were filed in the court of the Reistrar -II, Mr.Sunil Thomas.
The petitioner prays for the quashing of the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011(Bihar): The petitioner, Shobhana Bhartia has filed the Special Leave Petition( Criminal) No. -1603 of 2013 in the Supreme Court and prayed for the quashing of the Munger Kotwali P.S Case No. 445/2011, dated Nov.,18,2011 under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 read with Sections 420/471/476 of the Indian Penal Code Named accused persons in the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011(Bihar): In the Munger Kotwali P.S Case No.445/2011 in Bihar, the Chairperson of M/S Hindustan Media Ventures Limited (New Delhi)Shobhana Bhartia, the Chief Editor,Dainik Hindustan, Shashi Shekhar(New Delhi), the Regional Editor,Dainik Hindustan,Patna edition, Akku Srivastawa, the Regional Editor, Dainik Hindustan,Bhagalpur edition,Binod Bandhu and the Publisher, ,M/S Hindustan Media Ventures Limited( Nw Delhi), Amit Chopra, have been accused of receiving the government money to the tune of about rupees two hundred crores illegally and fraudulently by obtaining and printing the advertisements of the Union and Bihar governments in the name of illegally printed and published Munger and Bhagalpur editions of Dainik Hindustan for a decade continuously in Bihar. The Munger police ,meanwhile, have submitted the Supervision Report No.01 and the Supervision Report No.-02 and have found all allegations “prima-facie true” against all the named accused persons including the principal accused Shobhana Bhartia (New Delhi) under sections 8(b)/14/15 of the Press & Registration of Books Act, 1867 and sections 420/471/476 of the Indian Penal Code. The historical order of the Patna High Court : The Hon’ble Justice of the Patna High Court, Justice Anjana Prakash, in her order, dated Dec 17,2012, in the Criminal Miscellaneous No. 2951 of 2012, refused to interfere in the police investigation and directed the Munger (Bihar) police to complete the investigation in the Kotwali P.S Case No. 445/ 2011 within the three months from the date of the order. 
 
Srikrishna Prasad

आगामी चुनाव में सोशल मीडिया की होगी भूमिका

रवि प्रकाश मौर्य : लंबे समय से चल रही उठापटक व कयासों के बाद अंतत: दिल्ली में ‘आप’ ने सरकार बना ली और मैगसेसे पुरस्कार विजेता व सामाजिक कार्यकर्ता अरविन्द केजरीवाल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाल ली. इससे अपने देश के इतिहास में एक नया अध्याय जुड़ गया. 
एक समय जब मिसाइल मैन व गैर राजनीतिक व्यक्ति एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति बने थे, तब भी इसी तरह की एक शुरुआत मानी गई थी लेकिन वे देश व समाज को एक नई दिशा इसलिये नहीं दे सके क्योंकि वह राजनीतिक फैसले नहीं ले सकते थे.
इसके बाद अगले राष्ट्रपति चुनाव में चर्चित लेखिका शोभा डे व अन्य विद्वानों ने इसी तरह गैर राजनीतिक व उद्योगपति एन नारायणमूर्ति को राष्ट्रपति बनाये जाने की चर्चा छेड़ी जबकि भाजपा ने फिर से कलाम को ही लाने की ‘चाल’ चली. यह क्रम कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी की एक जिद के चलते टूट गया. उन्होंने प्रतिभा पाटिल को देश की पहली महिला राष्ट्रपति बनवाकर एक इतिहास रचा… लेकिन सिर्फ इतिहास ही रचा. अब एक बार पूरी तरह गैर राजनीतिक व सामाजिक कार्यकर्ता केजरीवाल दिल्ली की कुर्सी पर काबिज हुये हैं. यह एक तरह से ‘नेताओं’ के मुंह पर तमाचा भी है इधर कुल सालों वह यही सोचने-मानने लगे थे कि देश को चलाने का ‘ठेका’ बस उन्हीं के पास है. हालांकि राजनीतिक पंडितों को अब भी लगता है कि गैर राजनीतिक व अनुभवहीन लोग दिल्ली को कैसे चलायेंगे. शनिवार की दोपहर जब केजरीवाल व उनकी टीम ऐतिहासिक रामलीला मैदान में शपथ लेने जा रही थी, तब भी अधिकतर चैनलों पर राजनीतिक विश्लेषक बार-बार यही चीजें दुहरा रहे थे. खैर, अब दिल्ली में ‘आप’ की सरकार बन गई है और इसी के साथ ही 2014 में आगामी लोकसभा चुनाव की लड़ाई भी बेहद दिलचस्प हो गई है. भाजपा व कांग्रेस जैसी पार्टियों ने अभी से रणनीतियां बदलनी शुरू कर दी हैं तो मंझोली व छोटी-मोटी पार्टियों ने भी ‘गणित’ बैठानी शुरू कर दी है. ऐसे में सोशल साइटों पर चुनावी जंग देखने लायक होगी. 
इसी बीच एक खबर आई है कि दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया वेबसाइट फेसबुक की भारत और दक्षिण एशिया की पब्लिक पॉलिसी निदेशक अंखी दास ने आम आदमी पार्टी को ईमेल लिखकर ‘दिल्ली चुनाव में पार्टी की जीत में फेसबुक की भूमिका’ पर शोध की संभावना तलाशने की इच्छा जाहिर की है. उल्लेखनीय है कि अन्ना हजारे के नेतृत्व में जनलोकपाल के लिए शुरू हुए आंदोलन में शुरुआती स्वयंसेवक फेसबुक के जरिए ही जुड़े थे. आंदोलन के फेसबुक पेज 'इंडिया अगेंस्ट करप्शन' की आंदोलन को धार देने में भी उनकी बेहद अहम भूमिका रही थी. यहां गौर करने वाली बात यह है कि अरविन्द केजरीवाल ने एक साल पूर्व आम आदमी पार्टी के गठन के बाद यही तरीका अपनाया और दिल्ली के चुनाव में वह कारनामा कर दिखाया जिसने स्वयं फेसबुक को भी अपना दीवाना बना लिया. आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया एवं सूचना प्रौद्योगिकी विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे अंकित लाल भी दिल्ली में पार्टी की जीत में फेसबुक की अहम भूमिका मानते हैं. वर्तमान में फेसबुक के इस पेज से करीब साढ़े आठ लाख लोग जुड़े हैं जिनमें करीब दो लाख लोग सक्रिय हैं. यही नहीं, इस पेज से हर हफ्ते करीब साठ हजार नए लोग जुड़ रहे हैं. इसमें कोई शक नहीं कि आगामी लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया मुख्य भूमिका निभाने वाली है. इसी को देखते हुये ही राहुल के निर्देश पर कांग्रेस ने अपनी वेबसाइट को नया रूप दे दिया है और नई टीम गठित की है तो भाजपा भी मोदी के नेतृत्व में व उनके निर्देश पर ‘सोशल वार’ की रणनीति बना रही है. एमसीए के छात्र 22 वर्षीय हितेंद्र मेहता बीजेपी की सूचना तकनीकी इकाई के एक सदस्य हैं. वह पार्टी के इंटरनेट टीवी चैनल ‘युवा’ का काम देखते हैं. हितेंद्र के सहकर्मी 35 वर्षीय नवरंग एसबी भी पार्टी नेताओं के मुख्य बयानों को ट्विटर और फेसबुक पर डालते हैं. हितेंद्र और नवरंग बीजेपी की 100 सदस्यों वाली उस इकाई का हिस्सा हैं जिसे पार्टी की विचारधारा को सोशल मीडिया पर लोकप्रिय बनाने का श्रेय दिया जाता है. वहीं कई मुद्दों पर चोट खाने के बाद अब कांग्रेस को भी इस सोशल नेटवर्क का महत्व समझ में आ गया है. देश की सबसे पुरानी, सबसे बड़ी और शायद सबसे हठधर्मी राजनीतिक पार्टी ने दिग्विजय सिंह के नेतृत्व में 10 सदस्यों वाली संचार और प्रचार समिति कमेटी भी बनाई है. उनके अलावा इसमें मनीष तिवारी, अंबिका सोनी, ज्योतिरादित्य सिंधिया, दीपेंदर हड्डा, राजीव शुक्ल, भक्त चरण दास, आनंद अदकोली, संजय झा और विश्वजीत सिंह शामिल हैं. उनकी भी जंगी योजना तैयार हो चुकी है और अब मैदान में उतरने के लिए आला कमान की ओर से हरी झंडी मिलने का इंतजार किया जा रहा है.
कांग्रेस इसीलिये सचेत हुई क्योंकि उसने कई मौकों पर सोशल मीडिया को गंभीरता से न लेने की कीमत चुकाई. मसलन- अकबरुद्दीन ओवैसी के नफरत फैलाने वाले भाषण के यू ट्यूब पर तेजी से फैलने के बाद 8 जनवरी को ओवैसी की गिरफ्तारी, अण्णा हजारे के नेतृत्व में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन जो 2011 में कई दिनों तक दुनिया में सबसे ऊपर रहने वाला ट्विटर ट्रेंड था और दिसंबर 2012 में दिल्ली गैंगरेप के खिलाफ आंदोलन जिसने सोशल मीडिया के मंचों पर लोगों की टिप्पणियों से हवा मिलने के कारण व्यापक रूप ले लिया था. हाल ही जारी एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार लोकप्रिय सोशल साइट ट्विटर पर पर दस लोकप्रिय नेताओं में शशि थरूर, नरेन्द्र मोदी, मनमोहन सिंह, अजय माकन, सुषमा स्वराज, अरविन्द केजरीवाल, उमर अब्दुल्ला, सुब्रमण्यम स्वामी, डेरेक ओ ब्रायन, वरुण गांधी का नाम शामिल है. इसमें से शशि थरूर तो ट्विटर मंत्री के रूप में जमकर ख्याति बटोर चुके हैं. ये नेता कई बातें या योजनायें इन साइटों के माध्यम से ही सबसे पहले जगजाहिर करते हैं. यहां इस बात का भी जिक्र करना चाहूंगा कि इससे पूर्व कोलकाता में ममता बनर्जी ने भी सोशल मीडिया के जरिये ही अपने विरोधी को धूम चटाई थी. तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पहली क्षेत्रीय पार्टी थी, जिसने सोशल मीडिया को अपना हथियार बनाया. इसके पास तीन स्तरों वाली एक समर्पित टीम है. इन तीन स्तरों में पेशेवर, स्वयंसेवक व कार्यकतौ हैं जिन्हें मानदेय दिया जाता है. इस इकाई को डेरेक ओ ब्रायन ने गठित किया था जिसे तृणमूल युवा के नेता और ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी चलाते हैं. यह इकाई पार्टी की वेबसाइट, ट्विटर और फेसबुक को संभालने का काम करती है. इस साल पार्टी की ओर से एक डिजिटल चैनल शुरू करने की भी योजना है. 
‘सोशल मीडिया की एजेंडा सेटिंग इंटरनेट ऐंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ से मिले ताजा आंकड़ों के मुताबिक, भारत में इस समय 13.7 करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, 6.8 करोड़ फेसबुक एकाउंट हैं और 1.8 करोड़ ट्विटर आइडी हैं. वहीं भारतीय शहरों में सबसे अधिक इंटरनेट यूजर मुंबई (68 लाख) में हैं. इसके बाद आता है दिल्ली (53 लाख) का नंबर. इसके पीछे चेन्नै (28 लाख), हैदराबाद (24 लाख), कोलकाता (24 लाख), बंगलुरू (23 लाख), अहमदाबाद (21 लाख), पुणे (21 लाख) आदि महानगर हैं. वर्तमान में अधिकतर लोगों के लिए यह सूचना का पहला स्रोत बन चुका है. यही नहीं, सोशल मीडिया का सीधा असर मुख्यधारा के मीडिया पर पड़ रहा है. कई बार इसका प्रभाव इतना अधिक हो जाता है कि यह सामाजिक परिवर्तन का वाहक बन जाता है. दिल्ली में ‘आप’ की जीत भी इसी का नतीजा है. देखा जाये तो सोशल मीडिया का सबसे ज्यादा असर युवा शहरी वोटरों पर होता है. नये वोटरों को जोड़ने की मुहिम में जो मतदाता संख्या बढ़ रही है, वह यही है. अभी तक चुनावों में इसी वोट ने पार्टियों को जिताया है. ऐसे में जब लैपटॉप-टेबलेट की बाढ़ आ रही है और सरकारें इसे मुफ्त में बांट रही हैं तब आगामी लोकसभा चुनाव में भी इसके मुख्य भूमिका निभाने की पूरी उम्मीद है. 

जमीन पर नहीं रखा कदम फिर भी मिला आपदा की कवरेज के लिए सम्मान

देहरादून : उत्तराखण्ड की मीडिया में जेपी जोशी प्रकरण के बाद दलाल पत्रकारो की भूमिका खुलासा हुआ है. जिसके बाद राज्य में पूरे मीडिया कुनबे को शक की निगाहो से देखा जा रहा है. सरकारी दफ्तरों से लेकर आम जनता पत्रकारों को टेडी नजर से देख रहे हैं. वहीं दूसरी तरफ देहरादून में एक नया मामला सामने आया है.
गौरतलब है कि बीते 26 दिसंबर को देहरादून के राजभवन में आपदा के दौरान कवरेज करने वाले पत्रकारो को राज्यपाल द्वारा सम्मानित किया गया. लेकिन इस समारोह में इस सम्मान को पाने वाले कर्इ चेहरे ऐसे भी थे जो इसके हकदार नहीं थे लेकिन उन्हे भी राज्यपाल द्वारा सम्मानित करा दिया गया. राजभवन में यह कार्यक्रम पंजाबी सभा द्वारा आयोजित किया गया था और आपदा की कवरेज के नाम पर पत्रकारो को सम्मानित करने का खेल खेला गया.
सम्मानित हुए पत्रकारो में जिसमें एनडीटीवी के दिनेश मानसेरा, पी7 के किशोर रावत, कैमरामैन गोविंद सिंह, श्री न्यूज के रमन द्वारा आपदा में कवरेज की गर्इ थी उन्हें सम्मान मिला. जो कि समझ में आता है लेकिन इसके अलावा अन्य लोगो को सम्मान का पैमाना क्या था यह समझ से परे हैं. क्योंकि जी न्यूज के नरेश तोमर, न्यूज 24 के अधीर यादव, टीवी100 के नासिर आपदा के दौरान देहरादून से ही कवरेज करते रहे. इन्हें भी आपदा की कवरेज में सम्मानित कर दिया गया. वहीं इसके अलावा कर्इ पत्रकारो को भी सम्मानित किया गया लेकिन सम्मानित होने वाली जमात में कर्इ चेहरे ऐसे भी थे जो आपदा में कभी वहां की जमीन पर पहुंचे ही नहीं और पूरी कवरेज देहरादून के मीडिया सेंटर से ही करते रहे लेकिन सम्मानित होने वाली जमात में उन्हें भी सम्मानित कर दिया गया. जबकि आपदा के दौरान सबसे पहले वीडियो कवरेज करने वाले जी न्यूज के उत्तरकाषी संवाददाता रावत को इस सम्मान समारोह में सम्मानित तक नही किया गया इसके अलावा कर्इ चेहरे और भी सम्मान की इस बेला पर नदारद दिखे. जबकि जी न्यूज के उत्तरकाषी संवाददाता को दिल्ली में कर्इ संगठनो द्वारा पूर्व में ही सम्मानित किया जा चुका है लेकिन इस सम्मान समारोह में जिस तरह से देहरादून के मीडिया सेंटर में बैठकर कवरेज करने वाले सभी लोगों को सम्मानित कर दिया गया है. उस पर सवालिया निशान उठने शुरू हो गए हैं कि आखिर किसके इशारे पर आपदा के दौरान कवरेज करने वालो को यह सम्मान दिलवाया गया. 

फिल्म ‘बाबू की साइकिल’ में गोविंद नामदेव आएंगे नजर

श्री रामराजा सरकार फिल्म्स के बैनर तले बनने वाली हिंदी फीचर फिल्म 'बाबू की साइकिल' में गोविंद नामदेव बाबू के पिता के रोल में  नजर आएंगे. खबर है कि फिल्म में एक अहम किरदार सुष्मिता मुखर्जी का भी होगा। इस फिल्म का निर्देशन हेमंत वर्मा कर रहे हैं. फिल्म के निर्देशक हरीमोहन विश्वकर्मा है.
फिल्म की कहानी एक पिछड़े गांव में रहने वाले गरीब बच्चे और उसके पिता के इर्द-गिर्द घूमती है जहां बच्चे को पढ़ने के लिए शहर के स्कूल में जाने के लिए क्या-क्या परेशानियां उठानी पड़ती हैं. बच्चा पढ़ाई और स्कूल जाने के लिए एक अदद साइकिल की जुगाड़ के लिए कैसे-कैसे उपाय करता है. 

पापा-पापा घूस मत लेना केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गया है…

बीके सिंह : अरविंद केजरीवाल का नाम इतिहास के पन्नों में दिल्ली के सातवें मुख्यमंत्री के रूप में दर्ज हो गया है. आम आदमी पार्टी की स्थापना से लेकर अरविंद केजरीवाल के मुख्यमंत्री बनने तक के सफर पर अगर गौर किया जाए तो अभी तक भारत माता के इस लाल की कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं दिखा है. आगे क्या होगा यह कहना फिलहाल ठीक नहीं है लेकिन इतना तो तय है कि दिल्ली की गद्दी पर अब आम आदमी का राज हो गया है.
आज सुबह की एक घटना ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया. दरअसल मेरे एक जानने वाले शर्मा जी दिल्ली जल बोर्ड में बतौर कर्मचारी तैनात हैं. उन्होंने फोन पर बातचीत के दौरान मुझे जो कुछ बताया सुनकर मै हैरान हो गया. शर्मा जी ने बताया आज सुबह करीब 9 बजे वह अपने घर में चाय पी रहे थे और उनका 5 साल का बेटा बगल के कमरे में पढ़ रहा था. अचानक उनका बेटा उनके पास आया और बोला 'पापा-पापा आप घूस मत लेना केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गया है.' अपने 5 साल के बेटे के मुंह से यह बात सुनकर शर्मा जी सन्न रह गए. फिर थोड़ी देर बाद फोन करके मुझे इस घटना से अवगत कराया.
यह सब कुछ जानने-सुनने और समझने के बाद मुझे भी अब धीरे-धीरे यह एहसास होने लगा है कि बहादुर शाह जफर के दिल्ली में बदलाव की बयार बहने लगी है.

पांच पांच सौ रुपये में बिके बनारस के इले‍क्‍ट्रानिक मीडिया के पुरोधा

वाराणसी।। पत्रकारिता मिशन नहीं बल्कि भीख और दलाली का पर्याय बनती जा रही है। इसकी बानगी बनारस के उमरहां में देखने को मिली। चौबेपुर के उमरहां स्थित स्‍वर्वेद मंदिर में एक धार्मिक आयोजन था। इस कार्यक्रम में राष्‍ट्रीय क्षेत्रीय स्‍तर के सभी इलेक्‍ट्रानिक मीडिया को बुलाया गया। एक बड़े टीवी चैनल के पत्रकार महोदय,एक नामी न्यूज एजेंसी के कैमरामैन व इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के भाई कवरेज के लिए बीस किलोमीटर दूर बाबा की बाइट लेने पंहुचे।
बाइट लेने के बाद तो डग्‍गमारी शुरू हुई। च्‍वयनप्राश मिला, डबल बेड का कंबल मिला। यहां तक तो सब ठीक था। डग्‍गामारी की अती तो जब हो गयी जब एक लाइन अलग लगी थी जिसमें लिफाफा मिल रहा था। उक्‍त सभी महानुभाव उस लाइन में लगे। खुशी-खुशी लिफाफा लिया। जब खोलकर देखा तो मात्र पांच सौ रूपये का नोट। बस फिर क्या था एक टीवी चैनल के पत्रकार आयोजकों से भिड़ गये और कहने लगे कि क्‍या भिखारी समझ रखा है पांच सौ रुपये दे रहे हो। 
इस पर बाबा के समर्थकों ने समझाया कि अभी इतने रखिये आगे कवरेज करेंगे तो और मिलेंगे। पूरे कांड की चर्चा बनारस के इलेक्‍ट्रानिक मीडिया में जमकर फैली है। महज 500 रूपये के लिफाफा लेने पर कुछ धिक्‍कार भी रहे हैं। लेकिन इलेक्‍ट्रानिक मीडिया के ये पुरोधा कह रहे हैं कि विरोध वहीं कर रहे हैं जिनके लिए अंगूर खट्टे की कहावत लागू होती है।
 
कानाफूसी
 

बिहार में पत्रकारों का सरकार और पुलिस के खिलाफ धरना प्रदर्शन

पटना।। बिहार के पत्रकारों पर लगातार हो रही पुलिसिया ज्‍यादती के विरोध में 29 दिसंबर को राज्य की राजधानी पटना में वर्किंग जर्नलिस्‍ट यूनियन ऑफ बिहार के बैनर तले पत्रकारों ने एक दिवसीय धरना दिया तथा विरोध मार्च निकाला सैकडों की संख्‍या में पूरे बिहार से आये पत्रकारों ने पुलिस और प्रशासन द्वारा लगातार पत्रकारों पर दमनात्‍मक कार्रवाई किये जाने की घोर निंदा की।
 
संगठन के प्रदेश उपाध्‍यक्ष शशि भूषण प्रसाद सिंह की अध्‍यक्षता में यह धरना गांधी मैदान में स्थित जेपी गोलम्‍बर पर आयोजित किया गया और विरोध मार्च जेपी गोलम्‍बर आयकर चौराहा तक निकाला गया। धरना पर बैठे पत्रकारों ने दो टूक शब्‍दों में सरकार से मांग की है कि प्रजातंत्र के चौथे स्‍तंभ पर जुर्म और दमन बंद हो। किसी पत्रकार की गिरफ्तारी के पहले मुख्‍य मंत्री का निर्देश जरूर लिया जाय। अन्‍य राज्‍यों यथा हरियाणा, उत्‍तर प्रदेश, छत्‍तीसगढ्, मध्‍य प्रदेश, उत्‍तराखण्‍ड, राजस्‍थान तथा तमिलनाडू की भांति बिहार के पत्रकारों को भी पेंशन और सस्‍ते दर पर आवासीय भूखण्‍ड तथा आवास उपलब्‍ध करायी जाय। पत्रकारों ने यह भी मांग की है कि पत्रकारों को दी जाने वाली स्‍वास्‍थ्‍य राहत राशि पचास हजार से बढा कर पांच लाख रूपये की जाय। इसके अलावा राज्‍य के पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान की जाए।
धरना को संचालित कर रहे संगठन के प्रदेश महासचिव डॉ. देवाशीष बोस ने चेतावनी देते हुए कहा कि सूबे में पत्रकारों को साजिश के तहत फर्जी कांड में फंसा कर गिरफ्तार करने का सिलसिला अगर बंद नहीं किया गया तो इस आंदोलन को राज्‍य व्यापी स्‍वरूप प्रदान किया जायेगा। 
उन्‍होंने कहा कि प्रदर्शन और सेमिनार के माध्‍यम से सरकार के इस दमनात्‍मक रूप से भी जनता को अवगत कराया जायेगा।
धरना तथा विरोध प्रदर्शन में वरिष्‍ठ पत्रकार ब्रजनन्‍दन, रामानन्‍द रौशन, सुधीर मधुकर, अभिजीत पाण्‍डेय, मोहन कुमार, डा; प्रवीण कुमार, मुकेश महान, अनमोल कुमार, प्रभाष चन्‍द्र शर्मा, सुधांशू कुमार सतीश, अरूण कुमार सिंह, राम प्रवेश यादव, शिवनाथ केशरी, नवीन कुमार, अनुराग गोयल,अजय कुमार भगत तथा चन्‍द्र शेखर भगत समेत सैकडों पत्रकारों ने भाग लिया ।

अरविन्द केजरीवाल के नाम एक पत्र…

प्रिय अरविन्द केजरीवाल जी, 
नमस्कार !!
 
पिछले कुछ १०-२० दिनों से आपको पत्र लिखने के लिए सोच रहा था. पर एक आम आदमी कि परेशानियां तो आप जानते ही है. घर-ऑफिस कि जिम्मेदारियों के बीच समय निकालते-निकालते इतने दिन निकल गए. इस देरी का हालांकि फायदा ये हुआ है कि  इस बीच आप दिल्ली के मुख्यमंत्री हो गए हैं तो आपसे कहने, बतियाने के लिए मेरे पास भी एक-दो बातें ज्यादा हो गयी हैं. 
 
पिछले कुछ समय से,  अन्ना जी के आंदोलन के समय से ही मेरे आस पास का माहौल बदला है, इतने सारे संयोगो-प्रयोगों को होते देखा है कि ऐसे तो मैं आपसे कई बातें कहना चाहता हु, बताना चाहता हूं पर  बातचीत शुरू करने के लिए जो सबसे पहला मुद्दा एक आम आदमी कि समझ से लगता है कि वो आपकी सेहत का है. एक आम आदमी के लिए उसका शरीर  ही सब कुछ होता है और इस बात पर आपने मुझे बहुत निराश किया है. करीबन आज १५ दिन हो गए होंगे आपकी खांसी के. मुझे नहीं पता कि आप किससे अपना इलाज करवा रहे हैं  पर  इतना जरुर पता है कि आपका इलाज अच्छे से नहीं हो पा रहा है. 
इतने साल दिल्ली में रहने के बाद इतना दावे से कह सकता हूं कि आम खांसी सही इलाज से दिल्ली के ठंड के बीच भी मुश्किल से ५ दिन में निपट जाती है. यदि ऐसा नहीं होता तो या तो खांसी आम नहीं है या डॉक्टर सही नहीं है. इसलिए मुझे उम्मीद है कि आप अपने सेहत को गंभीरता से लेंगे और दोनों ही संभावनाओं कि उचित पड़ताल करेंगे। अपनी आम समझ से एक और बात जो मैं आपसे कहना चाहता हूं वो ये है कि राजनीति में आम आदमी भले काम कि चीज हो पर सेहत के मामलात में डॉक्टर खास (Specialist) ही काम के होते हैं, आम नहीं। तो इसलिए यहां अपने सिद्धांतों को थोडा परे रखियेगा। आपकी सेहत हमारे लिए महत्व्पूर्ण है.
 
 
आगे बढ़ते हुए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि शपथ लेने जाते हुए आप नीले स्वेटर में बहुत जंच रहे थे और जिस सादगी से आपने भव्यता के प्रतीक समझे जाने वाले पलों को अपने जीवन में स्वीकार किया वो एक मिसाल है. अखबारों में जो खबरें आयी हैं उसके मुताबिक आपने अपने लिए घर भी बेहद सादगी वाला ढूंढने का निर्देश दिया है. उसी खबर के मुताबिक पूरा PWD विभाग पिछले कई घंटो से इसमें लगा है जो उनके लिए काफी मुश्किल भरी कवायद भी साबित हो रही है. यहां मैं आपसे कुछ कहना चाहता हूं. आपके सादगी में इस विश्वास को मेरा नमन. पर मैं यकीं के साथ ये कहना चाहता हूं कि एक आम आदमी का जेब छोटा हो सकता है लेकिन दिल इतना छोटा नहीं कि अपने मुख्य-मंत्री को एक चारदीवारी वाला मकान मिलने पर तंज करे. आप इस आशंका को पूरी तरह अपने दिल से निकाल दे. मैं ये बातें आपको इसलिए लिख रहा हूं क्यूंकि उसी अखबार में एक खबर ये भी छपी थी कि पूर्वी दिल्ली के झुग्गी-झोपड़ियों के इलाके में छतें गिर गयी हैं और आबादी का एक बड़ा हिस्सा भरी ठंड में भी खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर है.
PWD विभाग मुख्य-मंत्री के लिए एक सादे घर के इंतजामम में मशगूल रहने के कारण यदि इनकी सुध नहीं ले पाया तो ये उतना ही निर्मम होगा जितना मुख्यमंत्री के लिए एक आलिशान बंगला ढूंढने में लगे रहने में सुध न ले पाने के कारण होता। ये तो एक तात्कालिक कारण है. एक बड़ा कारण ऐसा कहने का ये है कि मैंने उसी दिन एक और खबर पढ़ी थी. ये खबर उन मुख्य-मंत्रियों के बारे में थी जिन्होंने ऐसी ही कम-ज्यादा सादगी दिखायी थी. जैसे बंगाल के मुख्य-मंत्री, त्रिपुरा के मुख्य-मंत्री, ओड़िसा के मुख्य-मंत्री थे. अब अगर बंगाल- ओड़िसा के आम आदमी कि बात की जाये जो दिल्ली कि सड़को पर अक्सर मिल जायेंगे तो उनसे मिलकर तो दिल्ली के आम आदमी को खुद के खास होने का रश्क होने लगे. आप इशारा समझ रहे होंगे। मैंने कहीं पढ़ा था कि किसी भी चीज का अतिरेक उसके गुणो को समाप्त कर देता है. 
 
 
आपने राजनीति में कम समय में ही ऐसे कई अभिनव प्रयोग करके दिखा दिए हैं कि बड़े बड़े महारथीयों के भी होश गम हो गए. इसके लिए साधुवाद। जब आपने कोंग्रेस से गठबंधन के लिए वापस जनता के बीच  जाने का, उसकी राय इसपर राय जानने का प्रयोग किया तो यकीं मानिये मेरा दिल फूला नहीं समा रहा था. आप का ही एक भाषण सुना था जब आप मेरे इलाके में चुनाव प्रचार के लिए आये थे. आपने कहा था कि आम आदमी डरा हुआ है. ये बात मैंने उस दिन प्रत्यक्ष महसूस की. आपके उस प्रयोग से दिल तो फुला नहीं समां रहा था पर दिमाग में कुछ डर सा भी लगा. पर चूंकि आम आदमी को खुश होने के मौके बहुत कम मिलते हैं इसलिए उस आशंका को दबा मैं सबों के साथ खुश हो गया. जनता कि राय से सरकार चले, उसकी भागीदारी हो- वाह मुझ जैसे आम आदमी को तो मनो जमीं पर ही जन्नत नसीब हो गयी. पर अब हर काम क्षेत्र कि जनता के राय से, मर्जी से ही होगा; क्षेत्र कि जनता के मर्जी से ही कानून बनेंगे, हटेंगे- ये मैंने आपके पार्टी के कई नेताओं के मुह से और आपके मुंह से भी सुना।
इसने मेरी पहले दिन कि आशंका को फिर से सर उठाने का मौका दे दिया।  फिर आपके एक विधायक को टीवी पर एक सवाल के जवाब में जम्मू-कश्मीर के भारत या पकिस्तान में रहने के संदर्भ में इसी फॉर्मूले को लागु करने की जिद करते देखा। ये सुनने के बाद मुझे वही बात याद आ गयी- किसी भी चीज़ का अतिरेक उसके गुणो को समाप्त कर देता है. ये सुनने के बाद मुझे लगा कि मुझे आपको कुछ बातें जरुर बतानी चाहियें। एक दिल्लीवासी होने के नाते 700 L मुफ्त पानी और बिजली के आधे बिल मेरे लिए जन्नत कि नेमतों से कम नहीं है. पर इन सबके बावजूद इसके लिए जम्मू-कश्मीर कि कीमत थोड़ी ज्यादा लगती है. मैं एक आम आदमी हूं इसलिए अपनी ताकत के साथ साथ अपनी कमजोरोयों को भी अच्छे से जानता हूं. मैं आपकी इस बात से इत्तिफाक रखता हूं कि आम आदमी डरा हुआ है.
 
मैं भी डरा हुआ हूं, अपनी कमजोरियों से. मैं डरा हुआ हूं कि जम्मू-कश्मीर कि छोड़िये, ऐसे प्रोत्साहन मिलने पर कल को मैं खुद दिल्ली को एक अलग देश बनाने कि मांग का समर्थन कर दूं. मैं डरा हुआ हूं कि यदि क्षेत्र कि जनता की मर्जी के हिसाब से ही कानून बनने लगे/ खत्म होने लगे तो देश के सबसे खराब लिंग अनुपात वाले पंजाब में वहां कि जनता अपने पूर्वाग्रहों के कारण भ्रूण-हत्या-रोकथाम कानून खत्म न कर दे. मैं डरा हुआ हूँ कि Honour Killing के लिए कुख्यात हरयाणा में जनता उसे जायज बनाने का कानून न ले आये. ऐसी और कई चीज़ें हैं जिनसे मैं डर जाता हूं और मैं डरता हूं कि आम आदमी को फायदा पहुचने और उसका उत्थान करने वाले पहले भी आये कई कथित क्रांतिकारी विचारों, इंकलाबों जैसे समाजवाद, समतावाद, मार्क्सवाद कि तरह ये इंकलाब भी अपने कर्णधारों के अतिरेक उत्साह और अकुशलता के कारण बिना किसी ठोस बदलाव को लाये एक चूका हथियार बन कर न रह जाये। 
 
हो सकता है कि मैं नाहक डर रहा होऊं और ऐसा कुछ न हो. लेकिन ये भी हो सकता है कि मेरा डर सही साबित हो. क्यूंकि इस देश के इतिहास ने कई बार ऐसे डर को सही साबित किया है- विनोबा भावे के आंदोलन से लेकर जेपी के आंदोलन तक और शायद अनना के आंदोलन तक भी. एक और बात कहूंगा। अखबारों से ही सुना कि आप लोकसभा का चुनाव भी लड़ने वाले हैं ताकि केंद्र में भी आम आदमी को उसकी सरकार मिल सके. आपको ऐसा करने का पूरा अधिकार है. लेकिन एक दिल्ली-निवासी और एक आम आदमी होने के नाते मैं आपको ये सलाह देने का दुस्साहस करूंगा कि फिलहाल आप दिल्ली पर ही ध्यान दे. आप आम आदमी के सहारे, उसके फैसलो के सहारे सत्ता चलना चाहते हैं. लेकिन आम आदमी कि भी कुछ कमजोरियां है जो उसके फैसलों में भी रहेगी जब तक कि वो इस नयी जिम्मेदारी के लायक खुद को मजबूत नहीं बना लेता।
 
इसलिए आम आदमी को और आम आदमी के नेता के रूप में खुद को पुख्ता होने का समय दीजिये। सदियों कि जड़ता है, इसे ख़त्म होने में सदियाँ तो नहीं लेकिन दशक का वक़्त तो लगेगा ही. इसे वो वक़्त दीजिय। ज्यादा आंच खाने को जल्दी बनाने से ज्यादा उसे खराब कर देती है. पिछले एक साल में हिंदुस्तान के आम आदमी ने सीरिया, मिस्र, अरब के आम आदमी से इतना तो सिखा ही है. मैंने पहले भी लिखा है कि किसी भी चीज़ का अतिरेक उसके गुणो को खत्म कर देता है, चाहे वो उत्साह का अतिरेक हो, फैलाव का या बदलाव का अतिरेक। 
 
ये पात्र जब तक आपको मिले हो सकता है कि नया साल आ जाये। नया सबेरा, नया सूरज, नयी रोशनी। उम्मीद करता हूं कि ये सूरज अंधेरे में रहने वाले लोगो के लिए नया दिन लेकर आएगा और बदन झुलसा देने वाले दोपहर के अतिरेक से बचा रहेगा। 
 
वंदे मातरम !!
एक आम आदमी 
अभिनव

सरस बाजपेयी बने कानपुर प्रेस क्‍लब के नये अध्‍यक्ष, अवनीश बने महामंत्री

कानपुर।। 13 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद कानपुर प्रेस क्‍लब में चुनाव हो ही गया। चुनाव के परिणाम अनुसार सरस बाजपेयी (दैनिक जागरण) को अध्‍यक्ष, अवनीश दीक्षित (ईटीवी) को महामंत्री, घोषित किया गया. जबकि कोषाध्‍यक्ष तथा मंत्री पद पर क्रमश: ओमबाबू मिश्र तथा नीरज अवस्‍थी व सुनील साहू विजयी घोषित किये गये. उपाध्‍यक्ष पद हैदर नकवी ने अपने नाम किया.
कानपुर प्रेस क्लब का चुनाव शुरू से ही दिलचस्प रहा. चुनाव में शुरू से ही अध्‍यक्ष पद हेतु त्रिकोणीय मुकाबला देखने को मिला. चुनाव के दौरान सरस बाजपेयी (दैनिक जागरण), सौरभ शुक्‍ल व सुरेश त्रिवेदी (सहारा) के बीच कांटे की टक्‍क्‍र रही. चुनाव में सरस बाजपेयी ने सौरभ शुक्‍ल को हराकर अपनी विजय सुनिश्चित की. अभी कार्यकारिणी के 11 पदों की गिनती पूरी नहीं हो सकी है.
 

 

We want justice for false fir case…

In chattisgarh state district durg a bjp parshad facing a case of false F.I.R his father complained against this and want justice.
 
The editor ,
 
Media has always been one of the most effective medium to educate & make people aware for facts & right things, therefor I have written detail about the fact. would inform that my son Mr.hariom tiwari appointed as a B.J.P parshad,ward no 1, since 2010(nagar palika nigam bhilai) , his age is 31yrs. He has done so much work in ward & their localties regularly. As we know that in every area good & bad people live in localties, therefor Builder. Mr.shrinivas khedia & their gangester his work is generally land capturing & disturbance of loving people most of the time ,due to strong financial power,position & political support .
 
My son Hariom tiwari always oppose such unethical work of Builders Mr.shrinivas khedia & gangester( Niranjan tripathi nick name satpati & gulab mahto so many times , that's the reason Nagar palika nigam Bhilai
& durg collector giving order to destroy their illegal property last year 2012, after this incident they are just demoralise him , first of all Gulab mahto & satpati attacked him & several other incident happened in
last 3 yrs ,even then local supela & smriti nagar police didn't support , the reason behind financial support given by builder & such corrupt people.
 
Now we acknowledge that Builder Mr.shrinivas khedia , satpati & Gulab mahto these 3 people made plan , how to demolish their parshad career , therefor he has given money to drunker ishwar singh(nick name- ishu) for charging rape case of her 7 yrs daughter against 2 person name My son hariom tiwari &
lokesh sahu (military personel).
 
I am here short briefing of this case story : Ishwar singh charged rape case of her 7yrs old daughter , that date he mentioned 24.06.2013 & he reported on 22.09.2013 ,but we mentioned nothing is shown in medical report of rape case first, second already he mentioned lokesh sahu (military personel) on that date he was already on Military duty , location chennai that report already send by military commander to Supritendent police durg, third her wife Nitu kaur already opposed such nonsense thing but police didnot listen anything in police station, she is witness of everything for facts of money & greedness of her husband , but supela police & smritinagar (bhilai, durg )diidnot take any action of her drunker husband , 4th matter is How is possible 7 yrs girl who raped by 2 people & his father written an fir against him after 3 months & supela police filled fir without doing any inquiry of such facts.
 
we are very upset of such wrong thing happened against my son ,so I want your fully cooperation to right justice , if my son is wrong you took right action as well as hang till death ,  my view is very clear ,if he is right kindly justice and right action to all people either ishwar singh, shrinivas khedia , his gangester team(gulab mahto , satpati) & police also.
 
 
Note : we have evidence , plz cooperate for right justice.
 
 
Thanks & regards
Shanti Tiwari
Model town,ward no 1,
Nehru nagar ,bhilai,dist-durg, chhattisgarh.
mob: 07489055101

मुलायम के रास्ते पर ही चले हैं केजरीवाल !

अरविंद केजरीवाल ने कल दिल्ली के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। भ्रष्टाचार और फिजूल खर्ची के खिलाफ सरकारी यानी जनता के धन का दुरुपयोग जैसे तमाम मुद्दों को लेकर जनता के बीच आवाज बुलंद करके ही केजरीवाल आज इस स्थिति  में आये हैं। यहां तक तो सब ठीक है। 
मगर अपने  शपथ ग्रहण समारोह को दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित करके वह दिल्ली और देश को की जनता को क्या संदेश देना चाहते हैं? अपना आशय उन्हें पहले स्पष्ट करना चाहिए था! आखिर एक सादे समारोह में जो काम बिना किसी अतिरिक्त खर्चे के हो सकता था उसके लिए इतने बड़े पैमाने पर दिखावा करने की क्या जरुरत थी? यह उनकी कथनी और करनी का वह पहला फर्क है जो किसी भी राजनीतिक  दल या नेता में सत्ता आने के बाद आ ही जाता है। 
 
मुझे याद है कि सन १९८९ में जब सपा मुखिया कांग्रेस के खिलाफ एक लंबे और जबरदस्त आंदोलन के बाद पहली बार उत्तरप्रदेश जनता दल-भाजपा  की सरकार के मुख्यमंत्री बने थे, तब उन्होंने भी राजभवन के बजाये लखनऊ के केडी सिंह बाबू स्टेडियम में ही शपथ ग्रहण समारोह आयोजित किया था। मुलायम सिंह यादव एक घोषित राजनेता और राज़नीतिकं दल के मुखिया थे ,उनका दल सत्ता में आया था उन्हे अपनी विजय का परचम अपने ही तरीके से लहराना था सो उन्होंने किया। 
उन्होंने भ्रष्टाचार और फिजूलखर्ची और सादगी का वह लबादा नहीं ओढ़ा था,जो आज केजरीवाल ने ओढ़ा है। फर्क इतना है कि मुलायम के साथ भाजपा थी और केजरीवाल के साथ आज कांग्रेस है। तब मुलायम के लिए भाजपा साम्प्रदायिक थी और आज केजरीवाल के लिए कांग्रेस भ्रष्ट ! 
 
जाहिर सी बात है कि लालबत्ती से सरकारी धन की बर्बादी नहीं रुकेगी। सुरक्षा नहीं लेने से सरकारी पैसे का सदुपयोग नही होगा ,आखिर जो सुरक्षा कर्मी उनकी सुरक्षा में आते वह उनकी सुरक्षा में न आने के बाद भ नौकरी पर रहेंगे और वेतन लेंगे ही,कहीं भी उनको तैनात किया जाए! केजरीवाल की सादगी तब थी जब वह चुप-चाप उपराजयपाल के समक्ष बेहद सादगी से बिना किसी तमाशे के शपथ लेते और अपना जनता को रहत देने का,बिजली सस्ती और पानी मुफ्त देने का ऐलान करते,ऐसे तमाम फैसले करते जिनसे सरकारी धन कि बर्बादी रूकती और न केवल जनता को बल्कि अन्य राजनीतिक दलों को भी लगता कि वाकई यह आदमी कुछ करके दिखाने वाला है! हो सकता मेरा इस समय यह कहना जल्दबाजी कहा जाए मगर इस सच को ठुकराया नहीं जा सकता कि रामलीला मैदान आंदोलन का स्थान तो हो सकता है किसी संवैधानिक सरकार के अस्तित्व में आने के लिए नहीं,हो सकता है उन्होंने यह सोचा हो जिस रामलीला मैदान ने उन्हें दिल्ली का मुख्यमंत्री बना दिया उस भूमि को इस तरह से अपना आभार प्रकट करें ,मगर इसके लिए केवल शपथ ग्रहण ही उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। 
 
आखिर मौजूदा राजनीतिक दलों के काम और नीतियों से खुली असहमति जता कर फिर उनका ही अनुसरण करके केजरीवाल ने वोटों के बाजार में एक और दुकान का शुभारंभ नहीं कर दिया? इस विचार को खारिज करने के लिए मजबूत तर्क की जरुरत है ,जो उन्हें आज नहीं तो कल देना ही होगा! अरविंद केजरीवाल को आज पूरा देश शुभकामनाएं दे रहा है,दिल्ली उनकी तरफ आखें फाड़ कर देख रही है ,आखिर बाकी राज्यों की सरकारें भी यह जानना चाहत हैं कि केजरीवाल क्या ऐसा करते हैं जो सबसे अलग होगा! मगर रामलीला मैदान का नाटक समझ से  परे है! उन्हें वाकई कुछ करना है और जनता की  राय लेकर काम करना है तो मैं भी उन्हें कुछ सुझाव देना चाहता हूं:-
 
 
दिल्ली के नए मुख्यमंत्री को इन सुझावों को पढ़ने  से पहले यह संकल्प लेना जरुरी है कि  PR.,Advertising ,इमेज building करने वाली कंपनियों से दूर रहना है। कॉर्पोरेट सिस्टम को जड़ से खतम करके एक ऐसी व्यवस्था बनानी है जिसमे दिखावा नहीं स्थायित्व और सुविधा हो और आम आदमी भी उस व्यवस्था को जान ले।
१- प्रत्येक चुनाव में सभी नागरिको के लिए मतदान अनिवार्य ,समीक्षा के लिए एक आयोग का गठन ,जैसे इनकम टैक्स  करता है कि किस किस ने रिटर्न नहीं भरा, यह आयोग केवल समीक्षा करेगा और मतदान न करने वाले के समस्त नागरिक अधिकार समाप्त, करने तक जैसा दंड।
२-लोकसभा और विधानसभा समेत सभी सहकारी और निकाय चुनावों में मतदान के लिए एक हफ्ते का न्यूनतम समय,चुनाव आयोग को अभी कह दीजिये कि दिल्ली में एक दिन में नहीं होगा मतदान।
३ -मोबाईल एटीम के जैसे वोटिंग मशीनें लिए वैन घर जाकर मतदान लेंगी।
४ -कोई सरकारी मीटिंग किसी फाइव स्टार होटल में नही होगी।
५ -सरकारी दफ्तरों होने वाली बैठकों में चाय नाश्ता प्रति व्यक्ति २५ रुपये से ज्यादा स्वीकार्य  नहीं होंगा । काजू बादाम खाने हैं तो घर जाकर खाइये।  लंच केवल उन अतिथियों के लिए होगा, जिनको सामूहिक रूप में बुलाया गया हो,और इसके लिए अधिकतम ५० रुपये की  अनुमति ,ऐसी मीटिंग बंद जिसमे खाना खिलाना पड़े,आखिर अपने ही मातहत कर्मचारियों और अफसरों को रोज तनख्वाह देकर मेहमान बनाना कहां तक उचित है ?
६ -गैस पेट्रोल डीजल औरआटा, दाल ,चावल ,मसाले, घी ,तेल ,चाय ,काफी, फल सब्जी ,किताबें आदि से वैट और बाकि टैक्स की दरें तुरंत आधी। सरकारी विभागों को चलाने के लिए आखिर टैक्स के जरिये जनता से धन वसूली बंद। भ्रष्टाचगार यदि आधा भी कर दिया तो अतिरिक्त टैक्स नहीं लगाना पड़ेगा।
७- सरकारी डिस्प्ले विज्ञापन अधिकतम एक साल में चार और नेताओं की बरसी के विज्ञापन बंद ,उन्हें सिर्फ इतिहास में पढ़ाया जाए और उन्ही नेताओं को इतिहास में पढ़ाया जाए जिनके चरित्र संबंधी विवाद हों। 
 
८- मीडिया को खुश करने के लिए बड़े-बड़े विज्ञापन  देने का सिलसिला  बंद, सरकारी डिस्प्ले विज्ञापन का अधिकतम साइज १०० सेमी से अधिक नहीं होना चाहिए। सरकारी योजनाओं के प्रचार के लिए विज्ञापन ठीक है मगर योजना से देश कि हालत बदल गयी यह प्रचार अनुचित और जनता के पैसे की बर्बादी है। आखिर बदली हुई हालत जनता खुद बोलेगी।
९-सरकारी समारोह में पत्रकारों को उपहार प्रतिबंधित। इसके बदले श्राम कानूनो को अधिक मज़बूत बनाया जाए जिससे पत्रकारो की आर्थिक स्थिति सुधरे और उनकी सेवाओं संबंधी कानून कड़ाई से लागू हों।
१०- दिल्ली  राज्य के प्रत्येक नागरिक का स्वास्थ्य एवं जीवन बीमा ,इसकी लिए आधार कार्ड या NPA राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर में नाम दर्ज होते ही मासिक आय का दो प्रतिशत हर नागरिक से शुल्क लेकर बाकि धनराशि सरकार अदा करे, नागरिकों से एक बार ही अंशदान लिया जाए,इस अंशदान से एक कोश बनाया जाए।।
११- झुग्गी झोपड़ियों स्वास्थय सफाई शिक्षा के लिए स्वयं सेवी दलों का गठन।
१२- बिजली की दरें सभी के लिए एक सामान,बिजली चोरी रोकने की दिशा में बड़ा कदम होगा। घरेलु व् व्यावसायिक व् औद्योगिक दरें एक सामान।
१३ – सरकारी अफसरों कर्मचारियों को घर से लाने और ले जाने के लिए बसों की व्यवस्था।
१४- दहेज, विवाह संबंधी विवादों को निपटाने के लिए महिलाओं के लिए विवाह पूर्व समजिक संबंध और व्यवहार प्रशिक्षण संस्थानों कि स्थापना जिसमें युवतियों और युवकों को यह बताया  जाए कि विवाह के बाद कैसे जीवन निर्वाह करना है ,जहां सब एक दूसरे को समझ जान सकें,इससे समाज में यौन हिंसा और विवाह संबंधी विवादों में कमी आएगी और एक स्वस्थ समाज की  रचना की दिशा में बड़ा काम होगा। यह एक ऐसी  पहल होगी जिसमे MSW डिप्लोमा प्राप्त युवक युवतियां और समाज और मनोविज्ञानी विवाह पूर्व इस बात का प्रमाण देंगे कि यह जोड़ा शादी के लिए मानसिक रूप से तैयार है। इससे समाज में विकृति नहीं बढ़ेगी और सरकार का धन व् समय इन विवादों में बर्बाद नहीं होगा ,वर्ना पुलिस अभी इन्ही मामलों  में उलझी रहती है। 
 
१५- अमेरिका की ओबामा सरकार ने अपने यहां एजुकेशन लोन पूरी तरह माफ़ कर दिया है। एक नीति बनाकर कम से कम उन छात्रों का लोन तो माफ कर ही देना चहिये जिन्होंने वाकई इसका सदुपयोग करके अच्छे नंबरों से उच्च शिक्षा प्राप्त की है। 
 
आशीष कुमार अग्रवाल
 

पीटीआई के दीपक रंजन को प्रथम व नेशनल दुनिया के अशोक को द्वितीय पुरस्कार  

गाजियाबाद।। मेवाड़ संस्थान वसुंधरा में पं.मदन मोहन मालवीय जयंती के अवसर पर मंगलवार को 9वां पत्रकार प्रोत्साहन पुरस्कार समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह में पीटीआई के पत्रकार दीपक रंजन को प्रथम और नेशनल दुनिया गाजियाबाद के अशोक कुमार गिरी को द्वितीय पुरस्कार मिला। 
समारोह का शुभारंभ मुख्य अतिथि चिंतक एवं वरिष्ठ पत्रकार बनवारी जी ने मां सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्जवलित कर किया। उन्होंने कहा कि गुरु रविंद्र नाथ टैगोर और मदन मोहन मालवीय के जीवन से काफी कुछ सीखने की आवश्यकता है। वर्तमान भारत में राजनीतिक आजादी तो मिल गई, मगर बौद्धिक आजादी नाम मात्र की नहीं है।
1947 के बाद से निरंतर हम बौद्धिक गुलाम होते गए। यह एक विचारणीय प्रश्न है। मेवाड़ संस्थान के अध्यक्ष अशोक कुमार गदिया ने कहा कि मदन मोहन मालवीय विशिष्ट व्यक्तित्व के धनी थे। वह आदर्श विद्यार्थी, पुत्र, पति, देशभक्त पत्रकार, वकील, कवि एवं कुशल राजनीतिज्ञ थे। वह शिक्षा के क्षेत्र में युगदृष्टा थे। चयन समिति के सदस्य वरिष्ठ पत्रकार जगदीश उपासने, हरिशचंद्र शुक्ल काक, प्रदीप सिंह और अरविंद मोहन के सामूहिक निर्णय से प्रथम पुरस्कार पीटीआई के पत्रकार दीपक रंजन को व द्वितीय पुरस्कार नेशनल दुनिया गाजियाबाद के अशोक कुमार गिरी को दिया गया। 
इसके अलावा मंगल सिंह चौहान को विशिष्ट पुरस्कार से नवाजा गया। विभिन्न कार्यों के लिए पत्रकार रवि शंकर, अरूण कुमार सिंह, धु्रव कुमार, ताराचंद, रामवीर सिंह को भी पुरस्कृत किया गया। सभी प्रतियोगियों को शॉल, प्रशस्ति पत्र एवं प्रतीक चिन्ह प्रदान किए गए। समारोह का संचालन अमित पराशर ने किया। डॉ. अलका अग्रवाल ने आगंतुकों का आभार व्यक्त किया। 
 

गुजरात की ‘रोशनी’ और सोमनाथ का ‘सूरज’

पिछले दिनों गुजरात जाना हुआ गुजरात, नाम लेते ही एक और नाम जहन में आता है जिसकी चर्चा आज लगभग हर किसी की जुबान पर आम है । नरेन्द्र मोदी राज्यीय स्तर से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे नरेन्द्र मोदी का कद बढ़ाने में गुजरात का अहम योदान है । गुजरात में किये उनके विकास के दम पर देश के विकास के सपने देखे और दिखाये जा रहे हैं ।
मौजूदा सरकार की असफलता, भ्रष्टाचार और हालात को देखते हुये आशावादी होने के लिये ऐसे सपने देखना जरूरी भी हो जाता है ।
अहमदाबाद पहुंचते ही मोदी के विकास की तस्वीर का सच देखने की स्वभाविक इच्छा थी । रात के अन्धेरें में साफ चौड़ी सड़को पर चमकती लाइटों से एक बारगी लगा कि दिल्ली फेल है । अहमदाबाद स्टेशन के 10 किमी. एरिया में घूमना हुआ । मणीनगर में मिले शानदार बाजार, खुशनुमा लोग, सोड़े की दुकान पर ठहाका मारते दोस्त और दौड़ती सिटी बसें । सिटी बसों के लिये 5 लैन सड़क के बीच में अलग से रोड था जिस पर केवल इन्ही बसों को आवागमन होता है । वहीं स्वचालित दरवाजे लगे हुय इनके स्टोपेज थे । आधुनिक समाज जैसा सब कुछ था लेकिन फिर भी दिल्ली जैसी आपाधापी नहीं थी । दारू के ठेके नहीं थे ।
उसकी जगह था सोड़ा पानी, 5 रूपये गिलास से शुरू, 10 तरह के स्वाद, मार्केट के हर नुक्कड़ पर एक दुकान मिल रही थी । शराब का अच्छा विकल्प । कुछ से पूछा कि ‘यहां शराब मिलती है? जवाब मिला नहीं, बन्दी है । अच्छा लगा । मन में ख्याल आया कि जहां से आये हैं वह कृष्ण की नगरी है, माखन है, मिश्री है, दूध है, दही है, लेकिन सब बेकार हैं, क्यूकिं यहां शराब है । पीने वालो और पिलाने वालों ने वृन्दावन को भी नहीं बख्शा । सरकार ने अपने नाम पर वृन्दावन में घुसने से पहले ही वन चेतना केन्द्र ( परिवार के साथ घूमने के लिये सरकारी पार्क) के सामने ठेका उठा रखा है । अजीब है लेकिन फिर भी यहां कई लोग तो दूध बेचकर शराब खरीदते हैं । लगभग पूरे उ.प्र. की यही हालत है । गरीब परिवारों में महिलाऐं और बच्चे काम करने और पिटने को मजबूर हैं क्योंकि उनके घर के मर्द, शराब पीते हैं । 
खैर, गुजरात में विकास का एक कारण तो समझ में आ गया । सड़कों पर लोगों के चेहरे पर दिखने वाले विकास की धूप केवल अहमदाबाद जैसी बड़ी जगह पर ही फैली हुई है या फिर इसका उजाला दूर गांवों तक में जाता है यह तो पता नहीं लगा लेकिन इतना जरूर है कि अहमदाबाद आने वाला व्यक्ति यहॉं कि चमक-दमक लेकर ही वापस लौटेगा ।
 
 
अगले दिन सोमनाथ जाना हुआ । भगवान शिव के द्वाद्वश ज्योतिलिंगों में से प्रथम यहां विराजमान हैं । रात्रि 9 बजे अहमदाबाद स्टेशन से बैठे तो सुबह की पहली किरण के साथ हम सोमनाथ की पावन धरती पर थे । मंदिर से 6 किमी. पहले का मुख्य रेलवे स्टेशन है बेरावल । फ्रैश होने के बाद जैसे ही स्टेशन से निकलने को हुये मारे बदबू के जी मिचला गया । किसी पशु के शव से  उठने वाली दुर्गन्ध सी चारों और फैल रही थी । मालूम हुआ कि यहां मछलियों का एक्सपोर्ट का काम किया जाता है । लाखों मछलियों को बड़े काटूर्नों में पैक कर रेल द्वारा अहमदाबाद और वहां से अन्य जगहों तथा देश से बाहर भेजा जाता है । रोजाना यहां से गुजरने वाली लगभग प्रत्येक गाड़ी में पार्सल से यह मरी हुई मछलियां बाहर भेजी जाती हैं । इसी की बदबू स्टेशन पर चारों ओर फैल रही थी ।
पवित्र धरती पर आस्था और आध्यात्म की भावना विकास की बलि चढ़ रही थी । स्टेशन से बाहर आये तो टैम्पों वाले खड़े थे । अपना ब्रज होता तो घिर जाते लेकिन एक ही टैम्पों वाला आगे आया । यहां लगभग आसपास ही 12-14 मंदिर हैं उनमें से कुछ सोमनाथ मंदिर के रास्ते में पड़ जाते हैं और कुछ वहां से 2 किमी. के दायरे में हैं । इन मंदिरों में घूमने जाना था साथ में कुछ ओर भी यात्री मिल गये । टैम्पों चालक ने बताया कि मोदी की एकता रैली की वजह से सारे मुख्य मार्ग बंद हैं वह मंदिर के पीछे कालोनियों में होकर ले चलेगा ।
 
चाय पानी कर टैम्पों से निकले तो रास्तें में कुछ मंदिरों में दर्शन मिल गये । लेकिन मंदिरों के दशर्न से मन में कोई अनुभूति नहीं हो रही थी क्योंकि इसके लिये माहौल नहीं मिल रहा था । पूरे रास्ते भर साथ चल रहे बच्चों और महिलाओं ने नाक पर रूमाल रखे रखा । जब तक हम समन्दर के किनारे बाणगंगा तक नहीं आ गये तब तक रास्तें में पड़ने वाले मछली संस्थानों से आने वाली बुरी बदबू परेशान करती रही । खराब सड़कों पर यहां हमें रास्तें में सिटी बस की जगह सवारियां ढ़ोते छकड़ा दिखायी दिये । बुलेट मोटरसायकिल को रिक्शे का आकार देकर सवारी गाड़ी बनाया गया था । 1 से 2 लाख की रेंज की इस जुगाड़ का पास के एक कस्बे में पूरा बाजार था ।
 
सोमनाथ मंदिर के पीछे बसी कालोनियों में गंदगी अपना दर्द बयां कर रही थी । मिश्रित आबादी के ये गली मुहल्ले अपनी यू.पी. जैसे ही थे । विकास की चमक यहां धुंधली सी हो रही थी ।  मुख्य मंदिर के बाहर सुरक्षा कड़ी थी । भोलेनाथ के दर्शन कर बाहर निकले तो सामने बस समन्दर था । 10 रूपये में नारीयल पानी पीते हुये समन्दर किनारे ऊंट की सवारी करते सैलानी बच्चों की खुशियां देखना अलग अनुभव था ।
नारीयल पानी वाले को पैसे देकर मुड़ा तो एक छोटे गुमसुम से बालक ने रास्ता रोक लिया । याद आया कि इतना प्रसिद्ध मन्दिर अभी तक एक भिखारी नहीं मिला था । जैब में हाथ डालकर 2 रूपये निकाले तो बच्चे ने लेने से इंकार कर
दिया । उसके हाथ में पॉलिश का ब्रश था और नजर जूतों पर थी । साथ में खड़े बड़े बच्चे ने पूछा ‘पॉलिश कर दें’
 
पूछा कितने पैसे लोगे ? बड़े ने बताया, 10 रूपये । छोटे बच्चों से पॉलिश कराने में थोड़ा सा असहज था और अभी जरूरत भी नहीं थी सौ बोल दिया ‘‘ नहीं ’’ । दोनों बच्चों ने मुंह मोंड़ा और चल दिये । 2 रूपये अभी भी मेरे हाथ में थे । मन में ख्याल आ रहा था कि भीख में 2 रूपये ना लेने वाले इन खुद्दारों को 10 रूपये काम के देना ज्यादा सही है । आवाज देकर बुलाया तो बड़े ने ही आवाज निकाली ‘जी’ । छोटा अभी तक कुछ नहीं बोला था । बड़ा जूतों पर बड़ी तल्लीनता से पॉलिश कर रहा था और छोटा बस हाथ में ब्रश लिये चुपचाप बैठा था । यूं लग रहा था जैसे सारे दुनियां जहान का दुख इस नन्ही जान के हवाले था । नाम पूछने पर धीमी सी आवाज में बोला… ‘सूरज’ । माता पिता, परिवार, स्कूल के बारे में बहुत पूछा, लेकिन ना बड़ा बोला ना सूरज ।
सोमनाथ आते समय रास्तें में सफेद टोपी लगाये मोदी की एकता रैली में शामिल स्कूली बच्चे मिले थे । लेकिन इनके पास ना तो उन जैसी साफ ड्रैस थी, ना टोपी और ना हाथ में उनके जैसा तिरंगा । दोनों में बस एक बात समान थी ।
दोनों गुजरात से थे । 
जूतों पर पॉलिश हो चुकी थी । सूरज ने जूते उठाये, केवल एक ब्रश उन पर घुमाया और पैर के पास रखकर खड़ा हो गया । पूछा ये क्या है भाई’ तो बड़ा बोला- इसे अभी इतना ही आता है । 10 का नोट लेकर दोनो लेकर चले तो अब कदमों की चाल पहले की तरह बेदम नहीं थी । ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी छोटे बच्चे को जूते पॉलिश करते देखा हो, यू.पी. दिल्ली के लगभग प्रत्येक रेलवे,बस स्टेशन पर ऐसे दो चार सूरज आसानी से रोज मिल जाते हैं । लेकिन ये गुजरात के ‘सोमनाथ का सूरज’ था ।
वहीं सोमनाथ जिसके बारे में अभी नरेन्द्र मोदी जी ने बड़े गर्व से यू.पी. के बनारस में जिक्र करते हुये कहा था कि ‘‘मैं सोमनाथ से आया हूं ।’’
 
ये उस गुजरात का सूरज था जिसके विकास की चर्चा पर आज लोग पूरे देश की कमान सौंपने को तैयार नजर आते हैं ।  निश्चित रूप से अपवाद सभी जगह होते हैं । निश्चिय ही यह कोई बड़ी घटना या बड़ी बात नहीं है जिसके आधार पर गुजरात के विकास को बेमायने या झूठा बता दिया जाये । लेकिन फिर भी इतना तो महसूस हुआ कि गुजरात के विकास की रोशनी अभी इतनी तेज नहीं है कि उसकी
कुछ किरणें सूरज जैसे उन बच्चों पर भी पड़ सके जो केवल इस वजह से स्कूल नहीं जा सकते क्योंकि उन्हें शाम की दो रोटी का जुगाड़ करना है ।
 
 
 
 जगदीश वर्मा
 सह सम्पादक- प्रखर क्रान्ति चक्र 
 मथुरा (उ.प्र.)
 09319903380

नेटवर्क 10 चैनल में बनी जे.पी जोशी सेक्स सीडी

देहरादून।। चर्चित जे.पी जोशी सेक्स सीडी मामले में शाईनी मैक खान की गिरफ्तारी के बाद बड़ा खुलासा हुआ है। हाई-प्रोफाइल जे.पी जोशी सेक्स सीडी के मामले में  नेटवर्क 10 चैनल को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है।
 
उत्तराखण्ड राज्य के देहरादून से प्रसारित होने वाला न्यूज चैनल नेटवर्क 10 अपने शुरुआती दौर से ही परेशानियां झेल रहा है नेटवर्क 10 चैनल के मालिक राजीव गर्ग व आर.एस पवार ने जहां इस चैनल को खोलकर डेढ़ साल में तीन अन्य लोगों को बेच कर जहां करोडों रूपये पैदा किए वही चैनल के पत्रकारो को अपना गुलाम समझकर दलाली का अडडा बनाने की पूरी कोशिश की ।
हाल ही में जो मामला सामने आया उससे ये साफ जाहिर हो गया कि चैनल नेटवर्क 10 के मालिकों ने चैनल खोलकर ब्लैकमेलिंग का अड्डा बना लिया है उत्तराखण्ड के हाई प्रोफाइल अपर सचिव जे.पी जोशी सेक्स स्कैंडल मामले में जो तथ्य सामने आये वो संपूर्ण मीडिया जगत के लिए बदनुमा दाग साबित हो गया है।
 इस हाई प्रोफाइल मामले में पुलिस की जांच में साफ हो गया है कि ब्लैकमेलिंग की सेक्स सीडी नेटवर्क 10 चैनल के दफ्तर के अंदर ही तैयार की गयी थी। जे.पी जोशी सेक्स स्कैंडल मामले में जिस शख्स की गिरफ्तारी हुई है उसका नाम शाईनी मैक खान है । जो कि नेटवर्क 10 चैनल में टेक्नीकल की टीम मे नौकरी कर रहा था साथ ही वह पीडित महिला भी इस चैनल मे कार्य कर चुकी है इस हाई प्रोफाइल मामले में देहरादून में दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिन्दुस्तान जैसे बड़े अखबारों में साफ लिखा है कि पुलिस सूत्रों ने बताया है कि शाईनी मैक खान ने अपने चैनल के दफ्तर में रात को इस वीडियो की सीडी बनाई थी। शाईनी के संग इसी चैनल की एक युवती भी थी पीडिता की सहेली बताई जा रही है।
 
देहरादून के अखबारों में जो खबरें छपी है उसमें साफ लिखा है कि यह सेक्स सीडी एक निजी चैनल के कार्यालय में बनाई गई है। इस प्रकरण में पुलिस को जिन तीन लोगों की तलाश है उनमें एक युवती भी शामिल है यह युवती जिस चैनल में नौकरी कर रही है उसी चैनल के शाईनी मैक खान यानि नेटवर्क 10 चैनल के इस कर्मचारी की गिरफ्तारी की जा चुकी है। अखबारों में साफ लिखा है कि अन्य दो आरोपियों में एक चैनल हेड का नाम सामने आया है। इस प्रकरण में पुलिसिया जांच में एक के बाद जो नाम सामने आ रहे है उससे साफ लगता है कि आने वाले दिनों में नेटवर्क 10 चैनल की मुश्किलें बढ़ने वाली है।
 
जल्द ही नेटवर्क 10 के मालिको राजीव गर्ग व आर.एस पवार की मुश्किलें और बढेगी। पहले तो नेटवर्क 10 चैनल के सहारे धोखाधड़ी करके करोड़ो कमाये फिर इस चैनल के माध्यम से सेक्स सीडी तैयार कर ब्लैकमेलिंग का धंधा किया जा रहा है। आरोपी शाईनी मैक खान की गिरफ्तारी से साफ हो गया है कि इस ब्लैकमेलिंग सेक्स सीडी में नेटवर्क 10 चैनल के प्रशासन का भी अहम रोल रहा है।
 
R Rawat

‘आप’ के प्रचार में बुंदेलखंड़ से 100 युवक-युवतियां पहुंचेंगे अमेठी!

बांदा।। आम आदमी पार्टी (आप) के राजनीतिक भ्रष्टाचार व वंशवाद विरोधी अभियान में बुंदेलखंड़ के महिला जन संगठन भी खुलकर सामने आ गए हैं। ‘नागिन’ और ‘कोबरा गैंग’ राहुल गांधी के खिलाफ अमेठी से कुमार विश्वास को चुनाव लडाने की घोषणा से बेहद खुश हैं और चुनाव प्रचार के लिए बुंदेलखंड़ से 50 युवक व 50 युवतियां भेजने का निर्णय लिया है।
 
महिला जन संगठन ‘नागिन’ और ‘कोबरा गैंग’ की केन्द्रीय समन्यवक नेहा कैथल ने बताया कि ‘दोनों जन संगठन आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल द्वारा छेड़े गए ‘ईमानदार राजनीति की शुरुआत’ और ‘राजनीतिक भ्रष्टाचार व वंशवाद विरोधी अभियान’ में खुलकर साथ देना चाहते हैं, इसलिए केन्द्रीय कोर कमेटी की गुरुवार को अतर्रा कार्यालय में संपन्न हुई बैठक
में निर्णय लिया कि ‘यदि आगामी लोकसभा चुनाव में आप ने अमेठी से राहुल गांधी के खिलाफ कवि कुमार विश्वास को चुनाव लड़ाया तो उनके महिला जन संगठन चुनाव प्रचार के लिए बुंदेलखंड़ से 50 युवक और 50 युवतियां खुद के संसाधन से अमेठी भेजेंगे।’ उन्होंने कहा कि ‘जनता राजनीतिक भ्रष्टाचार व वंशवाद से ऊब चुकी है और तीसरे विकल्प की ओर बढ़ रही है, दिल्ली विधानसभा के
चुनाव परिणाम इसके सबूत हैं।’ बैठक का हवाला देते हुए नेहा ने बताया कि ‘नागिन गैंग की वाइस चीफ कमांडर मनोज सिंह (फतेहपुर) द्वारा रखे गए राजनीतिक प्रस्ताव पर चर्चा के बाद दिग्गजों के खिलाफ लड़ने वाले आम आदमी पार्टी (आप) के प्रत्याशियों के पक्ष में चुनाव प्रचार करने पर सहमति बनी है, जिनमें अमेठी को शीर्ष पर रखा गया है।’ उन्होंने बताया कि ‘यह टीम
फरवरी के अंत में अमेठी में डेरा जमाएगी और चुनाव प्रचार में युवतियों का नेतृत्व मनोज सिंह करेंगी व युवकों की जिम्मेदारी वह खुद संभालेंगी।’
 
 
आर जयन (प्रवक्ता)
महिला जन संगठन- ‘नागिन गैंग’ व ‘कोबरा गैंग
09794382988
 

नए साल में बरेली से शुरू होगा कैनविज टाइम्स का प्रकाशन

नए साल की शुरूआत में बरेली से कैनविज टाइम्स का प्रकाशन सम्भवतः शुरू हो जाएगा। बरेली मे इसकी कमान कभी दैनिक जागरण मुरादाबाद के संपादक रहे अनुपम मार्कण्डेय संभाल रहे हैं।
रियल स्टेट के कारोबारी रहे बरेली निवासी कन्हैया गुलाटी का अखबार कैनविज टाइम्स फिलहाल लखनऊ से प्रकाशित हो रहा है जहां इसकी जिम्मेदारी प्रभात रंजन दीन के पास है। बरेली में अनुपम मार्कण्डेय को संपादक की जिम्मेदारी दी गयी है। यह वही अनुपम मार्कण्डेय है जो कभी दैनिक जागरण मुरादाबाद के संपादक हुआ करते थे। डीएनई ब्रजेन्द्र निर्मल को भी कैनविज में वरिष्ठ पद सौंपा गया है। इन दोनो के अलावा संजीव गंभीर,अरशद रसूल, सुशील कुमार को भी कैनविज टाइम्स ने जगह दी है। 
वहीं दूसरी ओर अमर उजाला बदायूं में अपनी सेवा दे चुके सुधाकर शर्मा को दैनिक जागरण में प्रभारी बनाया गया है तो वहीं बिसौली में जागरण देख रहे प्रमोद मिश्रा अमर उजाला से जुड़ गए हैं। बरेली की तहसील बहेड़ी में अमर उजाला में अपनी सेवा दे चुके शोएब को हिन्दुस्तान ने हिमांशु पांडे की जगह प्रभारी बनाया है।
बरेली में केके सक्सेना ने दैनिक जागरण से इस्तीफा देकर कैनिवज टाइम्स ज्वाइन कर लिया है। केके लंबे समय से जागरण से जुड़े थे। वह बदायूं के उजला प्रभारी पद पर भी रह चुके हैं।
 
 
बरेली से एक पत्रकार की रिपोर्ट

भ्रष्टाचार में लिप्त सभापति ने चहेते पत्रकारों को बांटी ‘रेवड़ीयां’

अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपनों को देय. यह कहावत अजमेर जिले की यावर नगर परिषद के सभापति डॉ. मुकेश मौर्य पर सटीक साबित होती है. अपने चहेतों को उपकृत करने के लिए सभापति हमेशा सुर्खियों में रहते हैं. कुछ समय पूर्व सफाई कर्मचारी भर्ती मामला और अवैध कॉम्पलैक्स निर्माण विवादों में रहा था। इस बार तो सभापति ने सारी हदें पार कर दी. अपना उल्लू साधने के लिए पार्षदों को लड़ाने में माहिर सभापति ने अब पत्रकारों में फूट डाल दी.
कांग्रेस राज में जमकर कथित भ्रष्टाचार करने वाले यावर नगर परिषद सभापति मुकेश मौर्य भाजपा राज आते ही सकते में आ गए हैं. सत्ता बदलते ही भाजपा पार्षदों ने भी भ्रष्टाचार की पोल खोलना शुरू कर दिया है. सभापति की शिकायतें स्वास्थय शासन विभाग और भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो में की गई.
समाचार पत्रों में यह खबरें प्रकाशित होते ही सभापति की नींद उड़ गई. उन्हें भ्रष्टाचार का खेल एसीबी और मुख्यमंत्री तक पहुंचने का डर सताने लगा. इस मामले को दबाने और गोरखधंधों को छिपाने के लिए सभापति ने चुनिंदा पत्रकारों को भूखण्डों की लॉलीपोप थमा थी. प्रमुख समाचार पत्रों के प्रभारियों और परिषद की बीट देखने वाले संवाददाताओं को भूखण्ड आवंटित कर दिए. इतना ही नहीं सभापति ने अपने ‘चमचों’ को राजी करने के लिए उनसे जुड़े कम्प्यूटर ऑपरेटर और फोटोग्राफर्स के नाम भी भूखण्ड आवंटित कर दिए.
हालांकि दिखावे के लिए भूखण्ड आवंटन की यह प्रक्रिया 20 दिसंबर को पत्रकारों के सामने अंजाम दी गई मगर इस प्रक्रिया में 52 आवेदकों में से सिर्फ 13 आवेदकों को ही लाभ दिया गया. शेष फाइलें मौके पर मौजूद तक नहीं थी. भूखण्ड से वंचित पत्रकारों द्वारा कारण पूछे जाने पर सभापति ने टालमटोल जवाब दिए. न तो उनकी फाइलें मौके पर मंगवाई गई और न हीं उन्हें बताया गया कि फाइलों में आखिर ऐसी क्या कमी रही जिनकी वजह से उन्हें इस प्रक्रिया में शामिल नहीं किया गया. पत्रकारों के नाराजगी जाहिर करने पर सभापति कक्ष में भूखण्ड का लाभ पाने वाले पत्रकार भड़क गए और सभापति की हिमायत करने लगे.
मॉर्निंग न्यूज के विष्णुदत्त धीमान, ईटीवी के सुमित सारस्वत, केशवधारा के संपादक संदीप बुरड़ ने सभी पत्रकारों की फाइलें मौके पर मंगवाने और फाइलों में कमियां बताने की बात कही. इस पर भूखण्ड का लाभ लेने वाले राजस्थान पत्रिका के भगवत दयाल सिंह और दैनिक नवज्योति के किशनलाल नटराज आगबबूला हो गए. पत्रिका का भगवत दयाल तो इतना भड़क गया कि संदीप बुरड़ से गाली-गलौच करते हुए मारपीट के लिए दौड़ पड़ा. मौके पर मौजूद पत्रकारों और कर्मचारियों ने बीच बचाव किया. ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति अपनाने वाले सभापति मुस्कुराते हुए यह सारा नजारा देख रहे थे.
उनके चेहरे की कुटिल मुस्कान साफ बयान कर रही थी कि वे अपना उल्लू साधने में सफल रहे. सभापति ने पत्रकार विमल चौहान, राहुल पारीक, हेमंत कुमार साहू, कमल किशोर प्रजापति, संतोष कुमार त्रिपाठी, किशनलाल नटराज, मोमीन रहमान, राजेश कुमार शर्मा, पदम कुमार सोलंकी, कमल कुमार जलवानियां, तरुणदीप दाधीच, भगवत दयाल सिंह, महावीर प्रसाद को पत्रकार कॉलोनी में भूखण्ड आवंटित किए हैं. शेष आवेदकों को सभापति ने झांसा देकर टरका दिया.
सभापति कक्ष से बाहर आकर पत्रकार मनीष चौहान, दिलीप सिंह, बबलू अग्रवाल, संदीप बुरड़, सुमित सारस्वत, विष्णु धीमान, बृजेश शर्मा, विष्णु जलवानियां, यतीन पीपावत ने नाराजगी जाहिर की. पत्रकारों की यह नाराजगी भगवत दयाल को रास नहीं आई और उसने धमकी दे डाली कि ‘देखता हूं अब तुम लोग प्लॉट कैसे लेते हो. तुम्हारी …. में दम हो तो सभापति से लेकर दिखाना.’
उसके इस कथन से साफ जाहिर होता है कि दलाल सरीके ये पत्रकार चाटुकारिता करते हुए सभापति के तलुवे चाटते हैं और उनकी गुलामी करते हैं. इस बयान से मिलीभगत भी साफ जाहिर होती है. हमारे सूत्रों ने तो इतना तक बताया कि प्रक्रिया शुरू होने से पहले सूची कुछ और थी, जिसे बाद में बदल दिया गया. इस बीच किशनलाल को सभापति कक्ष में सभी पत्रकारों की फाइलें टटोलते हुए देखा गया. इस बात को लेकर वहां मौजूद कुछ पार्षद भी हैरत में पड़ गए थे कि आखिर सभापति के राज में यह सब क्या हो रहा है.
सभापति द्वारा अंजाम दी गई कि यह पूरी कार्यवाही अवैध थी. इसे पारदर्शी बनाने की बजाय गोपनीय रखा गया. सभापति ने नियमों को दरकिनार कर चहेतों को रेवडियों की तरह भूखण्ड आवंटित कर दिए, ताकि उनके मुंह बंद रहें. यह प्रक्रिया पूरी तरह नियम विरूद्ध थी, जो कई सवाल खड़े करती है.
नियमानुसार इस प्रक्रिया का चयन उस कमेटी द्वारा होना चाहिए था, जिसमें सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी एवं संपादकीय टीम से जुड़ा कोई वरिष्ठ पत्रकार सदस्य शामिल हो. जबकि सभापति द्वारा मनमर्जी से गठित की गई पांच सदस्यों की कमेटी में न तो पीआरओ प्रतिनिधि था और न ही कोई संपादकीय सदस्य. सभापति की अध्यक्षता में बनी कमेटी में आयुक्त ओमप्रकाश ढीढवाल, सहायक लेखाधिकारी घनश्याम तंवर, कार्यालय अधीक्षक दुर्गालाल जाग्रत, वरिष्ठ लिपिक भंवरनाथ रावल शामिल थे.
वंचित आवेदकों ने प्रक्रिया पर संदेह जताते हुए भ्रष्टाचार के आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि कुछ आवेदकों को योग्य नहीं होने के बावजूद भूखण्ड दे दिए गए हैं, जबकि योग्यता रखने वाले आवेदकों की अनदेखी की गई. सभापति ने कुछ समय पूर्व पत्रकारिता में कदम रखने वाले अनाडियों को पत्रकार की श्रेणी में शामिल कर लिया, जबकि राज्य सरकार द्वारा अधिस्वीकृत पत्रकारों को दरकिनार कर दिया. सभापति ने जिस मोमीन रहमान को भूखण्ड आवंटित किया है वो कुछ समय पूर्व नव'योति में कम्प्यूटर ऑपरेटर के पद पर लगा था. प्रेस फोटोग्राफर कमल किशोर प्रजापति उर्फ सुमन प्रजापति अशिक्षित है. यह फोटोग्राफर अपनी कारगुजारियों के कारण किसी भी संस्थान में एक साल से 'यादा नहीं टिकता है. महावीर प्रसाद दैनिक भास्कर के सर्कुलेशन विभाग में कार्यरत है. सुबह उठकर अखबार बेचने वाले को भी सभापति ने न जाने क्यों प्रक्रिया में शामिल कर भूखण्ड का लाभ दे दिया. वर्षों से पत्रकारिता में जीवन झोंक रहे 80 वर्षीय अधिस्वीकृत पत्रकार भंवरलाल शर्मा को योजना का लाभ नहीं दिया गया.
आखिर क्या वजह रही कि चयन कमेटी में संपादकीय सदस्य और पीआरओ को शामिल नहीं किया गया? वर्षों से सिर्फ पत्रकारिता कर रहे पत्रकारों की अनदेखी क्यों की गई? आखिर ऐसी क्या सांठ-गांठ रही कि किशनलाल को सभापति कक्ष में पत्रकारों की फाइलें टटोलने की परमिशन दी गई? आखिर क्या वजह रही कि राजेश शर्मा, किशनलाल और भगवत दयाल पूरी प्रक्रिया के तहत अगुवाई करते हुए घर-घर जाकर फार्म भरवाते रहे और बाद में घालघुसेड़ कर खुद को भूखण्ड मिलने के बाद चुप्पी साध गए? सात दिवस की निर्धारित अवधि में आवेदन फार्म जमा करवाने के बाद परिषद ने नोटिस थमाकर आपूर्तियां पूरी करने के लिए तीन दिवस का समय दिया था। निर्धारित अवधि में पत्रकारों ने कमियों की पूर्ति कर दस्तावेज जमा करवा दिए। इसके बाद फिर कौनसी कमियां रह गई जिनकी वजह से लॉटरी के वक्त फाइलों को मौके पर नहीं मंगवाया गया? आखिर लॉटरी प्रक्रिया के दौरान वंचित आवेदकों को पूछने पर भी फार्म की कमियां क्यों नहीं बताई गई?
नियमानुसार सभी फाइलें चैक होने के बाद चयनित फाइलों के आवेदकों की लॉटरी निकालनी थी, जबकि सभापति ने प्लॉट की लॉटरी निकाली. 27 में से 13 प्लॉट आवंटित करने के बाद अब 14 प्लॉट शेष बचे हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि शेष 14 प्लॉट बचे हुए 39 आवेदकों को कैसे दिए जाएंगें? इन सभी सवालों को दरकिनार कर सभापति ने अपने शेष कार्यकाल को राजी-खुशी निकालने के लिए पत्रकारों को मैनेज किया है. वैसे राजनीति में लेन-देन की परंपरा तो वर्षों से चली आ रही है, मगर काले कारनामों को छुपाने के लिए भूखण्ड देकर मुंह बंद करने का यह तरीका नया है जो जनप्रतिनिधियों के साथ शहर में चर्चा का विषय बन गया है. अब देखना है कि संवेदनशील और पारदर्शी सरकार के शासन में लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने वाले इन पत्रकारों के साथ क्या न्याय होगा. 
 
 एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

आनन्द भवन कैंपस के बेरोजगार दलित युवाओं की दर्द भरी दास्तां…

सर हम सभी आनन्द भवन कैंपस के बेरोजगार दलित युवा हैं। हमारे पिता जी लोग आनन्द भवन संग्रहालय में अलग-अलग पद पर कार्यरत है। हम लोगो का पूरा बचपन यहीं बीता है। यहां के कुछ कर्मचारी तो पंडित जवाहर लाल नेहरू जी के जमाने से थे। पर अब वो रिटायर हो गयें  हैं। उनकी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। 
हमने कांग्रेस पार्टी को कई पत्र लिखे ईमेल भी किया। पर वहां के अधिकारी हमारी बात राहुल गांधी तक नहीं पहुंचने देते। जब वो आनन्द भवन आते है तो यहां के अधिकारी गेट पर ताला लगवा देते हैं। यहां तक की घर का समान लेने के लिये भी घुमाकर बाल भवन के गेट से भेजते हैं आखिर हम अपनी समस्या किससे कहें। क्योंकि राहुल गांधी जी तो आम आदमी की पहुंच से दूर है। हम लोग कांग्रेस पार्टी से ये कहना चाहते हैं कि जिसके घर के दलित युवा बेरोजगार है। तो देश के बेरोजगार युवा और दलित कैसे विश्वास करेंगे। क्या कांग्रेस पार्टी अब आम आदमी पर ध्यान नहीं देती। हमारा परिवार व अन्य कर्मचारी कई वर्षो से कांग्रेस को आंख मूंद कर वोट देते हैं। कुछ तो कई पीढ़ी से दे रहे हैं। क्या उस विश्वास की कोई कीमत नहीं हैं।
 
अगर आप लोग हमारी ये बात कांग्रेस के आला अधिकारियों और नेताओं को पहुंचा दें। तो हम आपके जीवन भर आभारी रहेंगे। सर हम लोगो ने जो पत्र भेजा था वो आपको भी मेल से भेज रहे हैं। 
arjunbrahmatitu@gmail.com

जादूगोड़ा में भी है महाठग चार्ल्स पोंजी का अवतार

जादूगोड़ा में एक साधारण युवक कमल सिंह द्वारा किया गया महा-घोटाला अमेरिकी महाठग चार्ल्स पोंजी  के याद दिलाता है जिसने  १९१९-२० के काल में अमेरिका के अप्रवासी इटालियन चार्ल्स पोंजी ने ९० दिनों में  लगभग ४० हजार लोगो से १५ मिलियन डॉलर से अधिक की राशि एकत्रित करके पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। लेकिन जादूगोड़ा जैसे छोटे लेकिन महत्वपूर्ण जगह से अरबो लेकर गायब हुए कमल सिंह की चर्चा उतनी नहीं हो रही है। 
क्या वह आसमान में चला गया या पाताल में समा गया या देश छोडकर चला गया ? यह किसी को पता नहीं है। सरकार को इसकी तनिक भी फिक्र नहीं है ,पूरी सच्चाई उजागर करने के लिए सरकार की और से अबतक कोई पहल नहीं की गयी है। वहीं नारायण साईं को खोजने के लिए गुजरात में सरकार ने हर दिन लाखों रुपये खर्च किये। लेकिन जादूगोड़ा और आसपास के क्षेत्रो के असंख्य लोगो के जीवन से दुराचार और खिलवाड़ करने वाले को ढूंढने के प्रति झारखंड सरकार को कोई चिंता नहीं है। सरकार की सोच में यह कोई मामला ही नहीं दीखता कमल सिंह का सारा नाम पता  ठिकाना भारत सरकार के पास  दर्ज है। मजे की बात यह है की कमल सिंह एक सरकारी उपक्रम का कर्मचारी भी है। वह अपनी पोंजी स्कीमे चला चला कर लोगो को ठगता भी रहा और उपक्रम से वेतन भी उठाता रहा और लोगो को आकर्षित करने के लिए कुछ व्यावसायिक उपक्रम का उद्घाटन बड़े-बड़े लोगो और अधिकारियों से कराता रहा। लोग इस कदर झांसे में आ गए की प्रति माह लाख में पांच हजार और बीस माह में दुगना के चक्कर बैंको से कर्ज लेकर और यहां तक की बीवी के गहने और जमीं बेचकर भी इन स्कीमो में पैसा लगा दिया। कमल सिंह ने गुवाहाटी ,कोलकाता , थाणे , मुंबई , अहमदाबाद , नई दिल्ली , धनबाद , जैसे शहरो के पतों पर कई कंपनियां बनायी  और इन कंपनियों में कई लोग  निर्देशक बनाए गए लेकिन सरकार  एक भी निदेशक को अभी तक पूछताछ के लिए खोज नहीं पायी है। क्या सभी एक साथ गायब हो सकते है ?
 
चारा घोटाले में महज अनुशंषा या पैरवी पत्र लिखने की वजह से डॉ जगन्नाथ मिश्र जैसे लोग जेल की हवा खा सकते है तब कमल के साथ गलबाहीं लगाने और नौकरी से लेकर धंधा में संरक्षण देने वालो की पहचान भी नहीं की जा सकती ? सरकार , प्रशासन ,पुलिस और जादूगोड़ा में यूरेनियम जैसे जरुरी धातु के प्रोसेसिंग से प्रदुषण पर पूरी दुनिया में हंगामा मचानेवाले एनजीओ और मानवाधिकार संगठनो की चुप्पी बहुत कुछ बता रही है की सभी आम आदमी को सिर्फ धोखा देने जानती है और आम आदमी के नाम पर सिर्फ रोटियां सकने का काम करती है।
जादूगोड़ा के युवक देवाशीष सेन जो वर्तमान में युके में काम करते है उन्होंने बताया की उन्होंने कमल के कंपनी में विपुल भकत  के माध्यम से १२ लाख रुपय जमा किये थे वो उसकी जिंदगी भर की कमाई थी , उसने बताया की उनके पिताजी की मौत बचपन में ही हो गयी थी और उन्होंने जिंदगी में बहुत मेहनत की ट्यूशन पढ़ाये और अपनी पढ़ाई भी की और टाटा कम्युनिकेशन सर्विस युके में काम कर रहें है उनका बचपन से ही सपना था की अपनी मां के लिए अपना घर खरीदूंगा और युके से आकर  भारत में ही कहीं नौकरी  कर अपनी मां की सेवा करूंगा लेकिन कमल सिंह के झांसे  में आकर मेरी जिंदगी तबाह हो गयी है और मेरा सपना टूट गया है , देवाशीष सेन चाहते है की कमल और उसका पूरा ग्रुप उसके संरक्षक और उसके जितने भी कंपनियां है वो सही है या फर्जी है इसकी जांच सरकार द्वारा आयोग बनाकर किया जाए।  

मीडिया की नैतिकता के खिलाफ है जी न्यूज का स्टिंग ऑपरेशन

बीते कुछ दिनों या यूं कहें कि कुछ सालों में यह लगातार देखने को मिल रहा है कि मीडिया खासकर इलेक्ट्रानिक मीडिया अपनी गलत प्रतिस्पर्धा के लिए मीडिया के उन तमाम आदर्शों, नैतिकता आदि को ताक पर रख रहा है जिसके लिए मीडिया को अन्य लोगों से अलग रखा जाता है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि टीआरपी पाने के लिए इलेक्ट्रानिक चैनल वो सारे काम करने को विवश है जिसके करने से मीडिया आदर्श को बहुत बड़ा धक्का लग रहा है। 
दो दिन पहले ही देश के बड़े मीडिया ग्रुप जी न्यूज के द्वारा कांग्रेस विधायकों का स्टिंग आपरेशन किया गया। हम बड़े आदर्शों और नैतिकता की तो बातें करते हैं लेकिन जब गला काट प्रतिस्पर्धा की बात आती है तो खुद मीडिया ग्रुप वह सारे गलत काम कर देता है जिसे करने से मीडिया आदर्श को बड़ा आघात पहुंचता है। 
जब दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी के नेता कुमार विश्वास पर एक चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया तो उस वक्त कुमार विश्वास की ओर से बताया गया कि स्टिंग ऑपरेशन करने वाले वरिष्ठ पत्रकार अनुरंजन झा उनके पारिवारिक मित्र हैं और जिस दिन यह स्टिंग ऑपरेशन किया गया उस दिन अनुरंजन झा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ घर पर आए थे और पारिवारिक व्यक्ति होने के कारण सामान्य तौर पर बातचीत होती रही। क्योंकि जब दो गहरे मित्र मिलते हैं चाहे वह पत्रकार और नेता ही क्यों न हो व्यक्ति थोड़ा सामान्य तौर पर अंदर की बातें करने लगता है लेकिन कोई अगर उस विश्वास का गला घोटे तो इसे क्या कहा जाए। उस वक्त कुमार विश्वास की यह बातों पर लोगों ने स्टिंग ऑपरेशन को नैतिकता के खिलाफ बताया था।
तो क्या कांग्रेस विधायकों का स्टिंग ऑपरेशन की नैतिकता के खिलाफ नहीं है? कांग्रेस विधायकों ने अगर आपसे विश्वास में एक दोस्त समझकर अगर कुछ शेयर किया तो क्या उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए था? यह तो मीडिया सहित साी जानते हैं कि कांग्रेस ने आप को इस लिए समर्थन किया है ताकि जो वायदे आप ने किए हैं वह पूरा करें, क्योंकि कांग्रेस को लगता है कि जिस तरीके से आप ने वायदे किए हैं उसे हकीकत में पूरा करना टेढ़ी खीर साबित होगी। वैसे तो यह सब जानते थे कि कांग्रेस ने आप को निपटाने के लिए ही सरकार बनवाई है इसमें भला कौन सी ब्रेकिंग न्यूज थी। बेवजह पत्रकार और नेता के बीच ऑफ रिकार्ड की प्रक्रिया को खत्म कर न्यूज चैनल ने अच्छा नहीं किया। इससे आगे साी नेता घर में या बाहर कहीं भी आफ रिकार्ड कुछ भी बात नहीं करेंगे। इसका खामियाजा सभी पत्रकारों को भुगतना पड़ेगा। क्योंकि हमारी बिरादरी जो भाई हैं उनकी काफी खबरें यही नेता
सूत्रों और विश्वस्त सूत्रों पर चलवाते हैं निसंदेह अब इस तरह जब बातचीत बंद होगी तो लोगों को विश्वस्त सूत्रों की ब्रेकिंग से कुछ नहीं मिलेगा।
मेरा मानना है कि हर हाल में कम से कम पत्रकारों और अन्य लोगों, नेता, अधिकारी आदि के बीच जो रिपोर्टिंग के दौरान गहरे रिश्ते बनते हैं और उन्हें हर हाल में कायम रहने की जरूरत है। क्योंकि हम लोग खबर के भूखे होते हैं और ये लोग विपरीत परिस्थिति में खबर न होने पर विश्वास की डोर को कायम कराते हुए खबर मुहैया करवाते हैं।
विभूति कुमार रस्तोगी
वरिष्ठ पत्रकार

बुंदेली भाषा को मिलेगा साहित्य में वाजिब मुकाम

बुंदेली भाषा अति प्राचीन है लेकिन उसे हिंदी साहित्य के इतिहास में वह मुकाम नहीं मिल पाया जिसकी वह हकदार है। अब उसे वाजिब स्थान दिलाने की पुरजोर कोशिश शुरू हो गई है। हिंदी के चिंतकों न बुंदेली की गहरी जड़ें खोजने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इसी माह तीन और चार दिसंबर को बुंदेलखंड विश्वविद्यालय में देश के हिंदी चिंतकों और दिशा निर्धारकों का संगम हुआ। तवारीख के लिहाज से यह अद्वितीय मौका था। 
पहली बार देश के विचारकों ने बुंदेली लोक साहित्य और संस्कृति के रचनासेवियों और उनके बहुमूल्य कार्यों को हिंदी साहित्य के इतिहास में उचित स्थान दिलाने की कोशिश समग्रता से की है। यह सब संभव हो पाया है विज्ञान के उच्चकोटि के विद्वान और हाइटेक अध्येता तथा हिंदी के हितचिंतक बुदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाशचंद्र पाण्डेय के भागीरथ प्रयासों के चलते।
 इसकी अनुगूंज भारतीय हिंदी परिषद के 41वें अधिवेशन में पास एक विशेष प्रस्ताव में भी सुनाई पड़ी। इस प्रस्ताव में हिंदी परिषद के कर्ताधर्ताओं न खुले मन से यह बात स्वीकार की कि हालांकि प्रो. पाण्डेय विज्ञान के विशेषज्ञ हैं लेकिन भारतीय भाषाओं और संस्कृति से उनका गहरा लगाव है। उनके विशेष प्रयासों और आग्रह के कारण ही भारतीय हिंदी परिषद का 41वां अधिवेशन बुंदेलखंड की हृदयस्थली झांसी में आयोजित किया गया।
 
गौरतलब है कि भारतीय हिंदी परिषद की स्थापना सन 1942 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के तत्कालीन हिंदी विभागाध्यक्ष डा. धीरेंद्र
वर्मा और तत्कालीन कुलपति सर अमरनाथ झा के प्रयासों से हुई। सन 1942 के राष्ट्रीय आंदोलन की व्यापकता विस्तार तथा गहनता अन तीनों तथ्यों से यह तय हो चुका था कि देश निश्चित रूप से शीघ्र ही स्वतंत्र होगा। इस अवधारणा को केंद्र में रखते हुए भारतीय मनीषियों ने स्वतंत्र देश के विविध सामाजिक संदर्भों से जुड़े भावी भारत के विकास के लिए योजनाएं निर्मित करने का संकल्प शुरू कर दिया था। यह संदर्भ राष्ट्रभाषा हिंदी के उन्नयन तथा उच्च शिक्षा के संकल्पों से भी जुड़ा। इस संस्था का संबंध उच्च शिक्षा
संबंधी हिंदी की समस्याओं से रहा है। यह बराबर इसके लिए संघर्ष करती रही है। यह संस्था देश के सभी विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के प्राध्यापकों से जुड़ी हुई है। इसमें सामयिक और स्थायी लगभग दो हजार विद्वान सदस्य हैं।
यह परिषद उच्चस्तरीय अध्यापन की समतुल्यता स्तरीयता तथा राष्ट्रीय हितबद्धता को ध्यान में रखकर काम करती है।  इसका दूसरा स्तरीय दायित्व हिंदी शोध कार्य को व्यवस्थित करके उसे उत्कृष्टता प्रदान करना है ताकि हिंदी शोध की दिशा स्खलित न होने पाए। हिंदी परिषद का संकल्प पूरी तरह से इस संदर्भ से जुड़ा है कि भारतीय समाज रचना की व्यवस्था कैसे संतुलित हो जिससे शैक्षिक प्रशासनिक एवं लोक व्यवस्था के स्तर पर हिंदी को अपेक्षित गौरव प्राप्त होता रहे।
 
भारतीय हिंदी परिषद के 41वें अधिवेशन का मूल संदर्भ इस बार बुंदेलखंडी भाषा तथा साहित्य के सर्वांग मूल्यांकन का रहा। इसे तय करवाने में बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अविनाशचंद्र पाण्डेय की अहम भूमिका रही। इसकी तस्दीक अधिवेशन के दौरान परिषद के शीर्ष पदाधिकारियों ने अपने संभाषण में की।
 
यहां आए हिंदी के विद्वानों ने यह तथ्य स्वीकार किया कि भारतीय हिंदी परिषद के 41वें अधिवेशन में उन्होंने बुंदेली भाषा के साहित्यिक विश्लेषण के साथ-साथ ऐतिहासिक एवं सामयिक मान्यताओं से जुड़े तथ्यों का एकत्रीकरण और उस पर मंथन इसलिए कर रहे हैं ताकि हिंदी की राष्ट्रीय पृष्ठभूमि का सही आकलन हो सके। उन्होंने बताया कि संपूर्ण हिंदी साहित्य के आदिकाल से
लेकर आज तक लगभग एक हजार से अधिक बुंदेलखंडी कवि हैं जिनसे जुड़ा इतिहास केवल विवरणात्मक है। जहां तक बात रही बुंदेलखंडी शब्द की तो यह चौदहवीं शती का है। यहां अधिवेशन में आए चिंतकों के मन को यही सवाल मथता रहा कि
ईसा की चौथी शती से स्थापित इस ऋषिभूमि यानी बुंदेलखंड की भाषा को क्या नई भाषा कह सकते हैं। कारण यह कि इस भाषा के प्रारंभ का कोई साक्ष्य नहीं जिसके आधार पर वे यह कह सकें कि यह प्राचीन भाषा है।
 
भारतीय हिंदी परिषद के अध्यक्ष प्रो. योगेंद्र प्रताप सिंह का मानना है कि यजुर्वेदकाल में बुंदेलखंड क्षेत्र का नाम यर्जुहोतो था। आगे चलकर इसका नाम युज्रहोता पड़ा। इसका कारण यह था कि यहां ऋषिगण निवास करते थे।
वे निरंतर चिंतन. साधना में लगे रहते थे। आगे के कालखंड में यह क्षेत्र जुझौती कहलाया। इसका विवरण सातवीं सदी के चीनी यात्री युवान चांग ने दियी है। बाद में इसे जुझारखंड तथा और बाद में इस नगरी को विंध्यखंड कहा गया। कालांतर में यही नाम बुंदेलखंड पड़ा। बुंदेलखंड नाम 14वीं सदी में महाराज हेमकरण बुंदेला ने दिया।
 
हिंदी के विद्वानों का मानना है कि मध्यकालीन भाषा क्षेत्र में हिंदी के तीन रूप रहे। पहला ब्रजभाषा तथा हिंदी पश्चिम भारत दूसरा मध्यदेशीय अवधी तथा हिंदी मध्य का भारत तथा तीसरा भोजपुरी का बिहारी भाषा पूर्व का
भारतीय क्षेत्र। ब्रजभाषा तथा बिहार क्षेत्रों की भाषा का सर्वेक्षण तथा सांस्कृतिक विकास क्रम का सर जार्ज ग्रियर्सन से लेकर सुनीति कुमार चटर्जी तक व्यापक रूप से मूल्यांकन हो चुका है। अवधी भाषा के विकास पर भी यह कार्य डा.बाबूराम सक्सेना कर चुके हैं। हम मध्यप्रदेश को बुंदेली, बघेली, छत्तीसगढ़ी भाषाओं में बांट रहे हैं किंतु इसकी भाषिक रूप रचना एवं साहित्यिक संदर्भों का जब तक सही मूल्यांकन नहीं किया जाता तब तक भाषिक सर्वेक्षण तथा साहित्यिक विश्लेषण का पक्ष अधूरा रहेगा।
 
विभिन्न पक्षों को ध्यान में रखते हुए यहां बुंदेलखंड विश्वविद्यालय परिसर के विभिन्न सभामारों में दो दिनों तक चल गोष्ठियों में हिंदी
हितचिंतकों ने बुंदेली लोक साहित्य और संस्कृति से जुड़े पक्षों पर विचार मंथन किया। विद्वानों ने शोधपत्र पेश किए। इन्हें अहम दस्तावेज के रूप में सहेजा जाएगा। विश्वविद्यालय ने शोधपत्रों को एक पत्रिका के रूप में सहेजने का निर्णय लिया है। बुविवि के कुलपति ने पत्रिका के प्रकाशन पर आने वाले संपूर्ण खर्च को वहन करने का निर्णय लिया है।
 
अब हिंदी के विद्वानों में यह उम्मीद जगी है कि बुंदेलखंड के लोक साहित्य और संस्कृति को हिंदी साहित्य के इतिहास में वह वाजिब स्थान मिल सकेगा जिसकी वह हकदार है। उनका मानना है कि हाइटेक भगीरथ के प्रयास रंग
लाएंगे।
 
उमेश शुक्ल (प्रवक्ता)
जनसंचार एवं पत्रकारिता संस्थान
बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झांसी
9452959936

बिहार में निविदा की शर्तों को ताक पर रखकर हो रहा है चीनी मिलों का आवंटन

बिहार में जब जदयू और बीजेपी ने 2005 में मिलकर सरकार बनाई थी तब यहां बंद पड़े चीनी मिलो को फिर से शुरू करने की बात कही गई थी जिसके तहत बिहार स्टेट शुगर कार्पोरेशन की जो चीनी मिलें थी उसको प्राइवेट सेक्टर के हाथ से बेचने की निविदा करायी गई थी।

तत्कालीन गन्ना आयुक्त जयमंगल सिंह ने चरणबद्ध तरीके से निविदा कराई, पहले दौर की निविदा जो 2008 में कराई गई थी, मोतीपुर और बिहटा सुगर मिल को इंडियन पोटाश लिमिटेड, लौरिया और सुगौली चीनी मिल को हिंदुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड को क्रमशः 45 और 50 करोड़ में बेचा गया।
दूसरे दौर की निविदा जो 2009 में कराई गई थी, रैयाम और सकरी चीनी मिल को तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड के हाथो क्रमश 8.44 और 18.25 करोड़ में बेचीं गई। 
बिहार में सरकारी निविदा की जो शर्ते होती है उसके तहत कंपनी कम से कम तीन साल पुरानी होनी चाहिए और वार्षिक टर्न ओवर के साथ साथ तकरीबन 50 शर्त होती है। 
लेकिन रैयाम और सकरी चीनी मिलों को प्राइवेट सेक्टर के कंपनी तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड के हाथो बेचते हुए निविदा की सारी शर्ते ताक पर रख दी गई थी। तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड रजिस्टर ऑफ कंपनी में 22 अगस्त 2008 को पंजीकृत हुआ था और मात्र 1 करोड़ के पूंजी के साथ। 2009 में बिहार स्टेट सुगर कारपोरेशन के दुसरे चरण के निविदा में रैयाम और सकरी की चीनी मिलें तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड को दे दी गई।
एक ओर जहां हिंदुस्तान पेट्रोलियम कार्पोरेशन लिमिटेड और इंडियन पोटाश लिमिटेड जैसे भारत के प्रतिष्ठित कंपनीओ को चीनी मिलो का आवंटन किया गया वही दूसरी ओर तिरहुत इंडस्ट्रीज लिमिटेड जैसे 6 महीने पुरानी कंपनी को निविदा की सारी शर्ते ताक पर रख कर चीनी मिलो का आवंटन किया गया।
 
काली कान्त झा

गजल अब पैसे कमाना चाहती है…

सोनभद्र।। मिर्जा असदुल्लाह बेग खान उर्फ गालिब जयंती के अवसर पर मित्र मंच, सोनभद्र की ओर से स्थानीय विवेकानंद प्रेक्षागृह में शुक्रवार की रात ‘ऑल इंडिया इण्डोर मुशायरा’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि और सदर विधायक अविनाश कुशवाहा द्वारा गालिब की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन से हुआ।
 
गालिब के फाकामस्ती भरे जीवन पर प्रकाश डालते हुए अविनाश कुशवाहा ने कहा कि गालिब ने 11 साल की उम्र में शायरी करनी शुरू कर दी थी और पूरी उम्र उनकी शायरी में गम का कतरा घुलता रहा। इस दौरान उन्होंने गालिब की कुछ शेर भी पढ़े-
"न था कुछ तो खुदा था, कुछ न होता तो खुदा होता। डुबोया मुझको होने ने, न होता मैं तो क्या होता।।….पूछते हैं वो कि गालिब कौन है, कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या….इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के।"
 
भदोही के खम्हरिया से आए चर्चित शायर कासिम नदीनी ने मुशायरे का आगाज कुछ इस तरह से किया-
 
"खशबू मिली, बहार मिली, दिलकशी मिली…जन्नत से भी हंसी तुम्हारी गली मिली…इरफां मिला सऊर मिली आग भी मिली…जिगर-ए-नबी से हमको नई जिंदगी मिली।।…"
 
फिर उन्होंने जो शेर पढ़े वह लोगों की दिलों में हिन्दुस्तान के जज्बात पैदा कर गए-
 
 "मैं मर जाऊं तो मेरी सिर्फ ये पहचान लिख देना…मेरे माथे पे मेरे खून से हिन्दुस्तान लिख देना…हम उस भारत के वासी हैं जहां होता है….हर एक धर्म का सम्मान लिख देना…हमारे मुल्क का इतिहास जाके तुम कभी लिखना…मुसलमानों को दिल और हिन्दुओं को जान लिख देना…वहीं अजमतों को पाक दिल की जन्नत भी निछावर है…वो है मेरे भारत के खेत और खलिहान लिख देना….जो तुमसे स्वर्ग का संक्षिप्त वर्णन कोई करवाए…तो इक कागज उठाकर सिर्फ हिन्दुस्तान लिख देना…मैं मर जाऊं तो मेरी सिर्फ ये पहचान लिख देना…हमारी सभ्यता और एकता लक्ष्य तो आधा…ग्रन्थ बाइबिल, गीता है और कुरान लिख देना।
 
कानपुर से आईं शायरा रुही नाज ने अपनी नज्म से लोगों को जिंदगी से कुछ इस तरह रूबरू कराया-
 
"चांद से दूर जरा चांदी के हाले कर दूं…दिल तो कहता तो है कि हर शम्त उजाले कर दूं…इस तरह तेरे सुलगने से बेहतर तो ये है…जिंदगी ऐ तुझको, जिंदगी के हवाले कर दूं।"
 
इसके बाद उनकी एक-एक कर गजलों ने श्रोताओं को वाह-वाह करने पर कुछ इस तरह मजबूर किया-
 
"मेरे बहते हुए अश्कों ने पुकारा तुमको…दिल की हसरतें ही हैं कि मैं देखूं
दुबारा तुमको…मेरी हर सांस तेरे नाम से चलती ही रही…पास आओ तो दिखाऊं ये
नजारा तुझको…बात ठुकराई है हर राह पर तुमने मेरी…फिर भी हर मोड़ पे देती
हूं सहारा तुमको।"
 
मध्य प्रदेश के ग्वालियर से आए अख्तर ग्वालियरवी के शेर स्रोताओं के दिलों में
कुछ इस तरह उतरे कि वे उन्हें बार-बार मंच पर शायरी करने की मांग करने लगे।
उन्हें अपने शेरों कुछ इस इंदाज में बढ़ा-
 
"मेरी आंखों से मेरे दिल में उतरना सीखो…आइना सामने रखा है संवरना सीखो…आओ
अब फसलें बहारां की अदा बन जाओ।…खुशबुओं की तरह बिखरना सीखो।"
 
ग्वालियरवी की नज्मों के बाद स्थानीय शायर नजर मुहम्मद नजर ने कुछ इस तरह अपनी
वेदना का इजहार किया- चाहने वाला दिल से मुझको अभी तो मिला नहीं…चाहे अपने
हों या पराए किसी से सिकवा गिला नहीं..वफा करो वफा मिलेगा नजर ये कहने की बात
है…वफा किया तो सिला वफा को हमको किसी से मिला नहीं।
 
वहीं स्थानीय शायर अब्दुल हई ने कुछ इस तरह अपने जज्बात स्रोताओं के सामने रखे-
 
भूले से क्या पड़े कफन पर हाथ मेरे…जीवन की हर परिभाषा मैं जान गया…जनम
मरण के अनसुलझे संदर्भों की…एक गांठ क्या खुली मैं पहचान गया। लखनऊ से आए
कवि और लेखक आदियोग ने अपनी पंक्तियों को इस तरह लोगों के सामने रखा- हुजुर
माफ कीजिए, कल आप मेरे सपनों में आए। रॉबर्ट्सगंज के मशहूर और वरिष्ठ शायर
मुनीर बख्स आलम ने भी अपने शेर से स्रोताओं के दिलों को झकझोरने की कोशिश की-
वो आए बज्म में मीर ने देखा…। कार्यक्रम का संचालन कर रहे कानपुर के मशहूर
शायर कलिम दानिस ने सियासत पर कुछ तरह इल्जाम लगाए-
 
सियासत अब ठिकाना चाहती है…तवायफ घर बसाना चाहती है…शरीफों का घराना चाहती
है…गजल लहजा पुराना चाहती है…गरीबी की ये मजबूरी तो देखो…गिरी रोटी
उठाना चाहती है…खुले सिर फिर रही है शहरों-शहरों…गजल अब पैसे कमाना चाहती
है….। चुर्क निवासी शायर एमए शफक ने भी अपने शेर पढ़े। कार्यक्रम के आयोजक
मित्र मंच, सोनभद्र के निदेशक विकास वर्मा ने कुछ इस तरह अपने जज्बातों की
तुकबंदी की- इक तमन्ना जवान है यारों…आपका इम्तिहान है यारों….उसकी कुछ
ऐसी शान है यारों…हर अदा इक तूफान है यारों…। संगठन के सदस्य एवं
कार्यक्रम के स्वागताध्यक्ष राम प्रसाद यादव और स्वागत सचिव अमित वर्मा ने
मुशायरे में शामिल शायरों और मुख्य अतिथियों का माल्यार्पण कर स्वागत किया।
 
इस मौके पर राधे श्याम बंका, धर्मराज जैन, सत्यपाल जैन, विकास मित्तल, मुन्नू
पहलवान, वीरेंद्र सिंह, सलाउद्दीन, मुख्तार आलम, सर्फुद्दीन, अशोक श्रीवास्तव,
डॉ. वीपी सिन्हला, वीरेंद्र जायसवाल, आशुतोष पांडेय, राजेश सोनी, बिन्देश्वरी
श्रीवास्तव, अनिल वर्मा, राधारमण कुशवाहा, संदीप चौरसिया, उमेश जालान, मुकेश
सिंह, अधिवक्तगण आलोक वर्मा, सुधांशु भूषण शुक्ला, विमलेश केशरी, बलराम,
रत्नाकर, शैलेंद्र, विशेष मणि पांडेय, मुन्नी भाई, विनोद चौबे, अधिवस्ता
प्रदीप पांडेय, अरुण सिंह, कृपा शंकर चौहान, विकास राय, शिवधारी शहरण राय,
महफूज, मकसूद, इकराम, साजिद खान, हिदायतुल्लाह, राज बहादुर चक्री, रामनाथ
शिवेंद्र, कामरान, श्यामराज, बरकत अली, रोशन खां, मुनि महेश शुक्ला, विकास
द्विवेदी, बृजेश पाठक, अशोक विश्वकर्मा, सुरेश भारती, ब्रजेश शुक्ला,
कौशलेंद्र पाठक, अनिल तिवारी, आयुष वर्मा, देवाशीष, राज कुमार सोनी, सुन्दर
केशरी समेत तमाम सहयोगी, समाजसेवी, साहित्यप्रेमी मित्र मंच परिवार के साथ
सहयोगी कार्यकर्ता सारी रात महफिल का उरुज बनाए रखा।

कारोबारी का लड़ना – मिलना सब मतलब से होता है…!!

