यह अख़बार अपने मालिक की कंपनियों के ख़िलाफ़ भी खबरें छापता है!

प्रकाश के रे-

‘द वाशिंगटन पोस्ट’ के बारे में कुछ बातें-

साल 1877 में स्थापित इस अख़बार को 2013 में जेफ़ बेज़ोस ने 250 मिलियन डॉलर में ख़रीदा था. बीच की कहानी भी दिलचस्प है, पर उसे छोड़ दें. इराक़ युद्ध के समय इस अख़बार बहुत घटिया भूमिका निभायी थी. ख़ैर, यह ख़रीद बेज़ोस ने अपने पैसे से बनी कंपनी के माध्यम से की थी. इस कंपनी- नेश होल्डिंग्स- का आमेज़न या बेज़ोस की अन्य कंपनियों से कोई लेना-देना नहीं है.

वैसे तो मैं इन टेक ख़रबपतियों और उनकी कंपनियों का आलोचक हूँ, लेकिन वाशिंगटन पोस्ट के मामले में बेज़ोस ने ज़ो रवैया अपनाया है, वह एक अच्छा उदाहरण है. वे संपादकीय नीति और ख़बरों के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं करते. अक्सर आमेज़न के हितों के ख़िलाफ़ ख़बरें या लेख प्रकाशित होते हैं. उदाहरण के लिए, लीथियम और बड़ी कंपनियों के रवैए पर लंबे लेख में अन्य कंपनियों के साथ आमेज़न पर भी सवाल उठाए गए थे. आज ही वाशिंगटन पोस्ट ने बेज़ोस जैसे खरबपतियों के अंतरिक्ष में जाने पर कड़ा लेख छापा है.

बेज़ोस अपने स्टाफ़, चाहे आमेज़न के हों, पोस्ट के हों या किसी और कंपनी के, को उचित पैसा देने के मामले में हमेशा सवालों के घेरे में रहते हैं, पर अख़बार को उन्होंने स्वतंत्रता दी है. अभी सैली बज़बी इसकी अधिशासी संपादक हैं.

वैसे तो वाशिंगटन पोस्ट के ख़ाते में कई बड़ी रिपोर्ट हैं, पर सत्तर के दशक के पेंटागन पेपर्स और वाटरगेट स्कैंडल बेहद अहम हैं. पेंटागन पेपर्स ने वियतनाम युद्ध के ख़िलाफ़ बड़ा आंदोलन खड़ा करने में सहयोग दिया, तो वाटरगेट मामले की वजह से निक्सन को दुबारा चुनाव जीतने के बाद भी व्हाइट हाऊस छोड़ना पड़ा था. जब बेज़ोस ने इसे ख़रीदा था, तब इसकी माली हालत ठीक नहीं थी, पर डिजिटल पक्ष पर फ़ोकस कर अब अख़बार फ़ायदे में हैं.

आप 500 रुपए देकर इसका डिजिटल संस्करण एक साल तक पढ़ सकते हैं. प्रिंट एडिशन अभी दो डॉलर का है, रविवार को थोड़ा महँगा होता है. अगर आप आमेज़न प्राइम के सब्सक्राइबर हैं, तो डिजिटल संस्करण व ई-बुक सस्ते में पढ़ सकते हैं.

आज के प्रिंट संस्करण (शनिवार) में मुख्य ख़बर जर्मनी की बाढ़ और डेल्टा वैरिएंट से अमेरिका में एक सप्ताह में 70% संक्रमण बढ़ने के बारे में हैं.

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One comment on “यह अख़बार अपने मालिक की कंपनियों के ख़िलाफ़ भी खबरें छापता है!”

  • भारत भूषण says:

    ऐसी समझ जीवन के उत्तरार्ध में आती है ,जबकि ये समझ जीवन के पूर्वार्ध में आ जाय तो समाज में कैंसर की तरह फैली बीमारी को रोक कर नियंत्रित किया जा सकता है! जय हिंद !!

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