साथी पारितोष! दैनिक जागरण को काबिल पत्रकारों की ज़रूरत नहीं है

इलाहाबाद। दैनिक जागरण को भलीभांति इसलिए जानता हूं कि वहां तकरीबन सात साल तक संपादकीय विभाग में नौकरी की। … और, लखनऊ के रिपोर्टर पारितोष को इसलिए भी तकरीबन भलीभांति जानता हूं कि कानपुर में दोनों लोगों ने अमर उजाला में साथ साथ रिपोर्टिंग और प्रादेशिक डेस्क, दोनों जगह कई साल कार्य किया है।

पारितोष मिश्रा ने जब दैनिक जागरण ज्वाइन करने की चर्चा की तभी हमने आपत्ति की थी-कहां फंस रहे हो यार? दैनिक जागरण के प्रबंधन को काबिल आदमी चाहिए ही नहीं। याद है कानपुर में अमर उजाला दफ्तर की वो शाम, जब उसने एकदम से सिर को पीछे झटकते हुए पूरी ठसक के साथ कहा था- मैं माहौल को अपने हिसाब से ढालना भी जानता हूं। उसे आत्मविश्वास से लबरेज देख अच्छा तो लगा पर मन में एक आशंका बनी रही कि बंदा गलत जगह फंस रहा है। इसी बीच पारितोष ने दैनिक जागरण ज्वाइन कर लिया और निजी समस्याओं के चलते मैं कानपुर से अपने गृहनगर इलाहाबाद आ गया। कुछ दिनों तक आराम करने के बाद इलाहाबाद में हिन्दुस्तान में कला-संस्कृति, साहित्य की बीट देखने लगा। लखनऊ से दो सौ किमी दूर, इलाहाबाद रहकर भी पारितोष से फोन के जरिए अक्सर हाय-हैलो होता रहा। पारितोष हमारे उस गाढ़े वक्त के साथी रहे जब अमर उजाला कानपुर में हमारे निराशा का दौर चरम पर था। प्रादेशिक डेस्क में संपादन की सारी काबिलियत पेज बनाने तक सिमट चुकी थी। और डेस्क के कुछ ‘वरिष्ठ-गरिष्ठ’ साथियों के बीच मुझे पेज बनाने में फेल्योर साबित करने की होड़ लगी थी। उस समय हमारे इंचार्ज सूर्य प्रकाश तिवारी और उनकी दाएं बाएं की गोलियां मानें कि कुछ चिंटू-मिंटू टाइप के सहकर्मियों में ये होड़ रहती कि देखो, देखो तो आज सबसे ज्यादा कौन परेशान कर लेता है। सो, ऐसे बुरे वक्त में प्रेम दीक्षित, शिवचरन सिंह चैहान, इम्तियाज अहमद गाजी, इरा दीक्षित आदि न सिर्फ मददगीर साबित होते बल्कि ढांढस भी बंधाते। हालत इतने ज्यादा बुरे थे कि कई बार डिप्रेशन में जाना पड़ा। कई बार कमरे के भीतर बिस्तर पर जाने के बाद घंटों रोता रहता। वो भी एक दौर था। और यह दौर तब खत्म हुआ जब रूमपार्टनर के रूप में भाई भारत सिंह साथ रहने लगे। भारत भाई ने राष्ट्रीय सहारा में बतौर डिप्टी न्यूज एडिटर ज्वाइनिंग ले ली थी। खैर, इस पर विस्तार से फिर कभी।
 