मुंबई में आयोजित एक गैर-राजनैतिक समारोह में मनसे नेता राज ठाकरे और सदी के महानायक अमिताभ बच्चन का पुरानी बातें भुला कर मंच साझा करना जितना अप्रत्याशित था, उतना ही रहस्यमय भी। क्योंकि पांच साल पहले राज ठाकरे अमिताभ बच्चन समेत उत्तर भारतीयों के खिलाफ दुर्व्यवहार और दुर्भावनापूर्ण बातों की सारी सीमाएं लांघ चुके थे। खुद अमिताभ भी तत्कालीन घटनाक्रमों से काफी आहत दिखे थे। 
फिर अचानक ऐसा क्या हो गया कि दोनों भरत मिलाप करने को उद्यत हो उठे। जिसे अमिताभ की पत्नी जया बच्चन की समाजवादी पार्टी भी नहीं पचा पा रही है। लेकिन व्यावहारिक दृष्टिकोण से देखें तो इसके पीछे परिस्थितिजन्य समझौते की गुंजाइश ही ज्यादा नजर आती है। क्योंकि राज ठाकरे हों या अमिताभ बच्चन। दोनों ही कारोबारी है। एक का कारोबार अभिनय है तो दूसरे का राजनीति और कारोबारी लोग लड़ाई – समझौता सब मतलब से करते हैं। 
 
इस बात का ज्ञान मुझे करीब 23 साल पहले दक्षिण भारत की यात्रा के दौरान हुआ । उस दौर में दक्षिण खास कर तामिलनाडु में  हिंदी विरोध की बड़ी चर्चा थी। दक्षिणी क्षेत्र में प्रवेश पर ही रेलवे स्टेशनों पर हिंदी में लिखे स्टेशनों के नाम पर पोती गई कालिख से मुझे लोगों की हिंदी के प्रति दुर्भावना का आभास होने लगा। इस स्थिति में  साथ गए लोगों के साथ हिंदी में बात करने में भी हमें हिचक होती थी। अव्वल तो लोग हिंदी जानते नहीं थे, या फिर बोलना नहीं चाहते थे। पूरी यात्रा के दौरान चुनिंदा स्थानीय लोग ही ऐसे मिले,  जिन्होंने हिंदी में हमारे द्वारा पूछे गए सवालों का किसी प्रकार जवाब देने की कोशिश की। लेकिन हमें हैरानी तब होती थी, जब रेलवे स्टेशनों पर मंडराते रहने वाले तमाम गाइड हमें पहचान कर टूटी – फूटी हिंदी में बातें कर हमारे सामने अपने पेशे से जुड़े आकर्षक प्रस्ताव रखने लगते थे।
उन्हें हिंदी बोलने – बतियाने से कोई गुरेज नहीं था। किसी बाजार में जाने पर भी दुकानदार हमें बखूबी पहचान लेते, और किसी प्रकार हिंदी में ही बातें कर हमारी मांग पूछते। यहां तक कि यह भी कहते कि कोई ऐसी  खास फरमाइश हो जो अभी उपलब्ध न हो  या  ले जाने में परेशानी हो , तो हमें अपना पता दे दें, हम डाक से आपके घर भिजवा देंगे। यहीं नहीं उग्र विरोध के दौर में भी स्थानीय उत्पादों के एक कोने पर उस चीज का  नाम टूटी -फूटी हिंदी में भी लिखा होता था। जिसे देख कर हमें बड़ी खुशी होती थी। यानी इस वर्ग को राजनैतिक पचड़ेबाजी से कोई मतलब नहीं था । इसलिए नहीं कि वे कोई राष्ट्रभाषा हिंदी के समर्थक थे, या उनकी हिंदी विरोधियों से नहीं पटती थी। महज इसलिए क्योंकि  स्थानीय के साथ ही बाहरी पर्यटक भी उनके लिए खरीदार थे, जिसके माध्यम से उन्हें मौद्रिक लाभ की उम्मीद थी। राज ठाकरे और अमिताभ बच्चन का मिलन भी कुछ ऐसा ही है। राज ठाकरे को जब अपनी राजनीति  चमकानी थी, तब उन्होंने  अमिताभ पर हमला बोल कर अपना हित साधा और अब जब परिस्थितयां साथ आने में मुफीद लग रही है, तो उन्होंने उनकी  तारीफ के पुल बांधने से भी गुरेज नहीं किया। सदी के महानायक को भी शायद इसी मौके की तलाश थी।
 
तारकेश कुमार ओझा
09434453934

 

विवादों में घिरे ज्वालामुखी मंदिर के अधिकारी सस्पेंड

धर्मशाला।। विवादों में घिरे ज्वालामुखी मंदिर में तैनात मंदिर अधिकारी सुरेन्दर शर्मा को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया गया है।  कांगड़ा के जिलाधीश सी पाल रासू ने मंदिर प्रशासन को भेजे आदेशों के तहत मंदिर प्रशासन से आदेशों को अमल में लाने को कहा है।  विवादित अधिकारी इस बीच धर्मशाला चले गये हैं। 
अगले आदेशों तक मंदिर अधिकारी के तौर पर तहसीलदार सदर देवी राम को नियुक्त किया गया है।  गौरतलब है कि पिछले दिनों ज्वालामुखी मंदिर में चढ़ावे की गिनती के दौरान मंदिर अधिकारी को कथित तौर पर बारीदार ने चढ़ावे में गोलमाल करते हुये पकड़ लिया था। ये पूरी घटना सीसीटीवी कैमरें में कैद हो गयाी थाी। 
ज्वालामुखी मंदिर में तैनात मंदिर अधिकरी द्वारा ही गणना के दौरान की हेराफेरी की बात सामने आने से धार्मिक आस्था और श्रद्धालुओं की भावनाओं को ठेस पहुंची है।  इन दिनों इस मामले की काफी चर्चा है। लुधियाणा से मंदिर दर्शनों के लिये आये अमरजीत सिंह ने यहां कहा कि इस मामले से उन्हें  हैरानी हुई है कि आखिर जिस व्यक्ति पर ही संस्थान को संभालने का जिम्मा था अगर वह ही हेराफेरी करे तो हालात क्या होंगे। 
खबर है कि ज्वालामुखी मंदिर की जिम्मेदारी संभाले तहसीलदार एवं मंदिर अधिकारी बारीदार पुजारी के साथ चढ़ावे का पैसा गिन रहा था। गणना कक्ष के नियमों के मुताबिक चढ़ावे का हिसाब गिनने से पहले एंट्री में हरेक की जांच अंदर जाने या फिर बाहर निकलते समय होती है। जांच के दौरान कक्ष के बाहर से किसी भी व्यक्ति को मोबाइल, नकदी एवं आभूषण ले आने-जाने पर पाबंदी लगाई गई है। इस दिन भी ऐसा ही हुआ, लेकिन अचानक गिनती के दौरान बारीदार पुजारी की निगाह मंदिर के मुख्य संरक्षण संभाले तहसीलदार सुरेन्दर शर्मा को बातों ही बातों में जेब से नोट निकालते पड़ गई। सीसीटीवी कैमरे में भी सारी घटना रिकार्ड हो चुकी थीं। बाद में पुजारी ने इसकी शिकायत उच्च मंदिर अधिकारियों को की तथा कांगड़ा के जिलाधीश ने फौरन कार्रवाई करते हुए देहरा के एसडीएम को जांच का जिम्मा सौंप सच्चाई उन तक पहुंचाने को कहा। देहरा के एसडीएम विनय कुमार ने सच्चाई के लिए जब मंदिर में लगे सीसीटीवी कैमरों की वीडियो फुटेज खंगाली तो वह भी हैरान रह गए, क्योंकि उसमें आरोप सही दिख रहे थे।
 इसी आधार पर मंदिर अधिकारी पर कार्रवाई संभव हो पाई। इस बीच ज्वालामुखी के विधायक संजय रतन ने कहा कि इस मामले की पूरी जांच की जायेगी ताकि सच्चाई सामने आ सके। यहां पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि उन्होंने विधायक बनने के बाद हाल ही में मंदिर परिसर में करीब दो दर्जन सीसीटीवी कैमरे लगवायें हैं, लिहाजा कहीं भी हेराफेरी की कोई गुंजाईश नहीं है। फिर भी कोई ऐसा कुछ करता है तो वह बच नहीं सकता। संजय रतन ने दावा किया कि पिछले एक साल में मंदिर व्यवस्था में निरंतर सुधार हो रहा है। व कई विकास कार्य चल रहे हैं। श्रद्धालुओं के पैसे का पूरा ख्याल रखा जा रहा है। महज एक मामले से ही पूरी व्यवस्था को ही गलत नहीं ठहराया जा सकता।  वहीं मंदिर प्रशासन को प्रशासन को सारा लेखा जोखा जल्द ही तैयार करना होगा , ताकि अगली कार्रवाई संभव हो सके।
 
विजयेन्दर शर्मा

पत्रकार के भाई की असमय मृत्यु पर प्रेस क्लब हमीरपुर ने जताया शोक

हमीरपुर।। प्रेस क्लब हमीरपुर ने पत्रकार आशुतोष गोस्वामी के बड़े भाई सुरेश कुमार की आकस्मिक मृत्यु पर शोक व्यक्त किया है। वे 65 वर्ष के थे। प्रेस क्लब के अध्यक्ष सुरेंद्र कटोच ने शोक व्यक्त करते हुए कहा है कि पूर्व सैनिक सुरेश कुमार के अकस्मिक देहांत से  जहां पत्रकार आशुतोष गोस्वामी ने एक भाई खो दिया है वहीं परिवार को सदमा पहुंचा है। 
प्रेस क्लब हमीरपुर के वारिष्ठ सदस्यों दिनेश कंवर,विक्रम ढटवालिया, रणवीर सिंह,निकुंज सूद नवनीत बत्ता,राकेश पाल सोहारू, वासुदेव नंदन,संजय शर्मा,विजय शामा, रविन्द्र ठाकुर,राजीव चौहान,कपिल बस्सी, रजनीश शर्मा, अजय ठाकुर, देशराज कौशल, अशोक राणा, सुनील कुमार, अनिल कुमार, अरूण पटियाल, कमल कृष्ण, अश्वनी कुमार, विवेकानंद, मंगलेश कुमार, गगन दीप, सुभाष चंद, राजकुमार,मोहिन्द्र सिंह,जसवीर सिंह, अश्वनी वालिया,अनिल शर्मा, राकेश शर्मा,कमल ठाकुर, पम्मी कुमार से निष्पक्ष भारती, बीसी सोनल,सन्नी मेहरा, राजकुमार जैन, हेमंत कुमार, प्रदीप शर्मा,वीरेन्द्र गोस्वामी,पंकज वर्मा के अलावा अन्य उपमंडल के पत्रकारों ने दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की है।
 
विजयेन्दर शर्मा

खबर छापो नहीं तो मंत्री से कहवाकर अखबार से निकलवा देंगे

मिहिजाम।। देश में पत्रकार सुरक्षित नहीं हैं इसको लेकर आए दिन नए-नए मामले सामने आते रहते है। ऐसा ही एक मामला मिहिजाम नगर पंचायत क्षेत्र से सामने आया है। जहां एक नेता ने अपनी खबर अखबार में छपवाने के लिए एक पत्रकार को धमकी दे डाली। इस कद्दावर नेता  ने अपनी खबर छपवाने के चक्कर मे पत्रकार से कहा कि, अगर मेरी न्यूज नहीं छापोगे तो हम तुम्हें अखबार से ही निकलवा देंगे। हमारी पहुंच रांची तक है। सोच लो तुम तो मुझे पहचानते हो, वैसे किसी से मुंह बंधवाकर भी हम तुम्हें पिटवा सकते हैं। कई प्रकार की धमकियों से उक्त पत्रकार गहरे सदमे मे दिख रहे हैं। 
पत्रकार का कहना है कि स्वार्थी किस्म के उक्त नेता सिर्फ अपनी खबर छपवाने के लिए ही परेशान रहते हैं। जन कल्याण से उनका कोई सरोकार नहीं है। अगर खबर छप जाती है तो बाजार मे खबर भंजाकर उक्त नेता जी जान से वसूली करने मे जुट जाते हैं और मनमानी करते हैं। मिहिजाम की भोली भाली जनता को अब ऐसे नेताओं को पहचान कर उन्हें बहिष्कार करने की जरूरत है। वर्तमान सरकार मे मात्र दो चार नेताओं की भागीदारी से जब उक्त नेता एक पत्रकार को इस प्रकार से परेशान कर सकता है तो उक्त नेता की पार्टी सरकार मे पूर्ण बहुमत के साथ आ जाये तो मिहिजाम मे किसी को चलना फिराना भी मुश्किल कर देंगे। लोगों को प्यास भी लगेगी या फिर छींक आयेगी तो क्या इनसे अनुमिति लेनी होगी?
 
   ओम प्रकाश शर्मा
 CONTACT-09932330769

‘पत्रकारिता कोश 2014’ के प्रकाशन हेतु नामों का संकलन

मुंबई।। लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में दर्ज भारत की प्रथम मीडिया डायरेक्टरी "पत्रकारिता कोश" के 14वें अंक का प्रकाशन फरवरी 2014 में होगा। लगभग 1000 पृष्ठों पर आधारित इस बहुपयोगी पत्रिका के प्रकाशन के लिए मुंबई सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से प्रकाशित होने वाले विविध भाषाओं के समाचारपत्र – पत्रिकाओं, समाचार चैनलों आदि के साथ-साथ उनमें कार्यरत लेखक – पत्रकारों, कवि, साहित्यकारों, स्वतंत्र पत्रकारों, प्रेस फोटोग्राफरों, कैमरामैनों, प्रेस संगठनों, फीचर एजेंसियों, पत्रकारिता प्रशिक्षण संस्थानों, आदि के नाम व पते संकलित किए जाने का कार्य तेज गति से चल रहा है।
 
"पत्रकारिता कोश" में नाम दर्ज कराने हेतु समाचारपत्र-पत्रिकाओं, चैनलों, वेबसाइटों, आदि का संपूर्ण विवरण संपादक, पत्रकारिता कोश, भारत पब्लिकेशन, प्लॉट नं. 4-जे-7, कोंकण बैंक के सामने, शिवाजी नगर, गोवंडी, मुंबई- 400043 (महाराष्ट्र)  के पते पर  अथवा ईमेल- aaftaby2k@gmail.com पर 25 जनवरी, 2014 तक निश्चित रुप से भेज सकते हैं।
जिससे उनका नाम "पत्रकारिता कोश" के नए संस्करण में शामिल किया जा सके। अधिक जानकारी पाने के लिए मोबाइल नंबर पर कॉल कर सकते हैं- 9224169416, 9820120912, 9769952135.
 
(आफताब आलम)
संपादक

चिरेका के पीआरओ ने दे डाली पत्रकारो को धमकी…

देश में पत्रकार कितने असुरक्षित है इसको लेकर आए दिन नए-नए मामले सामने आते रहते है। ऐसा ही एक नया मामला पश्चिम बंगाल में सामने आया है जहां पत्रकारों को धमकाया गया है। यहां चित्तरंजन रेल इंजन कारखाना (चिरेका) के जन संपर्क अधिकारी मंतर सिंह ने पत्रकारो को धमकाया है।
चित्तरंजन (पश्चिम बंगाल) चिरेका महाप्रबंधक कार्यालय के समक्ष २३ दिसंबर से आमरण अनशन पर बैठे है हिंदी अखबार इस अनशन का खूब कवरेज दे रहे है इससे चिरेका के जन संपर्क अधिकारी मंतर सिंह बौखलाए हुए है गुरुवार को इंटक के शीर्ष नेता को गेस्ट हाउस बुक नहीं करने का विरोध करते हुए इंटक प्रतिनिधि चिरेका के उप महाप्रबंधक सह मुख्य जन संपर्क अधिकारी रमेश मौर्या का घेराव करने पहुंचे इस दौरान मीडिया कर्मियों को देख कर मंतर सिंह को रहा नहीं गया और कहा कि बिना मुझसे पूछे न्यूज करोगे तो चित्तरंजन में घुसना मुश्किल कर देंगे। 

कुमारी शैलजा बोली रॉबर्ट वाडरा प्रॉपर्टी मामला मीडिया की रचना

अंबाला।। केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा ने रॉबर्ट वाडरा प्रॉपर्टी मामले को मीडिया की रचना करार दिया दिया। कुमारी शैलजा ने कहा कि अब मीडि‍या खुद के द्वारा तैयार किए गए इस मामले पर कब विराम लगाना चाहता है।
शैलजा ने ये बेतुका बयान गुरुवार को अपने अंबाला निवास पर दिया। कुमारी शैलजा अंबाला से सांसद है और आगामी चुनाव के चलते उन्हें पत्रकारो की याद आई तो उन्होंने पत्रकारो को भोज का न्योता दिया था।
 
भोज से पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब मीडिया ने सवाल उठाया कि रॉबर्ट वाडरा के मामले ने हरियाणा में कांग्रेस को किस सीमा तक प्रभावित किया है और आगामी चुनाव तक क्‍या पार्टी इस मामले में अपना पक्ष स्‍पष्‍ट कर पाएगी क्‍योंकि खेमका के दोबारा से मुखर होने पर मामला फिर जीवित हो उठा है। इस सवाल का जवाब देते हुए शैलजा ने कहा कि जो चीज सिर्फ मीडि‍या ने बनाई, भला उसके बारे में वो क्‍या कह सकती हैं।
शैलजा के इस बेतुके जवाब से जमीर वाले पत्रकारों ने सवाल उठाया मैडम ऐसे आप इस मामले को मीडिया जनित मामला कैसे कह सकती हैं। बस इस पर शैलजा खूब हंसी।
उधर शैलजा के लंच की बात सुनकर बुजुर्ग और न के बराबर पत्रकारिता करने वाले तथाकथित पत्रकार भी पहुंचे। न के बराबर से भाव ये कि जो अब बूढ़े हो गए हैं और इतने बूढ़े की चला तक नहीं जाता, बस नाम के लिए थोड़ा किसी अखबारों का तमगा लिए घूमते हैं।
फिर कइयों की तो खुशी का ठिकाना नहीं था, क्‍योंकि पत्रकारों को चुनाव से पहले राजी करने के लिए मैडम शैलजा खुद पत्रकारों के साथ खाना खाने बैठी। ऐसा पहले तो होता न था।
अंबाला के एक पत्रकार द्वारा भेजी गयी खबर

युवा पत्रकार अभिषेक सिंह के उपन्यास ‘फरेब’ का हुआ विमोचन

ग्रेटर नोएडा।।  प्रख्यात साहित्यकार पद्म भूषण डॉ. गोपालदास नीरज ने ग्रेटर नोएडा के जीएल बजाज इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एवं टेक्नोलॉजी में युवा पत्रकार और उभरते साहित्यकार अभिषेक सिंह कश्यप के उपन्यास 'फरेब' का विमोचन किया। उपन्यास की कहानी देश में झूठ फरेब और भ्रष्टाचार कुचक्र का खुलासा है। विमोचन के मौके पर पत्रकारिता जगत की कई हस्तियां मौजूद रहीं।
देश को भ्रष्टाचार का दीमक दशकों से खोखला कर रहा है। लोग अब इसके इतने आदी हो गए हैं कि समाज में इसे मूक सहमति मिल गई है। आज लालच, झूठ और धोखा व्यक्तिगत व्यवहार हिस्सा बन गया है। दुनिया भर के लिए सामाजिकता की सीख माना जाने वाला भारतीय समाज इसका पर्याय बन गया है। युवा साहित्यकार अभिषेक सिंह कश्यप ने अपने उपन्यास के माध्यम से इन्हीं मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की है।उपन्यास विमोचन के मौके पर नीरज जी ने अभिषेक कश्यप के इस प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि एक युवा की ओर इस तरह के विचारों की अभिव्यक्ति परिवर्तन का परिचायक है। 
उन्होंने कहा कि लेखक की सोच निश्चित रूप से लोगों को सोचने को मजबूर करेगी। नीरज जी ने युवाओं से साहित्य के क्षेत्र में बढ़ने की अपील की साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि साहित्य से हृदय का विकास होता है जो किसी भी स्वस्थ समाज के विकास के लिए अनिवार्य है। इस मौके पर इंडिया टीवी के संपादकीय निर्देशक कमर वहीद नकवी ने भी उपन्यास की सराहना की। उन्होंने कहा कि लेखक जिन चीजों को अपने चारो ओर देखता है उसे लोगों के सामाने विचार के लिए परोसता है। इसका असर भी होता है ऐसी ही कृतियों से दुनिया में तमाम परिवर्तन आए हैं। देशबंधु के राजनीतिक संपादक एसएन सिंह देश परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। बुराईयां किसी भी देश समाज के लिए थोड़े समय तक पांव जमाए रखती है।
 
लेखनी के माध्यम से ही परिवर्तन की शुरूआत होती है। अभिषेक सिंह का उपन्यास निश्तचित रूप से परिवर्तन का वाहक सिद्ध होगा। इस मौके पर नेशनल दुनिया के मुख्य महाप्रबंधक अरूण सिंह, ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण के उप मुख्यकार्यपालक अधिकारी मानवेंद्र सिंह, जीएल बजाज कॉलेज के वाइस चेयरमैन पंकज अग्रवाल, निर्देशक डॉक्टर राजीव अग्रवाल, डॉक्टर मुकुल गुप्ता, ग्रेटर वैली स्कूल की प्रधानाचार्य पूनम चौबे, डॉ नीरज के निजी सचिव आशीष वार्षणेय , एनआईईटी कॉलेज के डीन डॉ. प्रवीण पचौरी, एनाआईईटी के कुलसचिव आरसी नायक, एचआईएमटी कॉलेज योजना निर्देशक मोहम्मद ऐहतसाम, यूनाईटेड कॉलेज के प्रोफसर पीके भारती, कांग्रेस के जिला प्रवक्ता आलोक सिंह, कांग्रेस के जिला उपाध्यक्ष विक्रम कसाना, सेक्टर बीटा एक के महासचिव हरेंद्र भाटी आदि लोग मौजूद रहे। इस मौके पर देशबंधु के पश्चिमी यूपी प्रभारी देवेंद्र सिंह ने सभी अतिथियों को धन्यवाद व्यक्त किया। विमोचन मंच का संचालन डॉ शशांक अवस्थी ने किया। 

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने सामुदायिक रेडियो को 50 फीसदी वित्तीय सहायता देने की घोषणा

नई दिल्ली।। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय (एमआईबी) ने भारत में नए और मौजूदा सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से मंत्रालय की तरफ से' सामुदायिक रेडियो सहायता योजना ' नामक एक नई योजना शुरू की है . सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की ओर से ये योजना नए उद्यम में 12 वीं पंचवर्षीय योजना के तहत शुरू की गई है .
 
इस योजना के तहत मंत्रालय सामुदायिक रेडियो स्टेशनों के लिए ' उपकरण अधिग्रहण ' पर कुल अनुमानित व्यय 50 फीसदी की अधिकतम सहायता प्रदान करेगा . हालांकि, इस वित्तीय सहायता के लिए अधिकतम राशी सीमा 7.50 लाख रुपये रखी गयी है।
 
शॉर्ट लिस्टिंग उपकरणों के मुद्दों से निपटने के लिए, एमआईबी पूर्व इंजीनियर इन चीफ , ऑल इंडिया रेडियो , वीके सिंगला की अध्यक्षता में एक तकनीकी समिति का गठन किया गया है . आई बी के तहत यह सरकारी तकनीकी समिति इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग , डब्ल्यूपीसी विंग , परिचालन सामुदायिक रेडियो स्टेशनों , सामुदायिक रेडियो संगठनों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों से सदस्यों के होते हैं .
 
विस्तृत चर्चा और परिचालन स्टेशनों का दौरा करने के बाद समिति कम एक सामुदायिक रेडियो स्टेशन के संचालन के लिए आवश्यक उपकरणों सूचीबद्ध किया गया है और यह भी हर चुने उपकरण के लिए कुछ खास बेंच के निशान से नीचे रखा गया है .
 
इसके अलावा , समिति ने सार्वजनिक क्षेत्र में विनिर्देशों / मानक के साथ चुने उपकरण के लिए एक प्रस्ताव भेजा गया है जो कि पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता की सुविधा के लिए हितधारकों से प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए किया जाता है .
 

AMU में हुआ राष्ट्रपति कार्यक्रम, मीडियकर्मियों ने की शिकायत चहेते मीडियकर्मियों को दिए गए पास

अलीगढ़।। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (अमुवि) में शुक्रवार को आयोजित हुए 37वीं इंडियन सोशल साइंस कांग्रेस के उद्घाटन समारोह के कवरेज पास अमुवि के जन संपर्क विभाग ने चंद चहेते पत्रकारो को ही प्रदान किये. इस उद्घाटन समारोह में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने शिरकत की थी. 
जिन मीडियाकर्मियों को अमुवि जन संपर्क विभाग ने पास जारी नहीं किये उन्होंने विश्व विद्यालय के कुलपति से मामले की लिखित शिकायत की है. शिकायत करने वाले पत्रकारो का आरोप है कि जन संपर्क विभाग प्रभारी ने अपने चहेते पत्रकारो को पास जारी किये  इसके आलावा कुछ विश्व विद्यालय कर्मियो को भी जन संपर्क विभाग ने पत्रकार वाले पास जारी कर दिए. जिससे पत्रकारो को पास नहीं मिल सके. 
जिसके कारण कई बड़े न्यूज चैनलो के स्ट्रिंगरो समेत समाचार पत्रों के प्रतिनिधियो को परेशानी झेलनी पड़ी. नाराज मीडियाकर्मिओं ने अमुवि पीआरओ की लिखित शिकायत की है. वही इस पूरे मामले में पीआरओ का कहना है कि राष्ट्रपति का कार्यक्रम केनेडी हाल में था जिसमे बैठने की जगह कम थी जिसके कारण सीमित पत्रकारो को बुलाया गया था. लेकिन सवाल यह उठता है कि महज मीडियाकर्मियो के लिए सीटे कम थी. अगर सीटे कम थी तो चहेते पत्रकारो को देर शाम पास कैसे जारी हो गए ? 

सामूहिक आंदोलन करने की तैयारी में लोकमत श्रमिक संगठन

लोकमत श्रमिक संघठन पिछले 17 सालों से कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर संघर्ष कर रहा है. इस रजिस्टर्ड और सरकारी मान्यता प्राप्त संघठन से जुड़े 61 कर्मचारियों को लोकमत प्रबंधन ने 21 नवंबर को गैरकानूनी तरीके से टर्मिनेट कर दिया. इनमें 10 पत्रकार सहित 31 स्थायी और 30 ठेकेदारी कर्मचारी हैं. इन कर्मचारियों में संघठन के अध्यक्ष, महासचिव से लेकर कार्यकारिणी सदस्य और सक्रिय कार्यकर्ता तक शामिल हैं. 
इनका कसूर बस इतना था कि ये लोग अपने अधिकारों के लिए आवाज उठा रहे थे. केंद्र सरकार द्वारा लागू पालेकर,(1979) बछावत,(1988) मणिसाना सिंह (1998) और मजीठिया( 2010) वेज बोर्ड की सिफारिशें अभी तक लोकमत प्रबंधन ने लागू नहीं की हैं. संघठन ने रीक्लासीफिकेशन का मामला अदालत में दायर कर रखा है, जो अब अंतिम दौर में है. इस मामले में हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद लोकमत प्रबंधन ने अब तक अपनी बैलेंस शीट तक अदालत में पेश नहीं की है.
 
इसके अलावा, गैरकानूनी ढंग से सालों से ठेके पर काम कर रहे कर्मचारियों को स्थायी और नियमित करने की मांग को लेकर भी मामला न्यायालय में विचाराधीन है. लोकमत श्रमिक संगठन ने हाल में अकोला और गोवा में अपनी शाखाएं प्रारंभ की हैं. मैनेजमेंट चाहता था कि संघठन ये शाखाएं बंद कर दे और ठेका कर्मचारियों को नियमित करने तथा वेज बोर्ड लागू करने की मांग को लेकर दायर मामले वापस ले लिए जाएं. संघठन ने जब इन मांगों को मानने से इंकार कर दिया तो प्रबंधन ने न सिर्फ नागपुर, अकोला और गोवा के 61 कर्मचारियों को फर्जी और आधारहीन आरोप लगाकर बाहर का रास्ता दिखा दिया, बल्कि अपने प्यादो कों आगे कर लोकमत श्रमिक संघठन पर अवैध रूप से कब्जा भी कर लिया.  
 
हटाए गए कर्मचारी कानूनी तरीके से न्याय प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं, मगर जरूरी है कि लोकमत प्रबंधन की लगातार जारी कर्मचारी विरोधी गैरकानूनी नीतियों और दमन तंत्र का पर्दाफाश करने के लिए सामूहिक आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया जाए. इसी संदर्भ में विचार करने के लिए आगामी 29 दिसंबर 2013 को सुबह 11 बजे पत्रकार भवन, पंचशील चौक के सभागृह में नागपुर के सभी श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों की एक संयुक्त बैठक का आयोजन किया गया है. अत : आपसे निवेदन है कि बैठक में हिस्सा लेकर न्याय की इस लड़ाई में अपना सक्रिय योगदान दें और मालिकों की दमनकारी नीतियों के खिलाफ प्रभावशाली आवाज उठाने में और कर्मचारियों को न्याय दिलाने में सहयोग करें.  रविवार 29 दिसंबर 2013, सुबह 11 बजे, पत्रकार भवन, पंचशील चौक, नागपुर. 
 
भवदीय
 
अध्यक्ष    
महासचिव
कामगार एकता जिंदाबाद

जब जज से न मिला न्याय तो कर डाली जज की ही शिकायत…

इस देश में एक आदमी को न्याय पाने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता है इसका एक जीता-जागता उदाहरण हैं एक परेशान व्यक्ति जिसने खुद को न्याय मिलता न देख जज तक की शिकायत कर डाली ये झारखंड के जमशेदपुर की बात है। 
 
सेवा में,
माननीय मुख्य न्यायधीश महोदय,
झारखंड उच्च न्यायालय, रांची।
 
विषय : न्यायिक दंडाधिकारी द्वारा खामखा अपमानित और परेशान करने के संबंध में।
 
महोदय,
 
सविनय निवेदन है कि जमशेदपुर न्यायालय में पदस्थापित प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी श्री आर एस मिश्रा, थाना द्वारा सीज किये गये मेरी पत्नी के मोबाइल और कलाई घड़ी के रिलीज आर्डर देने में, मुझे खामखा परेशान कर रहे हैं और कुछ अर्ज करने पर अपनी कुर्सी का रौब दिखाकर अपमानित करने पर उतारू हो जाते हैं। मैं 4 दिसंबर से उनके कोर्ट में अर्जी देकर दर्जनों बार जा चुका हूं, लेकिन वे हर बार कुछ न कुछ नुस्ख निकालकर मुझे वापस कर देते हैं और बहुत कड़े तेवर में नाकारात्मक भंगिमा बनाकर धमकी देने लगते हैं। उनके रवैये से त्रस्त और नाउम्मीद होकर अंततः मुझे आपसे गुहार लगानी पड़ रही है।
 
मेरे घर में घुसकर नशे में धुत एक ड्रग एडिक्ट्स ने मेरी पत्नी उशा देवी का मोबाइल और कलाई घड़ी चुरा लिया था, जिसे हम लोगों ने पकड़ लिया और उसे सीताराम डेरा थाना ले गये तो पुलिस ने जबर्दस्ती सामान सीज कर लिया और कहा कि प्राथमिकी दर्ज कर चोर को जेल भेज रहे हैं। अतः आपको सामान कोर्ट से रिलीज कराना होगा। केस नं. है 179@13 और जी आर केस नं. है 4260@13. 
 
मैं जब आवेदन लेकर कोर्ट पहुंचा तो पहले ही दिन मुझे लौटाते हुए दंडाधिकारी ने कह दिया कि मैं वकील के माध्यम से अर्जी दूं। वकील करके जब अर्जी दी तो सामान की रसीद लाने का फरमान सुनाया गया। रसीद न होने की स्थिति में शपथ पत्र देने को कहा गया। शपथ पत्र जब वकील ने बनाया तो तीन बार उसमें सायास नुस्ख निकालकर लौटाया गया। कई दिनों बाद कहा गया कि थाने से नो ऑब्जेक्शन लेकर आयें। सीतारामडेरा थाने का थानेदार ने भी हैकड़ी दिखाकर तीन दिनों बाद रिपोर्ट भेजी। दंडाधिकारी ने अब 4 हजार के सामान के लिए 8 हजार की कीमत तय कर दी और कहा कि दो जमानतदार पेश करें जो कम से कम 16-16 हजार के हों। मैंने यह औपचारिकता भी पूरी की। 
 
इस बीच वकील ने भी मेरा खूब दोहन किया। चार हजार के सामान के लिए मैं कम से कम दो हजार खर्च कर चुका हूं और ऊपर से दर्जनों बार मैंने कभी थाने की तो कभी कोट की दौड़ लगायी है तथा अंतहीन मानसिक व शारीरिक कष्ट उठाये हैं। वकील आज कोर्ट नहीं आया तो मैंने खुद से फाइनल रिलीज आर्डर लेने के लिए शियूरिटी बांड जमा किया। घंटों इंतजार के बाद जब मेरी बारी आयी तो दंडाधिकारी ने फटकारते हुए मुझे बैरंग लौटा दिया और कहा कि जब वकील नहीं है तो मैं आपको आडेंटिफाई कैसे करूं। जाइए, वकील के साथ आइए।
 
यहां मैं विनम्रता पूर्वक निवेदन करना चाहूंगा कि मैं एक लेखक हूं और 33 वर्षों से मेरी रचनायें देश के सारे पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। बड़े-बड़े प्रकाशकों ने मेरी किताबें छापी हैं। तात्पर्य यह कि मैं किसी पहचान का मोहताज नहीं हूं, लेकिन इस आधार पर मैं कोई विशेषाधिकार (प्रिविलेज) की मांग नहीं कर रहा। लेकिन अब मुझे सामान भले न वापस मिले, मैं इसके लिए किसी वकील की मदद नहीं लूंगा। वकील मुझे काफी लूट चुका अब तक। 
 
महोदय, यह कैसी न्याय व्यवस्था है? कैसे हम पुलिस, न्यायमूर्ति और दंडाधिकारी को अपना हितैषी और संरक्षक मानें? मैं ऐसा महसूस कर रहा हूं जैसे ये सारे ओहदे आम आदमी को लूटने और जलील करने के लिए बनाये गये हैं। जब मेरे जैसे आदमी को एक मामूली से काम के लिए इस तरह प्रताडि़त होना पड़ रहा है तो आम आदमी को कितना कुछ चुपचाप सह जाना पड़ता होगा।
 
योर ऑनर, क्या इस पूरे प्रकरण में मैं आपसे न्याय और उचित कार्रवाई की कोई उम्मीद कर सकता हूं?
 
