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परीक्षा घोटाले में फंसी सरकार की प्राथमिकताओं में सरोगेसी के नियम!

संजय कुमार सिंह

आज की खबरें सरकार की विचित्र प्राथमिकताओं को रेखांकित करती हैं। ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों से परेशान दिखने वाली ‘सरकार’ सरकारी महिला कर्मचारियों के लिए मातृत्व अवकाश, सरोगेसी से जुड़े नियमों में संशोधन के साथ पिता के लिए भी छुट्टी की व्यवस्था कर रही है।  

नीट मामले में एनटीए प्रमुख के खिलाफ कार्रवाई और सीबीआई की जांच के आदेश नरेन्द्र मोदी सरकार ने पहली बार दबाव में दिये हैं। इससे पहले की जांच स्वेच्छा से दी गई है, मांग से पहले ही दे दी गई है आदि आदि। हर तरह की जांच में वह विपक्षी सरकारों के खिलाफ ही रही हैं। आज अमर उजाला में प्रकाशित एक खबर के अनुसार एनटीए ने बिहार पुलिस की जांच में सहयोग नहीं किया। आप जानते हैं कि शिक्षा मंत्री शुरू से कहते रहे हैं कि मामला प्रश्नपत्र लीक का नहीं है। कल के अखबारों की खबरों के अनुसार मामला बिहार में ही केंद्रित था इसलिए परीक्षा रद्द करने की जरूरत नहीं है। अब पता चल रहा है कि एनटीए बिहार पुलिस का सहयोग नहीं कर रहा था, सीबीआई टीम गोधरा भी पहुंची है। जाहिर है मामला बिहार में सीमित नहीं है और सीबीआई जांच करेगी या लीपापोती – यह बाद में पता चलेगा। फिलहाल स्थिति यह है कि एनटीए ने सहयोग नहीं किया, बिहार पुलिस से जांच ले ली गई और केंद्र सरकार की एजेंसी सीबीआई, केंद्र सरकार की बनाई एजेंसी एनटीए के काम काज की जांच कर रही है। 

कहने की जरूरत नहीं है कि अभी तक सीबीआई और ईडी का उपयोग जिस तरह किया जाता रहा है उसमें नीट मामले की जांच सीबीआई से कराने का मकसद एनटीए को बचाना भी हो सकता है। यही नहीं, बिहार पुलिस ने कहा है कि पर्चा आउट होना आपराधिक साजिश थी और इसमें पेशेवर गिरोह शामिल है। ऐसे में परीक्षा रद्द नहीं किया जाना हमेशा संदिग्ध बना रहेगा। आज खबर यह भी है कि महाराष्ट्र में कोचिंग सेंटर चलाने वाले दो शिक्षकों को हिरासत में लिया गया था। हालांकि, उन्हें छोड़ दिया गया है। कल आप यहां पढ़ चुके हैं कि 2017 में बनाये गये एनटीए के चेयरपर्सन प्रदीप कुमार जोशी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और आरएसएस से जुड़े रहे हैं। हटाया डीजी, सुबोध कुमार सिंह को गया है जो आईएएस अधिकारी हैं। नीट मामले में एक मुद्दा कृपांक और इसमें पारदर्शिता नहीं होना भी था। ऐसे 1563 छात्रों के लिए कल दोबारा परीक्षा कराई गई। शिक्षा मंत्री ने यह भी कहा था कि इस परीक्षा और साधन-सुविधाओं के कारण कल होने वाली दूसरी परीक्षा रद्द कर दी गई थी।

टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड से अब पता चल रहा है कि इन छात्रों में सिर्फ 52 प्रतिशत या 813 ने दोबारा परीक्षा दी है। बाकी ने कृपांक के बिना मूल अंकों को स्वीकार करने का विकल्प चुना है। टाइम्स ऑफ इंडिया में आज लीड का शीर्षक है, कृपांक पाने वाले 1563 छात्रों में सिर्फ 813 ने नीट-यूजी की पुनर्परीक्षा दी। खबर में लिखा है कि चंडीगढ़ में दो छात्रों ने पुनर्परीक्षा के लिये पंजीकरण कराया था पर आये नहीं। खबर से यह पता नहीं चल रहा है कि परीक्षा सबको देनी थी या कृपांक के बिना अंक स्वीकार करने का विकल्प सबके लिये था। जिनलोगों ने दोबारा परीक्षा देने का विकल्प चुना उनके पास जाहिर है, कम नंबर आने पर पुराने को स्वीकार करने का विकल्प नहीं होगा। पर पंजीकरण करवाकर नहीं आने वालों का क्या होगा – यह खबर से पता नहीं चल रहा है। जो भी हो, मामला सीधा नहीं है और पुनर्पुरीक्षा के बाद मूल परीक्षा रद्द करने की संभावना कम हो रही है। 

जहां तक पुनर्परीक्षा की बात है, हिन्दुस्तान टाइम्स में आज पहले पन्ने पर छपी लीना धनखड़ की बाईलाइन वाली खबर के अनुसार, “टॉपर्स ने कहा है कि पुनर्परीक्षा मूल परीक्षा से कठिन थी”। आप जानते हैं कि हरियाणा के एक केंद्र के छह छात्रों को नीट में पूरे नंबर मिले थे। इन्हीं छह छात्रों ने रविवार को पुनर्परीक्षा दी और इनमें से चार ने कहा कि वे अपना पिछला प्रदर्शन दोहरा पाने को लेकर अनिश्चित हैं। अगर प्रश्नपत्र लीक की बात की जाये तो भले ही उसे बिहार में स्थानीय मामला माना गया है लेकिन आज इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार पुलिस को जले हुए स्क्रैप में 68 सवाल मिले थे जो मूल नेट पेपर से मेल खाते हैं। एक अलग खबर बताती है कि झारखंड में प्रश्नपत्र ई-रिक्शा से ढोये गये थे। झारखंड के हजारीबाग में रह रहे छात्रों के पास से बरामद जले हुए स्क्रैप की जांच बिहार पुलिस में करवाई थी और खबर के अनुसार इसी के बाद केंद्र सरकार ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की घोषणा की।

टाइम्स ऑफ इंडिया की कल की खबर के अनुसार शिक्षा मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा था कि अभी तक की जांच से लगता है कि मामला स्थानीय है और बिहार में पेपर लीक स्थानीय मामला है और इसलिए परीक्षा रद्द करने की जरूरत नहीं है। यहां गौर तलब है कि शिक्षा मंत्री ने पहले कहा था कि प्रश्नपत्र लीक का मामला नहीं है, अब शिक्षा विभाग के अधिकारी कह रहे हैं कि लीक का मामला स्थानीय है। बिहार पुलिस ने कहा है कि शिक्षा मंत्री के तहत एनटीए जांच में सहयोग नहीं कर रहा था और सीबीआई ने जांच शुरू की तो गोधरा भी पहुंची और महाराष्ट्र में भी पूछताछ हुई है। द टेलीग्राफ ने आज इन खबरों पर राहुल और प्रियंका गांधी के बयान को प्रमुखता से छापा है। यह दूसरे अखबारों में नहीं है दोनों ने कहा है, पेपर लीक रैकेट और शिक्षा माफिया के समझ प्रधानमंत्री असहाय है। ऐसे में राहुल गांधी प्रधानमंत्री की चुप्पी पर भी सवाल उठाये हैं। और कहा है कि भाजपा शासन में देश की कुछ सबसे बड़ी परीक्षाओं में एक की यह स्थिति है।  

इस बीच आज अखबारों में आरोपियों को हथकड़ी लगाकर ले जाने की जो तस्वीर छपी है वह परेशान करने वाली है। आरोपियों और अभियुक्तों  हथकड़ी तभी लगाई जानी चाहिये जब उनके भाग निकलने का डर हो। कैदी तो फिर भी भागते रहते हैं पुलिस कैदियों को अपमानित करने के लिए हथकड़ी लगाते हैं। रही सही कसर अखबार वाले ऐसी फोटो छाप कर पूरी कर देते हैं। मेरे ख्याल से पुलिस की गलती अखबार क्यों दोहरायें और दोहरायें तो इसे भी मुद्दा क्यों नहीं बनायें? सवाल है कि ऐसे लोग कैसे नागरिक बनेंगे और प्रश्न पत्र लीक होते हैं क्योंकि छात्र खरीदते हैं, इसके पैसे अभिभावक ही देते होंगे और जो लोग प्रश्नपत्र लीक करते हैं। ये सब उसी समाज में रहते हैं जिसमें हम रहते हैं और चाहते हैं कि एक ईमानदार-नैतिक सरकार हो। ऐसे लोग ईमानदार नैतिक सरकार चुनेंगे तो बच्चों को डॉक्टर कैसे बनाएंगे और भविष्य में कमाऊ पूत बनाने का उनका सपना कैसे पूरा होगा।

सरोगेसी से मातृत्व देने-लेने की सुविधा

कमाऊ पूत का सपना सरकार के ‘ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों’ के खिलाफ होने पर भी है। सरकार बच्चा चाहने वालों उनपर मेहरबान भी है। उसका पता आज अमर उजाला में तीन कॉलम में छपी खबर से लगता है। पहेली यह भी है कि आज ये खबर कैसे छपी है पर छपी है तो चर्चा होगी ही। शीर्षक है, सरोगेट व पालक दोनों मां पा सकेंगी मातृत्व अवकाश। हाईलाइट किया हुआ अंश है, केंद्र सरकार के नये नियम अधिसूचित। इस खबर के अनुसार, केंद्र सरकार की ऐसी महिला कर्मचारी जिन्होंने सरोगेसी के जरिये संतान उत्पन्न की है, अब छह महीने मातृत्व अवकाश की हकदार होंगी। ऐसी महिला कर्मचारी के लिए कोख देने वाली महिला (सरोगेट मां) भी केंद्र की कर्मचारी होगी, तो दोनों ही मांओं को छह-छह महीने का मातृत्व अवकाश मिलेगा। हालांकि इसकी शर्त होगी कि ऐसी महिलाओं के जीवित बच्चों की संख्या दो से कम होनी चाहिए। मुझे लगता है कि बच्चा पैदा करने के मामले में यह सुविधा सरकारी महिला कर्मचारियों को विशेष बनाता है और यह मामला इस सरकार की प्राथमिकताओं में है – यह अजीब है।

