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प्रेमचंद पर बोलना ही काफी नहीं, कुछ ऐसा करें कि उनका लिखा सार्थक हो

prem chand

हम लोग ईश्वर, अल्लाह, गुरूनानक और ईसा मसीह को खूब मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी नहीं मानते हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे हम प्रेमचंद को पढक़र उनकी तारीफ करते अघाते नहीं लेकिन कभी उनके पात्रों को मदद करने की तरफ हमारे हाथ नहीं उठते हैं। प्रेमचंद पर बोलकर, लिखकर हम वाहवाही तो पा लेते हैं लेकिन कभी ऐसा कुछ नहीं करते कि उनका लिखा सार्थक हो सके। प्रेमचंद की जयंती पर विशेष आयोजन हो रहे हैं, उनका स्मरण किया जा रहा है। लाजिमी है कि उनके जन्म तारीख के आसपास ही ईद का पाक उत्सव भी मनाया जाता है।

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हम लोग ईश्वर, अल्लाह, गुरूनानक और ईसा मसीह को खूब मानते हैं लेकिन उनका कहा कभी नहीं मानते हैं। बिलकुल वैसे ही जैसे हम प्रेमचंद को पढक़र उनकी तारीफ करते अघाते नहीं लेकिन कभी उनके पात्रों को मदद करने की तरफ हमारे हाथ नहीं उठते हैं। प्रेमचंद पर बोलकर, लिखकर हम वाहवाही तो पा लेते हैं लेकिन कभी ऐसा कुछ नहीं करते कि उनका लिखा सार्थक हो सके। प्रेमचंद की जयंती पर विशेष आयोजन हो रहे हैं, उनका स्मरण किया जा रहा है। लाजिमी है कि उनके जन्म तारीख के आसपास ही ईद का पाक उत्सव भी मनाया जाता है।

ईद को केन्द्र में रखकर गरीबी की एक ऐसी कथा प्रेमचंद ने ईदगाह शीर्षक से लिखी कि आज भी मन भर आता है। सवाल यह है कि दशक बीत जाने के बाद भी हर परिवार उसी उत्साह से ईद मना पा रहा है। शायद नहीं, इस बात का गवाह है ईद के दिन अपनी गरीबी से तंग आकर एक युवक ने मौत को गले लगा लिया। उसे इस बात का रंज कि वह ईद पर अपने दो बच्चों के लिये नये कपड़े नहीं सिला पाया। उन्हें ईदी भी नहीं दे पाया होगा। एक पिता के लिये यह शायद सबसे ज्यादा मुश्किल की घड़ी होती है। मरने वाला संवेदनशील था और उसे अपनी बेबसी का मलाल था। वह चाहता तो दूसरों की तरह मजबूरी का रोना रोकर और कुछ दिन गुजार लेता लेकिन मरने वाले का जिंदगी से जिस्मानी नहीं, दिली रिश्ता था। वह अपने बच्चों को दुखी देखकर जी नहीं पाया।
 
एक आम आदमी की तरह मैं उसके आत्महत्या की तरफदारी नहीं करूंगा लेकिन एक पिता के नाते उसके भीतर की तड़प को समझने की ताकत मुझमें है। शायद मैं भी कभी इस समय से गुजर चुका हूं लेकिन तब कोई काम मिल गया था और मेरी मदद हो गई थी। मैं थोड़ा बेशर्म किस्म का इंसान हूं इसलिये नजरें झुकाये जी लेता लेकिन मौत को गले नहीं लगाता। बस, उसमें और मुझमें यही फर्क था कि वक्त ने उसका साथ नहीं दिया और मेरा साथ दे दिया था। उसे तो दुनिया से फना हो जाना था, सो हो गया लेकिन क्या यह समाज उसके दर्द को समझ पायेगा? उसके रहते, उसकी बेबसी और मजबूरी के चलते उसके परिवार ने एक ईद नहीं मनायी लेकिन उसके जाने के बाद हर दिन बेवजह उपवास रखने की जो नौबत आ रही है, उसका क्या कीजियेगा?

हैरान इस बात को लेकर हूं कि एक मानवीय खबर को भीतर के पन्ने पर एक दुर्र्घटना के समाचार के रूप में छाप कर अपने दायित्वों की इतिश्री कर ली गई। इस पर कोई बात नहीं हुई। हां, बीजेपी नेता प्रभात झा ने कह दिया कि लाल गाल वाले टमाटर खाते हैं तो अखबारों की प्रमुख खबर तो बन ही गई, आमजन में चर्चा का विषय भी। क्या जो लोग आज और कल प्रेमचंद का स्मरण कर रहे होंगे, वे इस युवक के बारे में कोई बात करेंगे। ईदगाह के हामिद की बार-बार चर्चा होगी कि कैसे ईदी के पैसों से उसने दादी की चिंता की लेकिन क्या कोई इस युवक की चर्चा करेगा कि कैसे उसे अपने बच्चों का दुख देखा नहीं गया और उसने मौत को गले लगा लिया। दरअसल, अब हमें ढोंग से उबर जाना चाहिये। हमें मान लेना चाहिये कि मूर्तिपूजक बन कर रह गये हैं। हमें मूर्ति से वास्ता है, मूर्ति के बताये रास्ते हमारे लिये नहीं हैं।

 

मनोज कुमार

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