                                                   आपका विश्वासभाजन
जयनंदन
 जमशेदपुर – 9431328758.
 

सोनभद्र जिले के बच्चे कहते हैं बड़ा होकर-‘‘कोल माफिया बनूंगा’’

सोनभद्र ।। सोनभद्र जिले के उर्जांचल में कोयला चोरों की ठाठ व हनक देखकर यहां के बच्चे भी कहते हैं कि वो बड़ा होकर-‘‘कोल माफिया बनूंगा’’। किंतु रुकिए, कोल माफिया बनने के लिए इंतजार क्यों करना। यहां तो नाबालिग कोयला चोर भी महिने में मोटा माल बना लेते हैं। कहने को तो सीबीआई छापे के बाद से ही कोयला लूट बंद है लेकिन हकीकत कुछ और है। जिन लोगों ने कोयला चोरी से करोड़ों अरबों बनाये वो भला इसे कहां छोड़ने वाले। जिन सरकारी कर्मचारियों ने कोयला चोर पैदा कर अपनी जेंबे भरी, अब उनकी जेबें खाली रहे ये कैसे हो सकता है। 
चर्चा है एक सरकारी कर्मचारी ने तो बाकायदा पुराने कोयला चोरों को पुनः चोरी का काम प्रारम्भ करने का प्रस्ताव दिया। यही नहीं फाइनेन्स की भी पुरी सुविधा के साथ। एक भूतपूर्व कोल माफिया ने कहा साहब कहते हैं फिर से काम चालू करो, पैसा हमसे ले लो। काम देखने के लिए साहब ने अपने रिश्तेदारों को भी बुला लिया है। लेकिन जनाब साहब की किस्मत इतनी अच्छी नही थी। इधर कोयला चोरी का काम प्रारम्भ हो पाता, उससे पहले ही एक बड़े अखबार ने खुलासा कर दिया और उसके बाद साहब को बड़े साहब ने अपने पास बुला लिया। खुले रूप में कोयला चोरी प्रारम्भ होने से यहां के छुटभैये पत्रकार बड़े खुश हो रहे थे क्योंकि उनके लिए भी लूट का दरवाजा खुल रहा था। गहराई से सोचिये तो कोयला चोरी समाज के लिए अमृत की तरह है। कोयला चोर भी मालामाल, पुलिस की भी चांदी, पत्रकार भी मस्त, नेता भी खुश। इस एकमात्र बिजनेस ने सबको एक कर दिया। सरकार को कोयला चोरी वैध कर देना चाहिए।  
 
अनूप द्विवेदी
सोनभद्र
 

 

पत्रकारिता की आड़ में चल रहे हैं शराब के ठेके और पैट्रोल पंप

श्री आनन्द मोहन शर्मा,

सम्पादक, दैनिक जागरण,

आगरा, उत्तर प्रदेश।

महोदय,

सादर अवगत कराना है, कि गोपनीय तौर पर कई बार संज्ञान देने के बाद भी दैनिक जागरण कार्यालय एटा जिला प्रभारी श्री अनिल कुमार गुप्ता पुत्र स्वं. श्री हरीशंकर गुप्ता निवासी निधौली कला एटा (हाल निवासी अरूणा नगर एटा) पिछले दो दशक से अधिक समय से संस्थान में कार्यरत रहते हुऐ दैनिक जागरण अखबार की आड़ में अपना प्रभाव बनाकर कई तरह के कारोबार के स्वामी बन गये है।

बीएसएनएल की फ्रैंचाईजी, तेरह देशी-विदेशी शराब के ठेके के अलावा कई पैट्रोल पम्पों व डीजल के पेटी डीलर की कई दुकानों का संचालन कर रहें है। इस प्रकार संबंधित व्यवसाय के विभागों के साथ उनका तालमेल इतना गहरा गया है कि उन विभागों से संबंधित कोई भी निगेटिव खबर का कभी भी प्रकाशन नहीं करते। साथ ही राजनीतिक खबरों को भी भेदभाव एवं पक्षपात कर छापते है। वर्षों से  से एटा में दैनिक जागरण के जिला प्रतिनिधि पद का दुरूपयोग करते हुये वे संस्थान को भी वित्तीय नुकसान पहुंचा रहे है। जब कि अन्य अखबारों से जागरण की प्रतिष्ठा और निष्पक्षता कहीं अधिक है जो गत 22 वर्षों से एक ही स्थान पर जिला प्रभारी के पद पर उनके बने रहने से प्रभावित हो रहीं है। 

अतः आपसे अनुरोध है, कि संस्थान के हित को ध्यान मे रखते हुये एटा जिला प्रभारी दैनिक जागरण कार्यालय की विस्तृत जांच कराकर सही तथ्यों की जानकारी हासिल कर संस्थान के हित में आवश्यक कार्यवाही करने का कष्ट करें। जिससे जागरण की प्रतिष्ठा और निष्पक्षता बरकरार रह सके।

सधन्यवाद!

भवदीय

(मंजीत यादव)

सदस्य जिला पंचायत, एटा

Is This Love Or a Fraud…

Hi, My Name is Geeta Chauhan. I stay in Pariwaran complex, saket New delhi. i am going thrugh hard time. three years back i got married with a guy whose name is ganshayam makwana. by occupation he is builder. i met 1st time on malviya nagar, i was searching a flat for rent. after that he was trying to make me fool and propose me that he love me a lot. i rejected his proposal after that his behaviour changed and threated me and was asking to make physical relation.
 
i complain to police about the same. police arrested him case of harrasement anyhow he said that
he will nt do this and i took mycase,after that his behaviour totally changed. he kept me saying that he loves me a lot,one day he said me that he lives alone said hisd family stay in gujrat said you are also single,we can marry and spend life together happly,i thought he truely love me,i was not known that he wanted to take my property,i told him i cannot marry againts my family.
 
he said he will go to my hometown (Chattisgarh) he went there and convience my mom that he really wanted to marry with me. i got married on 7th november 2011 at my hometown (Chattisgarh). i came back to delhi and living with his brother's house at malviya nagar. his bother was also supporting him about this fraud. my husband was aware about my property. my flat where i stay, my plot which is in badarpur. he planned everything before marriage. but i was not aware about his farud.
 
later on i said i dnt feel god staying with your brother's house. i have my own flat we can stay there. he agreed about this. once he was looking very upset i asked the reason he said i am making a building at mahrauli. i spend whole money on that. i took 3500000 rs from market. now they are asking for money. they are gunda type so they can kill him. he said can you help to get out from this situation. when my builing will complete i will give you two bed room flat. i gave 3500000 rs, but i was not aware about this that he wanted to cheat me because i though he is my husband.
 
after week his behavior tottally changed he started beating me and threating me. one day i went outside for market. when i came back he was not at my home. he pack his clothes and run away. i try to contact him his phone was swithoff. i went to malviya nager where he used to sit. then i totally schoked bceause i came to know that he is married a gut with two children. i went ther to talk he threatin me and slap me.
 
i inform to the police about this, after that police, my husband wanted to compromise which i agrred. he said he will pay all the money. he sign nottry paper when her will pay all those amounts. later on i realized my propery paer is stolen by him and he dnt want return back. then i decide to complain abot this. i hired a attoreney. the case is going on. but the problem police is not coprating me because husband gave bribe to them. i need your help that police coprate me. i can provide you F.I.R Number-993.
 
please help me that police support me.
 
Thanks&regards
 
Geeta Chauhan
 
chauhan.geeta11@gmail.com

‘आप’ की भाग्यरेखा का क्या होगा?

 'आप' की सरकार बनाना एक ऐतिहासिक महत्व की बात होगी। यह एक आश्चर्य है कि राजनीति में अनुभवहीन और जनता के बीच से अपरिपक्क लोगों को उम्मीदवार बनाकर चुनाव में जीत हासिल कर शीला दीक्षित जैसी नेता को शिकस्त दे दी। नया इतिहास वही रचता है,जो जुनूनी होता है। अरविंद केजरीवाल एक जुनूनी और धुनी व्यक्ति हैं। 
                                                                       
यह राजनीति में वैसा ही करिश्मा है जैसा अपने समय में जयप्रकाश नारायण ने किया था। उनकी बात दूसरी थी,क्योंकि उनका कद बहुत ऊंचा था और उनके पीछे सारे दल थे। केजरीवाल को सभी नौसखिया मानते थे। बात भी सही थी जिसने कभी चुनाव नहीं लड़ा , जिसने कभी राजनीति की गर्म हवा का झोंका नहीं सहा ,वह विजय के सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंच जाये। अब वे सरकार बनाएंगे। इसके बाद ही शुरू होगा राजनीति का दांव-पेंच , व्यूह-रचना, जिसमें केजरीवाल भूल-भटक सकते हैं। बात सामने आ रही है। कांग्रेस ने बिना शर्त समर्थन देने का आश्वासन दिया था, वही अब शीला दीक्षित के जरिए कह रही है कि बिना शर्त देने की बात कांग्रेस ने नहीं कही थी। वह तो तब तक ही समर्थन देगी, जब तक 'आप' अपनी घोषणा के अनुरूप काम करती रहेगी। यानी कांटे की नोंक पर ओस का एक कतरा बनी रहेगी 'आप'। 
 
कांग्रेस वादा कर के मुकरने में उस्ताद रही है। पहले भी दो-दो बार उसने सरकार गिराई है। केजरीवाल ने उस पर भरोसा करके गलत किया है। कांग्रेस कब क्या पैंतरा बदले यह कहना मुश्किल है। राजनीति में ईमानदारी और नैतिकता का रास्ता अख्तियार कर केजरीवाल ने भले एक मिसाल कायम की हो , लेकिन कांग्रेस के लिए तो राजनीति की वही पुरानी परिभाषा है कि राजनीति और जंग में नैतिकता-अनैतिकता और छल सब जायज होता है। कांग्रेस में राजनीति की शतरंज खेलने वालों की कमी नहीं है, जो कि सब कुछ उलट- पुलट दें , यह कहा नहीं जा सकता। केजरीवाल सरकार तो बनाने जा रहे हैं, लेकिन कांग्रेस  निश्चय ही अपनी हथेली की भाग्य- रेखा बदल देगी और 'आप ' हथेली से उसकी लाइफ लाइन धूमिल कर देगी। 'आप' के लिए सरकार बनाना एक आग का दरिया है, जिससे उसे तैर कर गुजरना होगा। 
 
लेखक अमरेन्द्र कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं.

महाराष्ट्र : 2013 मीडिया के लिए रहा त्रासदी भरा

मुंबई।। महाराष्ट्र पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती की ओर से किए गये एक सर्वे में महाराष्ट्र में पत्रकारिता कितनी जोखिम भरी हो गयी है इसके बारे मे बहुत सारे तथ्य सामने आये हैं. इस सर्वे के कुछ अंश समिती के निमंत्रक एस.एम.देशमुख ने कल मिडिया के सामने रखे.
2013 महाराष्ट्र में मिडिया के लिए काफी त्रासदी भरा रहा.एक साल मे राज्य में दो पत्रकारों की निर्मम हत्त्या की गई. इसमे से एक हत्त्या के आरोपी को अभी तक गिरफ्तार नही किया जा सका है. साल मे 4 मिडिया ऑफिस पर हमले किए गये. जिसमें इन सभी मीडिया ऑफिस का काफी नुकसान हुआ. राज्य की राजधानी और सपनों की नगरी मुंबई में एक महिला पत्रकार का सामुहिक बलात्कार किया गया. 71 पत्रकारों के उपर हमला किया गया जिसमें कि कुछ मामलों में चाकू,तलवार आदि हत्यारों का इस्तेमाल किया गया।
पुणे के एक पत्रकार के पूरे परिवार पर ऍसिड अटैक किया गया जिसमे पत्रकार उनकी पत्नी,और बच्ची बुरी तरह से जल गये थे. विविध कारणों से राज्य में साल मे 4 पत्रकार- फोटोग्राफर्स ने खुदखुशी की,बहुत सारे पत्रकारों को छोटे-छोटे मामलों मे गिरफ्तार कर लिया गया. पिछले साल जहां 64 पत्रकारों के ऊपर हमले हुए थे तो 2013 में इसमे काफी बढोत्तरी हो गयी है. दुर्भाग्य की बात यह है की,पत्रकारों के ऊपर जो हमले हुए है उसमें से 78 प्रतिशत प्रकरणों में आरोपी किसी ना किसी राजनैतिक पार्टी से ताल्लुक रखते है.15 प्रतिशत घटनाओं में हमलावर गुंडे या माफियाओं का हाथ था. 
इतना ही नहीं कुछ हमले पुलिस की और से किए गये. हमलावरों में राजनैतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं की तादात काफी ज्यादा होने से सरकार पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने मे अनदेखी कर रही है.पत्रकार हमला विरोधी कृती समिती पिछले पांच साल से कानून के लिए आंदोलन कर रही है.इस मांग के लिए समिती की और से 13 बार मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण से मुलाकात की गयी,दो बार राष्ट्रपती जी से मुलाकात की गयी, दो बार प्रेस काउंसिल के चेयरमेन से पत्रकार मिले. राज्य के गृहमंत्री,विरोधी दल के सभी नेताओं से भी समिती ने कई बार मुलाकत की लेकिन समिती की सारी कोशिशे नाकामयाब हो रही है. लेकिन जब तक कानून नही होता तब तक आंदोलन जारी रखने का ऐलान समिती के निमंत्रक एस.एम.देशमुख ने किया है.
क्या कहते है सर्वे के आंकडे- 
महाराष्ट्र में 2013 मे दो पत्रकारों की हत्त्या, एक महिला पत्रकार से सामुहिक बलात्कार, 4 मिडिया हाऊसेस पर हमले, 4 पत्रकारों ने की खुदखुशी, 71 पत्रकारों पर जानलेवा हमले.
 

कानपुर प्रेस क्‍लब से ‘अनूप बाजपेयी युग’ का अंत होते दिख रहा

कानपुर।। कानपुर में इस वर्ष के अंत तक 13 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद कानपुर प्रेस क्‍लब का चुनाव संपन्न हो ही जायेगा। इस क्रम में कल प्रेस क्‍लब के चुनाव के नामांकन का कार्य पूरा हो गया है इससे ये तो साफ हो गया है कि अब प्रेस क्‍लब से ‘अनूप बाजपेयी युग ’ का अंत होने वाला है ।
लगभग 13 वर्षों के बाद होने वाले इस चुनाव में स्‍थानीय पत्रकारों का जोश भी चरम पर दिख रहा है । जिसका साफ नजारा नामांकन के दौरान दिखाई दिया। होर्डिंग प्रचार पर रोक के बावजूद भी कई पत्रकारों ने प्रेंस क्‍लब के सामने ही बड़ी-बड़ी होर्डिंग लगा रखी है। एक एक पद पर कई-कई उम्‍मीदवार आमने-सामने है जिसके चलते ये चुनाव काफी रोचक हो गया है तथा शहर के पत्रकार कई खेमों में बट कर अपने प्रतयाशी के पक्ष मे जोर दार प्रचार कर रहे हैं जिसके कारण इन दिनों दावतों का दौर भी कफी बढ़ गया है । 
अध्‍यक्ष पद हेतु सरस बाजपेई,सुरेश त्रिवेदी,तथा सौरभ शुक्‍ला के साथ हीराजेश द्विवेदी शाहिद जमाल,‍ हरिनरायण तिवारी भी अपनी किस्‍मत अजमा रहे है वही पर महामंत्री पद हेतु सुनील गुप्‍ता गजेन्‍द सिहं सहित कई दिग्‍गज शामिल हैं। कोषाध्‍यक्ष हेतु ओमबाबू मिश्र संजय सिंह तथा वरिष्‍ठ छायाकार अधीर सिंह भी शामिल हैं। उपाध्‍यक्ष हेतु अनिल त्रिवेदी,अतुल तिवारी,सतीन्‍द्र के साथ ही वरिष्‍ठ पत्रकार हैदर नकवी की भी किस्‍मत का फैसला होना है ।  मंत्री मद हेतु संयज त्रिपाठी,पुरूषोतम द्विवेदी के साथ सुनील साहू नीरज अवस्‍थी भी मैदान मे अपनी किस्‍मत अजमा रहे हे । कार्यकारिणी हेतु संजय त्रिपाठी,संजीव त्रिवेदी,गौरीशंकर भट्ट ,प्रमोद कुमार त्रिपाठी सुनील साहू,अधीर सिंह लल्‍ला, संजय सक्‍सेना ,अ‍रविन्‍द पाण्‍डेय आदि आने वाली 29 दिसंबर को होने वाले इस चुनाव को अपने पक्ष में मोडने हेतु दिन रात एक किये हुए हैं।
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

दैनिक जागरण ने की देवरिया संगोष्ठी की गलत रिपोर्टिंग

देवरिया।। २१ दिसंबर को देवरिया में आयोजित न्यू मीडिया एवं ग्रामीण पत्रकारिता संगोष्ठी सफलता पूर्वक संपन्न हुई. सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार इस कार्यक्रम से पहले स्थानीय राष्ट्रीय अखबारों के ब्यूरो एवं पत्रकार संगठनों द्वारा इसे असफल करने का प्रयास किया गया था.
पत्रकार संगठनों के बायकाट के बावजूद यह कार्यक्रम अद्भुत ढंग से सफल हुआ. कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आई जी श्री अमिताभ ठाकुर उपस्थित हुए तो वहीं कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो. रामदेव शुक्ल ने की। बतौर वक्ता माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय  के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विभाग के अध्यक्ष डॉ श्रीकांत सिंह, स्तंभकार पंकज झा सहित भड़ास के सम्पादक यशवंत सिंह, आकाशवाणी की समाचार वाचक अल्का सिंह उपस्थित रहे. 
स्थानीय लोगों में अरुण पाण्डेय,सतीश सिंह सहित तमाम पत्रकारों ने सभा को संबोधित किया. कार्यक्रम में पांच लोगों को मोती बीए नया मीडिया सम्मान से सम्मानित भी किया गया. दैनिक जागरण के वरिष्ठ पत्रकार संजय मिश्र, राष्ट्रीय सहारा के नर्वदेश्वर पांडे देहाती, प्राध्यापक डॉ जय प्रकाश पाठक, डॉ सौरभ मालवीय एवं हिन्दुस्तान के युवा पत्रकार राजिव यादव को सम्मानित किया गया. इस दौरान सम्मानित व्यक्तियों ने भी सभा को संबोधित किया. कार्यक्रम की अद्भुत बात ये रही कि शीर्ष से लेकर नीचे तक सभी स्थानीय वक्ताओं ने इस कार्यक्रम को अनोखा बताया और कहा कि पिछले 15 वर्षों के इतिहास में यह कार्यक्रम अद्वितीय है. 
मंच से कई पत्रकारों ने उन लोगो की आलोचना भी की जो इस कार्यक्रम को लेकर जलन और इर्ष्या का भाव लेकर इसके असफलता के लिए प्रयासरत थे. दैनिक जागरण के देवरिया ब्यूरो ने तो इस कार्यक्रम के प्रति अपना उपेक्षित नजरिया अपनी खबर में भी दिखा दिया. यह सवाल सबके जहन में दूसरे दिन बना रहा कि जिस कार्यक्रम की बुनियाद से लेकर संयोजन एवं संचालन तक शिवानन्द द्विवेदी सहर का सबसे अधिक योगदान रहा उनका नाम तक खबर से हटा लिया गया था. कार्यक्रम के संरक्षक डॉ दिनेश मणि त्रिपाठी को संचालक बताते हुए जागरण ने शिवानन्द के नाम को काट कर गलत रिपोर्टिंग की शर्मनाक मिसाल कायम की. हालांकि शिवानन्द इसे महत्व नहीं देते क्योंकि उनका मानना है कि जब हम न्यू मीडिया की बात करेंगे तो मुख्यधारा मीडिया की चूलें हिलेंगी. अगली बार यह आयोजन और बड़े पैमाने पर होगा, ऐसा कार्यक्रम के सह संयोजक शिवानन्द ने बताया. कुल मिलकर यह कार्यक्रम देवरिया के पत्रकारिता इतिहास में अद्भुत रहा है. 
 
आदर्श तिवारी
09792187038

 

‘भगत’ का गला घोंटने की कोशिश

50 बरस के लंबे अंतराल के  बाद बड़ी मुश्किल से पुनर्जागृत हो पाई आगरा की 4 सौ साल पुरानी लोक नाट्य परंपरा  'भगत' का गला घोंटने की कोशिश की जा रही है। मजेदार बात यह है कि कोशिश वही लोग कर रहे हैं जो खुद को इसका अलम्बरदार बनने का दावा करते हैं।'ताज लिट्रेचर फेस्टिवल' में देश भर से आये हिंदी-अंग्रेजी के साहित्यकारों,संस्कृतिकर्मियों,फिल्मकारों और मीडिया जनों के सामने होने वाले इसके प्रदर्शन 'संगत कीजे साधु की' को कानूनीजामा पहना कर रोकने की कोशिश की गयी। 
प्रदर्शन से ठीक 2 दिन पहले किसी राकेश अग्रवाल, श्रीभगवान शर्मा वगैरा ने प्रदर्शनस्थल होटल क्लार्क शीराज के महाप्रबंधक को वकील के माध्यम से  नोटिस भेजकर भगत का प्रदर्शन इस आधार पर न होने देने कि चेतावनी दी कि प्रस्तुति करने वाली संस्था 'रंगलीला' और 'अखाडा दुर्गदास' ने उनकी 'परिषद से  इजाज़त नहीं ली है' और कि ' इस भगत के ख़लीफ़ा फूलसिंह यादव को 'परिषद' ने निष्कासित कर दिया है !' 
पांच दशक पहले 'भगत'  के मृतप्राय हो जाने की कई प्रमुख वजहों में एक इसके 'ख़लीफ़ाओं' के संगठन 'काव्य कला भगत सांगीत परिषद' की अलोकतांत्रिक गतिविधियां भी हैं। दरअसल तब (और दुर्भाग्य से अब भी) इस 'परिषद' पर ऐसे तथाकथित खलीफाओं के गुट का कब्ज़ा था जो व्यापार से जुड़े थे, इस लोक नाट्य  कला के 'चौबालों' की एक लाइन गुनगुनाने की जिन्हें तमीज भी नहीं हासिल थी और 'ख़लीफ़ा' का पद जिन्हें पैतृक रूप से प्राप्त हो गया था क्योंकि उनकी तीसरी या चौथी पीढ़ी के बुज़ुर्ग 'भगत' की सेवा करने के चलते 'ख़लीफ़ा' हो गए थे।7 साल पहले नाट्य संस्था 'रंगलीला' ने 'भगत पुनर्जागरण' का जो सांस्कृतिक आंदोलन छेड़ा था खलीफा फूलसिंह यादव, अखाडा वृदावन बिहारीलाल (छीपीटोला) के गुरु गद्दी स्व० सुमेदीलाल जैन और अखाड़ा चौक चमन के निर्देशक डॉ मिहीलाल यादव सहित दर्जनों भगतकर्मी सक्रिय हुए थे। 'रंगलीला' का नारा था -'नए दौर की नयी भगत !' यानि भगत की पुरानी राग रागनियों को छेड़े बिना इसके कथ्य और शिल्प को आज के समय के हिसाब से तैयार किया जाय।
साल में लगातार चल रही 'रंगलीला' और 'अखाड़ा दुर्गदास' की हर भगत प्रस्तुति को दर्शकों का व्यापक जनसमर्थन और प्रशंसा मिल रही है जबकि लोक कला की दुहाई देने वाले इस 'गैंग ऑफ फोर' के यदा कदा हुए उबाऊ और थकाऊ प्रदर्शनों में दर्शक ही नहीं जुटते। इस खिसियाहट मे आप दर्शकों का तो कुछ बिगाड़ नहीं सकते तो चलो उस भगत को ही नहीं होने दिया जाय जिसे देखने वे उमड़ पड़ते हैं ! 'भगत',  कला के किन्ही 2-4ठेकेदारों की बपौती नहीं, यह आगरा की 400 साल पुरानी विरासत है जिसे बचाना और सहेजना समूचे शहर और देश भर के कलाप्रेमियों का दायित्व है।आइये संस्कृत विरोधी इन अलोकतांत्रिक तत्वों से कला की इस शानदार विरासत को बचाएं ! 
 
 
 
लेखक – अनिल शुक्ला
 

केजरीवाल को लाइव न दिखाने के लिए जी न्यूज में आंतरिक मेल जारी

नई दिल्ली।। जी न्यूज मीडिया में आम आदमी पार्टी के नेता और मुखिया अरविंद केजरीवाल को लाइव दिखाने, वो चाहे लाइव खबर या लाइव इंटरव्यू या लाइव बाइट के रूप में, को लेकर रोक लगा दी गयी है। जी न्यूज में जारी एक आंतरिक मेल में संपादकीय के सभी विभागों को निर्देश दिया गया है।
बताया जाता है कि चैनल को ये डर है कि कहीं लाइव के दौरान केजरीवाल कोई ऐसी बात न बोल दें जो जी न्यूज के खिलाफ चली जाए। बीते दिनों एक लाइव बातचीत के दौरान 'आप' नेता मनीष सिसोदिया ने जी न्यूज के एंकर से कह दिया था कि जी न्यूज का संपादक करप्शन के मामले में जेल जा चुका है। मनीष के इस बयान से जी न्यूज का मैनेजमेंट बौखला गया। कहा जा रहा है कि नए आदेश के बाद अब जी न्यूज में आम आदमी पार्टी के किसी नेता का लाइव चैट या लाइव इंटरव्यू या लाइव बाइट नहीं चलेगा।

रमेश ठाकुर ने लांच किया खुद का अखबार ‘हाई अलर्ट व्यूज’

नई दिल्ली।।  दूरदर्शन, एटूजेड, एनडीटीवी, अमर उजाला व दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित संस्थाओं में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके रमेश ठाकुर अब पाठकों के सामने खुद के हब मीडिया प्रकशन लिमिटेड ग्रुप के अखबार 'हाई अलर्ट व्यूज' के साथ उपस्थित हो रहे हैं। 

अखबार का प्रकाशन 15 दिसंबर से दिल्ली-एनसीआर व मुंबई से एक साथ शुरू हो गया है। मुंबई में अखबार का जिम्मा आजतक न्यूज चैनल के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार सत्य प्रकाश सिंह ने संभाला है। राष्ट्रीय स्तर के इस नए अखबार के साथ कई वरिष्ठ लोग जुड़े हैं। 

रमेश ठाकुर ने अपने अखबार को मीडिया की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए ईटीवी के पूर्व करंट अफेयर प्रमुख अजीत वर्मा, जी न्यूज के योगेश सोनी, नवभारत के पूर्व पत्रकार एनके जोशी को जोड़ा है। हब मीडिया प्रकाशन लिमिटेड ग्रुप के इस अखबार का प्रकाशन जल्द ही देहरादून व कानपुर से भी शुरू होगा।

रजनीश बाबा ने लाइव इंडिया से दिया इस्तीफा, फिल्मी इंडस्ट्री में की ऐंट्री

नई दिल्ली।। पिछले 5 वर्षों से लाइव इंडिया में बतौर स्पोर्ट्स रिपोर्टर काम कर रहे रजनीश बाबा मेहता ने मीडिया को अलविदा कह दिया है। रजनीश ने अब अपनी नई मंजिल तलाशने के लिए मुंबई का रुख किया है। रजनीश ने 3 दिसंबर को लाइव इंडिया से रिजायन दिया। 

रजनीश ने लाइव इंडिया में रहते हुए independent filmmaker की हैसियत से White end….gandhi aur goli…. khaamoshii… second can change your life जैसी कई फिल्म बनाई। gandhi aur goli को साल 2012 दिल्ली फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट 2nd फिल्म का अवार्ड भी मिला। 

अब रजनीश मुंबई में रहकर बड़ी फिल्म की प्लानिंग में जुटे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में पढ़ाई करने के बाद रजनीश श्रीरामसेंटर फॉर परफॉर्मिंग आर्ट्स से थिएटर में डिप्लोमा भी किया और अब न्यूज चैनल को अलविदा कहने के बाद फिल्मी दुनिया में अपनी मंजिल ढूंढने निकल पड़े हैं। 

ऑल इंडिया रेडियो हिसार में महिला न्यूज रीडर से छेड़छाड़, दो कर्मचारियों पर केस दर्ज

हिसार।। ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) के हिसार केंद्र की महिला कैजुअल न्यूज रीडर व उद्घोषक ने दो अधिकारियों के खिलाफ छेड़छाड़ का मुकदमा दर्ज करवाया है। अधिकारियों पर आरोप है कि दोनों ने फरवरी में महिला न्यूज रीडर के साथ छेड़छाड़ की थी। जब महिला ने इसका विरोध किया तो अधिकारी बदतमीजी पर उतर आए और धक्के देकर बाहर निकाल दिया। महिला ने मामले की शिकायत ऑल इंडिया रेडियो मुख्यालय को भी भेजी थी, लेकिन मुख्यालय के अधिकारियों ने इस मामले पर कोई संज्ञान नहीं लिया।

महिला ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि पिछले दो वर्षों से प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव राकेश कपिला और गुलाब सिंह ने उस पर अभद्र टिप्पणियां कर रहे हैं। फरवरी, २०१३ में विरोध करने पर अधिकारियों ने उसे धक्के देकर ऑफिस से बाहर निकाल दिया था। 

महिला न्यूज रीडर ने शिकायत में ये भी बताया कि प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव महिला कर्मचारियों को समय से पहले बुला लेते थे। आरोप है कि उसका प्रोग्राम साढ़े छह बजे शुरू होता था, लेकिन अधिकारी उसे 2 बजे बुला लेते थे। इस दौरान ऑफिस में बैठकर भद्दी टिप्पणियां करते थे। कंपेयर ने शिकायत में कहा है कि ऐसा उस अकेली के साथ नहीं होता था बल्कि कई महिला कर्मचारी अधिकारियों के ऐसी हरकतों से परेशान हैं, मगर वे सामने नहीं आना चाहती और कुछ पर उन्होंने दबाव भी बनाया हुआ है।

इस मामले की शिकायत न्यूज रीडर ने मुख्यालय में बैठे उच्च अधिकारियों को की। उच्च अधिकारियों ने जब कोई कार्रवाई नहीं कि तो महिला न्यूज रीडर ने इसकी शिकायत महिला आयोग को भेजी है।

महिला आयोग ने मामले पर संज्ञान लेते हुए जिला पुलिस प्रशासन को जांच करने के निर्देश दिए। इस दौरान महिला न्यूज रीडर ने इसकी शिकायत पुलिस कप्तान बी सतीश बालन को दी। पुलिस कप्तान ने एएसपी मनीषा चौधरी को मामले की जांच सौंप दी। पुलिस का कहना है आरंभिक जांच में दोनों अधिकारी दोषी मिले हैं।

जिन पर एएसपी ने संबंधित एरिया पुलिस को मामला दर्ज करने के लिए लिख दिया। सोमवार को आजाद नगर चौकी ने महिला न्यूज रीडर की शिकायत पर ऑल इंडिया रेडियो के दोनों प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव के खिलाफ छेड़छाड़ का (धारा 354 के तहत) मुकदमा दर्ज कर लिया हैं। इसकी पुष्टि आजाद नगर चौकी इंचार्ज सब इंस्पेक्टर विकास ने की है।

‘आप’ से ‘हम भारत के लोग’ के कुछ सवाल…

प्रिय अरविंद केजरीवाल जी,

वर्तमान विधानसभा में मिले समर्थन से आप आगामी दिनों में दिल्ली में सरकार बनाने जा रहे हैं और इसके लिए आप सरकार बनाने के लिए आम आदमी पार्टी के दर्शन के अनुरूप आम जनता से राय ले रहे हैं, जो बहुत अनूठा और स्वागतयोग्य कदम है. 

आपको भावी मुख्यमंत्री के रूप में देखते हुए हम दिल्ली के विभिन्न वर्ग के आम नागरिक – ‘We The People of India – हम भारत के लोग’ – आपसे हमारी दिन-ब-दिन की जिंदगी जुड़े चंद सवाल पूछना चाहते हैं. 

हमें पूरी उम्मीद है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था पर अपनी प्रतिबद्धता के अनूरूप आप हम साधारण नागरिकों के प्रश्नों का उत्तर अवश्य देंगे. 

धन्यवाद I 

निवेदक :

We The People of India – हम भारत के लोग’

C/o कप्तान दीपक कुमार,

C-1/214, दूसरा तल, 

जनकपुरी,

दिल्ली – 110058.


आप –आम आदमी पार्टी से कुछ सवाल

1. संसद द्वारा लोकपाल विधेयक पारित हो गया है. इस सम्बन्ध में हम जानना चाहते हैं कि जब इस विधेयक के तहत राज्यों को अपने यहां लोकायुक्त नियुक्त करने के मामले में नियम में संशोधन करने का अधिकार है, ऐसे में क्या आप दिल्ली में इसके अधीन कॉर्पोरेट घरानों, धार्मिक संगठन और एनजीओ, जो की व्यापक पैमाने पर भ्रष्टाचार फैलाने में अधिक भूमिका निभाते है, को भी शामिल करना चाहेंगे? 

2. आप अपने जन-लोकपाल बिल में दलितों-आदिवासियों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की भागीदारी कैसे सुनिश्चित करेंगे? जन लोकपाल बिल में इन वर्गों के हितो की रक्षा कैसे की जाएगी?

3. आप का कहना है कि आप स्थानीय क्षेत्र के विकास में मोहल्ला समिति और स्थानीय लोगों की राय को ही महत्व देंगे, ना कि कोई निर्णय ऊपर से लागू करेंगे. इस संबंध में हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि देश की स्वतंत्रता के समय से ही संविधान और समाज में शीत युद्ध चल रहा है, जैसे तमाम सामाजिक बुराइयां जैसे-दहेज, बाल श्रम, लिंग भेद, जाति, अस्पृश्यता आदि को समाज सही मानता आया पर संविधान/ कानून की नज़र में ये सब अपराध है. ऐसे में यदि आप हर चीज में जन भावना के नाम समाज की राय मांगने की नीति की शुरुआत कर देंगे तो क्या भविष्य में ये कथित जन भावना, खाप का रूप लेकर संविधान पर प्रश्न चिन्ह तो नहीं लगा देंगी? इस बाबत हम जानना चाहते हैं कि आप संविधान/कानून को महत्व देंगे या आम जनता की राय का नाम लेकर हरियाणा की तरह दिल्ली में भी खाप संस्कृति को बढ़ावा देंगे?

4. बिजली के संबंध में आपका वादा है, कि आप इसका दाम आधा कर देंगे, पर दिल्ली में जहां बिजली का उत्पादन बहुत ही कम होता वहीं समाज का उच्च वर्ग एसी, गीजर, वाशिंग मशीन इस्तेमाल कर बिजली और पर्यावरण को नुकसान पहुचाते हैं, बिजली और पानी कोई असीमित संसाधन नहीं है. बिजली उत्पादन के लिए बनाए जाने वाले बांधों से लाखों लोग विस्थासपित होते हैं. बिजली को सस्ता करने की प्रक्रिया में उन विस्थायपितों के अस्तित्वि का सवाल आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं है? उनमें से बहुत से विस्थाउपित पुनर्वास के अभाव में दिल्लीा का रुख करते हैं. उनके बारे में आपकी क्या राय और योजना है? साथ ही अमीरों द्वारा बिजली से चलने वाले यंत्रों के अत्यधिक प्रयोग से पर्यावरण को पहुंचने वाले नुकसान के बारे में आपकी क्या राय और योजना है?

5. यदि आप किसी भी रूप में बिजली की दर कम करेंगे तो इससे होने वाले आर्थिक नुकसान की भरपाई किस माध्यम से करेंगे?आम आदमी को सब्सिडी का बोझ न उठाना पड़े इसके लिए क्या आप अमीर या संपन्न वर्ग से टैक्स इत्यादि वसूलेंगे?

