Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

सुख-दुख

पेपर लीक, पत्रकार व पुलिस : पहले और अब में काफी फर्क है!

प्रेमांशु शेखर-

खबर है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने पेपर लीक की खबर करने वाले पत्रकार को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। मैं 29 साल पहले 1993 की बात कर रहा हूं। दिल्ली विश्वविद्यालय में पेपर लीक हुआ था और इसकी खबर मैंने जनसत्ता अखबार में लिखी थी।

तब कुलपति उपेंद्र बख्शी थे। मजबूरन परीक्षा रद्द कर जांच दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई। नाराज बख्शी साब ने यह आरोप भी लगा दिया कि मैं पेपर लीक करने वालों से मिला हुआ हूं। क्राइम ब्रांच के एसीपी अशोक चांद ने (फिलहाल एडिशनल पुलिस कमिश्नर पद से रिटायर) मुझे मिलने के लिए अपने घर पर बुलाया।

तब वे नई दिल्ली में जय सिंह मार्ग पर वाईएमसीए के सामने रहते थे। नाश्ता कराने के साथ सबसे पहले उन्होंने कहा कि प्रेस रिपोर्टर होने के नाते मैं आपको अपना सोर्स बताने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। लेकिन आपको थोड़ी मदद तो करनी होगी।

उपेंद्र बख्शी साब बहुत बड़े आदमी थे और मैं अपने कैरियर के शुरुआती दौर में, इसलिए चाहता तो मैं भी था कि मामले जल्द से जल्द सुलझे। मैंने कहा कि मुझे तो पेपर सत्यवती कालेज के एक छात्र नेता और श्यामलाल कालेज के एक शिक्षक ने उपलब्ध कराएं। अगर आप उनदोनों पर केस नहीं बनाने का वचन दे तो मैं नाम बता दूंगा। उनसे आगे की कड़ियों को आप जोड़ लीजिए। ऐसा नहीं होने पर फिर कभी कोई मीडिया के सामने नहीं आएगा।

मेरी बात से सहमति जताते हुए उन्होंने वचन दिया कि उनदोनों पर केस नहीं बनाया जाएगा। मैंने छात्र नेता राजन चोपड़ा और शिक्षक सविता जी का नाम उन्हें बता दिया। अगले ही दिन सविता जी को पुलिस ने तड़के चार बजे घर से उठा लिया और चाणक्यपुरी ले गई।

तब वहां आतंकवादियों से पूछताछ का केंद्र हुआ करता था। सविता जी पत्नी ने बदहवासी में तड़के ही मुझे फोन किया। कुछ ऐसा ही राजन चोपड़ा के साथ भी हुआ। मुझे लगा कि कहीं मुझसे कोई गलती तो नहीं हो गई।

मैं तब फोन पर ही अपने वरिष्ठ साथियों से मदद मांगने में जुट गया। बहरहाल दस बजे तक पुलिस ने सविता जी को घर पहुंचा दिया और उन्होंने मुझे फोन पर बताया कि पुलिस ने चाय बिस्कुट के साथ बहुत अच्छे से बर्ताव किया, तब जाकर मेरी जान में जान आई। कुछ ही दिनों में क्राइम ब्रांच ने खुलासा कर दिया कि एक तो सत्यवती कालेज के विकलांग शिक्षक ने ही लालचवश पेपर लीक किया और दूसरा, न्यू फ्रेंड्स कालोनी की प्रेस में काम करने वाले कुछ लड़कों ने, जहां पेपर छपे थे।

राजन चोपड़ा पुलिस जांच से तो बच गया, लेकिन गुस्से में बख्शी साब ने उसका रिजल्ट रोक लिया। इसके लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। बहरहाल मैं खुश किस्मत था कि मेरे चीफ रिपोर्टर सुशीत कुमार सिंह और प्रधान संपादक प्रभाष जोशी थे। प्रभाष जी ने बाद में इस पर्चा प्रसंग पर मुझसे एक पूरा पेज भी लिखवाया और पेज सज्जा की जिम्मेदारी आलोक तोमर जी को दी।

इससे दो साल पहले पहले 1991 में सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा के पेपर भी लीक हुए थे। इस खबर को भी मैंने ही जनसत्ता में ब्रेक की थी। इसकी जांच सीबीआई को सौंपी गई थी। सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी ने तब भी मुझे बुलाया था। मैंने उनसे कहा कि मुझे दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ लड़कों ने पेपर दिए। लेकिन उनका इनसे कोई लेना देना नहीं, वो तो मेरे पास इसलिए आ गए कि उन्हें अपने सब्जेक्ट का पेपर नहीं मिला। बहरहाल कुछ ही दिनों में सीबीआई ने खोज निकाला कि हजारीबाग (झारखंड) के कोलंबस प्रेस में पर्चे छपे और वहीं से लीक हुए, दोषियों को पकड़ भी लिया गया।

प्रेमांशु शेखर

कंसल्टेंट (मीडिया),

नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन