राहुल गांधी की यात्रा और पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी!

अमरीक-

राहुल गांधी की अगुवाई वाली भारत जोड़ो यात्रा का पंजाब सफर खत्म हो गया है। यकीनन यह यात्रा पंजाब में काफी प्रभावशाली रही। कांग्रेस का दावा है कि भारत जोड़ो यात्रा गैर सियासी है। लेकिन कम से कम पंजाब में तो इसके इर्द-गिर्द सियासत नजर आई। विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी बैकफुट पर थी और कुछ दिग्गज नेता पार्टी को अलविदा कह कर भाजपा के साथ चले गए थे। इनमें चुनाव से ऐन पहले अलहदा होने वालों में पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और उनके कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी साथी भी थे। प्रदेशाध्यक्ष रहे सुनील कुमार जाखड़ भी कांग्रेस में हिंदुओं की उपेक्षा और सीखो को तरजीह देने के आरोप लगाकर भाजपा में चले गए। चुनाव के बाद की उथल-पुथल ने राज्य इकाई को लुंज-पुंज कर दिया था।

करारी हार के बाद भी पंजाब कांग्रेस खेमेबाजी का शिकार रही। एक खेमा नए प्रदेशाध्यक्ष बने विधायक अमरिंदर सिंह राजा वडिंग है। दूसरा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा का और तीसरा जेल जाने को मजबूर हुए नवजोत सिंह सिद्धू का। जेल जाने के बावजूद सिद्ध के खेमेबाज साथी सक्रिय रहे। 26 जनवरी को नवजोत रिहा हो रहे हैं और फिर से राजनीति में सक्रिय हो जाएंगे। भारत जोड़ो यात्रा में शिरकत करने वाली उनकी पूर्व विधायक पत्नी डॉक्टर नवजोत कौर सिद्धू ने भी बाकायदा ऐसे संकेत दिए हैं। वह राहुल गांधी के साथ-साथ लगभग बीस किलोमीटर पैदल चलीं और उनसे बातचीत भी की। अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और प्रताप सिंह बाजवा तो पहले दिन से ही राहुल गांधी की पंजाब से गुजरी भारत जोड़ो यात्रा में उनके साथ थे।

बताया जाता है कि राहुल गांधी ने वडिंग, बाजवा और डॉ सिद्धू से साफ कहा कि अब धडेबाजी छोड़कर, एकजुटता के साथ काम करें। थोड़े अरसे के बाद सूबे में निकाय चुनाव होने हैं। जालंधर लोकसभा सीट पर भी उपचुनाव यथाशीघ्र होगा। यहां से चौधरी संतोख सिंह सांसद थे और भारत जोड़ो यात्रा के दौरान उनका आकस्मिक निधन हो गया था। कांग्रेस की यह परंपरागत जीत वाली सीट है। राहुल गांधी और भारत जोड़ो यात्रा को खासतौर पर जालंधर में चौधरी संतोख सिंह के दिवंगत हो जाने के बावजूद बहुत अच्छा रिस्पांस मिला। पार्टी आलाकमान चाहता है कि इसका दूरगामी फायदा लिया जाए। यह तभी संभव है जब पार्टी एकजुट हो। पंजाब में अपनी आखरी पत्रकार वार्ता में भी राहुल गांधी ने संकेत दिए कि पंजाब में गुटबाजी का दौर खत्म हो गया है।

भारत जोड़ो यात्रा और इसकी अगुवाई करने वाले राहुल गांधी यहां कई प्रभाव छोड़ गए हैं और कुछ सवाल भी।