6. आपकी सफलता में ऑटो चालको की बड़ी भूमिका है, पर अक्सर देखने में आया है कि ऑटो चालक मीटर से चलने से मना करते हैं, और कई बार दुगना किराया वसूलते हैं. इन तमाम परेशानियों को देखते हुए पिछली सरकार ने ऑटो चालक पर नियंत्रण, हेड क्वार्टर तक पहुंचाने का यंत्र लगाने की कोशिश की थी, पर ऑटो चालकों के विरोध के चलते यह लागू नहीं हो पाया था, क्या आप आम जनता को ऑटो की तकलीफ से मुक्ति दिलाने के लिए इसे लागु करवाएंगे? ऑटो चालकों के मनमाने रुख के लिए काफी हद तक ‘ऑटो मालिक व ऑटो – वित्तदाता माफिया’ जिम्मेदार है, जिसके चुंगल में ऑटो चालक अक्सर होते हैं. इस माफिया को समाप्त करने के लिए आप क्या करेंगे, जिससे की वास्तव में ऑटो चालाक अपनी मेहनत की कमाई से वंचित न हों?

7. आपने आपके पत्र में ठेका प्रणाली का विरोध किया है, जो बहुत अच्छी बात है, इस संबंध में हम आपको अवगत कराना चाहते हैं कि दिल्ली मेट्रो व् अन्य संस्थानों में कई ठेका कंपनियों ने ठेका कर्मचारियों के वेतन से पीएफ काटकर पीएफ कमिश्नर कार्यालय में जमा करने के बजाय डकार गयी है. इसके अलावा श्रम कानूनों की धज्जियां उड़ाई जा रही है जो की कई बार मीडिया में उजागर भी हो चुके हैं, हम आपसे जानना चाहते हैं कि क्या आप ठेका प्रणाली का पूर्णतः अंत करेंगे और दोषी ठेकेदारों पर कठोर कार्रवाई करेंगे? श्रम कानूनों को लागू करवा कर मजदूर वर्ग को सहारा देंगे या मुनाफाखोरो को खुश करेंगे?

8. आप जानते ही हैं कि दिल्ली में जमीन की कमी हैं और इसकी कीमत बहुत ज्यादा है, पर यहां की प्राइम लोकेशन जैसे अक्षरधाम,लोदी एरिया, क़ुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया, छतरपुर आदि में बड़े भाग पर हिंदू मंदिर और संस्थाओं को जमीन दी गयी है, क्या समाज के गरीब वर्ग के हित में इस जमीन से मंदिरों का कब्जा हटाकर इसे गरीब वर्ग और जनकल्याण के लिए उपलब्ध करायेंगे? यदि नहीं तो क्यों?

9. आपने यह माना है कि सरकारी स्कूलों में अच्छी शिक्षा नहीं मिलती और आप इसकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है, यह बेशक अच्छी बात है पर क्या आप इसके साथ राईट तो एडुकेशन के तहत शहर के निजी स्कूलों में गरीब-दलित के बच्चों का प्रवेश सुरक्षित करेंगे? इस संदर्भ में आपकी क्या कार्य योजना है?

10. आपने सरकारी अस्पतालों में वृद्धि और सुविधाओं को निजी अस्पताल की तरह करने की घोषणा की है, जो बहुत अच्छी बात है, पर क्या आप निजी अस्पतालों में दलित-गरीब तबके के नि:शुल्क इलाज की व्यवस्था आरम्भ करेंगे? यदि हां तो इसकी रूपरेखा स्पष्ट करे.

11. महिला सुरक्षा आप का अहम मुद्दा रहा है, और ऐसी किसी घटना पर आप प्रदर्शन करते रहे है पर हमने देखा कि दलित-आदिवासी महिलाओ के अत्याचार में आप मौन रहते है, हरियाणा में महिलाओ पर हुए अत्याचार इसका उदहारण है क्या आप बताएंगे कि दलित-आदिवासी महिला अत्याचार के मामले की गंभीरता को देखते हुए एक पृथक दलित-आदिवासी महिला आयोग का गठन करेंगे. यदि नहीं तो क्यों?

12. संविधान-प्रदत्तक अजा/अजजा के लिए आरक्षण व्यकवस्थाप के बारे में आपकी क्या- राय है? दिल्ली सरकार के अधीन एससी/एसटी की खाली पड़ी रिक्तियों और बैकलॉग को भरने के बारे में आपके पास क्याध कार्य-योजना है? (कृपया स्पष्ट जवाब दें)

13. दिल्ली में रह रहे आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं दिया गया है I दूसरे राज्यों से विस्थापित हो कर राजधानी क्षेत्र में आकर बसी अनुसूचित जनजाति की आबादी को दिल्ली में अनुसूचित जनजाति का दर्जा प्रदान करने और उनको सविंधान प्रदत्त सुविधाए मुहैया कराने के लिए आपकी क्या कार्ययोजना है?

14. केंद्र सरकार ने गैस सिलेंडर से सब्सिडी घटाकर इन्हें मंहगा कर दिया है, इस सम्बन्ध में हम बताना चाहते हैं कि शहर के गरीब, कागज़ात और पैसो के अभाव में गैस कनेक्शन नहीं ले पाते हैं, जिसके चलते उन्हें मार्केट दर से कहीं अधिक दर पर (120 रूपए प्रति किलो) छोटे सिलेंडर भरवाने पर मज़बूर होते हैं, क्या आप गरीब तबको को बिना कागज़ात के रियायती दर पर छोटे सिलेंडर उपलब्ध कराएँगे. यदि हां तो क्या उसका बोझ आम आदमी पे पड़ेगा? अगर नहीं तो कैसे?

15. दिल्ली के तमाम अमीर रिहायशी इलाकों में एलपीजी की सप्लाई के लिए गैस पाईप लाइन बिछी होती है पर जेजे कॉलोनी और गरीब बस्ती में कहीं भी यह सुविधा नहीं है, क्या आप सस्ती दरो पे गरीबों की बस्ती में इसे उपलब्ध करायेंगे? अगर नहीं तो क्यूँ और अगर हां तो कब तक और कैसे?

16. शहर का गरीब तबका सिर्फ सार्वजनिक यातायात के साधनों में ही सफर करता है, पर बसों को अक्सर कार जैसे निजी वाहनों के चलते जाम का सामना करना पड़ता है, और अपना कीमती समय सफ़र में व्यतीत करता है इसके साथ ही अधिक किराये का भुगतान भी करना पड़ता है, क्या आप गरीब वर्ग पर अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए इसके किराए में कमी करते हुए बीआरटीएस सिस्टम लागू करेंगे? निजी वाहनों पे पाबन्दी लगाने के लिए क्या कदम उठाये जायेंगे ?

17. शहर में घरेलू कामगार, शोषण का शिकार होते हैं, क्या आप इनके लिए न्यूनतम वेतन और पीएफ सुनिश्चित करेंगे और इसे लागू कराने के लिए आपके पास क्या कार्ययोजना है?

18. आपकी नज़र में आम आदमी कौन है. कौन से वर्ग आम आदमी की श्रेणी में आते है जिसके मद्देनज़र आप अपनी नीतिया तय करेंगे?

– ​“We The People of India

''हम भारत के लोग”​ की ओर से

मूलचंद (रिटायर्ड अधिकारी) ​,

दीपक कुमार (पायलट) ,

अनीता भारती (लेखिका व सामाजिक कार्यकर्ता) ,

डॉ. गंगा सहाय मीना (प्रोफेसर) ,

रत्नेश (सामाजिक कार्यकर्ता) ​,

गुरिंदर आजाद (सामाजिक कार्यकर्ता) ​,

सेवंती (सामाजिक कार्यकर्ता) ​,

राजीव (सामाजिक कार्यकर्ता) ,

अरुण रूपक (सामाजिक कार्यकर्ता) ​,

डॉ राहुल (चिकित्सक) ​,

धरम सिंह (रिटायर्ड अधिकारी) ​,

दीपक सिंह (वकील) ​,

जयनाथ (रिटायर्ड अधिकारी) ​,

सी बी राहुल (सामाजिक कार्यकर्ता) ​,

सुभाष कुमार (सामाजिक कार्यकर्ता) ​ ​तथा अन्य ​कार्यकर्ताओं द्वारा हस्‍ताक्षरित। ​​ ​​ 

मधु किश्वर के भाई पर लगा बलात्कार का आरोप, नहीं दर्ज हुई रिपोर्ट

Om Thanvi : मधु किश्वर के भाई पर बलात्कार का आरोप लगा। पुलिस अभियुक्त यानी उनके भाई को गिरफ्तार करने घर पहुंच गई। मधु दबंग महिला हैं। उन्होंने पुलिस से संघर्ष किया और रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई। इसके लिए शिकायतकर्ता को दस हजार रुपए भी दिए गए।

वजह? मधु नहीं मानती थीं कि उनका भाई गुनहगार है। उनका कहना था कि 'झूठी' शिकायत से वह एक दिन भी अंदर चला गया (जो जाता ही) तो उसकी नौकरी चली जाएगी।

क्या निर्दोष मान लेने का यह अधिकार मधु बलात्कार के अन्य आरोपितों को देंगी, जब किसी अन्य आरोपित की नौकरी — या जान भी — जाने का खतरा हो? देश में कानूनी इदारे किस खुशी में स्थापित हैं, जहां मधु न अपने भाई के लिए गईं, न पूर्वोत्तर की युवती के लिए, जो अंततः मदद के लिए ही उनके बलात्कार का आरोप लेकर पास पहुंची थी?

और पढ़िए जनसत्ता में इस साल के शुरू में छपा उनका ही लेख कि बलात्कार के उस कानून के बारे में वे क्या सोचती हैं, जो अब और कड़ा हो गया है। नीचे की कटिंग पर क्लिक करें…

जनसत्ता अखबार के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी के फेसबुक वॉल से साभार.

पंकज आत्रेय ने दिया आज समाज से इस्तीफा, अमर उजाला से जुड़े

करनाल।। पत्रकार पंकज आत्रेय ने आज समाज से इस्तीफा दे दिया है। पंकज ने अपनी नई पारी की शुरूआत अमर उजाला करनाल में बतौर ब्यूरो प्रभारी की है। पंकज आज समाज में ब्यूरो चीफ के पद पर कार्यरत थे। इससे पहले पंकज ने दैनिक भास्कर में अपनी सेवाएं दी थी। पंकज ने पत्रकारिता में अपने करियर की शुरूआत अमर उजाला अंबाला से की थी। 

आईजी, पीटीएस, गोरखपुर से ट्रांसफर हेतु प्रत्यावेदन

गोरखपुर।। आईजी पद पर हाल में प्रोन्नत हुए आइपीएस अफसर अमिताभ ठाकुर ने आईजी, पीटीएस, गोरखपुर के पद पर हुए स्थानान्तरण के संबंध में डीजीपी, यूपी को अपना प्रत्यावेदन भेजा है.
पीटीएस गोरखपुर में एडीजी के रूप में विजय सिंह तैनात हैं. अमिताभ ठाकुर ने तत्कालीन प्रमुख सचिव, गृह कुंवर फतेह बहादुर के साथ मुख्यमंत्री मायावती के सचिव विजय सिंह पर उत्पीडन और जानबूझ कर परेशान करने के गंभीर आरोप लगाए थे और इस बारे में हाई कोर्ट में मुकदमा भी दर्ज कराया था. हाई कोर्ट के आदेश पर मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने जांच करके इन अधिकारियों को क्लीन चिट दी थी जिसे अमिताभ ठाकुर ने हाई कोर्ट में चुनौती दी है और मामला अभी कोर्ट में लंबित है.
 
इस पोस्टिंग को पूरी तरह गलत बताते हुए अमिताभ ठाकुर ने श्री सिंह द्वारा पूर्वाग्रह से प्रेरित हो कर काम करने की प्रबल संभावना के आधार पर अपना स्थानान्तरण कहीं और करने का निवेदन किया है.

वरिष्ठ लेखक रूप नारायण ने फिल्म कृष-3 निर्माता के खिलाफ दर्ज कराया मुकदमा

लखनऊ।। वरिष्ठ लेखक और अधिवक्ता रूप नारायण सोनकर ने फिल्म कृष-3 के निर्माता, लेखक और कलाकारों के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच के समक्ष रिट पेटिशन ( M/B-12092- 2013) दाखिल कर फिल्म पर अपने उपन्यास सूअरदान के तथ्यों की चोरी का आरोप लगाया है।
इसी के साथ नारायण सोनकर ने फिल्म निर्माता राकेश रोशन से पचास करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की है। लखनऊ निवासी और हाईकोर्ट में अधिवक्ता श्री सोनकर ने संविधान के आर्टिकल 226 के तहत दायर कराये गये अपने मुकदमे में कृष-3 के निर्माता पर आरोप लगाया है कि उन्होंने उनके उपन्यास- सूअरदान से बिना बताये हू-ब-हू तथ्यों को उठा लिया हैं। इस संबंध में इलाहाबाद हाई कोर्ट के लखनऊ बेंच में डबल बेंच के द्वारा फिल्म प्रमाणन बोर्ड को निर्देश पारित कर दिया गया है। 
सोनकर ने अपने पेटिशन में फिल्म निर्माता राकेश रोशन पर भारतीय कॉपी राइट एक्ट 1957 के उल्लंघन का आरोप लगाया है। मुकदमे में राकेश रोशन के अतिरिक्त अभिनेता अमिताभ बच्चन, रितिक रोशन, विवेक ओबराय, सह रचनाकार राबिन भट्ट, अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा, कंगना रनाउत, केंद्र सरकार, राज्य सरकार व बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन को पक्षकार बनाया गया है। फिल्म कृष-3 की स्क्रिप्ट फिल्म राईटर्स एसोसिएशन, मुंबई में वर्ष-2011 में पंजीकृत है और फिल्म एक नवंबर, 2013 को रिलीज हुई, जबकि सोनकर का उपन्यास सूअरदान वर्ष 2010 में प्रकाशित हो गया था।
 
लेखक रूप नारायण सोनकर के इस उपन्यास के पात्र रामचंद्र त्रिवेदी, सज्जन खटिक, घसीटे चमार और सलवंत यादव उत्तर प्रदेश के सिंहासन खेड़ा गांव में एक पिगरी फार्म खोलते हैं। ये चारों इंग्लैंड से उच्च तकनीकी शिक्षा प्राप्त हैं और गांव के विकास के लिए अपना जीवन अर्पण करते हैं। चारों मानवतावादी सोच के हैं तथा विश्वबंधुत्व में यकिन रखते हैं। दूसरी तरफ आपराधिक प्रवृति का एक ग्राम प्रधान है जो अपने आतंक के बल पर गांव में राज करता है तथा अपना विरोध करने वाले लोगों का कत्ल करा देता है। वह अपंग है और ह्वील चेअर पर चलता है। समाज विरोधी व वर्चस्व की समस्त गतिविधियां बावजूद अपंगता वह अपने सहयोगियों के साथ व्हीलचेयर पर बैठे-बैठे संपन्न कराता है। वह गांव के एक कमजोर वर्ग की लड़की का अपहरण कराकर उसे रखैल बना लेता है। वह प्रेग्नेंट हो जाती है। यह उपन्यास का सुपर विलेन है।
 
पिगरी फार्म के पार्टनर अपने पिगरी फार्म में अमेरिका के वैज्ञानिकों की मदद से नये-नये वैज्ञानिक प्रयोग करते रहते हैं। सूअर और गाय के संगमन से एक नयी ब्रीड सूगाय उत्पन्न करते हैं। यह एक हाई ब्रीड है। लेखक द्वारा मानव के प्रथम दो अक्षर -मान  और जानवर के अंतिम दो अक्षर- वर तो मिलाकर मानवर  संज्ञा गढ़ा गया है। यह उपन्यास सूअरदान में पहली बार आया शब्द है, किसी शब्दकोश में नहीं है।
 आप कृष-3 फिल्म देखें तो उसमें काल (विवेक ओबेराय) मानव और जानवर के डीएनए से मानवर नाम का ही हाई ब्रिड उत्पन्न कराता है। काल भी अपंग है, व्हीलचेयर पर ही चलता है। वह फिल्म की हीरोइन प्रिया (प्रियंका चोपड़ा) का अपहरण कर लेता है और वह प्रेग्नेंट हो जाती है।
 उपन्यास सूअरदान में भयंकर बीमारियां हवा के माध्यम से फैलती हैं, वही फिल्म कृष-3 में पानी के जरिये फैलती हैं।
सूअरदान का एक पात्र सज्जन खटिक अमेरिका के न्यू जर्सी शहर में भारतीय मूल के डॉक्टर स्नेही लाल से मिलता है। पुजारी दयाशंकर की लाइलाज बीमारी एड्स का इलाज करवाता है, इसी तरह फिल्म कृष-3 में रोहित मेहरा (रितिक रोशन  का डबल रोल) सिंगापुर में भारतीय मूल के डॉक्टर सिद्धांत आर्या से मिलता है और मुंबई में काल द्वारा फैलायी जा रही लाइलाज बीमारियों का हल चाहता है।
इतनी समानताएं महज संयोग नहीं हो सकतीं। देखना है कि लेखक रूपनारायण सोनकर को न्याय मिल पाता है कि नहीं और मिलता है तो कब मिलता है।
 
रूप नारायण सोनकर
मोबाइल-09410778718

पंजाब केसरी मांगे असम में मुफ्त पत्रकार, सिकुड़ रहा नार्थ-ईस्ट एडिशन

पिछले दिनों पटना में एक होर्डिंग देखा था, जो बता रहा था कि सबसे महंगा अखबार यहीं यानी बिहार में मिलता है। बाद में गुवाहाटी आया तो पता चला कि 12 पेज का एक अखबार सात रुपय में उसमें भी अखबारों में सैलून खुलने की खबर और फलां के माताजी या पिता जी के स्वर्गवास का विज्ञापन और फिर नेशनल पेज पर दो दिन पुरानी खबर।
देखने से लगा कि 7 रुपए का अखबार नहीं बल्कि डमी हो। फिर अपने पत्रकार भाईयों से पूछना शुरू किया कि सबसे महंगा अखबार कहां मिलता है। कुल मिला कर जो जानकारी मिली उसे पता चला कि विश्व का सबसे बड़ा महंगा अखबार  गुवाहाटी का हिन्दी अखबार है। जिसे अखबार की जगह अखबार का कबाड़ कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। 
सोचा कि महंगे अखबारों में शायद कर्मचारियों का वेतन ज्यादा हो। लेकिन ऐसा नहीं है। एक बुजुर्ग पत्रकार ने बताया कि पत्रकारों का पेट चलाना मुश्किल होता है। एक पुराने मित्र हैं वे कभी सेंटिनल हिंदी में काम करते थे। शायद यहां का यह पहला हिंदी अखबार है। मुकेश कुमार इसके कभी संपदाक होते थे। इस अखबार के तो क्या कहने। एक सैलून में इस अखबार को पड़ा देखा। वो पीछे का पन्ना बड़े गौर से देख रहा था। पीछे के पेज में अभिनेत्रियों का खुले बदन वाली तस्वीर छपती हैं। सैलून वाले से मैंने पूछा कि अखबार में क्या लिखा है? उसने तपाक से कहा कि सर! हमको पढ़ने कहां आता है। ई तो ग्राहक सब के लिए लेते हैं। हम त समझिए ई फटू सब देख लेते हैं, बस।
 
यहां से चार हिंदी अखबार निकलता है। शुरू में नाम कमाने वाला सेंटिनल खराब स्थिति में है। किसी तरह से निकल रहा है। मुश्किल से दो -तीन आदमी कट -पेस्ट करके निकाल लेते हैं। दूसरे अखबारों की स्थिति भी अच्छी नहीं है, न्यूज के मामले में। हालांकि पन्नों में विज्ञापन चौंकाने वाला हैं। अहिन्दी क्षेत्र में हिन्दी अखबार में इतना विज्ञापन। मैने कुछ लोगों से पूछा कि साहब इतना विज्ञापन कैसे मिलता है तो लोगों का कहना था कि हिन्दी अखबारों के लिए विज्ञापन की कमी नहीं है। आधे साल का खर्च तो स्वर्गवासी लोगों का विज्ञापन छापने से निकल जाता है। 
फिर अगले दिन मैने अपने होटल में अखबार ले कर आने वाले हाकर से पूछा कि राष्ट्रीय अखबारों में कौन सब है? तो उसने बताया कि साहब! जागरण का आना बंद हो गया, हिन्दुस्तान, नवभारत तो कब के बंद हो गया। बस पंजाब केसरी और जनसत्ता आता है। उसने मुझे पंजाब केसरी का एक पुराना अंक दिया। गुवाहाटी में पहुंच कर इसका दाम 10 रुपया हो जाता है। बावजूद इसके यह पेपर यहां खूब बिकता है।  एक दिन बाद पहुंचने वाले इस पेपर के ऊपर में नार्थ-ईस्ट एडिशन लिखा देख मैं चौंका। फिर बीच के पन्नों पर देखा नार्थ- केसरी के लिए एजैंट और संवाददाताओं की वैकेंसी। फिर अपने कई मित्रों को फोन लगाया और इस बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि पिछले तीन महीने से पंजाब केसरी यह विज्ञापन दे रहा है। शुरू में नार्थ-ईस्ट के लिए एक पेज खबर होती थी। लेकिन धीरे-धीरे सिकुड़ता जा रहा है। यानी पूरे पेज में एजेंसी की एक आध -खबर के बाद खेल की खबरें।
मैने उनसे पूछा कि आखिर राष्ट्रीय अखबार में यहां से कोई आवेदन क्यों नहीं दे रहा है तो उन्होंने बताया कि कई लोगों ने शुरूआत में न्यूज भेजना शुरू  किया था। लेकिन दो से तीन महीने तक प्रबंधन की ओर से कुछ न मिलने के बाद लोगों ने लिखना छोड़ दिया। शायद पंजाब केसरी चाहता है कि कार्ड का तमगा लेकर संवाददाता अपने भी कमाए और अखबार को भी दे।
हालांकि मुझे बहुत कुछ समझ नही आया। सोचता रह गया  कि आखिर पंजाब केसरी की मंशा क्या है? पेज सिकुड़ता क्यों चला गया? हालांकि गुवाहाटी से निकलने वाले अखबार बता रहा है कि यहां राष्ट्रीय अखबारों की शख्त जरूरत है। अच्छे अखबारों के लिए माता कामाख्या की भूमि उर्वर है। यहां के अंग्रेजी अखबार देश का पहला ऐसा अखबार है जिसने  अपने कर्मचारियों को मजीठिया वेतन आयोग दे रहा है। हिन्दी अखबारों को साल का 7 से 8 करोड़ का सिर्फ निजी क्षेत्र से विज्ञापन मिल रहा है। असमिया, अंग्रेजी व हिन्दी को मिला कर 25 से ज्यादा अखबार है और असम सहित समूचे पूर्वोत्तर के राज्य में उद्योग धंधे बढ़ रहे हैं। खासकर रियल स्टेट से विज्ञापन खूब आ रहा है।
 
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 
 

दूरदर्शन और आकाशवाणी में नौकरी की बहार

नई दिल्ली।। मीडिया क्षेत्र और दूरदर्शन, ऑल इंडिया रेडियो (एआईआर) में नौकरी पाने की चाहत रखने वाले देश के युवाओं के लिए  लिए एक स्वर्णिम अवसर है.  प्रसार भारती में कर्मचारियों की कमी को दूर करने के लिए सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने भर्ती का एक बड़ा कदम उठाया है. जिसके चलते प्रसार भारती भर्ती बोर्ड के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मंत्रालय ने बोर्ड के गठन के संबंध में वित्त मंत्रालय में व्यय विभाग और कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग से विचार विमर्श किया है. मंत्रिसमूह की सिफारिश के मुताबिक प्रसार भारती के लिए एक भर्ती बोर्ड बनाना होगा. मंत्रालय ने व्यय विभाग और डीओपीटी (डिपार्टमेंट ऑफ पर्सनल ऐंड ट्रेनिंग) से मंजूरी प्राप्त कर ली है. अब केंद्रीय मंत्रिमंडल से अंतिम मंजूरी की दरकार है.
अधिकारियों का कहना है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रस्ताव के अनुसार प्रसार भारती भर्ती बोर्ड का प्रमुख भारत सरकार के अतिरिक्त सचिव स्तर का एक अधिकारी होगा और इसमें संयुक्त सचिव स्तर के दो और सदस्य होंगे.
 
इन पदों पर होंगी भार्तियां-
 
खबर है कि बोर्ड के गठन के लिए 45 पद सृजित किये जाएंगे जो विशेष रूप से दूरदर्शन और आकाशवाणी (एआईआर) के लिए कर्मचारियों की भर्ती करेगा. प्रसार भारती में निकट भविष्य में दूरदर्शन और आकाशवाणी में कार्यक्रम और तकनीकी प्रकोष्ठों में कम से कम 1,150 पदों को भरा जाना है. इन पदों में सहायक केंद्र निदेशक, इंजीनियरिंग सहायक, कार्यक्रम अधिकारी, ट्रांसमिशन अधिकारी, तकनीकी कर्मचारी, कैमरामेन, प्रोडक्शन सहायक और प्रशासनिक कर्मी आदि शामिल होंगे.
बोर्ड का गठन होने और भर्तियां शुरू होने के बाद दूरदर्शन और ऑल इंडिया रेडियो के महत्वपूर्ण कार्य क्षेत्रों में नयी ऊर्जा आएगी.

जेपी जोशी सेक्स स्कैंडल, साजिशकर्ता पुलिस की गिरफ्त से दूर

देहरादून।। उत्तराखण्ड के जेपी जोशी यौन प्रकरण में भले ही पीड़िता सहित कई लोगो की गिरफ्तारी हो गई हो लेकिन पुलिस अभी भी इस कांड में कई लोगो के चेहरों से नकाब हटाने में नाकामयाब रही है। इस प्रकरण में बनाई गई सीडी किस स्थान पर और किस मीडिया हाउस के इशारे पर बनाई गई इसका पर्दाफाश भी किया जाना बेहद जरूरी है। इस कांड में उत्तराखण्ड के कई पत्रकारों के नाम भी सामने आते दिख रहे हैं जिसके चलते प्रदेश की मीडिया के साथ साथ जनता भी उन लोगो के चेहरो को जानना चाहती जिनके इशारे पर इस घटनाक्रम को अंजाम दिया गया।
कांग्रेस की महिला नेत्री रितु कंडयाल के साथ साथ सचिवालय के एसएस वलदिया और उसके बाद संजय मुखर्जी की गिरफ्तारी के बाद ये तो तय हो गया है कि अभी पुलिस की पकड़ से कई गुनाहगार खुले घूम रहे हैं। पुलिस को पीड़ित युवती द्वारा मिले पत्र में 9 लोगों के नामों का खुलासा किया गया और ये 9 लोग कौन हैं पुलिस उनके नामो को जांच के चलते बताने से इंकार कर रही है लेकिन इस प्रकरण के बाद उत्तराखण्ड के सचिवालय से लेकर प्राइवेट संस्थानो में भी महिलाओ को लेकर सुरक्षा की दृष्टि अपनाई जानी शुरू हो गई है लेकिन उत्तराखण्ड के इस प्रकरण ने यह बात भी उजागर कर दी है कि नोटो की खनक के आगे जिस तरह से हथकंडो को अपनाया जा रहा है वह उत्तराखण्ड की देवभूमि के लिए शुभ संकेत नहीं।
 इस पूरे प्रकरण में जिस तरह से मीडिया को लेकर नाम उजागर होते जा रहे हें उससे उनकी विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं। दो दिन पूर्व देहरादून से प्रकाशित समाचार पत्र अमर उजाला ने 9 लोगों के नामों की तरफ इशारा कर सान्ध्य दैनिक लोकजन टुडे के सम्पादक अभिषेक सिन्हा के नाम का खुलासा इस प्रकरण में किया था लेकिन रविवार को समाचार पत्र ने अभिषेक सिन्हा के नाम को इस प्रकरण में ना होने की बात लिखि। सवाल इस बात का उठ रहा है कि यदि इस प्रकरण में कोई व्यक्ति मौजूद नही है तो किसके इशारे पर इस तरह के हथकंडो को अंजाम दिया जा रहा है।
 
समाचार पत्र की ऐसी खबरों को प्रकाशित करने के साथ साथ विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में आती नजर आ रही है और यह भी साबित हो रहा है कि ऐसी खबरों को लिखने वाले पत्रकार आखिर जनता को क्या सामग्री परोस रहे है। पुलिस इस प्रकरण में अभी तक इस बात का खुलासा नही कर पाई है कि इस सीडी को किस मीडिया संस्थान के कार्यालय में तैयार किया गया और जिस कार्यालय में इस सीडी को तैयार किया गया वहां के कम्प्यूटर की हार्ड डिस्क भी पुलिस ने अभी तक कब्जे में नहीं ली है। माना जा रहा है कि संजय मुखर्जी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को कुछ और नामों के खुलासा होने की उम्मीद भी बनी हुई है जिससे पुलिस जल्द ही इस मामले में कई लोगों की गिरफ्तारी करने की तैयारी में जुटी हुई है। अब तक इस मामले में उत्तराखण्ड के एक राजनेता का नाम भी सामने आता दिख रहा है लेकिन पुलिस अभी तक उस नेता की गिरफ्तारी नहीं कर पाई है। 
 
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पुलिस देहरादून के उस न्यूज चैनल के कार्यालय की हार्ड डिस्क भी हासिल नही कर पाई है जहां इस प्रकरण की वीडियो फिल्म को बनाए जाने का खेल अंजाम दिया गया है और उस राजनेता का नाम भी अभी तक कहीं उजागर नही हुआ है जिसके तार इस प्रकरण से जुड़े हुए बताए जा रहे हैं। यह भी जानकारी हासिल हो रही है कि इस राजनेता के नाम के सहारे उत्तराखण्ड में कई सरकारी कामों से लेकर ठेकों का काम बड़े पैमाने पर किया जा रहा है और इसी राजनेता के इशारे पर उत्तराखण्ड में कई और लोगों को भी पूर्व में निशाना बनाया जा चुका है लेकिन कोई भी इस मामले में अभी तक पुलिस के पास शिकायत लेकर नही पहुंचा है। इस प्रकरण में यदि उत्तराखण्ड के बड़े नेता की गिरफ्तारी होती है तभी इस प्रकरण की हकीकत खुलकर सामने आ सकती है।

नेताओं का सम्मान पत्रकारों का अपमान

मिहिजाम।। शनिवार शाम पश्चिम बंगाल के चित्तरंजन स्थित रविंद्र मंच मे झारखंड के एक गैरसरकारी विद्यालय का वार्षिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में जामताड़ा जिले से एसडीओ अखिलेश कुमार सिंहा सहित अन्य अधिकारी भी भाग लेने पहुंचे। बतौर मुख्य अतिथि चित्तरंजन रेल कारखाना के रेलवे सुरक्षा बल के समादेष्टा राज कुमार सिंह भी कार्यक्रम मे उपस्थित हुए।
मिहिजाम इलाके के गणमान्य व्यक्ति सहित इलाके के कई जाने माने युवा पत्रकार भी उपस्थित थे। कार्यक्रम मे सबकुछ ठीक ठाक ही चल रहा था। लेकिन बात तब बिगड़ गयी जब युवा पत्रकारों की अनदेखी कर स्थानीय एक नेता को कलम के सिपाही से संबोधित कर मंच साझा किया। 
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार मंच पर स्थानीय गणमान्य लोगों के साथ साथ झारखंड विकास मोर्चा के एक स्थानीय नेता को कलम के सिपाही एवं वरिष्ट पत्रकार के तौर पर सम्मानित किया गया। लेकिन एक दशक से उपर पत्रकारिता कर रहे युवा पत्रकारों को सम्मानित कराना तो दूर स्कूल के  उक्त प्रधानाचार्य ने पत्रकारों का नाम तक लेना मुनासिब नहीं समझा। जिसके कारण दर्शक दीर्घा मे बैठे पत्रकार इसे अपनी तौहीन समझकर कार्यक्रम से बाहर हो लिये।
 
पत्रकारों ने बताया कि इस प्रकार के स्कूल के आयोजक सिर्फ कवरेज करने एवं अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए ही पत्रकारों को कार्यक्रम मे बुला लेते हैं लेकिन कार्यक्रम मे उपस्थित होने पर मुंह से बोलना तक पंसद नहीं करते वहीं जब कोई छोटे मोटे नेता भी उपस्थित हो जाते हैं तो अपनी कुर्सी छोड़कर खड़ा हो जाते हैं तथा उनकी आवाभगत मे लग जाते हैं। पत्रकारों ने बताया कि हम कोई नौकर थोड़े हीं है जो सिर्फ उनका कार्यक्रम का कवरेज करते रहें। बताया जाता है कि उक्त गैर सरकारी विद्यालय को अब तक सरकार द्वारा मान्यता भी प्राप्त नहीं हो सकी है।

रवि यादव गए A 1 तहलका, नितिन ने शुरू की न्यूज नेशन के साथ नई पारी

नई दिल्ली।। रवि यादव ने गुडगांव में चल रहे आई विटनेस न्यूज से इस्तीफा दे दिया है. रवि यहां बतौर सीनियर रिपोर्टर (दिल्ली ब्यूरो) में कार्यरत थे. रवि ने अपनी नई पारी A 1 तहलका के साथ शुरु की है.
वहीं दूसरी तरफ आजतक की मीडिया इंस्टीट्यूट TVTMI के प्रतिभाशाली छात्र नितिन उपाध्याय ने बतौर रिपोर्टर न्यूज नेशन चैनल में ज्वॉइन किया है, आजतक प्रबंधन ने अपनी ही मीडिया इंस्टीट्यूट के छात्रों को नौकरी नहीं दी थी. हार ना मानते हुए छात्रों ने अपना रास्ता खुद बनाया और नितिन इसका जीता जागता उदाहरण हैं.
नितिन ने आजतक में नौकरी ना मिलने के बाद P7 में कुछ महीने काम किया. इसके पहले नितिन ने आजतक के सहयोगी चैनल दिल्ली आजतक में रिपोर्टर के तौर पर अपनी सेवाएं दी हैं.

