घर चलाने को परचून की दुकान खोल लो पर पत्रकार मत बनना!

शांतनु भौमिक

Om Thanvi : शान्तनु भौमिक की हत्या ने यही साबित किया है कि जुझारू पत्रकार न कम्युनिस्ट शासन में सुरक्षित हैं, न कांग्रेस या भाजपा राज में। हिंसा से क़लम को कुचलने का अजीबोग़रीब दौर है।

Nitin Thakur : पैसा पहले ही नहीं था, इज़्ज़त हाथों से फिसलती ही जा रही है और अब बात जान पर बन आई है। ऐसे माहौल में पत्रकार बनना कौन चाहेगा? बन गया तो सड़कों पर उतरकर रिपोर्टिंग का रिस्क आखिर क्यों ले? सरकार बचाव के लिए हाथ में हथियार तो देती नहीं है। मरने पर सबको मुआवज़ा भी नहीं मिलता। नौकरियां प्राइवेट हैं तो पेंशन-वैंशन भूल जाइए। दिक्कत तो ये है कि जो जनता जंग और हनीप्रीत से अघाई हुई है उसे भी वो पत्रकार नहीं दिखते जिन्होंने खून देकर पेशा निभाया है। 28 साल का शांतनु भौमिक उम्र में मुझसे भी छोटा था। ज़ाहिर है, सपने बड़े ही रहे होंगे। त्रिपुरा के लोकल चैनल का रिपोर्टर था। अगरतला से 35 किलोमीटर दूर मंडई में IPFT और TRUGP नाम के संगठनों में हुई झड़प को कवर करने गया था। वो किसी की तरफ नहीं था। बस अपने चैनल के लिए फुटेज जुटा रहा था ताकि लोगों तक ग्राउंड रिपोर्ट पहुंचाई जा सके। गुस्साई भीड़ ने शांतनु पर हमला बोल दिया। बता रहे हैं कि पहले टांगों में मारा। जब गिर गया तो सिर पर डंडों से मार-मार कर जान निकाल ली। फिर लाश को खींचकर एक स्टेडियम के पीछे फेंक दिया। हिंसा करने वालों में बीजेपी और वामपंथियों दोनों के साथी शामिल होने का शक है. त्रिपुरा में सरकार वामपंथियों की है. सरकार ने सीबीआई जांच की सिफारिश भले कर दी हो पर राजनीतिक कार्यकर्ताओं से होते हुए पत्रकारों की मौत तक पहुंचने का सिलसिला ये कहने को मजबूर कर रहा है कि साथियों, भले अपने घर चलाने को परचून की दुकान खोल लो पर पत्रकार मत बनना, और अगर बन जाओ तो दफ्तर में ही बैठकर बेवकूफ दर्शक- पाठक को मनोहर कहानियां लिखकर बेच देना मगर ना तो विचारोत्तेजक लेख लिखना और ना ही फील्ड में जाने का रिस्क लेना।

वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी और नितिन ठाकुर की एफबी वॉल से.

इसे भी पढ़ें….

कृपया हमें अनुसरण करें और हमें पसंद करें:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *