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सियासत

अतीत में जो कुछ हुआ उसमें राहुल गांधी का क्या कुसूर?

अमरीक-

क्या पंजाब की सियासत को बदलेगा राहुल गांधी का ‘पंजाबियत’ रंग?

11 जनवरी की सुबह राहुल गांधी ने फतेहगढ़ साहिब स्थित दशम गुरु श्री गुरु गोविंद सिंह के साहिबजादों की बेमिसाल शहादत की पवित्र याद में बने गुरुद्वारा साहिब में मत्था टेका, प्रसाद ग्रहण किया और यात्रा की कामयाबी के लिए अरदास की। गुरुद्वारा परिसर में मौजूद एक पत्रकार ने इस संवाददाता को बताया कि राहुल गांधी ने वहां अपने आसपास खड़े लोगों से बातचीत में कहा कि वह छोटे साहिबजादों की कुर्बानियों से बखूबी वाकिफ हैं। बचपन से किताबों में उनकी बाबत पढ़ते आए हैं। इसके बाद वह ऐतिहासिक रोजा शरीफ गए और सजदा किया। दोनों जगह राहुल गांधी को देखने के लिए भारी भीड़ जमा थी। बहुतेरे लोग राहुल गांधी के करीब जाकर उनसे मिलना चाहते थे लेकिन कड़ी सुरक्षा के चलते ऐसा संभव नहीं हुआ। कल भारत जोड़ो यात्रा कि पंजाब मैं शुरुआत से ऐन पहले उन्होंने श्री स्वर्ण मंदिर साहिब में मत्था टेका था। उनके आकस्मिक अमृतसर जाने के कार्यक्रम में सरकार तथा अवाम को खासा हैरान कर दिया। कल अमृतसर में राहुल गांधी केसरिया रंग की पगड़ी में थे और आज उन्होंने लाल रंग की पगड़ी बांधी हुई है। केसरिया और लाल रंग का पंजाबी रिवायत में विशेष महत्व है। पगड़ी पंजाबियों की आन- बान और शान है ही।

मुद्दत बाद ऐसा हुआ है कि दिल्ली से आए किसी राष्ट्रीय नेता ने पूरा वक्त पगड़ी बांधकर रखी हो। इससे पहले थोड़ी देर के लिए पगड़ी सिर पर रख ली जाती थी और फिर उतार दी जाती थी। लेकिन लगता है कि राहुल गांधी जितने दिन पंजाब रहेंगे, उतने दिन पगड़ी बांध कर रखेंगे। भारत जोड़ो यात्रा के पंजाब पड़ाव के दौरान राहुल गांधी पूरी तरह से पंजाबियत के रंग में रंगे दिखना चाहते हैं। विपक्ष को यह उनका ‘ड्रामा’ लग रहा है लेकिन पंजाबियों को उनका यह अंदाज खूब पसंद आ रहा है। अपने मौलिक अंदाज में राहुल गांधी पंजाब में यह साबित करना चाहते हैं कि वह सांझी विरासत ‘पंजाबियत’ के प्रबल पक्षधर हैं। अपनी यात्रा को वह साथ- साथ धर्मनिरपेक्ष रंग भी देना चाहते हैं और किसानों के बीच मकबूलियत हासिल करने की कवायद में भी हैं। भारत जोड़ो यात्रा की पूर्व संध्या पर उन्होंने फतेहगढ़ साहिब में एक किसान के घर मक्की की रोटी और सरसों के साग का सेवन किया। वहीं यूपी स्टाइल में पूड़ियां चलीं और वहां पहुंचे लोगों से खुलकर बातचीत की।

