मेरे कुछ ‘क्रांतिकारी’ मित्र अरबों-तुर्कों की कट्टरता पर टिप्पणी करने के नाते मुझे संघी इतिहास-बोध का वाहक बतलाते हैं!

अजय तिवारी-

अभिव्यक्ति के ख़तरे… 1964 में जब मुक्तिबोध ने लिखा था कि ‘अब अभिव्यक्ति के ख़तरे उठाने ही होंगे/ तोड़ने ही होंगे/ मठ और गढ़ सब।’ शायद तब इतने ख़तरे नहीं थे। लेकिन बीस साल बीतते-बीतते ये ख़तरे दुनिया भर में बढ़ने लगे। और अब लगभग पचास साल बाद वे चरम पर हैं। ये ख़तरे किसी एक ओर से नहीं आये।

अभिव्यक्ति का सबसे प्रमुख माध्यम साहित्य है। इसलिए हर ओर से साहित्य पर सबसे ज़्यादा ख़तरे आये। ये ख़तरे जिन जगहों से सर्वाधिक आये, वे धार्मिक संस्थाएँ थीं। आज धार्मिक संस्थानों पर आमफ़हम टिप्पणी करने की ज़रूरत नहीं है। कल न्यू यॉर्क में भारतीय मूल के अँग्रेज़ी लेखक सलमान रुश्दी पर जानलेवा हमला हुआ है। इसकी सूचना के साथ मंच पर घायल पड़े रुश्दी और हमलावर को दबोचते पुलिसकर्मियों का चित्र हमने दिया था। अभी इसी सिलसिले में अभिव्यक्ति के ख़तरे की बात करने का औचित्य है।

रुश्दी की पुस्तक ‘सेटेनिक वर्सेज़’ आयी तो दुनिया भर के इस्लामिक बुनियादपरस्त बौखला गये। अपनी कट्टरता के लिए सुन्नी बदनाम रहे हैं लेकिन रुश्दी की पुस्तक के ख़िलाफ़ शिया ईरान धर्मध्वजी अयातुल्ला खुमैनी ने 1989 में मौत का फ़तवा जारी कर दिया। जिस हादी मटर नामके हमलावर ने कल न्यू यॉर्क में व्याख्यान से ठीक पहले रुश्दी पर हमला किया, वह ईरान समर्थक है, उसके पास अयातुल्ला खोमैनी की तस्वीर निकली है।

मेरे कुछ ‘क्रांतिकारी’ मित्र अरबों-तुर्कों की कट्टरता पर टिप्पणी करने के नाते मुझे संघी इतिहास-बोध का वाहक बतलाते हैं, वे कभी इस्लामी कट्टरता के ख़िलाफ़ बोलते नहीं पाये जाते। उनकी क्रांति अत्यंत सुविधाजनक है। उनका साम्प्रदायिकता-विरोध बहुत चुनिंदा है।

मैं अपने बारे में नहीं कहना चाहता लेकिन प्रसंगवश उल्लेख कर देना ज़रूरी है कि पिछले 40 वर्षों में हिन्दू कट्टरपन, मुस्लिम कट्टररपन और ‘क्रांतिकारियों’ के कट्टररपन पर लिखने के कारण सबसे धमकियाँ पाता रहा हूँ। हिन्दू कट्टरपंथियों और संघ परिवार ने अनेक बार अनेक प्रकार से धमकाया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने भी अनेक बार धमकियाँ दीं। बुद्ध की प्रतिमा तोड़ने पर तालिबान के ख़िलाफ़ लिखने पर पहली धमकी मिली थी। क्रांतिकारियों की चहेती उपन्यासकार अरुंधती रॉय के बड़े बाँध विरोधी निबंध का खण्डन करने पर उनके एक भक्त ने ‘परिणाम’ भुगतने की चेतावनी दी थी। इसलिए हिन्दू-मुस्लिम कट्टरपंथी हों या ‘क्रांतिकारी’ जन जनवादी, सबके चेहरे से नक़ाब हट चुकी है।

उस समय बहुत परवाह नहीं होती थी। मैं कम्युनिस्ट पार्टी के साथ था। अब किसी पार्टी में नहीं हूँ। लेखक की स्वाधीनता को सर्वोपरि महत्व देता हूँ। अगर अब कोई हमला हुआ तो न सरकार बचाव में आयेगी, न हिंदुत्ववादी संगठन आयेंगे, न इस्लामी फ़िरके आयेंगे और न ‘क्रांतिकारी’ बुद्धिजीवी ही आयेंगे। फिर भी मैं साफ़ शब्दों में कहना चाहता हूँ कि सलमान रुश्दी पर हमला करने वाले इस्लामी सम्प्रदायवादी अपनी प्रवृत्तियों में हिंदुत्ववादियों जैसे ही हैं लेकिन खूँखारपन में उनसे बढ़कर हैं।

