भास्कर के पत्रकार ने प्रबंधन को दिया जोरदार झटका, अदालत से ट्रांसफर रुकवाया

मजीठिया वेज बोर्ड मांगने के कारण भास्कर प्रबंधन ने अपने पत्रकार धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का कर दिया था ट्रांसफर…

मुम्बई के तेज-तर्रार पत्रकारों में से एक धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का दैनिक भास्कर ने मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर मांगे जाने पर राजस्थान के सीकर में ट्रांसफर कर दिया था। मुम्बई में दैनिक भास्कर में एंटरटेनमेंट बीट के लिए प्रिंसिपल करेस्पांडेंट पद पर कार्यरत धर्मेन्द्र प्रताप सिंह को भास्कर प्रबंधन ने पहले उन्हें लालच दिया कि कुछ ले-दे कर मामला ख़त्म करो। फिर उन्हें भास्कर की सहायक महाप्रबंधक अक्षता करंगुटकर (कार्मिक) ने धमकी दी, जिसकी शिकायत धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने श्रम आयुक्त से की।

जब धमकी से भी धर्मेन्द्र प्रताप सिंह नहीं डरे तो उनका राजस्थान के सीकर में एंटरटेनमेंट पेज के लिए ट्रांसफर कर दिया गया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का ट्रांसफर लेटर ठीक उस दिन उन्हें घर पर मिला, जब वे मजीठिया वेज बोर्ड की सुप्रीम कोर्ट में हो रही सुनवाई के लिए दिल्ली गए थे। दिल्ली से वापस आये तो उन्हें दफ्तर में जाने नहीं दिया गया। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में पत्रकारों की तरफ से मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे एडवोकेट उमेश शर्मा से सलाह ले कर इंडस्ट्रियल कोर्ट की शरण ली, जहां इंडस्ट्रियल कोर्ट में मजबूती से पक्ष रखा युवा एडवोकेट महेश शुक्ल ने।

इस बहस के दौरान इंडस्ट्रियल कोर्ट के जज श्री एस. डी. सूर्यवंशी ने मौखिक टिप्पणी की कि मजीठिया वेज बोर्ड आज देश का सबसे गर्म मामला है। माननीय न्यायाधीश ने साफ़ कहा कि डी बी कॉर्प ने धर्मेन्द्र प्रताप सिंह का ट्रांसफर गलत तरीके से किया है। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने डीबी कॉर्प के एम. डी. सुधीर अग्रवाल और कार्मिक विभाग की सहायक महाप्रबंधक अक्षता करंगुटकर सहित कंपनी को भी अदालत में पार्टी बनाया है। धर्मेन्द्र प्रताप सिंह की मदद की रविन्द्र अग्रवाल सरीखे देश के दूसरे पत्रकारों ने, जिन्होंने ऐन वक्त पर उन्हें तमाम जरूरी दस्तावेज उपलब्ध करवाए। अदालत द्वारा धर्मेन्द्र प्रताप सिंह के ट्रांसफर पर रोक लगाने से मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार वेतन और एरियर की लड़ाई लड़ रहे मीडियाकर्मियों में खुशी का माहौल है, जबकि भास्कर प्रबंधन के खेमे में निराशा है।

शशिकान्त सिंह
पत्रकार एवं आरटीआई कार्यकर्ता
मुंबई
संपर्क : 9322411335

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केजरीवाल की राह पर चंद्रशेखर राव, मीडिया को बाहर निकाला, पत्रकारों का प्रदर्शन

दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल की राह पर तेलंगाना के मुख्यमंत्री चलने लगे है. तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव के निर्देशों को लागू करते हुए सचिवालय में मीडिया पर पाबंदी शुरू हो गई है. एक ओर मुख्यमंत्री कार्यालय वाले सी ब्लॉक से सुरक्षाकर्मियों ने पत्रकारों को बाहर निकल जाने का आदेश सुनाकर अपमानित किया है तो वहीं दूसरी ओर पत्रकारों को ललचाने के लिए पत्रकार निधि के लिए दस करोड़ रुपये आवंटित किये गए. सरकार की इस नीति का तेलंगाना के पत्रकारों द्वारा जमकर विरोध किया जा रहा है. सरकार ने मीडिया पर नियंत्रण ना होने के दावे करते हुए ही चुपचाप प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिया गया है. इस विषय पर सूचना-जनसम्पर्क विभाग के प्रमुख द्वारा ये कहा जा रहा है कि मीडिया पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन मीडिया को स्वयं नियंत्रण पद्धति को अपनाना चाहिए।