उन्होंने पंजाबियों, खासतौर से सिखों को ‘मार्शल कौम’ बताया है। पहले भी कुछ मंचों से वह ऐसा कह चुके हैं लेकिन इस बार उनके कथन के मायने दूसरे हैं। ध्यान से देखा जाए तो भारत जोड़ो यात्रा के पंजाब पड़ाव के पहले दिन उनके साथ चलने वाले सह यात्रियों की तादाद में ज्यादातर ‘गबरु जवान’ हैं। एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी पंजाबी पत्रकार अभिजीत सिंह सेखों के मुताबिक राहुल गांधी बीच-बीच में युवाओं से बातचीत भी कर रहे हैं और उनका जोर इस बात पर है कि पंजाब को नशा मुक्त कराया जाए। अभिजीत बताते हैं कि एक जगह रुक कर उन्होंने 2 मिनट के बेहद संक्षिप्त भाषणनुमा कथन में कहा कि हाथ जोड़कर प्रार्थना है कि पंजाब के नौजवान नशों के जहर से दूर रहें। इससे पंजाब के सुनहरे दिन लौट आएंगे। एक और जगह उन्होंने कहा कि उनके पुरखे पंजाब, पंजाबियों और सिख गुरुओं का बेहद सत्कार करते थे और यही भावना उनके मन में भी है। यह सुनकर लोगों भाव विभोर होकर खूब तालियां बजाई और राहुल गांधी के नाम पर जयकारे लगाए। राहुल ने भी मुट्ठी हवा में लहराकर उनका इस्तकबाल किया। अब तक की हासिल जानकारी बताती है कि राहुल गांधी की अगुवाई वाली भारत जोड़ो यात्रा सरहिंद के पास है और वहां आम लोग, जिनमें किसानों और युवाओं की तादाद काफी ज्यादा है, राहुल के करीब जाकर उनसे मिलना चाहते हैं लेकिन सख्त सुरक्षा बंदोबस्त के चलते यह संभव नहीं हो रहा। लोग थोड़े फासले पर किनारे से ही ‘राहुल जिंदाबाद’ के नारे लगा रहे हैं। लाल रंग की पगड़ी में राहुल को देखकर लोग बेहद खुश हो रहे हैं। खासतौर से सिख समुदाय के लोग।

इस तमाम घटनाक्रम का सूक्ष्म विश्लेषण करें तो राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के कई नए पहलू और मायने सामने आते हैं। सबसे बड़ा यह कि क्या गांधी परिवार अब पंजाब के सिखों में पूरी तरह स्वीकार्य हो गया है? न अमृतसर, न फतेहगढ़ साहिब और न ही सरहिंद में राहुल गांधी का रत्ती भर भी विरोध इस रिपोर्ट को फाइल करने तक नहीं हुआ। विपक्ष के नेता, विशेषकर शिरोमणि अकाली दल की सांसद जोड़ी, पूर्व उपमुख्यमंत्री व प्रधान सुखबीर सिंह बादल और पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के इन बयानों को लोग गंभीरता से नहीं ले रहे कि गांधी परिवार पंजाबियों का दुश्मन है इसलिए राहुल गांधी का स्वागत न किया जाए बल्कि उन्हें काले झंडे दिखाए जाएं। इन बातों को अनसुना किया जा रहा है-इसका पुख्ता सबूत यह है कि राहुल गांधी के साथ पंजाब में चल रहे 80 फ़ीसदी लोग सिख समुदाय से हैं और सड़कों के किनारे तथा रास्तों में भी उनका स्वागत करने वालों में आम सिखों की तादाद ज्यादा है। यह कोई ‘प्रायोजित’ भीड़ नहीं है बल्कि लोग- बाग स्वेच्छा से काम-धंधा छोड़कर राहुल गांधी के लिए घरों से बाहर निकल रहे हैं और उनकी विनम्रता का जवाब विनम्रता में दे रहे हैं।