जिन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान द्वारा गला रेतकर लोगों का क़त्ल करते इन हत्यारों की वीडियो देखी है, वे यदि मनुष्य हैं तो किसी भी बहाने से इनके पक्ष में नहीं बोल सकते।

मैं ‘क्रांतिकारियों’ को चुनौती देता हूँ कि बताएँ, इस्लाम की आलोचना के प्रति मुस्लिम कट्टरपंथी सहनशील हैं या हिंदुत्व की आलोचना के प्रति हिन्दू रूढ़िवादी ज़्यादा सहनशील हैं? मैं तो संघी हो ही चुका हूँ, लेकिन सिर्फ़ एक पुस्तक का ज़िक्र करता हूँ– हिंदू जाति का उत्थान और पतन लेखक: रजनीकांत शास्त्री प्रकाशक: किताब महल, इलाहाबाद।

अकेले इस एक किताब को देख लिया जाय और बताया जाय कि इसके लेखक को क्या किसी ने धमकी दी? क्या कभी इस पुस्तक को जलाया गया?

गिरोहों में रहकर जैसे धार्मिक-साम्प्रदायिक कट्टरपंथी लोग आचरण करते हैं, वैसे ही ‘क्रांतिकारी’ भी करते हैं। ये केवल अपनी मनमानी को ही यथार्थ समझते हैं। जिसके विचार इनसे ज़रा भी अलग हुए, वह प्रतिक्रान्तिकारी, सम्प्रदायवादी, संशोधनवादी वगैरह सब! ये दीन-दुनिया से बेख़बर लाखों का वज़ीफ़ा पाने वाले ही सच्चे ‘क्रांतिकारी’! सबपर फ़तवा देने में सक्षम!! फ़तवा, जी हाँ, वैसी ही संकीर्णता, वैसी ही कट्टरता। यही कारण है कि क्रांतिकारियों की कुल जितनी संख्या है, उससे ज़्यादा क्रांतिकारी दलों की संख्या है। फिर भी सारा दोष जनता का कि वह कट्टरपंथियों के चंगुल में फँसी हुई है!!!

भारत यहाँ तक न पहुँचे कि एक लेखक सार्वजनिक स्थल पर उपस्थित हो और हिन्दू या मुस्लिम कट्टरपंथी उसपर हमला कर दे। मॉब लिंचिंग हो या गला रेतकर हत्या, दोनों अभव्यक्ति के लिए एक समान खतरनाक हैं। फिर भी दोनों में एक अंतर है। मॉब लिंचिंग में एक गिरोह एक समूह को झूठी अफ़वाह के ज़रिए इकट्ठा करता है, लेकिन जैसी हत्या तालिबानी मानसिकता के हत्यारे करते हैं, वह एक षड्यंत्र रचकर चोरों की तरह हमला करते हैं। ‘क्रांतिकारियों’ के लिए पहली कार्रवाई तो अपराध है, दूसरी कार्रवाई अपराध नहीं है क्योंकि इसे अपराध कहते ही ‘संघी इतिहास-बोध’ का आरोप आ जायेगा।

फिर भी, किसी बात से डरे बिना हमें कहना होगा कि हर तरह का कट्टररपन अभिव्यक्ति के लिए खतरनाक है, चाहे दक्षिणपंथी हो या वामपंथी, चाहे हिंदुत्ववादी हो या इस्लामपरस्त, चाहे प्रतिक्रियावादी हो या क्रांतिकारी!!


Vishwa Deepak-

The IF & BUT style of condemnation

Dear progressives

People are not going to buy your IF & BUT style of condemnation. You are condemning the attack on Rushdie (was stabled 15 times on his neck by a Jihadist) without naming

the book “Satanic Verses” which he was attacked for; the idea of Blasphemy; Islamic fundamentalism; Iran’s supreme leader who announced a bounty of $ 3 million for the beheader.

What kind of condemnation is this? and how is this going to help you build a better world?

Time for this kind of FAKE, IMMORAL progressivism is over. Strengthen your morality otherwise, you will be – as you have been – thrown into the dustbin of history.

None of you said the Prophet is not above criticism. Rushdie every has right to base his book/novel/poetry/drama on Muhammad – the last Prophet.

Time has come Islam should get rid of Blasphemy like Christianity did a long ago.

This is a defining moment. And, if you cannot show minimum level of intellectual honesty, courage, then– then be off.



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