आगामी विधानसभा चुनावों के ‘चक्रव्यूह’ ने बढ़ाई टीम मोदी की चुनौती

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‘अच्छे दिन’ आने का जुमला मोदी सरकार के लिए दोधारी तलवार बनता जा रहा है। सरकार के खिलाफ विपक्ष ने इसी जुमले को अपना सबसे कारगर हथियार बनाने की कोशिश शुरू कर दी है। भाजपा के रणनीतिकारों को उम्मीद थी कि सत्ता में आने के 60 दिनों के बाद ही ऐसा कुछ जरूर हो जाएगा, जिससे कि जनता में यह भरोसा होने लगेगा कि मोदी के राज में ‘अच्छे दिन’ जरूर आने वाले हैं। लेकिन, मोदी सरकार के कार्यकाल में तो ‘सर मुंडाते ही ओले पड़ने’ वाली कहावत चरित्रार्थ होने लगी है। क्योंकि, मानसून का मुख्य सीजन निकलने को है। लेकिन, देश के ज्यादातर हिस्सों में बेहद कम बरसात हुई है। कई हिस्सों में तो धुर अकाल की स्थिति बन गई है। मानसून ने धोखा दिया, तो इसका नाजायज फायदा व्यापारी वर्ग उठाने लगा है। आलू-प्याज जैसी बेहद जरूरी सब्जियों के साथ खाद्यान्न की भी जमाखोरी शुरू हो गई है। इसी वजह से खाद्य वस्तुओं में पिछले एक महीने में ही महंगाई का एक और तड़का लगा है। इससे ‘अच्छे दिनों’ की जगह ‘महंगे दिनों’ का आगाज दिखाई पड़ रहा है। अगले महीने कई प्रदेशों में विधानसभा के उपचुनाव होने हैं। दो-तीन महीने बाद ही कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव की चुनौती है। उत्तराखंड के उपचुनावों के बाद टीम मोदी की रणनीतिक चुनौती काफी बढ़ गई है।

पहली चुनावी चुनौती अगले महीने होने जा रहे उपचुनावों की है। उत्तर प्रदेश में एक दर्जन सीटों पर उपचुनाव होने हैं। इसी के साथ मैनपुरी संसदीय क्षेत्र में भी उपचुनाव तय है। यह सीट सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव के इस्तीफे से खाली हुई है। उल्लेखनीय है कि सपा प्रमुख ने आजमगढ़ और मैनपुरी दो सीटों से चुनाव जीता था। उन्होंने आजमगढ़ की सीट बरकरार रखी है। जबकि, अपनी ‘घरेलू’ सीट मैनपुरी को खाली किया है। माना जा रहा है कि यह सीट सपा के लिए काफी आसान है। क्योंकि, यहां से मुलायम सिंह लंबे समय से बड़ी जीत हासिल करते रहे हैं। यहां पर उनका सजातीय वोट बैंक भी बहुत मजबूत समझा जाता है। इस सीट से मुलायम ने अपने भाई के पौत्र को ही टिकट दे दिया है। इसके पहले भी सपा सुप्रीमो अपने कई परिवारी जनों को चुनावी राजनीति में ला चुके हैं। भाजपा के रणनीतिकार इस कोशिश में हैं कि सपा की परिवारवादी राजनीति को मुद्दा बनाकर मैनपुरी में बड़ी चुनौती दी जाए।

