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सुख-दुख

सुभाष जी उत्तर प्रदेश के लिए एनसाइक्लोपीडिया जैसे थे!

श्यामलाल यादव-

मित्रों, आज की सुबह भी मनहूस निकली. उनसे 25 साल की दोस्ती थी. इंडिया टुडे में लम्बा साथ रहा. शायद उन्होंने 1995 में इंडिया टुडे ज्वाइन की थी और मैंने उनसे एक साल पहले. आजकल हम दोनों अलग-अलग संस्थानों में थे.

लखनऊ में मैं कभी रहा नहीं. लेकिन मेरे प्रदेश की राजधानी है. इसलिए कई बार कई तरह के छोटे-मोटे काम पड़ते रहते थे. लखनऊ में कोई काम हो, छोटा हो, बड़ा हो, किसी का फोन नंबर चाहिए, या राज्य के किसी सामाजिक-राजनीतिक-प्रशासनिक मसले पर विमर्श करना हो, समझ बढ़ानी हो तो पहला फोन मोटे तौर पर सुभाष मिश्रा जी को करता था. वे उत्तर प्रदेश के लिए एनसाइक्लोपीडिया जैसे थे.

बिना किसी आनाकानी के हर समय मदद को तैयार भी रहते थे. एक कुशल संवाददाता के तौर पर लखनऊ में उनकी पैठ बहुत गहरी थी. फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी भी थे. आज सुबह उठते ही शिवकेश जी का मैसेज देखा तो सन्न रह गया. सोचा, काश यह खबर झूठी होती. तुरंत अपने पुराने साथी मनीष अग्निहोत्री जी से भी चेक किया. खबर को झुठलाया नहीं जा सका. करीब महीने भर पहले ही बात हुई थी. बातचीत इसके साथ समाप्त हुई थी कि शीघ्र लखनऊ आएंगे तो बैठा जाएगा. लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा.

आज तड़के कोरोना ने उन्हें भी निगल लिया. सुभाष जी, जो फुटबॉल के अच्छे खिलाड़ी भी थे, बहुत जल्दी साथ छोड़ गए.

सुभाष जी को अश्रुपूरित श्रद्धांजलि…

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