उल्का ने रोपा पृथ्वी पर जीवन!

चंद्रभूषण-

जीवन की उत्पत्ति को लेकर कुछ गुत्थियां अभी सुलझनी बाकी हैं। एक तो यही कि सबसे प्रारंभिक रूप में जीवन हमारे अपने ग्रह पर ही पैदा हुआ या कहीं बाहर से पूरी की पूरी या फिर हिस्सों में इसकी आमद धरती पर हुई। ‘पैनस्पर्मिया’ नाम का सिद्धांत, जिसके मुरीद आइजक न्यूटन भी हुआ करते थे, इस बुनियादी प्रस्थापना पर टिका है कि जीवन के बीज ब्रह्मांड में हर जगह फैले हुए हैं। जहां भी उन्हें उपयुक्त परिस्थिति मिल जाती है, वहीं जिंदगी की फसल लहलहाने लगती है। समस्या यह है कि न्यूटन के दुनिया से विदा होने के कोई तीन सौ साल बाद भी पृथ्वी के अलावा कहीं और यह फसल लहलहाती तो क्या सुगबुगाती हुई भी नहीं पाई गई है।

इससे पैनस्पर्मिया को सिद्धांत के बजाय सनक की तरह देखने का एक चलन भी चल निकला है। लेकिन उल्का पिंडों पर काम करने वाले कुछ जापानी वैज्ञानिकों ने इस चलन को तोड़ते हुए हाल में बताया है कि जीवन की इमारत में लगी एक-एक ईंट का नमूना उन्होंने ऐसे उल्कापिंडों में खोज निकाला है, जो पृथ्वी तो क्या सौरमंडल से भी पुराने हैं। धरती पर जीवन के जितने भी रूपों के बारे में हम जानते हैं- शेर, हाथी, ह्वेल और इंसान से लेकर मछली, घड़ियाल, चिड़िया, चींटी, मकड़ी, आम, इमली, चीड़, बांज, काई, सेवार, मूंगा, स्पंज, फफूंद और बैक्टीरिया तक- उन सबकी बुनियादी इकाई कोशिका है। कोशिका खुद में एक जटिल चीज है। इतनी जटिल कि सूक्ष्मदर्शी से ही नजर आने के बावजूद उसका मेकेनिज्म किसी आधुनिक जेट विमान को टक्कर देता है।

जीवन का ढांचा

इस जटिलता के बावजूद कुछ चीजें हर कोशिका में हर हाल में पाई जाती हैं- चाहे वह ह्वेल जैसे विशाल प्राणी के शरीर में मौजूद हो या फिर किसी बैक्टीरिया में, जो एक अकेली कोशिका में ही मगन रहता है। ये चीजें हैं- 1. एक दीवार (सेल वॉल) जो उसकी भीतरी चीजों को बाहरी दुनिया और अन्य कोशिकाओं से अलग करती है, 2. बाहर से ऊर्जा की आवाजाही का कोई सिस्टम, और 3. कोशिका के भीतर एक और कोठरी में बंद डीएनए जो न केवल इसके व्यवहार को नियंत्रित करता है, बल्कि विभाजन के जरिये समय में इसकी निरंतरता भी सुनिश्चित करता है।

अभी कोविड की शक्ल में दुनिया को तबाह किए हुए सार्स कोव-2 और इसके जैसे अनगिनत वायरसों को जीवित प्राणी माना जाए या नहीं, यह बहस कभी हल नहीं होने वाली। फिर भी उनका ढांचा इस मायने में कोशिका जैसा है कि उनकी भी एक दीवार होती है और डीएनए के बजाय आरएनए नाम का पदार्थ उनके चाल-चलन को निर्धारित करता है। संक्षेप में कहें तो जीवन के बारे में कही जाने वाली कोई भी बुनियादी बात असल में आरएनए और डीएनए के बारे में ही होती है, जिनका पूरा नाम राइबो न्यूक्लिक एसिड और डिऑक्सी राइबो न्यूक्लिक एसिड है।

कोई कह सकता है कि आरएनए और डीएनए, या इनमें से कोई एक अगर कहीं पड़ा हुआ मिल जाए तो उसे जीवन तो नहीं मान लिया जाएगा। क्योंकि कोई सामान्य कोशिका या वायरस बनने के लिए इसके अलावा भी कई चीजें जुटानी पड़ेंगी और उनकी असेंबलिंग के लिए कई सारे ऐसे करम करने पड़ेंगे, जो अभी इंसानी क्षमता के बाहर हैं। फिर भी मुख्यतः डीएनए और एक हद तक आरएनए को ही जीवन की बुनियाद मानने में वैज्ञानिकों को कोई हिचक नहीं है।

ऊपर जिन जापानी वैज्ञानिकों का जिक्र किया गया है- होकाइडो यूनिवर्सिटी के असोसिएट प्रोफेसर यासुहिरो ओबा और उनकी टीम- उन्होंने उल्कापिंडों में आरएनए या डीएनए तो नहीं खोजा है, लेकिन जिन कार्बनिक अणुओं से ये पदार्थ बनते हैं, वे सारे के सारे उन्होंने इनमें खोज निकाले हैं। ये पदार्थ क्या हैं? डीएनए और आरएनए, दोनों के निर्माण में राइबोज नाम की एक खास शक्कर की जरूरत पड़ती है। जो शक्कर हम खाते हैं, वह सुगर नाम के अनेक रासायनिक पदार्थों में से एक है और ‘ओज’ इन सभी के नाम में आता है। जैसे ग्लूकोज, फ्रक्टोज और लैक्टोज हैं, उसी तरह राइबोज भी है। कार्बनिक उल्कापिंडों में राइबोज की शिनाख्त काफी पहले की जा चुकी है। जिन तीन उल्कापिंडों पर जापानी वैज्ञानिकों ने काम किया है, उनमें भी।