सूत्रों के अनुसार, भाजपा के नए अध्यक्ष अमित शाह ने मैनपुरी फतह के लिए रणनीति बनानी शुरू कर दी है। माना जा रहा है कि पार्टी के जिस उम्मीदवार ने यहां पर मुलायम सिंह को चुनौती दी थी, उसी को अब सपा सुप्रीमो के पोते के मुकाबले भी खड़ा किया जाएगा। कोशिश की जा रही है कि गैर-यादव वोटों की लामबंदी ज्यादा से ज्यादा कर ली जाए। तैयारी है कि प्रदेश के नेताओं के साथ राष्ट्रीय दिग्गज भी मैनपुरी में मुलायम की राजनीति को चुनौती देने के लिए जुटें। यदि किसी तरह से मैनपुरी में सपा को शिकस्त दे दी गई, तो इसके दूरगामी नतीजे होंगे। यहां हो रहे विधानसभा उपचुनावों में भाजपा के लिए ज्यादा मुश्किलें हैं। क्योंकि, ज्यादातर उपचुनाव भाजपा प्रतिनिधियों की खाली की गई सीटों पर हो रहे हैं। क्योंकि, ये लोग लोकसभा के लिए चुन लिए गए हैं।

प्रदेश में सपा की सरकार है। ऐेसे में, पार्टी नेतृत्व ने इन चुनावों को अपनी खास प्रतिष्ठा से जोड़कर पूरी ताकत लगानी शुरू कर दी है। पिछले दिनों सहारनपुर, मुरादाबाद, मथुरा, रामपुर व बदायूं सहित कई शहरों में सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुई हैं। इनके चलते पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े हिस्से में सांप्रदायिक आधार पर राजनीतिक ध्रुवीकरण करने की कोशिशें भी तेज की गई हैं। सपा इस राजनीतिक खेल में अल्पसंख्यकों का दिल जीतने में लगी है। लेकिन, संघ परिवार ने चुपके-चुपके अपने हिंदुत्व के एजेंडे का खेल शुरू किया है। इस अभियान में कई संवेदनशील शहरों में दलित वोट बैंक पर भी उसकी खास नजर है। इसको लेकर बसपा नेतृत्व में भी खासी बेचैनी है। इन उपचुनावों में अपना पलड़ा भारी रखने के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती ने भी अपनी पूरी ताकत झोंकनी शुरू की है। उन्होंने यह कहा है कि सपा और भाजपा दोनों वोट बैंक की राजनीति के लिए दंगाई सियासत कर रहे हैं। इससे प्रदेश का माहौल खराब किया जा रहा है। उन्होंने खास तौर पर दलितों और वंचित वर्गों से अपील की है कि वे धर्म के ठेकेदारों के झांसे में न फंसे।

उत्तराखंड में तीन विधानसभाओं के उपचुनाव संपन्न हुए हैं। शुक्रवार को चुनाव परिणाम आए, तो भाजपा नेतृत्व को खासा धक्का लगा है। धारचूला विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेसी मुख्यमंत्री हरीश रावत भाजपा उम्मीदवार के मुकाबले भारी वोटों से जीते हैं। सोमेश्वर और डोईवाला सीटों से भी कांग्रेस उम्मीदवार ही जीते हैं। जबकि, दोनों सीटें पहले भाजपा की झोली में थीं। इस करारी हार के बाद मुख्यमंत्री रावत राजनीतिक रूप से काफी मजबूत हो गए हैं। अब 70 में से कांग्रेस विधायकों की संख्या 35 हो गई है। साधारण बहुमत से केवल एक सीट का आंकड़ा ही पीछे रह गया है। यहां के उपचुनाव के पहले राजनीतिक हल्कों में कयास चल रहे थे कि चुनाव के बाद हरीश रावत की सरकार गिर जाएगी। भाजपा नेतृत्व में ‘जुगाड़’ की सरकार आराम से आ जाएगी। लेकिन, रावत के राजनीतिक करिश्मे ने भाजपा रणनीतिकारों का यह सपना तोड़ दिया है। यहां मिली सफलता से कांग्रेस नेतृत्व को एक नई ‘ऑक्सीजन’ भी मिल गई है।