अब सर्वमान्य तथ्य है कि उन्होंने सिखों के एक प्रभावशाली एवं बड़े तबके का दिल जीता। मुख्य प्रतिद्वंदी शिरोमणि अकाली दल और आम आदमी पार्टी (आप) की कवायद थी कि भारत जोड़ो यात्रा पंजाब में असफल रहे। खासतौर से सिख समुदाय इकट्ठा होकर राहुल गांधी का विरोध करे। ऑपरेशन ब्लू स्टार, 84 का सिख नरसंहार और बंदी सिखों की रिहाई के मुद्दे पर राहुल को घेरा जाए। जगह-जगह उन्हें काले झंडे दिखाए जाएं और गांधी परिवार के विरोध में खुल कर नारेबाजी की जाए। यात्रा की पूर्व संध्या पर राहुल गांधी ने एक बड़ा दांव खेलते हुए विपक्ष की इस रणनीति को पूरी तरह नाकामयाब कर दिया। आम श्रद्धालु की तरह, बगैर सुरक्षा तामझाम के और बाकायदा पगड़ी बांधकर वह बिना पूर्व सूचना अमृतसर स्थित श्री स्वर्ण मंदिर साहिब गए और मत्था टेक का। सिखों पर इसका बहुत अच्छा प्रभाव गया। बादलों की जेबी संस्था शिरोमणि अकाली दल (एसजीपीसी) की इस बात के लिए दुनिया भर के सिखों के एक तबके में खूब आलोचना हो रही है कि उसने विशिष्ट अतिथि होने के बावजूद राहुल गांधी को सम्मानित नहीं किया। जबकि परंपरा रही है कि कोई भी विशिष्ट व्यक्ति जब श्री हरमंदिर साहिब जाता है तो उसे सिरोपा वगैरह देकर औपचारिक तौर पर सम्मानित किया जाता है। राहुल गांधी की सरासर अनदेखी की गई और उन्हें उस द्वार में से भी भीतर नहीं जाने दिया गया, जहां से वशिष्ठ लोग जाते हैं। सोशल मीडिया पर सिखों की ओर से लाखों की तादाद में पूछा गया कि क्या गुरु घर में किसी के साथ ऐसा बर्ताव जायज है? पंजाब में जो कुछ इंदिरा गांधी के दौर में हुआ उसके लिए राहुल गांधी कतई जिम्मेदार नहीं है और न कुख्यात दिल्ली दंगों के गुनाहगार हैं। फिर ऐसा सुलूक क्यों? बादल दंपति (सुखबीर और हरसिमरत कौर) का बयान था कि राहुल गांधी को वहां जाने ही नहीं दिया जाना चाहिए था। बहुतेरे सिख पूछ रहे हैं कि क्या यह पंथक मर्यादा के अनुकूल है कि किसी को वहां जाने से रोका जाए? सिख गुरुओं का संदेश तो यह है कि वहां आने वाले दुश्मन को भी गले से लगाया जाए और फिर राहुल गांधी ने तो भूल से भी ऐसा कोई बयान तक नहीं दिया जो सिख भावनाओं को आहत करता हो।

अमृतसर यात्रा के ठीक अगले दिन वह फिर से पगड़ी बांधकर श्री फतेहगढ़ साहिब गुरुद्वारा गए और आम श्रद्धालु की तरह नतमस्तक हुए। फतेहगढ़ से लुधियाना तक उन्होंने सिखों की खास पहचान पगड़ी पहने रखी। पूरा वक्त।

पंजाब आकर दिए अपने वक्तव्यों तथा होशियारपुर में पत्रकार वार्ता में उन्होंने दो टूक कहा कि भारत, भारत नहीं होता–अगर सिख समुदाय न होता। इससे पहले सार्वजनिक भाषण में उन्होंने सिख गुरुओं का नाम लेकर श्रद्धा के फूल भेंट किए। उन्होंने साफ कहा कि प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी 84 के दुखद घटना क्रम के लिए बाकायदा माफी मांग चुके हैं और मैं इससे पूरी तरह सहमत हूं। सिखों को उन्होंने मार्शल कौम बताया और कहा कि इस समुदाय से उन्हें गहरा लगाव एवं प्यार है। राहुल गांधी की ऐसी बातों ने सिख समुदाय के एक तबके का दिल निश्चित तौर पर जीत लिया। यहां तक कि अमृतधारी सिखों और निहगों से वह अपना सुरक्षा चक्र तोड़कर गले लगकर मिले। पंजाबी हिंदुओं ने भी उन्हें अथाह प्यार दिया। राज्य में भारत जोड़ो यात्रा और राहुल गांधी पूरी तरह कामयाब रहे, इसमें शक नहीं।