कल जब राहुल गांधी अमृतसर स्थित श्री स्वर्ण मंदिर साहिब गए तो संकीर्ण हो चली सिख सियासत ने एक पवित्र रिवायत का खुला उल्लंघन किया। रिवायत रही है कि जो भी महत्वपूर्ण व्यक्ति श्री हरमंदिर साहिब आता है, उसे सिरोपा और कुछ धार्मिक पुस्तकें देकर सम्मानित किया जाता है। राहुल गांधी को इस सम्मान से वंचित रखा गया। एक भरोसेमंद सूत्र और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के पदाधिकारी, जो राहुल गांधी के स्वर्ण मंदिर जाने के वक्त कमेटी कार्यालय में मौजूद थे, उन्होंने नाम न जाहिर करने की शर्त पर बताया कि एसजीपीसी की ओर से फैसला हो चुका था कि राहुल गांधी के सौम्य व्यवहार और श्रद्धा को देखते हुए उन्हें खाली हाथ न लौटाया जाए और उनकी विशिष्टता के मद्देनजर परंपरागत ढंग से सम्मानित किया जाए। सर्वविदित है कि एसजीपीसी (शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी) के आका बादल परिवार के लोग हैं।

राहुल गांधी को सम्मानित करने की तैयारियां आनन-फानन में की जा रही थी लेकिन एक फोन कॉल ने साफ हिदायत दी कि राहुल गांधी को विशिष्ट श्रद्धालु न माना जाए। ‘फोन करने वाले ने’ स्पष्ट ‘आदेश’ यह भी दिया कि उनके लिए विशेष द्वार न खोला जाए। जबकि कोई वीआईपी श्री स्वर्ण मंदिर साहिब में आता है तो भीड़ से बचाव के लिए उसे विशेष द्वार से श्री गुरु ग्रंथ साहिब के प्रकाश स्थल तक लाया जाता है। लेकिन राहुल को भीड़ में से गुजर कर वहां तक जाना पड़ा। बावजूद इसके कि विधानसभा में विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा ने इसे लेकर एसजीपीसी अधिकारियों को विशेष आग्रह किया था। लेकिन चंद पलों में सारी परंपराएं बिसरा दी गईं।

एक सिख विद्वान का कहना है कि यह सहिष्णुता के खिलाफ है। याद रखा जाना चाहिए था कि राहुल गांधी निमाने (एक तरह से बेहद विनम्रता के साथ) हो कर पूरी मर्यादा सहित श्री स्वर्ण मंदिर साहब गए थे। वहां तो पंथ के गद्दारों और दुश्मनों तक को रियायत दे दी जाती है। अतीत में जो कुछ हुआ उसमें राहुल गांधी का क्या कुसूर? एक सिख डॉ मनमोहन सिंह को देश का प्रधानमंत्री बना कर गांधी परिवार संदेश दे चुका है कि वह सिख समुदाय के प्रति बेहद उदार है।

बताया जाता है कि राहुल गांधी को इन परंपराओं की जानकारी दी गई और बताया गया कि उनके साथ सौतेला व्यवहार जानबूझकर किया गया है लेकिन उसी वक्त राहुल गांधी ने बात काटकर कहा कि इसे किसी भी कीमत पर सियासी मुद्दा न बनाया जाए, वह हरगिज ऐसा नहीं चाहते। जिसे जो करना है-वह करे। वह तो श्रद्धावत अरदास करने आए हैं।

अलबत्ता फौरी यह है कि पंजाब में इसका बुरा मनाया जा रहा है। सूबे में ऐसे सिखों की कमी भी नहीं जो अतीत के कई जख्म बुलाकर अब कांग्रेस के साथ हैं। गैर कांग्रेसी सिख भी एसजीपीसी का विरोध कर रहे हैं जो दरअसल बादल परिवार के हाथों का खिलौना भर है।

बहरहाल, भारत जोड़ो यात्रा के पहले दिन एकजुटता के साथ जिस तरह राहुल गांधी को गले लगाया जा रहा है और आम लोगों द्वारा उनका स्वागत किया जा रहा है, वह विपक्ष को कहीं न कहीं मुश्किल में डाल रहा है। अब देखना यह होगा कि राहुल गांधी का ‘पंजाबियत’ के अक्स वाला चेहरा पंजाब की सियासत को क्या नया मोड़ देता है? फिलवक्त तो पंजाब में राहुल गांधी की ‘बल्ले-बल्ले’ हो रही है!

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