अन्ना को अंग्रेजी नहीं आती…

लोकपाल बिल लोक सभा और राज्य सभा दोनों में पारित हो गया है । रालेगण सिद्धी में अन्ना हजारे इसको पारित करवाने के लिये अनशन पर बैठे थे । बिल पारित होने पर उन्होंने अपना अनशन समाप्त कर दिया । लेकिन बिल पारित होने पर अरविन्द केजरीवाल प्रसन्न नहीं हैं । उनका मानना है कि इस लोकपाल से तो चूहे को भी पकड़ा नहीं जा सकता । दूसरी ओर अन्ना का कहना है कि इससे शेर भी पकड़ा जा सकता है ।
वैसे तो केजरीवाल इस अनशन के लिये स्वयं अन्ना के गांव जाना चाहते थे । लेकिन ऐन मौके पर उन्हें बुखार ने पकड़ लिया । वैसे कुछ भीतरी सूत्र यह भी बताते हैं कि अन्ना ने ही उनके रालेगन सिद्धी आने पर एतराज जताया था । इसलिये उन्होंने वहां अपना प्रतिनिधि और आम आदमी पार्टी के बड़े नेता गोपाल राय को भेजा था । इधर दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) का रुतबा बढ़ गया है , इसलिये महाराष्ट्र में अन्ना के गांव जाकर गोपाल राय ने मंच पर ही पूर्व सेनाध्यक्ष को टोकते हुये आन्दोलन का मार्गदर्शन करने का प्रयास किया तो अन्ना ने उसे मंच पर ही झिड़क दिया और गांव छोड़ कर जाने के लिये कहा ।
 
जब दिल्ली में अन्ना हज़ारे ने लोकपाल बिल को लेकर जनान्दोलन शुरु किया था तो अरविन्द केजरीवाल भी उनके समर्थन में खड़े थे । रामलीला मैदान में वही सबसे आगे दिखाई देते थे । धीरे धीरे वे थोड़ा और आगे हो गये । आगे होते होते केजरीवाल को लगा कि दूसरों से लोकपाल की याचना करने की बजाय ख़ुद ही एक राजनैतिक पार्टी बना लेनी चाहिये और फिर स्वयं ही लोकपाल बिल पारित करना चाहिये । लेकिन शायद अन्ना इससे सहमत नहीं थी । उनका कहना था कि हमारी लड़ाई सत्ता प्राप्त करने की लड़ाई नहीं है , बल्कि व्यवस्था को बदलने की लड़ाई है । इसके लिये पूरे देश में इतना सशक्त जनमत बनाया जाये ताकि , सत्ता चाहे किसी भी राजनैतिक दल की हो , लेकिन वह विपरीत जनमत के डर से भ्रष्टाचार में लिप्त न हो सके । इसके कारण देश की राजनैतिक व्यवस्था साफ़ होगी । यदि हम ने भी एक अलग राजनैतिक पार्टी बना ली , तो यह सींग कटा कर भेड़ों के रेवड में शामिल होने के समान हो जायेगा । लेकिन केजरीवाल नहीं माने । उन्होंने अपनी अलग पार्टी बना ली । उनको सत्ता प्राप्त करनी है । उनका मानना है कि उनका उद्देश्य अच्छा है । भ्रष्टाचार को समाप्त करना । अच्छे उद्देश्य के लिये सत्ता की चाह रखना बुरी बात नहीं है । लेकिन फ़िलहाल सत्ता पर सोनिया गान्धी का क़ब्ज़ा है । सोनिया गान्धी की पार्टी ने संसद में वह लोकपाल बिल पास कर दिया है , जिसके लिये कुछ दिन पहले तक अरविन्द केजरीवाल भी रामलीला मैदान में बैठा करते थे । लेकिन अब केजरीवाल के सामने दूसरी दिक्कत है । अब वे सोनिया कांग्रेस का , लोकपाल बिल पास करने के लिये आभार तो नहीं जता सकते । क्योंकि अब सोनिया कांग्रेस आम आदमी पार्टी की प्रतिद्वदी है । यदि आभार जताने के चक्कर में केजरीवाल फंस गये तो फिर चुनाव में उसको चुनौती कैसे दे सकेंगे ? न ही वे लोकपाल बिल पारित करवाने के लिये भारतीय जनता पार्टी का आभार जता सकते हैं । केजरीवाल के सामने वही समस्या भाजपा को लेकर है । अब केजरीवाल देश की राजनैतिक व्यवस्था का एक अंग हैं । अब वे व्यवस्था को बदलने की बात नहीं कर सकते , बल्कि व्यवस्था की भीतरी विसंगतियों का लाभ उठा कर सत्ता की एक और सीढ़ी चढ़ने का प्रयास करेंगे । ऐसा वे कर भी रहे हैं ।
 
लेकिन अन्ना हज़ारे की यह मजबूरी नहीं है । अन्ना को न कोई राजनैतिक दल चलाना है और न ही कहीं सांसद बनना है , न ही सत्ता के गलियारों में धमक देनी है । उनको लगता था लोकपाल बिल पारित हो जाने से व्यवस्था में घुसे भ्रष्टाचार से लडा जा सकता है । इसलिये वे लोकपाल बिल के पारित होने पर सभी का धन्यवाद कर रहे हैं । उनकी लड़ाई मुद्दों की लड़ाई है । उन के किसी मुद्दे पर कोई भी राजनैतिक दल उनके साथ खड़ा हो जाता है , तो वे उसका धन्यवाद करने में संकोच नहीं करते ।
 
अन्ना के आन्दोलन का केजरीवाल राजनैतिक लाभ उठा रहे हैं , यह देर सवेर अन्ना को भी समझ आ गया । थोड़े और सख़्त शब्दों में कहना हो तो केजरीवाल अन्ना के आन्दोलन का राजनैतिक शोषण कर रहे थे । केजरीवाल की एक दूसरी समस्या इन सभी घटनाक्रमों से पैदा हुई है , जिसका समाधान उन के लिये भी मुश्किल है । वे सोनिया कांग्रेस की आलोचना कर सकते हैं । भाजपा की आलोचना भी कर सकते हैं , लेकिन अन्ना हज़ारे की आलोचना करना उनके लिये अभी संभव नहीं है , क्योंकि कुछ दिन पहले तक तो वे अन्ना के मंचों पर ही नाच कूद रहे थे । अन्ना चुप रहते ,तब भी केजरीवाल को कोई समस्या न होती । किसी के भी मौन की पचास व्याख्याएँ की जा सकती हैं । लेकिन अन्ना तो बोल रहे हैं । वे लोकपाल बिल की प्रशंसा कर रहे हैं । केजरीवाल इस का क्या जबाव दें ? दिल्ली में सरकार बनायें या न बनायें , इसको लेकर केजरीवाल इतने संकट में नहीं हैं , जितना अन्ना को क्या जवाब दें ? ऐसा जबाव जिस से सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे । लेकिन लगता है अब उन्होंने इस का समाधान पा लिया है ।
 
केजरीवाल का कहना है कि अन्ना को लोकपाल जैसी गहरी बातों की समझ नहीं है । क्योंकि क़ानून का सारा काम अंग्रेजी में होता है और इसमें अनेक तकनीकी बातें होती हैं । अन्ना इतना कहां समझ पाते हैं । उन्हें अंग्रेजी तो आती नहीं । जब केजरीवाल अन्ना के साथ थे तो वे घंटों अपना मगज खपा कर अन्ना को ये सब गहरी बातें समझा देते थे । लेकिन अब अन्ना को समझाने वाला रालेगन सिद्धी में कोई नहीं बचा , इसलिये वे नासमझी में लोकपाल बिल के पारित होने पर तालियां बजा रहे हैं । यदि मान लिया जाये कि अन्ना इस देश की आम जनता के प्रतीक हैं और देश की आम जनता सरकारी कामकाज अंग्रेजी में होने के कारण उसके भीतर की ख़ामियों को पकड़ नहीं पाती तो इसका इलाज क्या है ? एक इलाज तो यही है कि कोई दलाल या ऐजंट ऐसा हो जो सरकार को जनता की बात और जनता को सरकार की बात बताता रहे । ऐसा पहले भी होता रहा है । इस पद्धति का सबसे बडा नुक़सान यह होता है कि इससे जनता को कोई लाभ नहीं मिल पाता , सरकार या व्यवस्था का भी बाल बाँका नहीं होता , लेकिन ऐजंट या दलाल की पौ बारह हो जाती है ।
उत्पादक और उपभोक्ता के बीच जब सीधा संवाद स्थापित हो जाता है तो सबसे ज़्यादा हल्ला बिचौलियों की ओर से ही होता है । केजरीवाल के ग़ुस्से और हैरानी का एक और कारण भी है । जब से केजरीवाल अन्ना को छोड़ कर गये हैं , तब से लेकर अब तक अन्ना की अंग्रेजी का हाल तो पूर्ववत ही है । फिर अन्ना लोकपाल बिल को समझने का दावा किस बूते पर कर रहे हैं ? इससे पहले भी देश के राजनैतिक दल देश की आम जनता की सूझबूझ पर तरस खाते रहे हैं । कई तो उसे अनपढ तक करार देते हैं । उसका कारण भी शायद उसका अंग्रेजी जानना न होगा । केजरीवाल शायद नहीं जानते कि इस देश की आम जनता की समझ अंग्रेजी जानने वालों से कहीं ज़्यादा है । इसके साथ ही अपने अधिकारों और अपने साथ हो रहे अन्याय से लड़ने के लिये उसे अंग्रेजी की नहीं बल्कि साहस की ज़रुरत है । यह साहस उसमें अंग्रेजी भाषा को दलाली की तरह प्रयोग करने वालों से कहीं ज़्यादा है । इसका परिचय इस देश की जनता ने इन्दिरा गान्धी के आपात काल में दिया भी था । उन दिनों जब आम जनता सत्याग्रह कर जेल जा रही थी तो अंग्रेजी पढ़े लोग दरबार में भांड नृत्य में मशगूल थे ।
 
यदि केजरीवाल को यह पता ही है कि सरकार अंग्रेजी की आड़ में ही इस देश के लोगों के साथ धोखा कर रही है तो वे अंग्रेजी के इस साम्राज्य के खिलाफ हल्ला क्यों नहीं बोलते ? कहा भी गया है , चोर को नहीं चोर की माँ को मारो । लेकिन केजरीवाल तो जानते बूझते हुये भी चोर की मां के खिलाफ मुँह नहीं खोल रहे । वे तो , इसके विपरीत अन्ना से कह रहे हैं कि मुझे डंडों से मार लो लेकिन मेरी बिचौलिए की भूमिका पर मत प्रहार करो । मुझे एक अवसर तो दो कि मैं आपको अंग्रेजी के इस लोकपाल का अर्थ समझा दूं । ऐजंट या दलाल की यही खूबी होती है कि वह चाहता है , लोग वही स्वीकार करें जो वह कह रहा है । जब लोग अपनी समझ से निर्णय लेने लगते हैं तो दलालों को सबसे ज़्यादा कष्ट होता है । ऐसी स्थिति में उनकी उपयोगिता समाप्त होने लगती है । दलाली के लिये ढाल चाहिये । केजरीवाल खुद मान रहे हैं कि अंग्रेजी उसी प्रकार की ढाल है । फिर केजरीवाल उस ढाल के खिलाफ मोर्चा क्यों नहीं लगाते ? उत्तर साफ है । यदि वह ढाल ही टूट गई तो केजरीवाल की भी जरुरत नहीं रहेगी , क्योंकि बकौल केजरीवाल तब अन्ना यानि देश की जानता सारे लोकपालों के अर्थ स्वयं ही समझ जायेगी । लम्बे अरसे से केजरीवालों की फ़ौज इस देश में यही खेल खेल रही है । दुर्भाग्य से जिन्होंने शुरुआत भारतीय भाषाओं से की थी , वे भी अगले मोड़ तक आते आते अंग्रेजी भाषा के दलदल में फँस गये । यदि कोई अन्ना बिना अंग्रेजी जाने भी देश को समझने का दावा करता हो तो केजरीवालों की यह फ़ौज तमाम काम छोड़ कर अन्ना पर टूट पड़ती है ।
 
डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

दो कौड़ी की फिल्में भी सौ करोड़ क्लब में …!!

जमाने के हिसाब से कह सकते हैं कि अमर शहीद खुदीराम बोस व भगत सिंह यदि आज होते , तो हमारे राजनीतिज्ञ उनकी शहादत को भी विवादों व सवालों के घेरे में ला सकते थे. उसी तरह गुजरे जमाने की तमाम घटिया फिल्में यदि आज रिलीज हुई होती, तो आज के  प्रचार माध्यम अपने कारनामों से उन्हें कथित सौ करोड़ क्लब में जरूर शामिल करा देते.
बस जरूरत उन्हें फिल्म को सुपर – डुपर हिट कराने की सुपारी देने की थी. मीडिया खास कर चैनल्स आज जिस बेहयाई से घटिया फिल्मों को भी तथाकथित सौ करोड़ क्लब में शामिल कराने का ठेका ले रहा है. उसे दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जा सकता है. नई रिलीज होने वाली फिल्मों की समीक्षा पत्र – पत्रिकाओं में पहले भी हुआ करती थी. इसका एक खास पाठक वर्ग हुआ करता था. 
समीक्षा में आलोचक रिलीज होने वाली फिल्मों की कमियों व खासियतों की चर्चा किया करते थे. लेकिन अपनी पसंद – नापसंद दर्शकों पर थोपने की कोशिश बिल्कुल नहीं होती थी. 90 के दशक में चैनलों का प्रसार बढ़ने पर फिल्मों की समीक्षा नए अंदाज में शुरू हुई, लेकिन यहां भी समीक्षक रिलीज होने वाली फिल्म के मजबूत और कमजोर पक्ष व अभिनेताओं के अभिनय की चर्चा मात्र ही करते थे.
 
लेकिन पिछले एक दशक में चैनलों ने जैसे किसी फिल्म को जबरदस्ती हिट कराने का ठेका ही लेना शुरू कर दिया है. दो कौड़ी की फुटपथिया फिल्मों की भी इस प्रकार आक्रामक मार्केटिंग की जा रही है, कि मानो दर्शकों को संदेश दिया जा रहा हो कि तुमने यदि यह फिल्म नहीं देखी, तो तुम्हारा जीवन व्यर्थ गया समझो. अपने इस धंधे को चमकाने के लिए चैनलों ने सौ करोड़  क्लब का फंडा चला रखा है.
 
फिल्म रिलीज हुई नहीं कि बंपर कमाई , सारे रिकार्ड तोड़े के जुमले के साथ रिलीज होने वाले दिन ही उसे सौ करोड़ फिल्म में शामिल करा दिया जाता है. किसी फिल्म के रिलीज वाले दिन ही कोई फिल्म सफलता के सारे रिकार्ड कैसे तोड़ सकती है, यह मेरी समझ में आज तक नहीं आया. बेशक नई रिलीज होने वाली फिल्म की चर्चा करने में कोई बुराई नहीं है. यदि इसके प्रचार के एवज में किसी माध्यम को विज्ञापन मिलता है, तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है. लेकिन फिल्म व इसके स्टार और निर्माता – निर्देशकों का भोंपू बन जाना, रात – दिन बगैर प्रसंग के फिल्म की बार – बार चर्चा करना और फिल्म के स्टार्स का स्टूडिया में बैठा कर घंटों इंटरव्यू लेना  तो दर्शकों पर फिल्म को थोपने जैसा ही है. कौन सी फिल्म अच्छी है और कौन नहीं, यह दर्शक बेहतर जानते हैं.
 
80 के दशक में राजश्री की नदिया के पार बगैर किसी शोर – शराबे के सुपर हिट हुई थी. क्योंकि दर्शकों ने उसे पसंद किया था. लेकिन आज उल्टी बयार बह रही है. यह किसी एक चैनल का नहीं बल्कि सारे चैनलों का हाल है. कल तक यही लोग कथित बाबाओं का भी इसी प्रकार प्रचार किया करते थे. बाबा लोग फंसने लगे तो उनकी बखिया उधेड़ने में जुट गए.  अभी कुछ दिन पहले ही चैनलों पर आमिर खान की धूम थ्री का आक्रामक प्रचार चैनलों पर देख रहा था. रिलीज वाले दिन तो एक चैनल ने हद ही कर दी, उसके एंकर ने उस दिन को ही धूम डे घोषित कर दिया. यही नहीं रिलीज वाले दिन ही फिल्म की जबरदस्त रिकार्ड तोड़ सफलता का ढिंढोरा पीटते हुए उसे सुपर हिट करार दे दिया गया.
इस बेशर्मी पर सिर ही पीटा जा सकता है. कह सकते हैं- ऐसी बेशर्मी देखी नहीं कहीं.
 
लेखक- तारकेश कुमार ओझा
      09434453934

बाबूलाल नागा को लाडली मीडिया अवार्ड

जयपुर।। विविधा महिला आलेखन एवं संदर्भ केंद्र से जुड़े व विविधा फीचर्स के संपादक बाबूलाल नागा को वर्ष 2012-2013 के लिए लाडली मीडिया अवार्ड से नवाजा गया है। यह पुरस्कार उन्हें लैंगिग संवदेनशीलता पर लिखी गई बेस्ट फीचर श्रेणी में मिला है. यह फीचर पंचायतीराज व्यवस्था में औरतों की बढ़ती भागीदारी पर लिखी गई थी.
 
20 दिसंबर की रात नई दिल्ली के चिन्मया मिशन ओडिटोरियम में आयोजित ‘‘लाडली मीडिया एंड एडवरटाइजिंग अवॉर्ड्स फॉर जेंडर सेंसिटिविटी 2012-13’’ कार्यक्रम में पॉपुलेशन फर्स्ट और यूएनएफपीए की ओर यह अवार्ड दिया गया।.समारोह की मुख्य अतिथि योजना आयोग की सचिव सिंधुश्री खुल्लर, लोकसभा चैनल के सीईओ राजीव मिश्रा थे.
पॉपुलेशन फर्स्ट की ओर से मार्च 2007 में मुंबई में शुरू किए गए इस अवार्ड का मकसद देश में लैंगिग तौर पर संवेदनशील रिपोर्टिंग एवं विज्ञापन निर्माण को बढ़ावा देना है. इस बार राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, छत्तीसगढ़ के 50 मीडियाकर्मियों को यह अवार्ड दिया गया है. अवार्ड के लिए देशभर से 1700 आवेदन प्राप्त हुए थे.
 
बाबूलाल नागा जयपुर जिले के जोबनेर कस्बे के निवासी हैं. पिछले दस वर्षों से वे पत्रकारिता क्षेत्र से जुड़े हैं. वर्ष 2008 में उन्हें ‘राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना की सार्थकता’ विषय के लिए ग्राम गदर ग्रामीण पत्रकारिता पुरस्कार व वर्ष 2011 में ग्रामीण पत्रकारिता को बढ़ावा देने व ग्रामीण मुद्दों पर बेहतरीन लेखन के लिए ग्राम बजट सम्मान से सम्मानित किया जा चुका है.

लखनऊ : हिंदी दैनिक अवध प्रान्त समाचार पत्र का प्रकाशन बंद

लखनऊ।। लखनऊ से हिंदी दैनिक अवध प्रान्त समाचार पत्र का प्रकाशन बंद कर दिया गया है. वहीं पिछले दो माह से वेतन न मिलने के कारण कर्मचारियों में रोष व्याप्त है। जिसको लेकर 19 दिसंबर को समाचार पत्र के कर्मचारियों और प्रधान संपादक (मालिक) जनमेजय खरवार के बीच गर्मा-गर्मी हो गयी और बात गालीगलौज तक पहुंच गयी.
 
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार पहले भी वेतन को लेकर कर्मचारियों ने कार्यालय का घेराव किया था. जिसके बाद सभी को एक माह का वेतन देकर शांत करा दिया गया था. परन्तु उसके बाद दो माह हो जाने के बाद भी वेतन न मिलने पर कर्मचारियों ने अपना आक्रोश व्यक्त किया.  जिस पर जनमेजय खरवार द्वारा गलियां और देख लेने कि धमकी दी गई. मामला गर्माता देखकर कर्मचारियों ने पुलिस से मदद की  उम्मीद में कई बार 100 नंबर डायल किया लेकिन उन्हें मायूस होना पड़ा.
जनमेजय खरवार द्वारा कार्यालय का  किराया और समाचार पत्र कि प्रिंटिंग का पैसा भी अभी तक नहीं दिया गया. जिसके
चलते अखबार का प्रकाशन बंद हो गया है.
खबर है कि खरवार कि अन्य रियल स्टेट कंपनी राज हाईटेक से नुकसान के चलते ही ऐसा हो रहा है. जनमेजय खरवार से
इस बाबत कई बार संपर्क करने का प्रयास किया गया परन्तु उनके सारे मोबाईल बंद मिले.
शैलेश पाण्डेय
09889635777

पत्रकार बनकर छुपा था आतंकी कुरैशी, वाराणसी मंदिर में विस्फोट करने में था हाथ

पानीपत।। वाराणसी के मंदिर में बस विस्फोट का आरोपी 38 वर्षीय डॉ. इफ्तिखार कुरैशी खटीक बस्ती के इमाम मोहल्ले में तीसरी मंजिल पर छोटे से कमरे में रहता था. कुरैशी की गिरफ्तारी के बाद भास्कर टीम उसके घर पहुंची. उसने बताया कि वो खाने के लिए मामा के होटल पर जाता था. कुरैशी बहुत ही सीमित पत्रकारिता करता था.
 
उसने अपने आपको कभी भी पत्रकार के तौर पर स्थापित करने की कोशिश नहीं की. पिछले पांच सालों से उर्दू समाचार से जुड़ने के बावजूद कुरैशी को शहर के कुछ ही लोग जानते थे. वह शहर के किसी भी बड़े कार्यक्रम, प्रेसवार्ता व बड़ी वारदातों को कवर करने नहीं जाता था. वह केवल अपने पुराने लक्ष्य की ओर बढ़ रहा था.
 
इफ्तिखार कुरैशी के बारे में मोहल्ले वालों को ये जानकारी है कि वह एक पत्रकार है, लेकिन किसी को यह जानकारी बिल्कुल नहीं थी कि वह कहां का रहने वाला था. उसने अपनी छवि सीधे और कम मिलने वाले व्यक्ति के रूप में बनाई.
 
यूपी में अपने परिवार से संपर्क किया, मां-बाप से मिलने पर हो पाया ट्रेस
 
चार-पांच साल तक कुरैशी ने किसी से कोई संपर्क नहीं साधा. इस बीच वह कहां रहा, परिवार वालों को पता नहीं था. करीब दो-तीन सालों से कुरैशी परिवार वालों के संपर्क में आया था. धीरे-धीरे उसके बूढ़े मां-बाप यूपी के गांव टांडा से उससे मिलने आने लगे. पुलिस को जब इसकी खबर लगी तो पूरी तैयारी के बाद गुरुवार रात करीब 10 बजे कुरैशी को गिरफ्तार कर लिया. उसके मकान मालिक पत्थरगढ़ निवासी आरीफ ने बताया कि कुरैशी ने गिरफ्तारी के बाद मां को 10,800 रुपए देने के लिए दिए थे.
 
2006 के बनारस बम ब्लास्ट में शामिल था कुरैशी, 28 से ज्यादा की गई थी जान
 
1 मार्च, 2006 को बनारस के संकटमोचन हनुमान मंदिर व कैंट रेलवे स्टेशन पर बम ब्लास्ट हुए थे. दोनों ब्लास्ट कुछ मिनटों के फासले पर हुए थे. पहला ब्लास्ट मंदिर पर शाम को 6:20 बजे आरती के दौरान हुआ था. इस ब्लास्ट में 28 से ज्यादा लोगों की जान गई थी, जबकि 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे. वहीं शहर में छह से ज्यादा स्थानों पर बम डिसमिस किया गए थे. इन बम ब्लास्ट में भी इफ्तिखार कुरैशी के भी शामिल होने का आरोप है. कुरैशी ने अभी शादी नहीं की है.
 
टेक्नॉलोजी का जानकार, देर रात तक कंप्यूटर पर करता था काम
 
कुरैशी के पास अपना कंप्यूटर सिस्टम था. इस सिस्टम में डोंगल का प्रयोग करके वह इंटरनेट का इस्तेमाल करता था. कुरैशी के मकान की पुरानी मालकिन ने बताया कि वह देर रात तक कंप्यूटर पर काम करता था. उससे मिलने के लिए काफी लोग अकसर उसके कमरे पर आते थे. पुलिस टीम को हार्ड डिस्क से उसके पुराने साथियों से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है.
 
अरबी, उर्दू, अंग्रेजी और हिंदी का अच्छा जानकार, पत्रकारिता का भी डिप्लोमा
 
कुरैशी को चार भाषाएं अच्छे से आती हैं. वह उर्दू में डिप्लोमा की डिग्री तथा फैजल में अरबी की डिग्री ले चुका है. 15 नवंबर, 1985 को जन्मे कुरैशी ने पत्रकारिता का डिप्लोमा किया है. वह कंप्यूटर व बिजनेस अकाउंटिग का जानकार है. पत्रकारिता का डिप्लोमा डिग्री लेने के साथ, पांच साल के लंबे अनुभव के बाद भी उसने पानीपत के किसी भी बड़े समाचार पत्र में जाने का प्रयास नहीं किया.
साभार : दैनिक भास्कर

आज समाज ने मनाई चौथी वर्षगांठ

अंबाला सिटी।। ‘आज समाज’ के चंडीगढ़ संस्करण की चौथी वर्षगांठ शुक्रवार को सादोपुर स्थित अंबाला के कार्यालय में धूमधाम से मनाई गई. इस अवसर पर संपादक अजय शुक्ल और सीनियर वाइस प्रेसीडेंट संजय सिंघल ने केक काटकर स्टाफ के सभी सदस्यों को बधाई दी गयी.
इस दौरान लोगों को संबोधित करते हुए संपादक अजय शुक्ल ने कहा कि स्टाफ के सभी सदस्यों की मेहनत की वजह से आज अखबार बुलंदियों को छू रहा है. आज समाज ने अपने चार वर्ष के कार्यकाल में समाज की सभी समस्याओं को प्रमुखता से उजागर किया है. 
अजय शुक्ल ने कहा कि आज समाज की उम्दा टीम की बदौलत ही हम लोगों का विश्वास जीत पाएं हैं. हमने बगैर किसी राग द्वेष के निष्पक्षता से सच को सामने लाने की कोशिश की है. प्रयास किया कि जनता की बात को समझा जाए और उनकी अपेक्षाओं के अनुकूल अखबार बनाया जाए. हमारी सोच रही है कि अखबार सिर्फ कहने के लिए नहीं, सही मायने में जनता का अपना अखबार होना चाहिए.
 

अजय रावत और भुवनेश को लाडली मीडिया अवार्ड

नई दिल्ली ।। राजस्थान पत्रिका भीलवाड़ा संस्करण के रिपोर्टर अजय रावत एवं भुवनेश पण्ड्या को वर्ष 2012-13 के लिए उत्तर क्षेत्र हिन्दी प्रिन्ट मीडिया बेस्ट कैंपेन का लाडली मीडिया अवार्ड से नवाजा गया. 
 
कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए जागरूकता के परिप्रेक्ष्य में दिया जाने वाला यह अवार्ड पॉपुलेशन फर्स्ट एवं यूएनएफपीए की ओर से शुक्रवार रात नई दिल्ली के चिन्मया मिशन ऑडिटोरियम में आयोजित लाडली मीडिया एण्ड एडवरटाइजिंग अवार्ड फॉर जेन्डर सेंसटिवटी 2012-13 समारोह में प्रदान किया गया.
इस समारोह के मुख्य अतिथि योजना आयोग की सचिव सिंधुश्री खुल्लर एवं लोकसभा टीवी के सीईओ राजीव मिश्रा थे. इस अवसर पर यूएनएफपीए की कंट्री हैड फ्रेडरिका मेजर एवं पॉपुलेशन फर्स्ट के निदेशक एएल शारदा समेत कई लोग मौजूद रहे.
नॉर्थ एवं वेस्ट जोन के लिए 50 वर्ग में पुरस्कार के लिए 1315 प्रविष्ठियां प्राप्त हुई थी. रावत एवं पण्ड्या की समाचार श्रंखला "बिटिया बचाओ" को श्रेष्ठ शोधपरक अभियान के रूप में भी माना गया. राजस्थान पत्रिका के भीलवाड़ा संस्करण में यह समाचार अभियान मई-जून 2012 में चलाया गया था. इसमें प्रकाशित समाचारों के माध्यम से समाज में कन्या भ्रूणहत्या के कारण गड़बड़ाते लिंगानुपात से उत्पन्न हालात को उजागर किया गया था.
 
अभियान से प्रेरित होकर भीलवाड़ा जिले के सैकड़ों विद्यार्थियों, महिला एवं स्वयंसेवी संगठनों ने कन्या भ्रूणहत्या रोकने एवं जागरूकता का संकल्प लिया था.

वरिष्ठ पत्रकार उत्कर्ष सिन्हा के पिता का निधन

गोरखपुर।। लखनउ के वरिष्ठ पत्रकार उत्कर्ष सिन्हा के पिता श्री राजेंद्र प्रसाद जी का आज हार्टअटैक की वजह से देहान्त हो गया. वे 80 वर्ष के थे.  स्व.राजेंद्र प्रसाद सरकारी सेवा से रिटायर्ड थे और गोरखपुर में उतकर्ष सिन्हा के बड़े भाई कुमार हर्ष के साथ रहते थे. उनका अंतिम संस्कार कल सुबह 9:30 बजे गोरखपुर में किया जाएगा.

बिड़ला जी का हिण्डाल्को और शोषण की अनकही दास्तां

हिंदुस्तान में रईसी को लेकर अक्सर एक जुमला कसा जाता है – टाटा-बिरला बन गए हो क्या ? यानि ये नाम रईसी के प्रतीक हैं ! पर रईस बनने के कई तरीके हैं ! शोषण-प्रथा , सम्भवतः, सबसे पुरानी है ! एशिया की सबसे बड़ी एल्युमिनियम की फैक्टरी "हिण्डाल्को" भी आज कल इसी तरीके से फल-फूल रही है.
 
4 राज्यों की सीमा को छूते, उत्तर-प्रदेश के सोनभद्र जिले के रेणुकूट में 1962 में स्थापित ये फैक्टरी इस क्षेत्र में, जवाहर लाल नेहरू के आग्रह पर, इसलिए लगाई गई , ताकि आदिवासी बहुल इस इलाके का विकास हो. लेकिन आज नजारा कुछ और ही है. ये क्षेत्र उत्तर-प्रदेश ही नहीं बल्कि देश के बदहाल इलाकों में से एक माना जाता है. मगर इस फैक्ट्री के मालिकान और अफसर बड़ी तेजी से अमीर-दर-अमीर होते गए. ये क्षेत्र उघोग-धंधों से पटा पड़ा है. कुमार-मंगलम बिरला की छवि , इस क्षेत्र में, एक महाराजा सरीखी है. ऐसा लगता है , मानो दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में आज भी कुछ महाराजा अपनी रियासतों के साथ अस्तित्व में बने हुए हैं. बिरला और रेणुकूट की कहानी भी कुछ इसी तर्र पर है. 
 
यहां की हिण्डाल्को फैक्ट्री के करता-धर्ता, "महाराजा" बिरला के मंत्री-संतरी की तरह काम करते हैं. कर्मचारी हितों की बलि लेकर अपने आका के लिए मुनाफा तैयार करते हैं. आधुनिकीकरण के नाम पर इस फैक्ट्री में स्थाई कर्मचारियों की संख्या तेज़ी से घटी है. अस्थाई प्रचलन जोरों पर है. "समान कार्य-समान वेतन" की मांग को यहां का प्रबंधन बकवास मानता है.
 
स्थानीय निवासियों और श्रमिकों के मुताबिक यहां की मैनेजमेंट ने "इंटक" , "राष्ट्रीय श्रमिक संघ" और "बी.एम.एस." नाम के मज़दूर-संगठनों के नेताओं को अपना पिट्ठू बना रखा है. हद तो ये है कि एक प्रभावशाली मजदूर नेता एक किशोर के साथ जबरदस्ती समलैंगिक संबंध बनाने के आरोप में जेल की हवा खा कर बाहर आया है , मगर हिण्डाल्को की मैनेजमेंट की आंखों का तारा है. ये वही मैनेजमेंट है जो अपने श्रमिकों को किसी भी आधार पर एक झटके में निकाल देती है. इनमें नैतिक उल्लंघन को बड़ी सख्ती से लागू किया जाता है, मगर एक किशोर के साथ ज़बरदस्ती समलैंगिक सम्बन्ध बनाने वाला ७२ साल की उम्र में भी हिण्डाल्को का प्रिय-पात्र  बना हुआ  है. 
 
सूत्रों के मुताबिक हिण्डाल्को का एच.आर. विभाग बड़ा शातिर है. समलैंगिक संबंधों के आरोपी मजदूर नेता (जिनकी सेक्स सी.डी. बहुत सारे स्थानीय निवासियों के पास मौजूद है) और हिण्डाल्को के एच.आर. विभाग  में अच्छी सांठ-गांठ है. कारण है कि ये नेता और हिण्डाल्को का एच.आर. विभाग मिलकर श्रमिकों का हाल तय करते हैं. बताने की ज़रुरत नहीं कि हाल बड़ा बे-हाल है और तो और जहां अन्य कर्मचारियों को ५८ साल की उम्र में रिटायर कार दिया जाता है , वहीं सेक्स सी.डी. वाले तथा-कथित मज़दूर नेताजी को ७२ साल में भी फैक्ट्री के करता-धरता, "काम वाला" मान कर रखे हुए हैं पाल-पोस रहे हैं .
 
इस एल्युमिनियम फैक्ट्री में कई काम बड़े रिस्क वाले होते हैं , मगर दुर्घटना के समय मिलने वाली राशि, हताशा और आक्रोश को जन्म दे रही है. इस फैक्ट्री के मालिक (महाराजा) कुमार-मंगलम बिरला तक ये सारी बात पहुंच रही है या नहीं , इस बात को यकीन के साथ कोई नहीं कह सकता पर मालिकान तक शोषण की दास्तां न पहुंचती हो , ये बात बहुतों को पचती नहीं. कहा जाता है कि काम करते वक्त मजदूरों के साथ अनहोनी की बात को इतनी सफाई के साथ दबा दिया जाता है कि भनक तक नहीं लगती. जिसे भनक लग जाती है उसे "खरीद" लिया जाता है. स्थानीय प्रशासन का हाल ये है कि बिरला की जूती उनका सर . श्रमिक नेता फैक्ट्री में ही ठेका लेकर करोड़ो के वारे-नारे कर मस्त हैं. देश में असंतोष और असमानता पैदा करने वाला आउट सोर्सिंग सिस्टम रोज़गार देने के नाम पर स्थाई कर्मचारियों की संख्या घटा रहा है.
 
हिण्डालको में इस सिस्टम का अब बोल-बाला हो रहा है. आदित्य बिरला ग्रुप की इस सबसे बड़ी फैक्ट्री को अल्युनिनियम जगत की शान कहा जाता है, चांद कहा जाता है पर इस चांद में कई बदनुमा दाग लग रहे हैं. दुःख की बात तो ये है कि स्वर्गीय आदित्य बिरला के होनहार पुत्र , कुमार मंगलम बिरला, इधर साल में एक बार झांकने भी नहीं आते. उनके मंत्री-संतरी उन्हें मुनाफे अंक-गणित समझा देते हैं. उघोग पतियों की हालत इस कदर हो चुकी है कि उन्हें भारी मुनाफा हर कीमत पर चाहिए. मानवीय संवेदनाओं के साथ कम मुनाफा जैसा गुण इन्हें विरासत में कहीं-कहीं ही मिलता है और हिण्डालको की मौजूदा हालत ये बताती है या तो कुमार मंगलम बिरला इस बात से बे-खबर हैं या फिर स्थाई कर्मचारियों की संख्या घटा कर और शोषण की राह पर चलते हुए जान-बूझते भी चुप्पी साधे हैं.
 
हिंदुस्तान जैसे गरीब मुल्क में अमीरों की की संख्या तो तेजी से बढ़ी है , लेकिन उस से भी तेज रफ्तार से उघोग पतियों की तिजोरी. रेणुकूट का हिण्डाल्को प्लांट इस बात की गवाही देने के लिए काफी है कि … शोषण का बुनियादी  सिध्दांत अमीरी की बुनियाद तैयार करता  है. भारी मुनाफा, नैतिक और मानवीय सिध्दांतों को लात मारता है और तभी अमीर और अमीर बनने की राह पर चल पड़ता है. कुमार मंगलम बिरला पुश्तैनी रईस हैं. संभवतः भारतीय लोकतंत्र के राजा-महराजाओं में से एक, जिनके अपने कानून होते हैं और अपना संविधान. इन निजी कानूनों को चुनौती देने का मतलब है भुखमरी से लबरेज मौत से भी बदतर जिंदगी. एशिया की सबसे बड़ी एल्युमिनियम फैक्ट्री का बदलता मिजाज इस बात की गवाही देने के लिए आप को आमंत्रित करता है. स्वागत करता है , शोषण की अनकही दास्तां को सुनाने के लिए.          
 
लेखक – नीरज वर्मा
 

संजय दत्त फिर पैरोल पर रिहा, मीडिया को पैरोल की किताब पढ़ने की दी नसीहत

मंबई।। इन दिनों मुंबई सीरियल ब्लास्ट केस में जेल की हवा खा रहे बॉलिवुड ऐक्टर संजय दत्त पिछले तीन महीने में दूसरी बार एक महीने के लिए शनिवार को पैरोल पर बाहर आ गए हैं. यरावड़ा जेल से बाहर आने के बाद संजय दत्त उनके मामले को तूल देने को लेकर मीडिया पर खासे भड़के हुए नजर आए. इस दौरान संजय दत्त ने मीडिया से कहा कि उन्हें पैरोल देने में कोई फेवर नहीं किया गया है.
 
संजय दत्त इतने गुस्से में थे कि उन्होंने मीडिया को नसीहत दे डाली और कहा कि मीडिया को पहले पैरोल की किताब को पढ़ लेना चाहिए. उन्होंने कहा हर रोज कई लोग परोल पर छूटते हैं, लेकिन उनकी रिहाई को मुद्दा बना दिया गया है. उनसे साथ दूसरे अपराधियों की तरह ही बर्ताव किया गया है.
उन्होंने कहा, 'मेरे परिवार में कैंसर का बैकग्राउंड रहा है. उनकी मां को भी कैंसर था. मेरी पत्नी के लिवर में ट्यूमर का पता चला है. मेरी आप सभी से विनती है कि आप मेरी पत्नी के लिए दुआ करें.'

पत्रकारों के लिए दूसरा सबसे खतरनाक देश है भारत

नई दिल्ली।। इस वर्ष भारत पत्रकारों की सुरक्षा के मामले में सीरिया के बाद दुनिया के दूसरे सबसे खतरनाक देश में रहा है. ब्रिटेन स्थित संस्था इंटरनेशनल न्यूज सेफ्टी इंस्टीट्यूट द्वारा लंदन में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में इस वर्ष 12 पत्रकारों सहित कुल 13 मीडिया कर्मी मारे गए हैं. इनमें से सात की हत्या की गई दो पत्रकार उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर दंगों की कवरेज करते हुए मारे गए और चार की मौत काम के दौरान हुई दुर्घटनाओं में हुई.

इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2013 में विश्व के 29 देशों में कुल 126 मीडियाकर्मी मारे गए हैं. यह संख्या पिछले साल के मुकाबले 17 प्रतिशत कम है. इसमें सबसे ज्यादा 19 पत्रकार सीरिया में जारी गृहयुद्ध की खबर कवर करते हुए मारे गए हैं. पिछले साल सीरिया में 28 मीडियाकर्मी मारे गए थे, लेकिन इस साल सीरिया में स्थानीय और विदेशी मीडियाकर्मियों के अपहरण की घटनाएं पिछले साल के मुकाबले बढ़ गई हैं.
 