अब कुछ सवाल। राहुल गांधी अमृतसर के स्वर्ण मंदिर साहिब में तो गए लेकिन आजादी के लिए शहादत की अमर निशानी जलियांवाला बाग नहीं गए। जबकि जलियांवाला बाग श्री स्वर्ण मंदिर साहिब से थोड़ी ही दूर है। वहां तक पैदल भी जाते तो बमुश्किल दस मिनट लगने थे। दिल्ली के किसान मोर्चे की बात उन्हें पहले ही करनी चाहिए थी और 700 मृतक/शहीद किसानों में से कुछ के घर भी जाना चाहिए था। पंजाब की मालवा पट्टी में किसान सबसे ज्यादा बदहाल और इस कदर कर्जदार हैं कि खुदकुशी वहां हर सुबह नई खबर लेकर नाम उदार होती है बल्कि खुदकुशियों का सूरज तो वहां डूबता ही नहीं! उस मालवा पट्टी को भारत जोड़ो यात्रा के नक्शे में नहीं रखा गया। वहां नशे की मार और कैंसर की महामारी के चलते आए दिन कई घरों में चूल्हे नहीं जलते। वैसे भी मालवा को अब ‘किसानों की मौत का घर’ और ‘कैंसर पट्टी’ कहा जाता है। मालवा के ऐसे इलाके उस खित्ते दोआबा से दूर नहीं हैं। आत्महत्या तथा नशे का ग्रहण पूरे पंजाब को लगा हुआ है। राहुल गांधी को इसके चलते स्थायी रूप से बेरोशन हो रहे घरों में जरूर जाना चाहिए था। सरकार तो जाती नहीं! भारत जोड़ो यात्रा के मकसद से यह उम्मीद पीड़ितों को जरूर थी लेकिन राहुल गांधी ने इस और गौर नहीं किया। मालवा के नव शहर में ही वह जेल है जहां जवाहरलाल नेहरू को अंग्रेज हुक्मरानों ने एक दिन के लिए तब कैद रखा था, जब वह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान लगे ऐतिहासिक ‘जैतो मोर्चे’ में शिरकत के लिए पंजाब आए थे। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, राहुल गांधी परिवार की सिरमौर हस्ती थे और उनकी दादी श्रीमती गांधी के पिता थे। इतिहास में नाभा की वह जेल और जैतो का मोर्चा अहम मुकाम रखते हैं। इन जगहों को भी राहुल गांधी का इतर वजू से इंतजार था। भारत जोड़ो यात्रा की शुरुआत में कहा गया था कि यह राजनीति से परे देश को समझने और उससे संवाद करने की यात्रा है। लेकिन राहुल गांधी ने पंजाब यात्रा के अंतिम दिन भगवंत मान सरकार और आम आदमी पार्टी पर तलक टप्पणियां कीं। क्या यह यात्रा पर चढ़ा सियासी रंग नहीं है?

बाहरहाल, पंजाब में पहले भी पैदल यात्राएं और ‘रथ यात्राएं’ निकलतीं रहीं हैं। लेकिन इतनी चर्चा और कामयाबी पहले किसी को हासिल नहीं हुई। आने वाला वक्त बखूबी बता जाएगा कि राहुल गांधी को पंजाब से और पंजाब को राहुल गांधी से क्या हासिल हुआ? इतिहास का अपना साइकिल, अपना यथार्थ और मौलिक सच्चाई होती है। जो फौरी तौर पर नहीं बल्कि बाद में सामने आती है। निश्चित तौर पर भारत जोड़ो यात्रा और उसकी अगुवाई करने वाले राहुल गांधी को भी पूरे नतीजों की बाबत बाद में पता चलेगा। फिलवक्त उन्हें जरूर जवाब मिल गया है, जो यात्रा से पूर्व विज्ञापनी भाषा में कहते थे कि राहुल पर फूल नहीं पत्थर बरसेंगे लेकिन इस सरहदी सूबे की सड़कों पर पैदल चले राहुल गांधी पर फूल ही बरसे। पत्थर किसी से नहीं बरसाए गए। उकसावे और साजिशों के बावजूद!



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