यूपी में भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग तकरीबन बिखर चुकी है!

जयशंकर गुप्त-

यूपी में भाजपा की सोशल इंजीनियरिंग तकरीबन बिखर चुकी है। ओमप्रकाश राजभर की सुभासपा और कृष्णा पटेल का अपना दल पहले ही अखिलेश यादव के साथ हो लिए थे। अब स्टूल छाप उपमुख्यमंत्री के सजातीय और अपने समाज के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी योगी सरकार से त्यागपत्र देकर सपा की सदस्यता ले ली है।

उनकी पुत्री भाजपा की लोकसभा सदस्य हैं। कभी बसपा के कद्दावर नेता रहे स्वामी प्रसाद मौर्य की 2017 और 2019 में यूपी में ओबीसी को भाजपा से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका थी।

और भी विकेट गिरेंगे। अगली बारी धर्म सिंह सैनी, दारा सिंह चौहान की!

और अब तो सवर्ण ब्राह्मण और भूमिहार भी बड़े पैमाने पर भाजपा से छिटकने लगे हैं। क्या वाकई यूपी में भाजपा की हालत बहुत अधिक खराब और खस्ता है?

हिन्दी के ज्यादातर टीवी चैनलों को मैं आमतौर पर खोलता भी नहीं. किसी मित्र ने कल शाम फोन कर कहा कि अमुक चैनल खोलकर देखिये-एक मज़ेदार कार्यक्रम चल रहा है! जिन सज्जन ने फोन पर सूचना दी, उनका राजनीति और मीडिया से कोई लेना-देना नहीं. उनकी बात को गंभीरतापूर्वक लेते हुए मैने चैनल को खोला.

शुरू का हिस्सा छोड़कर पूरा कार्यक्रम देख गया.

पहले भी कई बार मुझे लगा है कि यूपी के ‘समाजवादी घराने’ के मौजूदा ध्वजवाहक अखिलेश यादव कभी-कभी चौंका देते हैं. टीवी चैनलों के ऐसे कार्यक्रमों में उनकी हाज़िरजवाबी और मध्यमार्गी क़िस्म के नेता की अच्छी समझदारी उभरकर सामने आती है!
निस्संदेह, चुनाव-केंद्रित इस टीवी कार्यक्रम में नेता जमा और चैनल उखड़ा!

बहरहाल, टीवीपुरम् की बात यहीं छोड़ते हैं.

अब आइये, मौजूदा चुनावी परिदृश्य पर! हमारा मानना है कि यूपी का यह चुनाव दोनों(भाजपा और सपा) में किसी भी पक्ष के लिए आसान नहीं है. दोनों के लिए अगर मुश्किलें हैं तो संभावनाएं भी.

जहाँ तक समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव का सवाल है, अगर वह ‘फरसा-गडासा मार्का’ सियासत और बेमतलब कवायद से दूर रहकर सिर्फ यूपी की व्यापक अवाम के दुख-दर्द से जोड़कर अपना कैम्पेन करें और जिलावार-ब्लाकवार चुनाव-निगरानी का अपना पार्टी-तंत्र खड़ा करने पर जोर दें तो चुनावी परिदृश्य में गुणात्मक बदलाव दिखेगा! हालांकि यह सब करने में उन्होंने काफी देर कर दी है.

एक बात अब आईने की तरह साफ है कि यूपी में अगर ‘हिन्दुत्व’ की जनविरोधी-राजनीति का मुकाबला करना है तो वह सिर्फ जनपक्षी-विकास और सामाजिक न्याय की जेनुइन राजनीति से ही संभव होगा! दूसरा कोई रास्ता नहीं है!


वीरेंद्र राय-

दरअसल मोदी और शाह, गुजरात की तरह पूरे देश में भाजपा को चलाना चाहते हैं। जैसे गुजरात में सांसद और विधायक की कोई गणना नहीं होती। मंत्री भी रबर स्टांप होते हैं।

कुछ सालों से तो मुख्यमंत्री भी इसी टाइप का रख रखा है। अब उसी तरह यूपी और अन्य राज्यों को चला रहे हैं। विशेषकर यूपी में विधायक और मंत्रियों की घोर उपेक्षा की गई, बेचारे पांच साल तो चुप रहे। किसी तरह झेलते रहे। लेकिन अब उन्हें जैसे ही मौका मिला वो छिटक रहे हैं।

इसमें गलत भी नहीं है। हालांकि स्वामी प्रसाद मौर्या ने जो किया वो घोर नमकहरामीपन है। जिस पार्टी ने कैबिनेट मंत्री बनाया। बेटी को सांसद बनाया अब तुम उसी पर तोहमत लगा रहे हो। रोजगार श्रम मंत्री होकर भी तुम गरीबों का उद्धार नहीं कर सके तो पहले ही इस्तीफा दे देते।

खैर, ये राजनीति है यहां न नैतिकता की जगह है और न ही सिद्धांत की। ऊपर से लेकर नीचे तक सब अपनी जुगत में हैं। कुछ बकलोल टाइप के लोग बिना मतलब राजनीति के चक्कर में गदर काटे रहते हैं।


सिद्धार्थ विमल-

मेरा अंदाज़ा बिलकुल सटीक बैठता दिख रहा है। बाबा मुख्यमंत्री का ताज़ा बयान बता रहा है कि यूपी में अस्सी- बीस का समीकरण काम करेगा।

इस चुनाव में शुरुआत से मेरा जो अंदाज़ा रहा, वो ये है कि भाजपा शासन अब अपने उम्र के अंतिम पड़ाव पर है। इनके सारे वायदे झूठ और जुमला निकल चुके हैं। जिस पब्लिक ने इनके स्वर्ग से सुंदर ख़्वाबों पर भरोसा जता प्रचण्ड बहुमत से सत्ता में पहुँचाया था, उसी पब्लिक ने अब नर्क जैसी ज़िंदगी से छुटकारा पाने के लिए इसबार टाटा बाय- बाय का मन बना लिया है।

भाजपा की अंतिम क़वायद अब अपने कोर वोटर को बचा ले जाने तक सिमट चुकी है। इस क़वायद में वह एक हद तक सफल भी है। मामला अस्सी- बीस का ही रहेगा। भाजपा अपने कोर वोटरों के साथ सत्ता से बेदख़ल होकर विपक्ष में वापसी करेगी। अखिलेश इसबार नए मुख्यमंत्री बनेंगे।

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