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राजस्थान

क्रेडिट कोआपरेटिव सोसायटियों द्वारा बिना रिजर्व बैंक लाइसेन्स के किए जा रहे बैंकिंग कारोबार पर रोक

बाड़मेर : राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुनील अम्बवानी एवं न्यायमूर्ति प्रकाश गुप्ता की खण्डपीठ ने बुधवार को एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा बिना रिजर्व बैंक लाइसेन्स के किए जा रहे बैंकिंग कारोबार पर रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने क्रेडिट सोसायटियों द्वारा ऋण देने एवं एटीएम लगाने जैसे बैंकिंग व्यवसाय करने वाली गतिविधियों पर भी रोक लगा दी है।

<p>बाड़मेर : राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुनील अम्बवानी एवं न्यायमूर्ति प्रकाश गुप्ता की खण्डपीठ ने बुधवार को एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा बिना रिजर्व बैंक लाइसेन्स के किए जा रहे बैंकिंग कारोबार पर रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने क्रेडिट सोसायटियों द्वारा ऋण देने एवं एटीएम लगाने जैसे बैंकिंग व्यवसाय करने वाली गतिविधियों पर भी रोक लगा दी है।</p>

बाड़मेर : राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुनील अम्बवानी एवं न्यायमूर्ति प्रकाश गुप्ता की खण्डपीठ ने बुधवार को एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा बिना रिजर्व बैंक लाइसेन्स के किए जा रहे बैंकिंग कारोबार पर रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने क्रेडिट सोसायटियों द्वारा ऋण देने एवं एटीएम लगाने जैसे बैंकिंग व्यवसाय करने वाली गतिविधियों पर भी रोक लगा दी है।

बाड़मेर निवासी एडवोकेट सज्जनसिंह भाटी ने सहकारी अधिनियम एवं नाबार्ड से पंजीकृत क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा आकर्षक लुभावनी योजनाएं लाॅंच कर ग्राहकों से करोड़ों की जमाएं स्वीकार करने एवं उंची ब्याज दरों पर कर्ज देने के मामले मे पीआईएल दायर की थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सत्यप्रकाष शर्मा एवं दलपतसिंह राठौड़ ने पैरवी की।

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अधिवक्ता सत्यप्रकाश शर्मा ने बताया कि क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा उंची ब्याज दरों का लालच देकर आम ग्राहकों से जमाएं प्राप्त की जाती थी। ऐसी कईं सोसायटियां बाद मे रफू हो गई और लोगों के करोड़ों डूब गये। मारवाड़ सहित पूरे राजस्थान मे सैकड़ों की संख्या मे ऐसी क्रेडिट कोऔपरटिव सोसायटियां खोल दी गई हैं। याचिका के मुताबिक सहकारी अधिनियम एवं नाबार्ड के तहत पंजीकृत इन सोसायटियों के पास अपने ही सीमित सदस्यों से जमाएं प्राप्त कर उनके आर्थिक स्वावलंबन के काम करने का अधिकार होता हैं। जबकि ये सहकारिता कानून की आड़ मे सरेआम बैंकिंग व्यवसाय कर रहे हैं।

इन सोसायटियों द्वारा अखबारों, इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं होर्डिंग्स लगा कर जमाओं के आॅफर आमजन को दिये जा रहे हैं। जबकि बैंकिंग कारोबार के लिए रिजर्व बैंक से लाइसेन्स लेना अनिवार्य होता हैं। सोसायटियों मे जमाकर्ताओं के निवेष रूपयों की कोई सिक्युरिटी रिजर्व बैंक मे नही रहती। याचिका मे ऐसी कईं सोसायटियों का उल्लेख किया गया था जो जमाएं लेकर बंद कर दी गई और संचालक फरार हो गये।

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याचिका मे संजीवन क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी, नवजीवन क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी एवं सांईकृपा क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी, मारवाड़ क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी को भी पक्षकार बनाया गया था। हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार, राज्य सरकार एवं रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया था।

बुधवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सत्यप्रकाश शर्मा एवं दलपतसिंह राठौड़ ने दलील दी कि इस तरह की सोसायटियों द्वारा उंची ब्याज दरों पर कमजोर वर्गों के लोगों को कर्ज दिया जाता है तथा उनसे ही जमाएं प्राप्त की जाती हैं। आॅफर के दौरान पहुंचने वाले इन लोगों को बैकडोर से सदस्य बना लिया जाता है जबकि सहकारी कानून में ऐसे सदस्य बनाये जाने का कोई प्रावधान नही है।

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दुर्ग सिंह राजपुरोहित की रिपोर्ट.

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