बात पारितोष मिश्रा और दैनिक जागरण की। पारितोष मिश्रा अपने कार्य को लेकर हमेशा चैकन्ना रहने वाला जिम्मेदार और खरा स्वभाव वाला हंसमुख आदमी। ऐसे आदमी की जरूरत दैनिक जागरण को रहती है क्या? अगर ऐसा होता तो दैनिक जागरण को काबिल मरहूम साथी सुशील त्रिपाठी, सुधांशु उपाध्याय, प्रमोद शुक्ला जैसे लोगों को दैनिक जागरण संस्थान क्यों छोड़ना पड़ता। काबिल कर्मचारी खोजने के लिए वारंट निकालकर अभ्यर्थियों का चयन किया जाता है, पर दैनिक जागरण तो काबिल लोगों को संस्थान छोड़ने के लिए मजबूर करता है। कई उदाहरण भरे पड़े हैं दैनिक जागरण संस्थान के भीतर। खेल के काबिल पत्रकार रहे गोपालजी भारतीय को लगातार बाइस साल तक फुल टाइम कार्य कराने के बाद इलाहाबाद में परमानेंट नहीं किया गया। ऐसे ही एक काबिल रिपोर्टर अमरेश मिश्रा जो मौजूदा समय हिन्दुस्तान प्रतापगढ़ में बतौर ब्यूरो प्रमुख अपनी काबिलियत का परचम फहरा रहे हैं वे जब दैनिक जागरण में कौशांबी जिला में कार्यरत थे तो एक एक्सक्लूसिव रपट भेजी-कौशांबी में युवती को निर्वस्त्र कर सड़क पर घसीटा। डेस्क इंचार्ज होने के नाते हमने उस खबर पर अमरेश से बात की। पूरी तरह मुतमइन होने के बाद उस खबर को दिल्ली, वाराणसी, कानपुर, लखनऊ आदि जगह भेजकर इलाहाबाद के सभी संस्करण में प्रमुखता से फ्लैश किया। जोरदार खबर थी। हमने अमरेश को बधाई दी। कई जगह वो खबर बाईलाइन मिली ;इलाहाबाद में तो बाईलाइन की परंपरा ही नहीं थी, अभी भी साल दो साल में किसी खास रिपोर्टर की बाईलाइन छप पाती हैद्ध। अमरेश की उस खबर ने तहलका मचा दिया। तब शासन प्रशासन में ऐसे भी लोग हुआ करते थे जिनकी आंख का पानी मरा नहीं था। सो, तुरंत ही जांच पड़ताल शुरू हो गई। मजे की बात तो यह रही कि पुलिस विभाग से ज्यादा दैनिक जागरण इलाहाबाद और वाराणसी ऑफिस में हड़कंप मच गया। इलाहाबाद के संपादकीय प्रभारी कम मैनेजर आनंद प्रकाश दीक्षित केबिन के भीतर बिन जल की मछली की भांति छटपटा रहे थे। छटपटाहट की वजह यह थी कि कौशांबी में तैनात एसपी जो थे वे बड़े साहब के जानने वालों में थे। (बता दें कि वीरेंद्र गुप्ता के लिए दैनिक जागरण इलाहाबाद और वाराणसी में यही संबोधन चलता है। वो सबसे बड़का साहेब बने रहना पसंद भी करते हैं)।

बहरहाल, केबिन में हमें तलब किया गया। वहां पहुंचते ही देखा दीक्षितजी का पारा चढ़ा था। वे सूखे पत्ते की मानिंद कांप रहे थे। हमारे नमस्कार का जवाब देने के बजाए उन्होंने सवाल दागा। उनका सवाल किसी बम की तरह फटा- वो औरत नंगी करने वाली खबर आपने छापी कैसे? सवाल समझने में थोड़ा समय लगा। उन्होने सवाल दुहराया। इस बार उनके शब्दों में दहाड़ थी। हमने आग्रह किया-भाई साहब, मैं समझा नहीं। थोड़ी देर में ऑफिस के चपरासी जतन अखबार लिए केबिन के भीतर दाखिल हुए। दीक्षितजी ने अखबार का पन्ना सामने करते हुए फिर सवाल दोहराए- ये, ये… इस खबर की बात कर रहा हूं, पंडितजी। बड़ी मुश्किल से हंसी को रोक पाया। संयत होते हुए जवाब दिया-भाई साहब, ये एक्सक्लूसिव है, सिर्फ अपने यहां। ज्यादातर संस्करणों ने बाईलाइन दी है। दीक्षितजी ने कहा-बनारस से बार-बार पूछा जा रहा है, वहां का एसपी अपने बड़े साहब के जानने वालों में से है। खंडन छापने पर जोर दिया जाता रहा। हरामीपन की पराकाष्ठा थी। साफ इंकार करते हुए हमने तर्क दिया- जबरदस्त खबर है, हमारी समझ में इसको कांटिन्यू करना पड़ेगा, फॉलोअप जरूरी है। दीक्षितजी का गुस्सा फट पड़ा। पंडितजी जब अपना कोई अखबार निकालना तो बड़के अरूण शौरी बन लेना, यहां ये सब नहीं चलेगा, कतई नहीं। संक्षेप में कहूं तो उस समय के सिटी चीफ रहे झा जी और दीक्षितजी कौशांबी के लिए रवाना हुए और एसपी से मिलकर क्षमायाचना के बाद तेज तर्रार रिपोर्टर अमरेश मिश्रा को हटाकर उनको बेहतर कार्य करने का ईनाम दिया गया था। इस प्रसंग का जिक्र इसलिए कि बेहतर कार्य करने का ‘पुरस्कार’ दिए जाने की परंपरा दैनिक जागरण में पुरानी है। तथाकथित विश्व के सर्वाधिक बिक्री वाले अखबार की यही हकीकत है। इस परंपरा के पारितोषजी पहली बार शिकार नहीं हुए हैं। ये तो दैनिक जागरण की पुरानी परंपरा रही है। लेकिन साथी याद रहे कोई रात इतनी लंबी नहीं होती जिसकी सुबह न हो।

 

इलाहाबाद से वरिष्ठ पत्रकार शिवाशंकर पांडेय। लेखक दैनिक जागरण, अमर उजाला, हिंदुस्तान आदि अखबारों में कई साल कार्य कर चुके हैं। संपर्कः मोबाइल-9565694757, ईमेलः Shivashanker_panddey@rediffmail.com

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