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सुख-दुख

राम की मूर्ति : क्या एक पत्थर में इतना स्मित, इतनी आश्वस्ति, इतना आलोक, इतना प्रेम, इतनी करुणा भरी जा सकती है?

ध्रुव गुप्त-

मंदिरों में तो मेरी आस्था नहीं रही, लेकिन आज टेलीविजन पर रामलला की मूर्ति के दर्शन ने मुझे निःशब्द कर दिया है। यह छवि भीतर बहुत गहरे तक उतरी है।

एक पत्थर में इतना स्मित, इतनी आश्वस्ति, इतना आलोक, इतना प्रेम, इतनी करुणा भरी जा सकती है यह देखना अद्भुत अनुभव है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने बचपन में शायद ऐसे ही दिखते रहे होंगे।

आज यह जानना और भी सुखद था कि जिस मूर्तिकार की यह कृति है उसी ने केदारनाथ में शंकराचार्य और दिल्ली के इंडिया गेट पर सुभाषचंद्र बोस की बेमिसाल मूर्तियां भी गढ़ी है।

पुरुषोत्तम राम के साथ युवा मूर्तिकार अरुण योगीराज को भी मेरा प्रणाम !


अमिताभ श्रीवास्तव-

राम लला विराजमान। हिंदी पट्टी, खासतौर पर अवध के लोगों के बीच भगवान राम की प्रचलित छवि के मुकाबले दक्षिण भारतीय मूर्तिशिल्प में गढ़ी गई देवप्रतिमाओं की छाप दिख रही है इस बालरूप में।

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1 Comment

1 Comment

  1. Pramod Pandey

    January 23, 2024 at 5:09 pm

    वास्तव में सबको निःशब्द कर देने वाली कृति है।

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