वहीं पिछले साल की तरह इस साल भी पाकिस्तान इस मामले में पहले पांच की सूची में शामिल है. वहां इस साल 9 पत्रकार मारे गए हैं और वह पत्रकारों के लिए पांचवां सबसे खतरनाक देश रहा. पाकिस्तान के बारे में कहा गया है कि वहां पत्रकारों के लिए सबसे बड़ा खतरा यह है कि जब वह विस्फोट के बाद घटना स्थल पर पहुंचते हैं तो उसी जगह एक और विस्फोट की चपेट में उनके आने की आशंका होती है. इस सूची में फिलिपींस को तीसरे स्थान पर रखा गया है.
 
वहां भी 12 पत्रकार तथा एक अन्य मीडियाकर्मी मारे गए. 11 पत्रकारों की मौत के साथ इराक चौथे स्थान पर है. क्रमश: आठ, छह तथा छह पत्रकारों की मौत के साथ सोमालिया, मिस्र और ब्राजील छठे सातवें और आठवें स्थान पर हैं. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत में हुई पत्रकारों की हत्या के किसी भी मामले में अबतक पूरी जांच भी नहीं हो पाई है और न ही किसी को सजा हुई है.

बीईए के पदाधिकारियों का हुआ पुनर्गठन, पत्रकारों को राष्ट्रव्यापी बीमा कवरेज देने का लिया संकल्प

नई दिल्ली।। ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) ने सर्वसम्मति से आज नई दिल्ली में आयोजित एक वार्षिक आम बैठक में पदाधिकारियों का चयन किया जिसमें शाजी जमान ( एबीपी न्यूज ) को प्रेसिडेंट, एन.के. सिंह (लाइव इंडिया) को महासचिव के रूप में फिर से निर्वाचित किया गया. अरनब गोस्वामी ( टाइम्स नाउ ) उपाध्यक्ष चुने गए तो वहीं दीपक चौरसिया ( इंडिया न्यूज) उपाध्यक्ष और सुप्रिय प्रसाद (आजतक) बीईए का कोषाध्यक्ष बनाया गया.
 
इसी के साथ बीईए की इस बैठक में मीडिया के श्रमजीवी पत्रकारों के लिए एक राष्ट्रव्यापी बीमा कवरेज देने के लिए भी संकल्प लिया गया और टेलीविजन में गुणवत्ता पत्रकारिता को प्रोत्साहित करने के लिए बीईए वार्षिक पुरस्कार संस्थान गठन करने का भी निर्णय लिया गया.
बीईए की ओर से जारी प्रेस रिलीज हूबहु इस प्रकार है-
 
BEA elects office bearers, resolves to push for a nationwide insurance for electronic media working journalists
 
New Delhi, December 21, 2013
 
The Broadcast Editors' Association (BEA) unanimously elected it's office bearers at an AGM held in New Delhi today. Shazi Zaman (ABP News) was re-elected the President of the body and NK Singh (Live India) as the General Secretary. Arnab Goswami (Times Now) was re-elected the Vice President. Deepak Chaurasia (India News) will be Vice President and Supriya Prasad (Aajtak) treasurer of BEA.
 
A 15 member Executive Committee of the BEA has been constituted comprising Shazi Zaman(ABP News), NK Singh (Live India), Arnab Goswami (Times Now), Deepak Chaurasia (India News), Ashutosh (IBN 7),  Sonia Singh (NDTV ), Ajit Anjum (News 24), Vinay Tewari (CNN-IBN), QW Naqwi (India TV), Shailesh Kumar (News Nation), Supriya Prasad (Aajtak), Vinod Kapri (News Express), Dibang (Senior journalist), Satish K Singh (Senior Journalist ), Pranjal Sharma (Senior Journalist).
 
The BEA also constituted a credentials committee for inducting new members comprising Shailesh Kumar (News Nation), Sanjeev Paliwal (IBN 7) and Supriya Prasad (Aajtak).
 
The BEA AGM also resolved to push for a nationwide insurance coverage for working journalists of electronic media. It was also decided that in order to encourage quality journalism in television BEA would institute annual awards.
 
Shazi Zaman                                                                                                               NK Singh
President                                                                                                            General Secretary
www.beaindia.org
 
Broadcast Editors’ Association is the apex body of Editors of National & Regional TV News channels of India 

 

सिंगरौली पुलिस गोलीकांड मामले में पीड़ितों से मिला एकता मंच प्रतिनिधि मंडल

सिंगरौली।। सिंगरौली क्षेत्र में बीते 13 दिसंबर को घटित पुलिस गोलीकांड मामले में आदिवासी, सान,विस्थापित एकता मंच की तरफ से एक प्रतिनिधि मंडल मृतकों के परिजनों से मिला. इस दौरान प्रतिनिधि मंडल से शिकायत करते हुए परिजनों ने यह आरोप लगाया कि उच्च न्यायालय के सेवा निवृत्त न्यायाधिश आर.पी त्रिपाठी के नेतृत्व में कराई जा रही जांच मात्र एक छलावा है और ऐसा सिर्फ गुनाहगार पुलिस कर्मिर्यों को बचाने के प्रयास में किया जा रहा हैं. 
परिजनों ने पूरी घटना की सीबीआई से जांच कराने की मांग दुहराई व कहा कि इलाके की जनता इससे कम कुछ भी स्वीकार नही करेगी. पीड़ित परिवारों से मुलाकात करने गये प्रतिनिधि मंडल से मृतक अखिलेश साह, उम्र 27 वर्ष, के पिता भरतलाल शाह ने कहा कि अखिलेश की मौत पुलिस अभिरक्षा में हुई है और इसके तमाम प्रमाण मौजूद हैं. उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि 5 दिसंबर 2013 को पूलिस की एक टीम ने अमझर स्थित उनके एक रिश्तेदार के आवास से अखिलेश को उठाया था. 6 तारिख को इस बात की तस्दीक जिला एस.पी ने भी फोन पर की थी जब शाम 7 बजकर 47 मिनट पर मोबाइल नंबर 09826861168 से उन्होनें अपने सहयोगी श्री मनराखन साहू की मौजुदगी में एस.पी के मोबाइल फोन पर कॉल किया था. उन्होने मांग की कि एस.पी. के कॉल डीटेल निकलवाने पर इस बात को प्रमाणित भी किया जा सकता है.
श्री भरतलाल ने यह दावा किया कि उनके बेटे की पूलिस अभिरक्षा में हुई मौत दरअसल जिले में डीजल और कबाड़ के अवैध कारोबार में पुलिस की संलिप्तता व हिस्सेदारी को छिपाने का प्रयास है. इस संदर्भ में मृतक का ममेरा भाई विजय शाह का एक बयान आई.जी के कार्यालय में पंजीबद्ध किया जा चुका है.
 
उन्होनें बताया कि आरंभ में पुलिस विजय को ही खोजने अमझर स्थित आवास पर गई थी जहां विजय के न मिलने पर रिश्तेदारी में आये हुए अखिलेश को उठा लिया. अगले दिन 6 दिसंबर की शाम जब एस.पी से भरतलाल ने फोन पर पुलिस द्वारा अपने बेटे अखिलेश के उठाये जाने संबंधी जानकारी लेनी चाही तो एस.पी ने आश्वस्त किया कि अखिलेश फिलहाल पुलिस के पास है और उसे सुरक्षित घर पहुंचा दिया जायेगा. किन्तु 7 दिसंबर को एस.पी अपनी बात से मुकर गये और भरतलाल व अन्य लोगों ने पुरा ब्योरा देते हुए बैढन थाने में पुलिस द्वारा अखिलेश के अपहरण की रिपोर्ट लिखानी चाही तो थानेदार एस.एस राजपूत ने रिपोर्ट लिखने से इंकार कर दिया. बाद में उसने परिजनों पर दबाव बनाते हुए सामान्य गुमशुदगी सम्बंधी एक आवेदन लिखवाकर ही मामला पंजीबद्ध किया और आश्वस्त किया कि शाम तक अखिलेश को घर पहुंचा दिया जायेगा. जब अगले दिन 8 दिसंबर को भी अखिलेश की घर वापसी नही हुई तो परिजनों ने रजिस्ट्री के मार्फत बैढन थाना, एस.पी,कलेक्टर, आई.जी, मुख्य सजिव राज्य सरकार, डी.जी.पी व मुख्यमंत्री कार्यालय को विस्तृत शिकायत भेजी. इस बीच एस.पी जयदेवन ने परिजनो में भय पैदा करते हुए विजय शाह के छोटे भाई संजय शाह को हिरासत में ले लिया और उसे जमकर मारा पीटा गया.
फिलहाल संजय पुलिस की अभिरक्षा में बनारस के एक अस्पताल में भर्ती है और जिंदगी और मौत की लड़ाई लड़ रहा है. ज्ञात हो कि जिस विजय साह को खोजने के दौरान अखिलेश व संजय को अवैध हिरासत में लिया गया उसी विजय साह ने आई.जी रीवा के समक्ष ये बयान दिया कि सिंगरौली एस.पी के द्वारा डीजल चोरी में होने वाली आमदनी में अपना हिस्सा लेने के लिए उसे व उसके परिवार को प्रताडित किया जा रहा है. अखिलेश की मौत का जवाब मांगने पहॅुचे स्थानीयजनो पर पुलिस फायरिंग के फलस्वरूप मारे गये नकीब उम्र 22 वर्ष के पिता लतीफ उर्फ छोटे ने मंच के प्रतिनिधी मंडल को बताया कि गोली मारने के पश्चात नकीब को पुलिस ने अस्पताल तक नही जाने दिया. अस्पताल ले जाने के प्रयास में लगे नकीब के मामा शमीम खान एवं उन्हे बेरहमी से पीटा गया. शमीम खान आज भी घायल अवस्था में हैं व चलने में असमर्थ हैं. नकीब के परिजनों ने यह मांग की कि पूरी घटना की सी.बी.आई जांच हो तथा एस.पी जयदेवन ए व थानाध्यक्ष एस.एस राजपूत समेत मौके पर मौजूद सभी प्रशासनिक-पुलिस अधिकारियों पर इरादतन हत्या और दंगा कराने का मुकदमा कायम किया जाये. शमीम खान ने यह मांग की कि घटना के तत्काल बाद से जारी क्षेत्र के युवाओं का पुलिस उत्पीड़न रोका जाये तथा फर्जी मुकदमों में न फसाया जाये.
स्थानीय जनता ने प्रतिनिधि मंडल को यह बताया कि नकीब के साथ साथ पुलिस गोलीकाण्ड में गोली खाये अन्य लोगों को बैढन स्थित जिला चिकित्सालय में भर्ती कराने पहुंचे लोगों पर चिकित्सालय के अंदर घुसकर पुलिस ने लाठीयां भांजी. जनता के सामने आई.जी के समक्ष अपने कबुलनामें में कलक्टर सिंगरौली ने यह स्वीकार किया कि चिकित्सालय के भितर घुसकर लाठीचार्ज का आदेश पुलीस को उन्होंने स्वयं दिया था. हालांकि गोली चलाने के आदेश के मामले में वे मुकर गये. मृतक नकीब के परिजनों का यह दावा है कि गोली लगने के बाद समय पर इलाज उपलब्ध करानें में पुलिस ने गतिरोध न पैदा किया होता तो आज नकीब जिंदा होता.
प्रतिनिधि मंडल में शामिल मंच के संयोजक श्री लक्ष्मीचन्द दुबे ने कलक्टर एम. सेलवेन्द्रन पर पुलिस को बचाने की दृष्टि से एकतरफा कार्यवाही करने का आरोप लगाया व कहा कि जिस मामले में पुरा जिला प्रशासन स्वयं जिम्मेदार है उस मामले में जिला प्रशासन से न्याय की अपेक्षा नही की जा सकती. मृतकों के परिजनों द्वारा सी.बी.आई जांच की मांग को जायज करार देते हुए दुबे ने कहा कि पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा तत्काल पंजिबद्ध किया जाय तथा मौके पर मौजूद तमाम अधिकारीयों और कर्मचारीयों को तत्काल निलंबित किया जाय. मंच ने यह न्यायिक अभिरक्षा में एक और युवक संजय साहु की नृशंस पिटाई की भी आलोचना की और कहा कि पुलिस द्वारा संजय की हत्या की भी पुरी आशंका है. फिलहाल संजय को बेरहमीं से पीटने के बाद पुलिस अभिरक्षा में बनारस के एक अस्पताल में रेफर कराया है जहां उसकी हालत गंभीर बताई जा रही है. ज्ञात हो की संजय साहु को 6 दिसंबर को अखिलेश को छोड़ने के एवज में थाने बुलाया गया था जबकी बाद में अखिलेश को पुलिस अभिरक्षा में ही मार दिया गया.
मंच ने इस मामले में प्रदेश एवं राष्टीय स्तर के शीर्ष मानवाधिकार कार्यकर्ताओं से हस्तक्षेप का अनुरोध किया है जिसके जवाब में सिंगरौली की जनता के पक्ष में पूरी लड़ाई लड़ने का आश्वासन दिया है. दिल्ली से जारी अपने बयान में राष्टीय उपाध्यक्ष, पी.यु.सी.एल चितरंजन सिंह ने कहा कि दोषी पुलिसकर्मियों को तत्काल बर्खास्त किया जाय व उन पर आपराधिक मुकदमें कायम किया जाय. रालेगढ़ सिद्धि स्थित अन्ना हजारे के अनशन स्थल से जारी बयान में पुर्व विधायक व किसान संघर्ष समिति के अध्यक्ष डा. सुनीलम ने राज्य सरकार से इस घटना की जिम्मेदारी लेने की मांग की और कहा कि सिगरौली की जनता की शहादत बेकार नही जाने दी जायेगी. लोकविद्या जन आन्दोलन की राष्टीय समन्वयक चित्रा सहस्त्रबुद्धे ने कहा कि पुलिस गोलीकांड की यह घटना निंदनीय है और राज्य सरकार द्वारा निष्पक्ष कार्यवाही की जानी चाहिए. छिन्दवाड़ा से जारी अपने बयान में समाजवादी जनपरिषद के नेता सुनील भाई ने पुलिसिया अत्याचार की तीव्र निन्दा करते हुए कहा कि लगातार अनियंत्रित होती पुलिस के खिलाफ न्यायालय को कड़ी कार्यवाही करनी चाहिए. अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संगठन की राष्टीय उपाध्यक्ष व भाकपा (माले) नेता ताहिरा हसन व इलाहाबाद हाईकोर्ट की अधिवक्ता व मानवाधिकार कार्यकर्ता नम्रता तिवारी ने जारी अपने संयुक्त बयान में कहा कि पुलिस के मार्फत सिंगरौली की जनता के अनवरत होते शोषण के खिलाफ देश भर से आवाज उठाने की जरूरत है तभी दशकों से अपने अधिकारों से वंचित जनता को न्याय मिल सकेगा.
7 सदस्यीय प्रतिनिधि मण्डल में लक्ष्मीचन्द दुबे के अलावा अम्बिका नामदेव, मंजु सिहं, एकता, रवि शेखर तथा वेद प्रकाश शामिल हुए।
किसान, आदिवासी, विस्थापित एकता मंच जल्द ही सभी से चर्चा कर के आगे की रणनीति घोषित करेगा.
                                                                                    
                                                                                 मंजु सिहं(प्रवक्ता)
                                                                       एकता किसान, आदिवासी, विस्थापित एकता मंच
                                                                                  08225935599
 
                                                                                    ,
         
                   

अमरीका की दादागिरी का विरोध नितांत आवश्यक है

महाबली अमरीका का अन्य सार्वभौम देशों में हस्तक्षेप करने का बहुत पुराना रिकॉर्ड है. वह आर्थिक- सामरिक हस्तक्षेप तो करता ही है उन देशों के सम्मान और स्वाभिमान की भी धज्जियां उड़ा देता है. भारत के तमाम नेताओं जिसमें स्व इंदिरा गांधी से लेकर जॉर्ज फर्नांडिस, प्रफुल्ल पटेल, आजम खान, और पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलम भी शामिल हैं को अमरीका द्वारा अपमानित होना पड़ा है. 
हमारे राजनयिकों और अन्य नागरिकों को भी अक्सर अपमानित होना पड़ता है. पूर्व में भी दूतावास की एक वरिष्ठ राजनयिक को जांच के बहाने अपमानित किया गया था. देवयानी खोब्रागडे उसका अपवाद नहीं हैं. अमरीका की जघन्य बर्बरता का इतिहास उसकी ऐसी अनेक सोची समझी क्रूर हरकतों से भरा पड़ा है.
 
एशियाई अफ्रीकी और लातिनी अमरीकी देश उसके आसान शिकार होते हैं. वह उन्हें लगातार अपमानित करता रहा है. यद्यपि क्यूबा और ब्राजील से देशों ने उसे मुंहतोड़ जवाब दिया है लेकिन अमरीकी बेशर्मी और गुंडागर्दी की कोई सीमा नहीं. उसके पाप कितने घृणित हैं विगत में इसके अनेकों उदहारण हैं. अमरीका ने १६ जूलाई सन १९४५ ईसवी को परमाणु बम का पहला परीक्षण किया इसका उददेश्य जापान पर परमाणु बमबारी की तैयारी करना था. जापान उस समय यूरोप में दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के बावजुद अमरीकी बम्बारियों का डट कर मुकाबला कर रहा था और उसने अमरीका को भारी नुकसान भी पहुंचाया था. अमरीकी सरकार ने पहले परमाणु परीक्षण की सफलता के बाद जापान के हिरोशिमा और नागासाकी नगरों पर परमाणु बमबारी की और अपने अमानवीय अपराधों से इतिहास रच दिया.
अफगानिस्तान के बाद अमेरिका रासायनिक हथियार और अलकायदा को मदद करने के नाम पर इराक को तबाह कर दिया और राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी. जून 2013 में हॉन्गकांग स्थित एक होटल में स्नोडन ने लंदन के एक समाचार पत्र गार्जियन को एन.एस.ए से संबंधित अत्यधिक गोपनीय दस्तावेज उपलब्ध कराये. गार्जियन ने इन सूचनाओं को एक श्रृंखला के रूप में सार्वजनिक किया. जिसमें अमरीका और यूरोप के जासूसी कार्यक्रम इंटर्सेप्ट, प्रिजम और टेम्पोरा से जुड़ी जानकारियां शामिल थी. इससे साफ पता चलता है कि अमरीकी संस्था एन.एस.ए ने कुछ वर्षों में गूगल, एपल, फेसबुक, याहू जैसी शीर्ष इंटरनेट कम्पनियों पर अपना नियंत्रण कायम किया है और इन कम्पनियों का इस्तेमाल करके प्रिज़म जैसे कार्यक्रमों के द्वारा दुनिया भर के उपभोक्ताओं की गुप्त जानकारीयां हासिल की.
 
अमरीका एन.एस.ए और सी.आई.ए. जैसी संस्थाओं के जरिये इंटरनेट और दूरसंचार विभाग के माध्यम से पूरे विश्व की गुप्त जानकारी हासिल कर रहा है. इन गुप्त जानकारियों में विभिन्न देशों के नेताओं और राजनयिकों के निजी जिंदगी के आपराधिक रिकार्ड भी हैं ताकि वह मौका पड़ने पर इनकी बाहें मरोड़ सके और इनसे मनचाहे समझौतों पर हस्ताक्षर करवा सके. इसके अलावा किसी देश के रक्षा संबंधी दस्तावेज हासिल कर उसके खिलाफ कार्यवाई की रणनीति बनाना भी इसका एक हिस्सा है. इन हथकंडों से वह दुनिया पर प्रभुत्व स्थापित करने का सपना देख रहा है.
स्नोडन ने अमरीका द्वारा इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप के पीछे छिपी उसकी मंशा का भी भंडाफोड़ किया और यह बताया कि अमरीका कितनी चालाकी से यह सब विश्व शांति स्थापना की आड़ में करता है. सन् 2003 में इराक के खिलाफ युद्ध प्रशिक्षण के दौरान मिले अनुभवों से उसने बताया कि अमरीकी सैनिकों को अरब के लोगों की मदद करने की जगह उन्हें मारने के लिये प्रशिक्षण किया जाता है. यह अमरीका के साम्राज्यवादी मंसूबो को दर्शाता है जो वह इन देशों में लोकतंत्र बहाली के नाम पर कर रहा है. 
इन खुलासों से ये तो साफ है कि बुश की जासूसी करने वाली नीतियों को ओबामा ने हूबहू नकल किया है. सी.आई.ए के जरिये अमरीका दुनिया के ईमानदार नेताओं की जासूसी करने और उन्हें रिश्वत देने या उनकी हत्या करवाने का काम करता है. ऐसा संदेह है कि वेनेज़ुएला के सच्चे नेता ह्यूगो शावेज को इलाज के दौरान कैंसर की दवा देने का काम इसी संस्था द्वारा किया गया था. जिसके कारण उनकी मृत्यु हो गयी. दूसरी और एन.एस.ए दुनिया की सबसे गोपनीय संस्थाओ में शीर्ष पर कायम है. 
एक आंकड़े के अनुसार इसका एक केन्द्र एक दिन मे ईमेल या दूरसंचार विभाग से दुनिया की एक अरब गुप्त जानकारी हासिल करता है और इसके 20 ऐसे केन्द्र लगातार काम करते है. जब बोलिविया के राष्ट्रपति एवो मोरालेस मास्को से अपने देश जा रहे थे, तो यूंरोप मे उनके हवाई जहाज को उतारकर तलाशी ली गयी, कि कही उसमें छिपकर स्नोडन ना भाग रहे हों.
तथाकथित आतंक के खिलाफ युद्ध अमरीकी युद्ध अर्थव्यवस्था का एक मंत्र है. यह दुनिया भर में सैन्य रूप से अमरीकी आधिपत्य को तो जायज ठहराता ही है, साथ ही अमरीकी हथियार निर्माताओं के लिए बाजार भी पैदा करके देता है. आतंकवाद से युद्ध के नाम पर अमरीकी कांग्रेस एक विशाल बजट विभिन्न देशों की सहायतार्थ स्वीकृत करती है, जो कि अन्तत: अमरीकी हथियार निर्माता कंपनियों के हथियार खरीदने के काम आता है. पाकिस्तान सहित विभिन्न देशों को इस श्रेणी से सहायता प्रदान की जाती रही है. युद्धक सामान बनाने वाली कंपनियों ने अमरीकी राज्यतंत्र पर कब्जा कर लिया है, इसलिये दुनिया भर में युद्ध होते रहे हैं. शीत युद्ध के दौर के सबसे भीषण सैन्य संघर्षों में से एक वियतनाम युद्ध (1 नवंबर 1955 – 30 अप्रैल 1975) में एक तरफ चीन और अन्य साम्यवादी देशों से समर्थन प्राप्त उत्तरी वियतनाम की सेना थी तो दूसरे खेमे पर अमेरिका और मित्र देशों के साथ लड़ रही दक्षिण वियतनाम की सेना.
वियतनाम युद्ध के चरम पर होने और अमेरिका और मित्र देशों की सेना की भीषण मारक क्षमता को भली भांति जानते हुए भी 'लाओस' ने अपनी धरती उत्तरी वियतनाम की सेना के लिये मुहैया करा दी. यह अहंकारी अमेरिका को मंजूर नहीं हुआ.
इस निर्णय ने लाओस के भविष्य को बारूद के ढेर के नीचे हमेशा हमेशा के लिये दबा दिया. अमेरिका की फौज को एक छोटे से देश लाओस के इस निर्णय पर गुस्सा आ गया था. उत्तरी वियतनाम की सेना और छोटे से देश लाओस को सबक सिखाने के लिए अमेरिकी सेना ने यहां सबसे भीषण हवाई हमले की योजना बनाई. बस फिर क्या था मौके की ताक में बैठी अमेरिका की वायुसेना ने दक्षिण पूर्व एशिया के इस छोटे से देश लाओस पर इतने बम गिराए जितने कि अफगानिस्तान और इराक पर भी नहीं गिराए गए. लाओस में वर्ष 1964 से लेकर 1973 तक पूरे नौ साल अमेरिकी वायुसेना ने हर आठ मिनट में बम गिराए. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नौ सालों में अमेरिका ने लगभग 260 मिलयन क्लस्टर बम वियतनाम पर दागे हैं जो कि इराक के ऊपर दागे गए कुल बमों से 210 मिलियन अधिक हैं.
लाओस में अमेरिका ने इतने क्लस्टर बम दागे थे कि दुनिया भर में इन बमों से शिकार हुए कुल लोगों में से आधे लोग लाओस के थे. अमेरिका द्वारा लाओस पर की गई बमबारी को लेकर हुए खुलासों के अनुसार अमेरिका ने नौ सालों तक प्रतिदिन 2 मिलियन डॉलर सिर्फ और सिर्फ लाओस पर बमबारी करने में ही खर्च किए थे. फिर 1971 में हो ची मिन्ह के नेतृत्व में वियतनाम की जनता ने अमरीकी साम्राज्यवाद को उसकी हैसियत दिखा दी थी, अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके सामाजिक आधार को गहरी कुण्ठा से भर दिया था जिसे दुनिया वियतनाम ग्रन्थि (वियतनाम सिण्ड्रोम) के नाम से जानती है. 
 
अमरीका इस हार को कभी पचा नहीं सका और इसी कुंठा के तहत उसने तमाम अन्य देशों को अपना शिकार बनाया लेकिन अब वहां अन्य देशों में तेल और खनिज सम्पदा का भीषण दोहन भी शामिल था.
अफगानिस्तान के बाद अमेरिका ने रासायनिक हथियार रखने और अलकायदा को मदद करने के नाम पर इराक को तबाह कर दिया और राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन को फांसी दे दी. अमरीकी साम्राज्यवाद ने जब इराक पर आधिपत्य जमाने के लिए आक्रमण किया तो उसके कई मन्सूबे थे. पहला, इराक के ऊर्जा-स्रोतों पर एकाधिकार कायम करना. दूसरा, इराक को स्प्रिंग बोर्ड बनाकर भूमध्यसागर के दोनों ओर के तथा मध्य एशिया के ऊर्जा भण्डारों पर एकाधिकार कायम करना. उसका तीसरा मन्सूबा था, अपनी आधुनिकतम उन्नत तकनीक और सामरिक शक्ति-जैविक हथियारों, क्षेत्रीय पैमाने पर इस्तेमाल होने वाले छोटे नाभिकीय हथियारों, अत्याधुनिक इलेक्ट्रानिक सामरिक हथियारों से लदे विमानवाही पोतों (एयर क्राफ्रट कैरियर) और पनडुब्बियों का नग्न प्रदर्शन और इस्तेमाल करके पूरी दुनिया पर आतंक का राज्य कायम करना, जिसमें साम्राज्यवादी समूह के भीतर उसके विरोधी-फ़्रांस, जर्मनी और रूस तथा इच्छुक सहयोगी-ब्रिटेन, इटली इत्यादि भी आते हैं. शीत युद्ध की समाप्ति और सोवियत संघ के विघटन के बाद मध्य एशिया में अजरबैजान, काजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान, किर्गिस्तान, जार्जिया, युक्रेन आदि नव स्वतंत्र देशों का जन्म हुआ. यहां एक लाख मिलियन बैरल से अधिक दोहन योग्य तेल भण्डार है. अमेरिका सहित पश्चिमी देश इन तेल भण्डारों के दोहन के लिए व्यग्र हो उठे. फलतः अमेरिका और पश्चिमी योरोप की अनेक तेल कम्पनियां इस ओर दोड़ पड़ी, जिनमें प्रमुख थीं मोबिल, शेवरान, यूनोकल, टेक्सको, एजिप, टोटल, स्टेट आयल, ब्रिटिश, पेट्रोलियम और शेल आदि. अब प्रारंभ हुई तेल कूटनीति. इराक समस्या, ईरान और रूस के साथ अमेरिकी कटुता, अफगान युद्ध, इस्लामी आंतकवाद की समस्याएं बहुत कुछ इसी तेल राजनीतिक धूर्तता का परिणाम है . तालिबान का जन्म वास्तव में तेल दोहन की अमेरिकी रणनीति का भी एक हिस्सा था जिसके गंभीर दुष्परिणाम अमेरिका और पाकिस्तान को आज भुगतने पड़ रहे हैं.
कुछ मध्य पूर्व एशियाई देश अमरीका के पिछलग्गू रहे हैं. अमरीका जैसी महाशक्तियों ने इन देशों की इस मूलभूत कमजोरी का बड़ा लाभ उठाया है. इन देशों को आर्थिक, सैनिक और शस्त्रों की सहायता अमरीकी राजनीति और रणनीति के माध्यम रहे हैं. यह बात दीगर है कि इस कुचक्र में फंसे सहायता-प्राप्त देश अपने निर्णय की स्वतंत्रता खो बैठते हैं. परिणामत: उनमें एक अबाध हस्तक्षेप प्रारम्भ जाता है. एशियाई देशों का वर्तमान काल इस तरह के हस्तक्षेप के उदाहरणों से भरा पड़ा है. संधिबद्ध देश अपनी आंतरिक और बाहरी राजनीति में एक लंबे अरसे से अमरीकी हस्त्तक्षेप के शिकार रहे हैं. अनुदान और ऋण भी साम्राज्यवादी देशों द्वारा नवोदित सर्वभौम राज्य की नीतियों को प्रभावित करने का एक और साधन होते हैं. सहायता कार्यक्रम के अंतर्गत दी गई धनराशि का अधिकांश मामलों में देशों के सत्तारूढ़ हलकों को राजनीतिक घूस के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं. यह बात सर्वविदित है कि सन् १९६५ में भारतीय मुद्रा का अवमूल्यन पश्चिमी देशों के दबाव के लेकर ही था. एशिया,अफ्रीका और लातीनी अमरीका में उपनिवेशवाद तो समाप्त हो गया है किंतु ये देश इस व्यवस्था की व्यूह रचना से अभी पूर्णतया मुक्त नहीं हो पाए हैं. इन देशों की अर्थव्यवस्था भी भूतपूर्व औपनिवेशिक चंगुल से मुक्त नहीं हुई है. इसका पूरा लाभ साम्राज्यवादी अमरीका लगातार उठता रहा है. उसके इस शोषण के विरोध में आने की हिम्मत किसी की नहीं हुई. सद्दाम हुसैन ने अमरीका से वैर लिया और खत्म कर दिए गए. भारत और पाकिस्तान अमरीकापरस्त आर्थिक नीतियों के कायल रहे हैं. पाकिस्तान तो अमरीका के ऊपर अत्यधिक निर्भर है. ऐसे में अमरीका का वैचारिक और मानसिक आधिपत्य इन देशों की सत्ताओं पर सदैव रहता है. तब अमरीका से बराबर का सम्बन्ध होने की और उसके द्वारा अपमानित न होने की गुंजाईश कम ही बची रहती है. लेकिन अमरीका की इस दादागिरी का विरोध नितांत आवश्यक है. बल्कि विश्व के अन्य मित्र देशों को भी इसके लिए विश्वास में लेने की आज महती आवश्यकता है.
 
शैलेन्द्र चौहान 
07838897877
 

मीडिया मेरा पीछा अपराधी की भंति कर रहा है : जस्टिस गांगुली

नई दिल्ली।। यौन उत्पीड़न के आरोप में फंसे उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति एके गांगुली ने कहा है कि मीडिया इन दिनों एक अपराधी की भांति उनका पीछा कर रहा है जबकि उन पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाने वाली लड़की के हलफनामे की प्रति भी उन्हें अभी तक नहीं दी गई है. 
हाल ही में दिए गए अपने एक इंटरव्यू में गांगुली ने कहा कि उन्हें हलफनामे की प्रति क्यों नहीं दी गई जब वो उच्चतम न्यायालय की तीन सदस्यीय समिति के सामने पेश हुए. तब उनसे कहा गया था कि ये गोपनीय था. गांगुली ने कहा कि सामान्यत: होता ये है कि प्रतिवादी को याचिका की प्रति दी जाती है क्योंकि उसकी प्रतिष्ठा दांव पर लगी होती है. गांगुली ने कहा कि उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि उनके साथ ऐसा होगा और अब उन्होंने ये लोगों पर छोड़ दिया है कि वे इस मामले पर अपनी राय बनाएं.

मीडिया और सोशल मीडिया को सवालों के कटघरे में खड़ा करती है खुर्शीद अनवर की मौत !

टीआरपी की होड़ में पत्रकारिता के मूल सिद्धांतों को दरकिनार कर केवल मसाला खबरें बेचने की जो होड़ समाचार चैनलों में लगी है, वह अब लोगों को अपनी जान देने पर भी मजबूर करने लगी है. इसी का एक उदाहरण है सामजिक कार्यकर्ता खुर्शीद अनवर की दुर्भाग्यपूर्ण मौत….
टीआरपी की खातिर 16 दिसंबर के माहौल को भुनाने के लिए इण्डिया टीवी ने खुर्शीद अनवर पर लगाए जा रहे कथित बलात्कार के आरोप पर मीडिया ट्रायल शुरू कर दिया, जिसमें खुर्शीद का जमकर मानमर्दन किया गया. खुर्शीद पर जिस हद तक गिरकर आरोप लगाए जा सकते थे वे लगाये गये. परिणाम ये कि अवसाद में आकर खुर्शीद अनवर ने आत्महत्या कर ली.
आत्महत्या इसलिए कहना पड़ेगा क्यूंकी खुर्शीद ने खुद अपनी जान ली लेकिन सवाल यह है कि महज आरोप लगने पर अपनी जान देने जैसा आत्मघाती कदम क्यूं उठाना पड़ गया खुर्शीद को?  इन गंभीर आरोपों के बाद उन्हें डर अपनी प्रतिष्ठा के धूमिल होने का था या फिर कारण कुछ और ही था? उन्हें अपनी जान देने के लिए मजबूर किसने किया? ये कुछ ऐसे प्रश्न हैं जो फिलहाल अनुत्तरित हैं.
न तो युवती ने पुलिस के समक्ष बलात्कार का आरोप लगाया था और न ही उसकी कोई मेडिकल जांच हुयी, यहां तक कि अब तक कोई ऐसा सबूत भी सामने नहीं आया था जोकि किसी भी प्रकार से खुर्शीद पर लगाये जा रहे बलात्कार के कथित आरोपों का समर्थन कर पाता किन्तु इसके बावजूद जिस प्रकार से इण्डिया टीवी द्वारा खुर्शीद का मीडिया ट्रायल शुरू कर उनका मानमर्दन किया गया, वह निंदनीय है. 
खुर्शीद के खिलाफ मोर्चा केवल इण्डिया टीवी की ओर से ही नहीं खोला गया बल्कि सोशल मीडिया का इस्तमाल करते हुए उनके मानमर्दन का यह सिलसिला पहले ही शुरू हो चुका हो था, जिसको लेकर ये सुनने में आया था कि अपने मानमर्दन से आहत खुर्शीद ने तीन लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई.अभी खुर्शीद सोशल मीडिया के इस वार से खुद को संभाल नहीं पाये थे कि इसी बीच 16 दिसंबर के माहौल को अपनी टीआरपी बढाने हेतु भुनाने के लिए इण्डिया टीवी के प्रयासों का वह शिकार बन गये और इस बार जो कुछ इनके साथ हुआ शायद उसके बाद उन्हें लगा कि दुनिया उनके लिए ख़त्म हो गयी, वर्षों के अथक प्रयासों से जो मान-सम्मान-प्रतिष्ठा उन्होंने अर्जित की वह सब धूमिल होने लगी और शायद इसी वजह से उन्होंने खुद को इस दुनिया से अलग कर लिया.
किसी व्यक्ति के दोषी होने अथवा न होने का निर्णय करना कानूनी मामला है, पुलिस और अदालत हैं इस काम के लिए. लेकिन इससे पहले कि यह फैसला कानून के अनुसार हो पाये मीडिया और सोशल मीडिया अपनी ओर से एकपक्षीय माहौल तैयार कर अपना फैसला सुना देता है, जोकि चिंताजनक है. दुर्भाग्यपूर्ण है यह सब…. इस प्रकार का गैरजिम्मेदाराना रवैया अपनाने से मीडिया को बचना चाहिये. वैसे इन दिनों न्यूज चैनलों का पूरा जोर केवल मसाला खबरों को बेचने पर ही दिखाई देता है.
पत्रकारिता को कभी मिशन कहा जाता था लेकिन पूंजीपतियों के बढ़ते दखल ने अब इसे पूर्ण व्यवसाय में बदल
दिया है, जनसरोकार कम ही दिखाई देता है यहां आत्महत्या का प्रयास अपराध की श्रेणी में आता है और आत्महत्या के लिये
उकसाना भी अपराध है. खुर्शीद अनवर की मौत ने मीडिया और सोशल मीडिया दोनों को ही सवालों के कटघरे में खड़ा कर दिया है.
 
विनोद भारद्वाज
+91-9837074023
(लेखक विनोद भारद्वाज वरिष्ठ पत्रकार हैं| वे दैनिक जागरण आगरा के
सम्पादकीय प्रभारी/डीएनई एवँ 'ताज प्रेस क्लब' आगरा के अध्यक्ष रह चुके  हैं)