खासकर इसलिए भी कि बच्चे का अधिष्ठाता पिता भी यदि सरकारी कर्मचारी है तो वह भी 15 दिनों के पितृत्व अवकाश का पात्र होगा। नए नियम 18 जून से लागू हो गए हैं। दूसरी ओर, गरीब, बेरोजगार, अविवाहित और ज्यादा बच्चे पैदा करने वाले पुरुषों से मजबूर महिलाओं का ख्याल किया जाना कानूनी स्तर पर ज्यादा जरूरी है। यह सेवा मुख्य रूप से आर्थिक लाभ है जिसकी जरूरत सरकारी कर्मचारियों को हो भी तो सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिये।

माओवादियों ने दो जवान मारे

आज की तीसरी बड़ी खबर सुकमा में माओवादियों द्वारा आईईडी हमले में दो जवानों को मार डालने की है। पिछले दिनों सुरक्षा बलों द्वारा माओवादियों को बड़े पैमाने पर मार गिराने की खबरें छपती रही हैं। उनमें महिलाएं भी रहीं और मानवाधिकार के मामले अब नहीं होते। ऐसे में माओवादियों ने खुद बदला लिया है और जाहिर है, मारे गये जवान सरकारी नीतियों के शिकार हुए। इनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की थी। पता नहीं इन्हें क्या मुआवजा मिलेगा या मिलेगा भी कि नहीं। पर मुद्दा यह है कि सुरक्षा बलों को माओवादियों से निपटने के लिए नहीं छोड़ नहीं या जा सकता है। दूसरे शब्दों में सुरक्षा बलों की नौकरी माओवादियों को निपटाने की भी हो तो उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है। कायदे से माओादियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी सरकार की है औऱ उन्हें बिना सुनवाई नहीं मारा जा सकता है पर बहुमत से चुनी सरकार ने अगर ऐसी व्यवस्था बनाई है, मीडिया को स्वीकार है तो मैं भी क्या कर सकता हूं। लेकिन सुरक्षा बलों का ख्याल रखना सरकार का काम है और सुरक्षा बलों को चाहिये कि अपनी सुरक्षा के संबंध में अधिकारियों और सरकार को सतर्क करें। मुठभेड़ में मौत तो समझी जा सकती है पर हमले का शिकार होना तो व्यवस्था की नाकामी और चूक है।

बिहार में एक हफ्ते में तीसरा पुल ढहा 

बिहार में पुल गिरना थम नहीं ले रहा है। यहां एक सप्ताह के भीतर तीसरा पुल ढह गया है। इस बार की घटना मोतिहारी में हुई है।  इससे पहले अररिया और सीवान में भी पुल गिर चुके हैं। यह निर्माणाधीन प्रोजेक्ट था, जिसकी अनुमानित लागत दो करोड़ रुपये के करीब थी। पश्चिम बंगाल चुनाव के दिनों में 31 मार्च 2016 को दोपहर 12 बजे एक निर्माणाधीन पुल गिर गया था। तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इसे एक दुर्घटना (ऐक्ट ऑफ गॉड) कहा था। लेकिन ‘ना खाउंगा, ना खाने दूंगा’ वाले हमारे प्रधानमंत्री को यह ऐक्ट ऑफ फ्रॉड लगा था। संयोग से उसके कुछ ही समय बाद बनारस में भी एक पुल गिरा था। तब भी ऐक्ट ऑफ फ्रॉड याद नहीं आया। उसके बाद तो मोरबी का पुल गिरा, अस्पताल में मरीज देखने जाने से पहले अस्पताल की रंगाई पुताई का काम हुआ और अब यह ऐक्ट ऑफ फ्रॉड नहीं होता है। ऐसे में बिहार में लगातार तीसरा पुल गिरना कोई मुद्दा नहीं है। पहले पन्ने की खबर भी नहीं जबकि बिहार की नीतिश कुमार की सरकार डबल इंजन हो या न हो, केंद्र सरकार के लिए मोटर जरूर है। ऐक्ट ऑफ गॉड पर तब प्रधानमंत्री ने कहा था, यह दैविक कृत्य इस मायने में है कि यह हदसा चुनाव के ऐन वक्त पर हुआ है ताकि लोगों को यह पता चल सके कि उनपर किस तरह की सरकार शासन कर रही है। ईश्वर ने यह संदेश भेजा है कि आज यह पुल गिरा है, कल वे पूरे बंगाल को खत्म कर देंगी। आपके लिए ईश्वर का संदेश बंगाल को बचाना है।

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