जी, सी, ए, टी और यू

इसके अलावा चार रसायनों (न्यूक्लियोटाइड्स) से डीएनए बनता है- गुआनीन, साइटोसीन, एडेनीन और थायमीन। इनमें से चौथा यानी थायमीन आरएनए में नहीं पाया जाता। वहां यूरेसिल नाम का एक और रसायन उसकी जगह ले लेता है। जीवविज्ञानी इन रसायनों को जीवन का महाग्रंथ लिखने में काम आए अक्षरों की तरह भी पेश करते हैं- – जी, सी, ए, टी और यू। कमाल यह कि ये पांच के पांचो रसायन यासुहिरो ओबा की टीम ने अलग-अलग मौकों पर अलग-अलग जगह गिरे तीन उल्कापिंडों में खोज निकाले हैं।

इस खोज के साथ सबसे बड़ा संदेह इन उल्काओं के पृथ्वी के संपर्क में आने के बाद हुई मिलावट से जुड़ा है। धरती की हवा, पानी और मिट्टी के संपर्क से ये रसायन इन उल्कापिंडों में नहीं पहुंच गए हैं, इसकी गारंटी कैसे की जाए। जाहिर है, इनकी अत्यंत सूक्ष्म मात्रा ही उल्कापिंडों में मौजूद पाई गई थी और जिस पद्धति से इनकी पहचान की गई, वह इतनी अचूक है कि हजारों टन वजनी पहाड़ में किसी विशिष्ट रसायन की एक मिलीग्राम मात्रा को भी साफ पकड़ सकती है। जीवन के अक्षर तो ओबा की टीम को खोज के लिए मिले उल्कापिंडों के एक-दो ग्राम हिस्से में ही तलाशने थे।

मिलावट के संदेह का शमन करने के लिए इस टीम ने बहुत दिलचस्प ब्यौरे दिए हैं। पांचों रसायनों के कुछ ऐसे रूप (आइसोमर) भी उसे इन उल्कापिंडों में दिखे हैं, जिनका कोई लेश भी इनकी बरामदगी वाली जगह की मिट्टी में नहीं पाया गया। इसके बावजूद यह एक टीम की खोज है और इसे वैज्ञानिक सत्य का दर्जा अन्य टीमों की जांच के बाद ही मिलेगा। ध्यान रहे, धरती पर आने से पहले ये उल्कापिंड अरबों साल तक अंतरिक्ष में थे, जहां का तापमान 10 डिग्री केल्विन यानी माइनस 263.15 डिग्री सेल्सियस से ऊपर नहीं जाता। इतने कम तापमान पर किसी जटिल रासायनिक क्रिया की कल्पना भी कठिन लगती है।

सूरज का हमउम्र

ऊंचे तापमान पर आने का मौका इन्हें पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश करने के बाद ही मिला होगा, जो जटिल कार्बनिक रासायनिक क्रियाओं के लिए दूसरे छोर की असंभव स्थितियां पैदा करता है। रगड़ से पैदा होने वाला सैकड़ों डिग्री सेल्सियस का तापमान, जिसमें ठोस लौह संरचना वाले पत्थर भी भभक कर जल उठते हैं। उम्र पर जाएं तो रेडियोधर्मी आइसोटोपों के अध्ययन से इन उल्कापिंडों की उम्र 4 अरब साठ करोड़ साल निकाली गई है, जो सूरज के बराबर और पृथ्वी से ज्यादा है। पृथ्वी की आयु 4 अरब 54 करोड़ तीस लाख साल और सूरज की इससे छह करोड़ साल ज्यादा, 4 अरब साठ करोड़ 30 लाख साल नापी गई है। इन उल्का पिंडों की आयु पृथ्वी की तुलना में सूरज के ज्यादा करीब है। यूं कहें कि ये उसी मलबे का हिस्सा हैं, जिससे सूरज का निर्माण हुआ।

जब तक जापानी टीम की खोज पर कोई निर्णायक सवाल नहीं खड़ा हो जाता, तब तक इन तीनों उल्कापिंडों- 1950 में अमेरिका में गिरे ‘मरे मीटिअराइट’, 1969 में ऑस्ट्रेलिया में गिरे ‘मर्चीसन मीटिअराइट’, और सन 2000 में कनाडा में गिरे ‘टैगिश लेक मीटिअराइट’- में मिले मूल जैविक रसायनों राइबोज, गुआनीन, साइटोसीन, एडेनीन, थायमीन और यूरेसिल को सौरमंडल के निर्माण के दौरान हुई फोटोकेमिकल (प्रकाश-रासायनिक) क्रियाओं का परिणाम माना जाएगा।

धरती पर पहली कोशिका का, या उससे अलग किसी और रूप में बनने वाले जीवद्रव्य (साइटोप्लाज्म) का निर्माण बाहर से आने वाले ऐसे उल्कापिंडों के जरिये हुआ या हमारे ग्रह के अपने रसायनशास्त्र ने ही इसे रच डाला, यह जानने का कोई तरीका फिलहाल मौजूद नहीं है। लेकिन जीवन की ईंटें बनना अगर इतना आसान है कि तारों के बनने के दौरान खुद-ब-खुद यह काम हो जाया करता है, तो काफी संभावना है कि ऐसी ईंटें पूरे ब्रह्मांड में बिखरी होंगी और जिंदगी की छोटी-बड़ी इमारतें अन्य जगहों पर भी खड़ी हुई होंगी। पृथ्वी से इतर जीवन में विश्वास करने वालों के लिए यह उम्मीद बंधाने वाली बात है। भले ही इसकी पुष्टि या नकार अभी बहुत दूर का मामला हो।



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