वे जो कहते हैं ‘भारत में पत्रकारिता मर चुकी है’…

राहुल पांडेय-

जो लोग यह कहते हैं कि ”भारत में पत्रकारिता मर चुकी है,” क्या यह बताने का कष्ट करेंगे कि जिले तहसील के रोज ब रोज पिटते पत्रकारों के साथ वे आखिरी बार कब खड़े हुए थे? कब उनकी शर्मनाक सैलरी के लिए आवाज उठाई थी?

इसी कोरोनाकाल में हजारों पत्रकारों की नौकरी चली गई, मगर पत्रकारिता को मरा घोषित करने वालों के मुंह से क्या मजाल कि चूं तक निकली हो। मीठा चाहिए तो चीनी डालनी होती है। आखिरी बार कब उन्होंने देशभर के परेशान हाल श्रमजीवी पत्रकारों के हक की बात की थी?

उनसे पूछिए मजीठिया तो पूछते हैं कि वही चौक का चाटवाला ना? बहुत अच्छी बनाता है। पत्रकार तो रोज खबर लिखता है, हर तरफ से डांट मार खाता है, और अपनी मेहनत के कभी भी पूरे पैसे नहीं पाता है।

जो लोग यह कहते हैं कि ”भारत में पत्रकारिता मर चुकी है”, मैंने अक्सर देखा है कि वे पत्रकारों को यह भी सलाह देते हैं कि ”पैसे नहीं हैं तो कुछ और कर लो। किसी ने रोका है क्या? या डॉक्टर से लिखाकर लाए हो कि खबर नहीं लिखी तो मर जाओगे?” तो जो लोग यह कहते हैं कि ”भारत में पत्रकारिता मर चुकी है,” अक्सर ऐसे लोग मुझे सिरे से संवेदनहीन मिले।

उनसे आप दुनिया जहान पर बहस कर लीजिए, मगर एक गिलास पानी मांगा तो मुंह आड़ा तिरछा बनने लगता है। कहीं भूले से साथी पत्रकार की दिक्कतों की बात छेड़ दी तो फिर वह अपने धौरे दोबारा वैसे नहीं बैठाता, जैसे पूछने से पहले बैठाता था।

उनसे लाख गुने अच्छे वे लोग हैं जो हमारे जिले तहसील के पत्रकारों को यह पूछ लेते हैं कि रोटी खाई? पानी पिया? अगर यह कहना ही है कि ”पत्रकारिता मर चुकी है” तो यह भी जान लीजिए कि इसे जिंदा करने कोई मंगल ग्रह से नहीं आएगा।

चवन्नी देनी नहीं और गान अमरीका का। गल्ले पे बैठकर फेसबुक पर जो मर्जी अल्ल बल्ल सल्ल पोस्ट कर देना और हर पाद के साथ यह निकालना कि ”भारत में पत्रकारिता मर चुकी है,” कहीं से कैसी भी पत्रकारिता नहीं है, बल्कि ये किसी ऐसे किसान की लट्ठकारिता है, जिसके जुते हुए दोनों बैल भूखे हैं, फिर भी वह उन्हें लट्ठ मार मारकर कहता है, चल-चल, बढ़-बढ़!! हइया हो!!

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