तेलंगाना आंदोलन में अहम भूमिका निभानेवाली मीडिया वही नवगठित तेलंगाना के पुनर्निर्माण में भी विशेष भूमिका निभा रही मीडिया पर इस तरह की पाबंदी का तेलंगाना के पत्रकारों ने तीव्र विरोध करते हुए आंदोलन करने की चेतावनी दी है और अपना विरोध दर्ज कराते हुए सचिवालय के सामने प्रदर्शन भी किया। उधर इस पाबंदी को लेकर ये बात सामने आई है की कुछ मंत्रियो और अधिकारियो ने मुख्यमंत्री राव से शिकायत करते हुए कहा है की प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रतिनिधि निरंतर सचिवालय आते रहने से कामकाज बाधित होने के साथ साथ सुरक्षा से जुड़े मामलो में भी परेशानिया आ रही है, जिसे देखते हुए सचिवालय में मीडिया पर रोक लगनी चाहिए। इस प्रस्ताव को मुख्यमंत्री द्वारा भी मंजूरी देने के समाचार है.सरकार के इस निर्णय के बाद पत्रकार सिर्फ मंत्रियो के संवाददाता सम्मलेन के दौरान ही सचिवालय में कदम रख पाएंगे।

मीडिया पर पाबंदी को लेकर मुख्यमंत्री के साथ हुई चर्चा में मंत्रियो ने जो कारण गिनाये है, उनमें कहा गया है कि कुछ अपरिपक्व पत्रकार निरंतर मंत्रियो की पेशियों में बने रहते हैं और कामकाज में बाधा पहुंचाते है. यही नहीं, कुछ तो काल्पनिक खबरें छापते हैं. इसलिए दिल्ली व कुछ अन्य राज्यों की तरह पत्रकारों को सिर्फ पत्रकार सम्मलेन के समय ही बुलाना चाहिए और बाकी समाचार उन्हें ईमेल या जनसम्पर्क विभाग के जरिये ही भेजा जाना चाहिए। साथ में ये भी गिनाया है कि सचिवालय आनेवालों में 20 न्यूज़ चैनल, 15 समाचार पत्र, छोटे समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों को मिलाकर तक़रीबन 200 लोग पत्रकार के तौर पर आनेवालों में शामिल हैं. इनमे से कौन वास्तविक है और कौन नहीं, यह भी पहचान पाना मुश्किल होने की बात अधिकारियों ने कही है. इस तरह इन कारणों को लेकर सरकार द्वारा मीडिया पर लगानेवाली पाबंदी के खिलाफ पत्रकारों ने विरोध के स्वर तेज कर दिए है, जिससे सरकार के सामने नया विवाद खड़ा होने की आशंका है.

सूर्य प्रकाश तिवाड़ी की रिपोर्ट.

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टीवी9 न्यूज चैनल के कर्नाटक में प्रसारण पर पाबंदी

खबर है कि न्यूज चैनल टीवी9 का कर्नाटक में प्रसारण रोक दिया गया है. ऐसा राज्य के एक मंत्री के इशारे पर किए जाने का आरोप है. चैनल सोमवार को प्राइम टाइम में कांग्रेस सरकार को बेनकाब करने के लिए एक प्रेस कांफ्रेंस करने जा रहा था. इसके ठीक पहले कई केबल ऑपरेटर्स ने इसका बहिष्‍कार कर दिया.

चैनल प्रबंधन का कहना है कि सभी केबल ऑपरेटरों का एक साथ बहिष्‍कार करना साजिश की तरफ संकेत देता है. चैनल ने जारी एक प्रेस रिलीज में कहा, ‘कर्नाटक के ऊर्जा मंत्री डीके शिवकुमार ने केबल ऑपरेटरों को TV9 और NEWS9 का प्रसारण को रोकने के लिए आदेश दिया था.’

चैनल का आरोप है, ‘मंत्री ने केबल ऑपरेटरों को धमकी दी थी कि अगर वह प्रसारण नहीं रोकेंगे तो वह उन पर भारी दंड लगाएंगे.’