उत्तराखंड की इस सफलता से कांग्रेस आलाकमान का हौसला भी बढ़ गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में अब पार्टी ने अपनी खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने की कवायद तेज कर दी है। बिहार में विधानसभा की 10 सीटों पर उपचुनाव होने जा रहा है। यहां पर भाजपा को खास मुकाबला देने के लिए सत्तारूढ़ जदयू ने अपने धुर विरोधी राजद से चुनावी गठबंधन कर लिया है। फॉर्मूला यह बना है कि दोनों दल चार-चार सीटों पर चुनाव लड़ें। बाकी, दो सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ दी जाएं। इस तरह से बिहार में टीम मोदी के राजनीतिक जादू का मुकाबला करने के लिए तीन प्रमुख दलों का चुनावी गठबंधन बन गया है। इस मोर्चे से भाजपा नेतृत्व की बेचैनी बढ़ना स्वभाविक माना जा रहा है।

दरअसल, भाजपा रणनीतिकारों की कोशिश है कि यहां पर 10 में से हर हाल में भाजपा को 6 सीटें जरूर मिलनी चाहिए। क्योंकि, इन सीटों में कमी हुई, तो इसका राजनीतिक संदेश यही जाएगा कि अब प्रदेश में ‘मोदी जादू’ उतार पर है। दरअसल, छह सीटों की चुनौती खास तौर पर इसलिए हैं, क्योंकि ये सीटें भाजपा विधायकों के इस्तीफे के चलते ही खाली हुई हैं। विधायक रहे भाजपा के ये नेता लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। ऐसे में, बिहार का चुनावी मुकाबला काफी दिलचस्प हो गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव दशकों तक एक-दूसरे के कट्टर विरोधी रहे हैं। दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की आलोचना में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन, लोकसभा में भाजपा की जबरदस्त जीत के चलते दोनों दलों में एक डर पैदा हो गया है। यही कि भाजपा के मुकाबले एकजुट नहीं हुए, तो कहीं राज्य की राजनीति से भी ‘सेक्यूलर’ दलों का सफाया न हो जाए।
 
हरियाणा, दिल्ली, झारखंड व महाराष्ट्र में भी अगले कुछ महीनों में विधानसभा के चुनाव होने हैं। दिल्ली में राष्ट्रपति शासन लागू है। मौजूदा स्थितियों में यहां कभी भी नए चुनाव का ऐलान हो सकता है। लेकिन, उत्तराखंड के ताजा परिणाम के बाद भाजपा का नेतृत्व यहां के चुनावों को लेकर एक बार फिर संशय में पड़ गया है। इस बात को लेकर ऊहापोह है कि यहां राष्ट्रपति शासन की अवधि बढ़ाई जाए या हरियाणा और महाराष्ट्र के साथ ही चुनाव करा लिए जाएं? झारखंड की जो स्थिति है, वहां भी चुनाव बहुत दूर नहीं लगते। हरियाणा और महाराष्ट्र दोनों राज्यों में तो अक्टूबर-नवंबर में चुनाव होना तय ही है। इन दोनों राज्यों में लोकसभा के चुनाव में भाजपा को भारी जीत हासिल हुई थी। ऐसे में, विपक्षी दल मुकाबले के लिए ज्यादा तैयारी में हैं। महाराष्ट्र में पिछले 15 सालों से कांग्रेस और एनसीपी की सत्ता रही है। इस समय भी पृथ्वीराज चह्वाण के नेतृत्व में साझा सरकार चल रही है। लेकिन, लोकसभा के चुनाव में यहां पर भाजपा-शिवसेना के गठबंधन ने दोनों दलों की जमकर पिटाई कर दी थी। इसके चलते यहां कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें, तो एनसीपी को महज चार सीटें हासिल हो पाईं थीं।

लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस के मुकाबले एनसीपी को ज्यादा सफलता मिली, तो शरद पवार के नेतृत्व वाली एनसीपी ने अब कांग्रेस नेतृत्व से यहां ज्यादा सीटों की दावेदारी कर दी है। इसको लेकर दोनों दलों के बीच खींचतान जारी है। संभावना यह भी है कि सीटों को लेकर इस बार दोनों दलों का गठबंधन टूट जाए। यदि ऐसा कुछ हो गया, तो इसका सीधा फायदा भाजपा-शिवसेना गठबंधन को मिल जाएगा। तमाम अनुकूल स्थितियों के बावजूद भाजपा-शिवसेना के गठबंधन में भी सबकुछ ठीकठाक नहीं है। क्योंकि, चुनाव के पहले ही शिवसेना नेतृत्व ने दबाव बनाना शुरू कर दिया है कि इस बार मुख्यमंत्री का चेहरा उसकी पार्टी का होगा। लेकिन, यह बात टीम मोदी हजम करने को तैयार नहीं है।
 
जून में एक सड़क हादसे में केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे का आकस्मिक निधन हो गया था। वे मोदी मंत्रिमंडल के कद्दावार नेता थे। भाजपा की महाराष्ट्र की राजनीति में उनकी खास जगह थी। माना जा रहा था कि भाजपा नेतृत्व उन्हें मुख्यमंत्री चेहरे के रूप में प्रस्तुत करेगा। लेकिन, मुंडे के निधन से भाजपा की तमाम रणनीति ध्वस्त हो गई है। इसका फायदा भी शिवसेना नेतृत्व उठाना चाहता है। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने महाराष्ट्र में गठबंधन बनाए रखने के बारे में एनसीपी प्रमुख शरद पवार से बात की है। यही कहा है कि दोनों दल आपसी गिले शिकवे मिल-बैठकर निपटा लें। ताकि, एकजुटता के जरिए टीम मोदी को शिकस्त दी जा सके। कांग्रेस भी राज्यों के चुनाव में महंगाई को ही प्रमुख मुद्दा बनाने के फेर में है। क्योंकि, इसी मुद्दे पर टीम मोदी ने लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को खास तौर पर मात दी थी।
 
हरियाणा में कांग्रेसी नेतृत्व वाली भूपेंद्र सिंह हुड्डा की सरकार है। यहां पर लोकसभा के चुनाव में हुड्डा का जादू नहीं चल पाया। 10 में से 7 सीटें भाजपा के हाथ लगीं। जबकि दो सीटों पर ओमप्रकाश चौटाला की पार्टी इनेलो की झोली में गईं। महज एक सीट कांग्रेस के हाथ लगी। इस चुनाव में भाजपा का समझौता हरियाणा जनहित कांग्रेस से था। लेकिन, इस पार्टी को किसी सीट पर सफलता नहीं मिली। ऐसे में, आसार हैं कि विधानसभा चुनाव में भाजपा, इनेलो से हाथ मिला ले। ताकि, भूपेंद्र सिंह हुड्डा के जाट वोट बैंक को चुनौती दी जा सके। लेकिन, भाजपा का एक गुट ओम प्रकाश चौटाला और उनके कुनबे की खराब छवि का हवाला देकर गठबंधन की रणनीति को ठीक नहीं मान रहा। इस गुट का दबाव है कि कांग्रेस के असंतुष्ट दिग्गज नेता चौधरी वीरेंद्र सिंह को अपने पाले में ले आया जाए। उनको ही मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करके चुनाव लड़ा जाए, तो कांग्रेस की रणनीति यहां फ्लॉप हो सकती है। भाजपा की इस तैयारी की भनक लगी, तो कांग्रेसी नेतृत्व ने अपने असंतुष्ट नेता चौधरी वीरेंद्र सिंह की मनुहार एक बार फिर शुरू कर दी है। भाजपा रणनीतिकारों की खास चिंता यह है कि विधानसभा के चुनावों में यदि पार्टी को लोकसभा चुनावों की तरह सफलता नहीं मिली, तो फिर यह प्रचार शुरू होगा कि अब टीम मोदी की राजनीतिक चमक उतार पर है। सो, भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व जी जान से किसी तरह सफलता के झंडे गाड़ने के लिए हाथ-पैर मारने लगा है।

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लेखक वीरेंद्र सेंगर डीएलए (दिल्ली) के संपादक हैं। इनसे संपर्क virendrasengardelhi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है।

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