इस पूरे मामले पर मुख्‍यमंत्री सिद्धारमैया ने कुछ भी बोलने से इनकार कर दिया है. कर्नाटक‍ स्‍टेट केबल ऑपरेटर एसोसिएशन के अध्‍यक्ष पैटरिक राजू ने सरकार के दबाव से इनकार किया. उन्होंने कहा कि ये चैनल कई बार केबल ऑपरेटरों के खिलाफ नकारात्‍मक खबरें दिखाता है.

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क्रेडिट कोआपरेटिव सोसायटियों द्वारा बिना रिजर्व बैंक लाइसेन्स के किए जा रहे बैंकिंग कारोबार पर रोक

बाड़मेर : राजस्थान हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश सुनील अम्बवानी एवं न्यायमूर्ति प्रकाश गुप्ता की खण्डपीठ ने बुधवार को एक पीआईएल पर सुनवाई करते हुए क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा बिना रिजर्व बैंक लाइसेन्स के किए जा रहे बैंकिंग कारोबार पर रोक लगा दी है। हाईकोर्ट ने क्रेडिट सोसायटियों द्वारा ऋण देने एवं एटीएम लगाने जैसे बैंकिंग व्यवसाय करने वाली गतिविधियों पर भी रोक लगा दी है।

बाड़मेर निवासी एडवोकेट सज्जनसिंह भाटी ने सहकारी अधिनियम एवं नाबार्ड से पंजीकृत क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा आकर्षक लुभावनी योजनाएं लाॅंच कर ग्राहकों से करोड़ों की जमाएं स्वीकार करने एवं उंची ब्याज दरों पर कर्ज देने के मामले मे पीआईएल दायर की थी। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सत्यप्रकाष शर्मा एवं दलपतसिंह राठौड़ ने पैरवी की।

अधिवक्ता सत्यप्रकाश शर्मा ने बताया कि क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटियों द्वारा उंची ब्याज दरों का लालच देकर आम ग्राहकों से जमाएं प्राप्त की जाती थी। ऐसी कईं सोसायटियां बाद मे रफू हो गई और लोगों के करोड़ों डूब गये। मारवाड़ सहित पूरे राजस्थान मे सैकड़ों की संख्या मे ऐसी क्रेडिट कोऔपरटिव सोसायटियां खोल दी गई हैं। याचिका के मुताबिक सहकारी अधिनियम एवं नाबार्ड के तहत पंजीकृत इन सोसायटियों के पास अपने ही सीमित सदस्यों से जमाएं प्राप्त कर उनके आर्थिक स्वावलंबन के काम करने का अधिकार होता हैं। जबकि ये सहकारिता कानून की आड़ मे सरेआम बैंकिंग व्यवसाय कर रहे हैं।

इन सोसायटियों द्वारा अखबारों, इलेक्ट्रोनिक मीडिया एवं होर्डिंग्स लगा कर जमाओं के आॅफर आमजन को दिये जा रहे हैं। जबकि बैंकिंग कारोबार के लिए रिजर्व बैंक से लाइसेन्स लेना अनिवार्य होता हैं। सोसायटियों मे जमाकर्ताओं के निवेष रूपयों की कोई सिक्युरिटी रिजर्व बैंक मे नही रहती। याचिका मे ऐसी कईं सोसायटियों का उल्लेख किया गया था जो जमाएं लेकर बंद कर दी गई और संचालक फरार हो गये।

याचिका मे संजीवन क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी, नवजीवन क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी एवं सांईकृपा क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी, मारवाड़ क्रेडिट कोआॅपरेटिव सोसायटी को भी पक्षकार बनाया गया था। हाईकोर्ट ने केन्द्र सरकार, राज्य सरकार एवं रिजर्व बैंक आॅफ इण्डिया को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया था।

बुधवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सत्यप्रकाश शर्मा एवं दलपतसिंह राठौड़ ने दलील दी कि इस तरह की सोसायटियों द्वारा उंची ब्याज दरों पर कमजोर वर्गों के लोगों को कर्ज दिया जाता है तथा उनसे ही जमाएं प्राप्त की जाती हैं। आॅफर के दौरान पहुंचने वाले इन लोगों को बैकडोर से सदस्य बना लिया जाता है जबकि सहकारी कानून में ऐसे सदस्य बनाये जाने का कोई प्रावधान नही है।

दुर्ग सिंह राजपुरोहित की रिपोर्ट.

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